#internet ke karn khatm hoti padne ki adat

     आज मै  आपसे अपना अनुभव साझा करना चाहती हूँ।  मै  भाषण प्रतियोगिता में भाग लेने गयी। वहाँ  पर बहुत से विद्व्दजन उपस्थित थे। उनके सामने मै  स्वय को बौना  महसूस कर रही थी। उस प्रतियोगिता का विषय "-इंटरनेट के कारण पढ़ने  की ख़त्म होती आदते " था। मेने इस विषय पर बहुत सी किताबो में ढूंढा। इंटरनेट पर शोध किया। लेकिन मुझे कोई भी सामग्री पसंद नही आई। लेकिन मेने अपने हिसाब से इस विषय पर बोल दिया।
      उन सबके सामने अपने विषय पर बोल कर आई तो मेरे अंदर निराशा भर गयी। जो मेने इस विषय पर बोला था वह बाकि सबसे अलग था। मेने उसमे किसी लेखक का उद्धहरण और कविता की पंक्तिया नही जोड़ी थी। मुझे लग रहा था। मेरा सभी लोग मजाक उड़ाएंगे। मुझे पुरुस्कार मिलने की  कोई उम्मीद नही थी इसलिए मै  पीछे के रास्ते से कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद निर्णायक पल का इंतजार करने की अपेक्षा  वापस आने में अपनी भलाई समझी।
      मै  पीछे के रास्ते  से निकलने की कोशिश कर रही थी। तो वहाँ  बैठे लोगो ने कहाँ आपने  बहुत अच्छा भाषण दिया है। आपके हर शब्द मन को छू रहे थे। सिर्फ आपका बोला हुआ हमें समझ आया है  बाकि किसी का हमें समझ नही आया वे क्या बोल गए।
     जहाँ  मुझे अपने प्रयास पर ग्लानि हो रही थी। वही उन शब्दों ने मेरे मन में उत्साह भर दिया। वही  भाषण में आपके सामने प्रस्तुत कर रही हूँ। इसके दुवारा में आपसे शाबासी की उम्मीद नही कर रही हूँ। बल्कि मेरी जैसी स्थिति में फंसे लोगो को एक विषय चुनने में मदद करना चाहती हूँ।
    " मेरे हिसाब से इंटरनेट ने हमारी सोचने और काम करने की दुनिया बदल दी है। पहले समय में हमें किताबे ढूँढना और उन तक पहुंचना बहुत मुश्किल होता था। मुझे बचपन से ही किताबे पड़ने की आदत थी। हमें बचपन से ही पुस्तकालय का मेंबर बनबा  दिया गया था। हमारे पड़ोस में दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी की बस आती  थी। हम वहाँ  से कहानियों की  किताबे लेकर  पढ़ते  थे।
     उसके बाद बड़े होने पर हमें नोट्स  बनाने के लिए किताबो की जरूरत पड़ने लगी तब मुश्किलो का सामना करना पड़ा। हमें कॉलेज और स्कूल की लायब्रेरी में किताबे  मिलती नही थी या जो विषय किताब में चाहिए होता था उसके पन्ने  फ़टे होते थे। हमारी सारी  मेहनत बेकार चली जाती थी। ऐसे मै  हमारा समय और पैसे दोनों बर्बाद हो जाते थे..
      बिना काम के पूरा हुए घर पहुचने पर माँ की डांट  साथ में खानी  पड़ती थी। उन्हें लगता था हम झूठ बोल रहे है। उन्हें अपनी बात समझाने  में असफल होते थे। शायद आप मेरी विपदा समझ सके। 
       हम बहुत अमीर  नही थे। हमें बहुत सारी  किताबे खरीदने के लिए बहुत सारे पैसे भी नही मिलते थे। इसलिए  हम हमेशा अच्छी और साबुत किताब के मिलने के लिए एक से दूसरी लायब्रेरी के चककर  ही लगाते  रहते और डांट  खाते  रहते थे।
     जब पैसे की तंगी ख़त्म हो गयी। हम पढ़ाई  पूरी कर चुके तो हमें विविध विषयो की किताबे ढूंढने में एड़ी -चोटी  का जोर लगाना पड़ा। हमारे आस -पास के लोग किताबो के शौकीन नही थे इसलिए दुकान दार जिस किताब के ग्राहक ज्यादा होते थे केवल वही  किताबे रखते थे। हम जैसे लोगो की किताबे उनके पास मिलती ही नही थी। उनसे अनुग्रह करने पर भी वे हमारी पसंद की किताबे मंगवाने के लिए तैयार नही होते थे। हमारी सारी मेहनत और दौलत  हमारी  जरूरत पूरी करने में असमर्थ थी।
      जब से इंटरनेट का प्रयोग शुरू हुआ। हमें सारी  सामग्री उपलब्ध आसानी से हो जाती है। या इसके माध्यम से हम अपनी पसंद की पुस्तके आसानी से मंगवा सकते है। अब मन में कोई घुटन का अहसास नही होता है।
   मेरे पास समय का आभाव हे क्योंकि में खुद नौकरी करती हूँ। घर के कामकाज के बाद किताब पढ़ने  का समय निकालना और भी मुश्किल होता है। लेकिन मेरी ये उलझन लेपटोप और मोबाइल के कारण दूर हो जाती है। में जब भी खाली  होती हूँ। अपने मोबाईल के द्वारा पसंद की किताब ढूंढ  कर पढ़ने  लगती हूँ।
     नई पीढ़ी ने प्रसिद्ध साहित्यकारों की किताबे नही पढ़ी  है। लेकिन वे इंटरनेट या t.v के द्वारा उनकी नाटकीय प्रस्तुति देख कर उनसे रूबरू हो जाते है। एक इन्द्रिय से प्राप्त ज्ञान याद करने में मुश्किल होती है। लेकिन नाटक के माध्यम  से  कई इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान भुलाये नही भूलता। बच्चे उनका साहित्य नई  विधा के माध्यम से प्राप्त कर रहे है। इसका हमें अफ़सोस नही करना चाहिए। ज़माने की दौड़ से उन्हें पीछे रखना कहाँ  का इंसाफ है.
     इंटरनेट के माध्यम से सभी देशो के अच्छे साहित्यकारों की किताबे आज हम घर बैठे मँगवा  लेते है जो पहले असंभव था। हमें पुराने समय के लोगो के सामान नई  पीढ़ी को बंधनो में बांधने  की अपेक्षा उन्हें खुले आकाश में उड़ने की सहूलियत देनी चाहिए। इंटरनेट के द्वारा हमारे बहुत से काम आसान हो गए है। सभी चीजो से लाभ और हानि दोनों  होते है लेकिन हानि के डर  से लाभ की उपेक्षा करने से सभी को नुकसान का सामना करना पड़ेगा। इसलिए ये कहना उचित है की इंटरनेट ने हमारी पढ़ने  की आदतो को कम  नही किया है बल्कि हम पहले से अधिक जागरूक हो गए है। हम नए माध्यमो के द्वारा उनसे रूबरू होते रहते है। 

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