वेद ने खुद को काम में डुबो दिया। उसकी ख़ुशी और गम सब काम थे। उसके अपने एक -एक करके उससे दूर होते जा रहे थे। उसका पोता इस समय कक्षा 12 का पेपर दे रहा था।
उसने उसे कह दिया था -यदि मेरे पास पढ़ाई पूरी करने के बाद आकर रहना चाहते हो तो आ सकते हो।
पोते नरेश ने कहा -हा दादाजी में दिल्ली आपके पास आकर रहना चाहता हूँ।
नरेश ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वेद के पास आकर रहना शुरू कर दिया। नरेश के आने से उसके चाचा शेखर को बहुत बुरा लगा। वह वेद से बहुत लड़ने लगा। वेद की बेटियो को भी नरेश का वेद के पास आकर रहना अच्छा नही लगा। उनके सामने मनोज का व्यवहार उन्हें सोचने पर मजबूर कर देता था।
वे कहती -जैसा बाप था उसका बेटा भी वैसा होगा। आप इसके लिए कितना भी अच्छा करो ये कभी आपका उपकार नही मानेगा। आप इसके कारण फिर से दुःख उठाओगे। हमसे आपका दुःख देखा नही जायेगा। बेटियाँ पिता के लिए कुछ कर नही पाती लेकिन उनके दुखी होने पर उनसे रहा नही जाता। अब जमाना ऐसा हो गया है कोई किसी को अच्छे के लिए सलाह दे तो भी वह उसे तीर के सामान चुभती है। अभी वह आपका आभारी है। लेकिन कुछ समय बाद उसे आपका किया हुआ त्याग दिखाई नही देगा बल्कि उसे आपके हर काम में कमी दिखाई देगी। आपने अपने रिश्तेदारो के कारण बहुत दुःख उठाया है। अब आप अपने पोते के कारण भी सुखी नही रह पाओगे।
अधिकतर वेद उनके कहने पर चुप रह जाते। कभी -कभी कहते -मै अपने बेटो के सामान कैसे हो सकता हूँ। जब नरेश चुप -चाप मेरे सामने आकर खड़ा हो जाता है। मै उससे जाने के लिए कैसे कह दू। आखिर वो बिन बाप का बेटा है। मेरा पोता है। जिसके पैदा होने पर मेरे जीवन में खुशियाँ बिखर गयी थी। उसका उतरा मुँह देखकर मेरा दिल कचोटता है। लाली मै इतना सख्त कभी नही था। अब तो मेरे सामने मेरा पोता निराश -हताश होकर आता है। मुझसे उसका दर्द देखा नही जाता। नरेश मेरे सामने गलत शव्द नही बोलता जबकि मेरे बेटे हमेशा मेरा अपमान करते थे। उसके बाद भी मेने हमेशा उनकी मदद की। अब नरेश के लिए मुझे कुछ करने से मत रोको। जब तक वह मेरे साथ रहना चाहता है। उसे मै मना नही कर सकता।
वेद की दो बेटियाँ उनका उत्तर सुनकर शांत हो गयी। उन्होंने सोचा सारी मेहनत और पैसा बाउजी का है। वे अपने पैसो को जैसा चाहे वैसा खर्च करे। उन्हें यदि नरेश के लिए कुछ करके ख़ुशी मिलती है तो हम रोकने वाले कौन होते है। उनकी ख़ुशी ही हमारी ख़ुशी है।
वेद की दूसरी दो बेटियो ने नरेश को कभी स्वीकार नही किया। वे मनोज की मौत के लिए उसके परिवार को जिम्मेदार मानती रही ।
वे साफ शब्दों में वेद के सामने कह देती थी -आप अपने बेटे की मौत भुला सकते हो लेकिन हम उसकी मौत के लिए जिम्मेदार लोगो को कभी माफ़ नही कर सकते।
वेद के लिए नरेश को अपने साथ रखना आसान नही था क्योंकि सभी के लिए उसके अभिभावकों का व्यवहार ठीक नही था। वे वेद के साथ का व्यवहार भुला नही पाते थे। ऐसे ही कारखाने के मोर्चे पर भी वेद को अपने पार्टनर का विरोध सहन करना पड़ा।
उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया -यदि आपका पोता इस कारखाने में बैठेगा तो हम आपके साथ काम नही करेंगे। हमारे साथ काम करने के लिए आपको अपने पोते को यहाँ से हटाना होगा।
वेद ने उनसे अपना पक्ष रखते हुए कहा -जब मेने आपके सहयोग से कारखाना खोला था तब के हालात कुछ और थे। उस समय मेने ऐसी स्थिति आएगी कल्पना भी नही की थी। आज उसका बाप नही है। में उसकी जिम्मेदारी लेने के लिए मजबूर हो गया हूँ। में आपका प्रस्ताव नही मान सकता।
इस पर देवदत्त ने वेद के साथ पार्टनरशिप खत्म कर दी। उनके अनुसार देवदत्त ने वेद पर जो पैसा लगाया था। वह वेद को ब्याज सहित चुकाना था। इसके बाद ही नरेश उसके कारखाने में बैठ सकता था अन्यथा वे नरेश को अपने कारखाने में बैठा नही सकते थे।
वेद ने कहा -मै आपका सारा पैसा चूका देता हूँ। आप मुझे कुछ समय की मोहलत दीजिये।
वेद ने देवदत्त का सारा पैसा चुका दिया। अब वह अपने कारखाने का सर्वेसर्वा था। उस पर किसी की रोक टॉक नही थी। . लेकिन इसकी कीमत उसे बहुत बड़ी चुकानी पड़ी। उसे अब मकान का किराया चुकाना पड़ता था। अबसे पहले मकान देवदत्त का होने के कारण उसे कुछ नही देना पड़ता था।सारी मशीनो की कीमत उसने एक मुश्त दी।
इसके कारण वेद के पास नकद पैसा बिलकुल ख़त्म हो गया लेकिन अब नरेश जब चाहे वेद के कारखाने में आकर बेठ सकता था।
देवदत्त एक सफल व्यापारी था। वह लोगो के गुणों को देखकर उन पर पैसा लगाता था। उसने वेद पर ये सोच कर पैसा लगाया था जब तक वेद मेहनत कर रहा है उसकी मेहनत का फल उसे मिलता रहेगा। उसके जाने के बाद सारा सामान अपने आप उसे वापस मिल जायेगा। उसने लिखित मै ऐसे पेपर बनवा कर पार्टनरशिप की थी। उस समय किसी को भी ऐसे हालत बदल जायेंगे इसकी उम्मीद नही थी।
उसने उसे कह दिया था -यदि मेरे पास पढ़ाई पूरी करने के बाद आकर रहना चाहते हो तो आ सकते हो।
पोते नरेश ने कहा -हा दादाजी में दिल्ली आपके पास आकर रहना चाहता हूँ।
नरेश ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वेद के पास आकर रहना शुरू कर दिया। नरेश के आने से उसके चाचा शेखर को बहुत बुरा लगा। वह वेद से बहुत लड़ने लगा। वेद की बेटियो को भी नरेश का वेद के पास आकर रहना अच्छा नही लगा। उनके सामने मनोज का व्यवहार उन्हें सोचने पर मजबूर कर देता था।
वे कहती -जैसा बाप था उसका बेटा भी वैसा होगा। आप इसके लिए कितना भी अच्छा करो ये कभी आपका उपकार नही मानेगा। आप इसके कारण फिर से दुःख उठाओगे। हमसे आपका दुःख देखा नही जायेगा। बेटियाँ पिता के लिए कुछ कर नही पाती लेकिन उनके दुखी होने पर उनसे रहा नही जाता। अब जमाना ऐसा हो गया है कोई किसी को अच्छे के लिए सलाह दे तो भी वह उसे तीर के सामान चुभती है। अभी वह आपका आभारी है। लेकिन कुछ समय बाद उसे आपका किया हुआ त्याग दिखाई नही देगा बल्कि उसे आपके हर काम में कमी दिखाई देगी। आपने अपने रिश्तेदारो के कारण बहुत दुःख उठाया है। अब आप अपने पोते के कारण भी सुखी नही रह पाओगे।
अधिकतर वेद उनके कहने पर चुप रह जाते। कभी -कभी कहते -मै अपने बेटो के सामान कैसे हो सकता हूँ। जब नरेश चुप -चाप मेरे सामने आकर खड़ा हो जाता है। मै उससे जाने के लिए कैसे कह दू। आखिर वो बिन बाप का बेटा है। मेरा पोता है। जिसके पैदा होने पर मेरे जीवन में खुशियाँ बिखर गयी थी। उसका उतरा मुँह देखकर मेरा दिल कचोटता है। लाली मै इतना सख्त कभी नही था। अब तो मेरे सामने मेरा पोता निराश -हताश होकर आता है। मुझसे उसका दर्द देखा नही जाता। नरेश मेरे सामने गलत शव्द नही बोलता जबकि मेरे बेटे हमेशा मेरा अपमान करते थे। उसके बाद भी मेने हमेशा उनकी मदद की। अब नरेश के लिए मुझे कुछ करने से मत रोको। जब तक वह मेरे साथ रहना चाहता है। उसे मै मना नही कर सकता।
वेद की दो बेटियाँ उनका उत्तर सुनकर शांत हो गयी। उन्होंने सोचा सारी मेहनत और पैसा बाउजी का है। वे अपने पैसो को जैसा चाहे वैसा खर्च करे। उन्हें यदि नरेश के लिए कुछ करके ख़ुशी मिलती है तो हम रोकने वाले कौन होते है। उनकी ख़ुशी ही हमारी ख़ुशी है।
वेद की दूसरी दो बेटियो ने नरेश को कभी स्वीकार नही किया। वे मनोज की मौत के लिए उसके परिवार को जिम्मेदार मानती रही ।
वे साफ शब्दों में वेद के सामने कह देती थी -आप अपने बेटे की मौत भुला सकते हो लेकिन हम उसकी मौत के लिए जिम्मेदार लोगो को कभी माफ़ नही कर सकते।
वेद के लिए नरेश को अपने साथ रखना आसान नही था क्योंकि सभी के लिए उसके अभिभावकों का व्यवहार ठीक नही था। वे वेद के साथ का व्यवहार भुला नही पाते थे। ऐसे ही कारखाने के मोर्चे पर भी वेद को अपने पार्टनर का विरोध सहन करना पड़ा।
उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया -यदि आपका पोता इस कारखाने में बैठेगा तो हम आपके साथ काम नही करेंगे। हमारे साथ काम करने के लिए आपको अपने पोते को यहाँ से हटाना होगा।
वेद ने उनसे अपना पक्ष रखते हुए कहा -जब मेने आपके सहयोग से कारखाना खोला था तब के हालात कुछ और थे। उस समय मेने ऐसी स्थिति आएगी कल्पना भी नही की थी। आज उसका बाप नही है। में उसकी जिम्मेदारी लेने के लिए मजबूर हो गया हूँ। में आपका प्रस्ताव नही मान सकता।
इस पर देवदत्त ने वेद के साथ पार्टनरशिप खत्म कर दी। उनके अनुसार देवदत्त ने वेद पर जो पैसा लगाया था। वह वेद को ब्याज सहित चुकाना था। इसके बाद ही नरेश उसके कारखाने में बैठ सकता था अन्यथा वे नरेश को अपने कारखाने में बैठा नही सकते थे।
वेद ने कहा -मै आपका सारा पैसा चूका देता हूँ। आप मुझे कुछ समय की मोहलत दीजिये।
वेद ने देवदत्त का सारा पैसा चुका दिया। अब वह अपने कारखाने का सर्वेसर्वा था। उस पर किसी की रोक टॉक नही थी। . लेकिन इसकी कीमत उसे बहुत बड़ी चुकानी पड़ी। उसे अब मकान का किराया चुकाना पड़ता था। अबसे पहले मकान देवदत्त का होने के कारण उसे कुछ नही देना पड़ता था।सारी मशीनो की कीमत उसने एक मुश्त दी।
इसके कारण वेद के पास नकद पैसा बिलकुल ख़त्म हो गया लेकिन अब नरेश जब चाहे वेद के कारखाने में आकर बेठ सकता था।
देवदत्त एक सफल व्यापारी था। वह लोगो के गुणों को देखकर उन पर पैसा लगाता था। उसने वेद पर ये सोच कर पैसा लगाया था जब तक वेद मेहनत कर रहा है उसकी मेहनत का फल उसे मिलता रहेगा। उसके जाने के बाद सारा सामान अपने आप उसे वापस मिल जायेगा। उसने लिखित मै ऐसे पेपर बनवा कर पार्टनरशिप की थी। उस समय किसी को भी ऐसे हालत बदल जायेंगे इसकी उम्मीद नही थी।
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