#kanjak

    आज नवरात्र का त्यौहार है। हमारे यहाँ अंतिम दिन कंजक के रूप में लड़कियों को बुला कर उनका आबभगत  किया जाता है। दिल्ली जैसी जगह पर लड़कियों की कमी दिखाई देती है। जब एक परिवार कंजक के लिए लड़कियों को बुला लेता है। उन्ही लड़कियों को दूसरा परिवार अपने घर आमंत्रित कर लेता है। इस तरह एक परिवार में बुलाई गयी लड़कियाँ एक साथ कई परिवारो की मेहमान बन के अपने घर बापिस लौट पाती है।
     इसी तरह मेरे साथ वाले परिवार ने जब अपने घर कंजक बुलाई उन्ही को मेने अपने घर आमंत्रित कर लिया। उसमे  हिन्दू परिवार की लड़कियों के आलावा दो बच्चे मुस्लिम परिवार के भी थे। उन्हें कंजक के रूप में देखकर मुझे काफी हैरानी हुई। मुझे समझ नही आया। इनके बारे में दूसरे परिवार को पता था या नही। वह मुस्लिम परिवार अभी हमारे पड़ोस में रहने आया था। उनको अपने घर कंजक के रूप में बुलाते हुए कुछ झिझक मुझे हो रही थी। क्योंकि नौकरी में तो  मुस्लिम लोग मेरे दोस्त रहे थे। लेकिन इस तरह के त्यौहार में ऐसा मौका कभी नही आया था।
    मेने उन्हें भगवान  का रूप समझ कर उनकी भी पूजा कर दी। जब उनके माता -पिता को झिझक नही थी तो मेने भी बंधनो में बंधने की अपेक्षा उनका स्वागत किया। मेरे घर से निकलने के बाद वे बच्चे कई और घरो में कंजक खाने गए।
    इस बात को उठाने का कारण केवल इतना है। जब हिन्दू मुस्लिम पास रहते है तो उनमे सौहाद्र पनपने लगता है। वे दुश्मन की तरह व्यवहार नही करते लेकिन जब दोनों समुदाय के लोग दूर रहते है। उनमे एक झिझक और डर होता है। लेकिन वे परस्पर दुश्मन नही होते बल्कि अपनी जिंदगी अपने तरीके से जी रहे होते है।
    इस तरह के संबंधो को अराजक तत्व या नेता लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए साम्प्रदायिकता का नाम दे देते है। में उन लोगो को ईद मुबारक कह देती हूँ। हमारे बीच बहुत अच्छे सम्बन्ध नही है। लेकिन उन्हें आप बुरा भी नही कह सकते। जैसे और पड़ोसियों के साथ सम्बन्ध होते है। उतना सम्बन्ध उनके साथ भी है।      मेने इस बारे में अपने परिवार में बताया तब मेरे बच्चे कहने लगे -इनके लिए कंजक का महत्व है। ये बच्चे इस खाने को सही ढंग से खाएंगे। बाकि बच्चो को इस दिन इतनी अधिक संख्या में खाने के लिए मिल जाता है कि  वे खाने का निरादर करते है। उन्हें इस दिन मिलने वाले पैसे और उपहार से मतलब होता है। बहुतायत में होने के कारण खाने का सही उपयोग नही हो पाता।
      हमारे यहाँ कंजक का खाना सिर्फ छोटे बच्चे ही खाते है। इस खाने की बर्बादी ज्यादा होती है। मेरे घर से कंजक खाकर गए बच्चो को लगभग एक घंटा हुआ था। मेने एक परिवार को थाल  भरकर खाना गाय के सामने डालते देखा। मुझे देखकर दुःख हुआ इतनी मेहनत से बना हुआ खाना आज के समय में इतना बर्बाद हो रहा है।  आज भी बहुत बच्चे अच्छे और पेट भर खाने से महरूम है। दूसरी तरफ इतनी खाने की बर्बादी मन को झकझोर जाती है। 

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