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       वेद के दोस्त देवदत्त उनको बचपन से जानते थे। उनकी जानपहचान लाहोर के दिनों से थी। दोनों ने भारत बिभाजन का दंश समान रूप से झेला  था। उस कटुता ने उनको सोना बना दिया था। उनकी जवानी संघर्षो का सामना करते हुए बीत गयी। लेकिन उनके संघर्षो ने उन्हें आज बुलंदी पर पहुंचा दिया था। वह अपने इलाके की जानी -मानी हस्ती बन गए थे।
      वे बहुत गरीबी में पले  थे। उनके पिताजी का छोटी उम्र में देहावसान हो गया था। उनकी माँ ने मजूरी करके बच्चो को पाल -पोस  कर  बड़ा किया। छोटी उम्र में पैसो के अभाव के कारण वे विद्यालय जाने में असमर्थ रहे। इसलिए उन्हें आप अनपढ़ कह सकते है।
       देव की कई फैक्टरी थी। उसने अपना बहुत सा पैसा प्रॉपर्टी खरीदने और बेचने में लगा रखा था।   उनके पास अब  शाम के समय बहुत  अधिक नोट आते थे। उन्हें इन नोटों को गिनना तक नही आता था। वे उसको एक के ऊपर एक रखकर समझते थे ये एक लाख हो गए या दो  लाख हो गए। उनके सहयोगी जब चाहे उनकी रोज की आमदनी में से कुछ नोट निकाल लेते तो वे इसका अंदाजा नही लगा सकते थे।    लेकिन वे अपने बुरे दिन आज भी नही भूल पाये थे।
     वेद को  अपनी लाचारी के दिनों में देवदत्त की याद आयी।  जब वेद उसके पास पहुंचे तब देवदत ने वेद का बड़े जोश के साथ स्वागत किया। उसकी विपदा सुनकर देवदत्त को बहुत दुःख हुआ।
    उसने कहा - क्या भगवान से ऐसे दिन देखने के लिए बेटे मांगते है। जो बुढ़ापे में अपने पिता का ध्यान ना  रखे। तू चिंता मत कर जब तक तेरे पास कोई काम नही है। तू मेरे पास आ जा। तेरे जैसे मेहनती काविल  और ईमानदार  इंसान के लिए  कामो की कोई कमी नही होगी। अभी मुझे तेरे लायक काम समझ नही आ  रहा लेकिन गल्ले पर एक ईमानदार इंसान की मुझे हमेशा जरूरत रहती है। तू जानता हे में पढ़ाई नही कर सका। इस लिए जो कुछ मेरे पास हे किस्मत से मिला है। मुझे कोई भी पेसो के मामले में धोखा दे सकता है। तू पड़ा लिखा है। मुझे तुझ पर भरोसा है तू मेरा सहायक बनेगा तो कोई मुझे धोखा नही दे सकेगा।  तुझे देखकर मुझे लाहौर के दिन याद आ जायेंगे। तू अपनी जिम्मेदारियों से आजाद हो चूका है। मेरी भी सारी  जिम्मेदारी पूरी हो चुकी है। हम दोनों बुड्ढों के लिए लोगो के पास समय भी नही है। हम दोनों हमउम्र है  एक दूसरे को अच्छी तरह समझते है। दोनों परस्पर आपस में बोल- बतिया कर अपने दुःख - दर्द साझा करेंगे।
    वेद को उसके शब्द सुनकर हैरानी हुई कि उसके जैसे अमीर इंसान के जीवन में भी दुःख हो सकते है या वह उसका मन रखने के लिए ऐसे शव्दो का इस्तेमाल कर रहा है।
     वेद से दोनों बेटो ने मुँह  मोड़ लिया था। उन्होंने ये भी जरूरी नही समझा उनका पिता अपना पेट कैसे भरता है। वे अपने जीवन की रंगीनियों में खोये रहे।
         देवदत्त ने वेद का ध्यान रखा।  देवदत्त ने वेद को अपने साथ बिठाने के बदले आर्थिक मदद करनी शुरू कर दी। दोपहर के समय जब देव खाना खाने जाता तो वह वेद को भी जबरदस्ती अपने साथ ले जाता। उसे खाना खाने के लिए मजबूर करता। इस तरह एक समय के खाने का इंतजाम देव के साथ हो गया। सुबह वेद दूध और ब्रेड का नास्ता करके चले जाते।  शाम के समय फिर से किसी तरह अपना पेट भरने का इंतजाम कर लेते। लेकिन किसी भी बेटे ने उनसे खाने के लिए आग्रह नही किया इसी तरह काफी समय बीत गया।
     एक दिन देवदत्त ने वेद से कहा -मेरे पास मशीनो के  काम की पेशकश लेकर  कोई आया है उन मशीनो को ठीक करने के लिए बाजार में कोई नही  है। उसकी हमारे बाजार में बहुत मांग हे।  तुम्हारे पास तकनिकी ज्ञान है। मेरे पास पैसा है। यदि दोनों मिल जाये तो कैसा  रहे। इसमें हम पार्टनर बन कर नए रास्ते पर निकल सकते है।
    वेद को उसका प्रस्ताव पसंद आया। दोनों ने नई पार्टनर शिप में काम शुरू कर दिया। फैक्टरी खोलने के लिए देव ने जगह भी मुहैया करा दी अब वेद को उसमे मेहनत करनी थी। उसको जोखिम का सामना करने के लिए एक मजबूत साथी भी मिल गया था।
     वेद की मेहनत और उसकी इच्छाशक्ति ने फिर से उसे अपने पैरो पर खड़ा कर दिया। वेद ने बहुत साधारण जिंदगी जी थी। उसकी महत्वाकांक्षा ज्यादा बड़ी नही थी.वह केवल इज्जतदार और सम्मान के साथ जिंदगी जीना चाहता था। उसने 71 साल की उम्र में फिर से एक नई फैक्टरी खड़ी  कर ली थी।
    इसे कहते है -जहाँ  चाह होती है वहाँ राह निकल आती है.वरना कौन सोचता है। 71 साल का इंसान नए इरादो के साथ नई मंजिल तक पहुँच सकता है। उनके बेटो ने उन्हें अपने ऊपर जबरदस्ती की जिम्मेदारी समझना  शुरू कर दिया था। ये वेद को मंजूर नही था। एक कर्मठ इंसान दुसरो के रहमोकरम पर जीना कभी पसंद नही करता। ये वेद ने फिर से अपनी मेहनत से चरितार्थ करके दिखा दिया था।  

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