नरेश अपने दादाजी के पास आना नही चाहता था। वह कई अन्य रिश्तेदारो के पास रहा। लेकिन कुछ दिनों में उसका मन वहाँ से भी उचट जाता। नरेश जिसके घर जाता सबके अपने परिवार थे। उनके परिवार के साथ उसे कुछ समय अच्छा लगता लेकिन कुछ समय में वह अपने को बेगाना महसूस करने लगता तो वह वहाँ से दूसरी मंजिल की तलाश में निकल पड़ता अंतत उसकी तलाश दादाजी के पास आकर ख़त्म हो जाती।क्योंकि दादाजी अकेले रहते थे। वे नरेश का पूरा ध्यान रखते थे। जिसे कहते है -तुझे और नही मुझे ठौर नही। ये हालत वेद और नरेश की थी। दोनों को एक दूसरे का सहारा था इसलिए नरेश कभी भी वेद के पास आ जाता था।
अचानक वह एक दिन चुपचाप दादाजी के पास आकर रहने लगता ऐसा कई बार हुआ। वेद ने नरेश से कभी भी उसके आने और जाने का कारण नही पूछा। लेकिन और रिश्तेदारो के मन में जिज्ञासा पैदा होती थी। ये सब क्या है। नरेश जिस रिश्तेदार के घर जाकर रहता। वे वेद को आकर उसकी लाचारी बताते तो वेद को बहुत दुःख होता। लेकिन वेद का बुढ़ापा और अपनों से मिली अवहेलना ने उसे मजबूर कर दिया था।
वह कहते- बेटा बुढ़ापा लाचारी का नाम है। मेरा क्या मै कितने दिन का मेहमान हूँ। मै खुद नही जानता इसे किस बात का दिलासा दू। इसे अपने पास रखने का अधिकार भी मेरे पास नही है। जिन पर मेरा अधिकार था। वे मुझसे दूर हो गए। ये दूसरे की अमानत है। जितने दिन चाहे आकर रह सकता है। मै इसे जाने के लिए नही कह सकता। इसका मुरझाया चेहरा देख कर मेरा दिल कचोटता है। आखिर हे तो मेरा खून। कभी इसमें मेरी जान बसती थी। इसके बाप का किया इस पर कैसे उतार सकता हूँ..
वेद के दर्द में डूबे शब्द सबका मुँह बंद कर देते थे।वेद अब काफी बीमार रहने लगे थे। उनकी उम्र अब 80 साल से ज्यादा हो गयी थी। वेद कर्मठ थे इसलिए वे अपनी उम्र के लोगो से ज्यादा स्वस्थ और काम कर रहे थे।
वे हमेशा अपनी फैक्टरी में जाकर बैठते थे। उनकी फैक्टरी का काम उनके सहायक सँभालते थे। जब वेद बहुत बीमार हो जाते तो सहायको को लगता इनके ना रहने से वे बेरोजगार हो जायेंगे। कुछ सहायको को लगता इनके ना रहने पर शायद वेद अपने कारखाने की जिम्मेदारी उसे सौंप जाये। जैसे सभी की साँस वेद की सांसो के साथ जुडी हुई थी।
ऐसे में उन्हें नरेश का वेद के साथ आकर रहना उचित लगता। वेद के अंदर पुराने संस्कार थे जिनके कारण वे बेटियो के घर जाकर नही रहना चाहते थे..उनकी कर्मठता उन्हें खाली बैठने नही देती थी। वे बीमारी से जरा सा स्वस्थ होते ही अपने कारखाने में जाकर बैठ जाते। जब भी कोई उन्हें घर में आराम से रहने के लिए कहता।
उनका एक जबाब होता -लाली में खाली नही बैठ सकता। मेरा मन ऊब जाता.jजब चार लोगो से मिलता हूँ।मुझे अपनी बीमारी याद नही आती। मुझे घर की चार दीवारी काटने को आती है।
वेद हमेशा काम में लगे रहे। सुकन्या को हमेशा वेद का हर समय काम करना खलता था। उन दोनों में इस बात को लेकर अक्सर झगड़ा होता था.सुकन्या को वेद के साथ रहने का वक्त नही मिला। अब वेद के पास वक्त था तो उससे मन की बात करने वाला साथी नही रहा था। उसे अब सारी खुशियाँ कारखाने में पहुँच कर ही मिलती थी।
अचानक वह एक दिन चुपचाप दादाजी के पास आकर रहने लगता ऐसा कई बार हुआ। वेद ने नरेश से कभी भी उसके आने और जाने का कारण नही पूछा। लेकिन और रिश्तेदारो के मन में जिज्ञासा पैदा होती थी। ये सब क्या है। नरेश जिस रिश्तेदार के घर जाकर रहता। वे वेद को आकर उसकी लाचारी बताते तो वेद को बहुत दुःख होता। लेकिन वेद का बुढ़ापा और अपनों से मिली अवहेलना ने उसे मजबूर कर दिया था।
वह कहते- बेटा बुढ़ापा लाचारी का नाम है। मेरा क्या मै कितने दिन का मेहमान हूँ। मै खुद नही जानता इसे किस बात का दिलासा दू। इसे अपने पास रखने का अधिकार भी मेरे पास नही है। जिन पर मेरा अधिकार था। वे मुझसे दूर हो गए। ये दूसरे की अमानत है। जितने दिन चाहे आकर रह सकता है। मै इसे जाने के लिए नही कह सकता। इसका मुरझाया चेहरा देख कर मेरा दिल कचोटता है। आखिर हे तो मेरा खून। कभी इसमें मेरी जान बसती थी। इसके बाप का किया इस पर कैसे उतार सकता हूँ..
वेद के दर्द में डूबे शब्द सबका मुँह बंद कर देते थे।वेद अब काफी बीमार रहने लगे थे। उनकी उम्र अब 80 साल से ज्यादा हो गयी थी। वेद कर्मठ थे इसलिए वे अपनी उम्र के लोगो से ज्यादा स्वस्थ और काम कर रहे थे।
वे हमेशा अपनी फैक्टरी में जाकर बैठते थे। उनकी फैक्टरी का काम उनके सहायक सँभालते थे। जब वेद बहुत बीमार हो जाते तो सहायको को लगता इनके ना रहने से वे बेरोजगार हो जायेंगे। कुछ सहायको को लगता इनके ना रहने पर शायद वेद अपने कारखाने की जिम्मेदारी उसे सौंप जाये। जैसे सभी की साँस वेद की सांसो के साथ जुडी हुई थी।
ऐसे में उन्हें नरेश का वेद के साथ आकर रहना उचित लगता। वेद के अंदर पुराने संस्कार थे जिनके कारण वे बेटियो के घर जाकर नही रहना चाहते थे..उनकी कर्मठता उन्हें खाली बैठने नही देती थी। वे बीमारी से जरा सा स्वस्थ होते ही अपने कारखाने में जाकर बैठ जाते। जब भी कोई उन्हें घर में आराम से रहने के लिए कहता।
उनका एक जबाब होता -लाली में खाली नही बैठ सकता। मेरा मन ऊब जाता.jजब चार लोगो से मिलता हूँ।मुझे अपनी बीमारी याद नही आती। मुझे घर की चार दीवारी काटने को आती है।
वेद हमेशा काम में लगे रहे। सुकन्या को हमेशा वेद का हर समय काम करना खलता था। उन दोनों में इस बात को लेकर अक्सर झगड़ा होता था.सुकन्या को वेद के साथ रहने का वक्त नही मिला। अब वेद के पास वक्त था तो उससे मन की बात करने वाला साथी नही रहा था। उसे अब सारी खुशियाँ कारखाने में पहुँच कर ही मिलती थी।
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