#sarkar ka insaf

      आज कल हर जगह समाचारो में दिखाई दे रहा है। मुस्लिम समुदाय के साथ बुरा बर्ताव हो रहा है। इसके विरोध स्वरूप अलग तरह से लोग कार्य कर रहे है।
     जव एक हिन्दू ने  केरल में कुछ मुस्लिम  धर्म के विरोध में बोल दिया तो  उसके दोनों हाथ काट दिए गए। किसी समाचार में उसके बारे में बताया गया। ऐसी खबरे समाचार वाले दिखाते ही नही है।
      केरल जैसे राज्य जो भारत का एक हिस्सा है। कोई रिक्शेवाला हिन्दू देवी देवता की फोटो नही लगा सकता। किसी समाचार में इसको विशेष खबर में दिखाया जाता है।
     मै किसी समुदाय के विरोध में नही हूँ। ना किसी धर्म की तरफदारी कर रही हूँ। मुझे किसी धर्म विशेष से कोई लगाव या नफरत नही है। में सिर्फ आपके सामने सच्चाई लाना चाहती हूँ। आप खुली आँखों से जिंदगी को देखने की कोशिश कीजिये।
    में जिस इलाके में रहती हूँ वहाँ मुस्लिम समुदाय के लोग  ज्यादा नही है  लेकिन दो मस्जिदे आमने -सामने बनी  हुई है। एक मस्जिद सड़क के एक तरफ तो दूसरी सड़क  के दूसरी तरफ है। एक सीधी रोड पर चार मस्जिदे बनी  हुई है। मुझे मस्जिदो के इतनी अधिक संख्या पर बने होने पर हैरानी होती है। जहाँ मुस्लिम समुदाय के लोग बहुत कम है वहाँ चार मस्जिदो का क्या औचित्य है। ये हमारी सरकार की धर्म के प्रति सहिष्णुता नही तो और क्या है।
    कुछ साल पहले उत्तेर प्रदेश सरकार की आई एस ऑफिसर दुर्गावती नागपाल  को नौकरी से निलंबित कर दिया गया था। आपको मालूम है क्यों। उस इलाके में एक मस्जिद बनायीं जा रही थी। उसने उसे रुकवाने के लिए प्रयास किये। उसके फलस्वरूप उस की दीवार गिरबा  दी । मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उसे पद से हटा दिया ।
    उसके बाद दूसरा अफसर  आया। उसने मस्जिद के मामले में कोई दखल नही दिया। आज वह मस्जिद बन के तैयार हो गयी है।  लेकिन उसकी खबर किसी समाचार में दिखाई और सुनाई नही दी।
    कई बार लगता है हम भारत में नही रहते बल्कि किसी मुस्लिम देश में रहते है। जहाँ  हिन्दुओ पर अत्याचार किसी मुस्लिम दुवारा होने पर कोई खबर नही बनती लेकिन यदि गुंडे किसी मुस्लिम के साथ अपराध को अंजाम देते है तो एकदम प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से इस्तीफा माँगा जाता है।
    हिन्दुओ की सुनवाई किसी और देश में नही है लेकिन भारत जैसे देश में भी हिन्दुओ को सिसक -सिसक कर जीना  पड़ेगा।
    कुछ समय पहले एक मुस्लिम आई  पी अफसर की मौत के एवज में अखिलेश सरकार ने उसके परिवार को  मुआवजे के रूप में 55  लाख रूपये दिए। इसकी खबर किसी समाचार में नही दिखाई दी। सिर्फ उसकी मौत पर शोर मचता रहा।
      अभी एक हिन्दू अफसर मनोज मिश्रा  की मौत ड्यूटी पर हो गयी। उसकी मौत पर उसके परिवार को मात्र 10  लाख दिए गए. इस अंतर पर कोई खबर नही दिखाई गयी। इस तरह की खबरे देखने पर लगता है। इतना अंतर सरकार कर रही है। इस अंतर पर आवाज उठाने के स्थान पर लोग केवल सरकार की नाकामी गिनाने में क्यों लगे है। सरकार का केवल काला पक्ष ही दिखाई देता है उनके द्वारा किया अच्छा काम कोई समाचार वाला क्यों नही दिखा रहा है।
      हम लोकतंत्र में रह रहे है। लोकतंत्र में कोई भी शासक निरंकुश नही हो सकता वह सीमाओ में रह कर ही काम  करना चाहते है। उन्हें काम करने का मौका दीजिये उसके हाथ मत बांधिए। उसका परिणाम हमें ही भोगना पड़ेगा। एक डरा हुआ इंसान कैसे किसी के साथ इंसाफ कर पायेगा। हमें उसके हाथ मजबूत करने चाहिए ना की उसके हाथो में जंजीरे बांध दी जाये, उसे नाकाम कर दिया जाये,उसका खामियाजा हम सभी को उठाना पड़ेगा। ये केवल वोट बैंक की राजनीति  है। उससे अपने आप को अलग करके सोचिये हमें क्या करना चाहिए।   

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