मनोज के ऊपर बहुत ज्यादा कर्ज चढ़ गया। उसका इस बीच मकान भी बिक गया। उसके परिवार के लोग उसे छोड़कर चले गए। वेद को तब उसके ऊपर आई विपदा पता चली। उसे मनोज के बारे में ज्यादा जानकारी नही थी।
वेद को मनोज के मकान बिकने की खबर भी अपनी बेटी हिना से चली। वे लोग इतने समय तक सबसे कट कर रहे। किसी ने उनके बारे में जानने की कोशिश भी नही की। जब वेद ने मनोज के ऊपर आई मुसीबत के बारे में जाना उसे बहुत दुःख हुआ। वेद को जिस बात का अंदेशा था अंतत वही मनोज के साथ घटा। वह पिता की सारी बातो को बेफजुल समझता था। उनकी आज्ञा का उल्लंघन करता था। इन्ही बातो के कारण मनोज ने घर छोड़ा।
जवानी में वेद से उसके पिता ने कारखाना ले लिया था। उसकी मेहनत के फल का कुछ ही समय में खात्मा हो गया था। वेद ने जवानी में उस दुःख को झेल लिया था। लेकिन बुढ़ापे में बेटे ने उसके लगाये कारखाने को ख़त्म कर दिया। उसके लिए इस दुःख से उबर पाना मुश्किल हो रहा था।
वेद का बेटा अपनी मर्जी का मालिक था। उसे अपने निर्णय सही लगते यदि पिता उसे समझाने की कोशिश करते तो वह आपे से बाहर हो जाता। वेद को नीचा दिखाने की कोशिश करता। वेद अपना सा मुँह लेकर रह जाता। अब मनोज के लेनदारों को उसके पिता के बारे में जानकारी मिल गयी थी कि वे साधन -सम्पन्न है । वह मनोज का कर्ज वसूलने के लिए वेद के कारखाने उसे धमकाने आने लगे। वेद सज्जन इंसान थे।
इस बात के लिए कर्जदारो को वह कहते -तुमने मुझसे पूछकर कर्ज दिया था। जो मुझसे वसूलने और यहाँ मेरा अपमान करने चले आते हो।
कर्जदार कहते -हमने पैसा दिया है। हमें यदि अपना कर्ज नही मिला तो हम मनोज को जिन्दा नही रहने देंगे।
एक पिता के लिए बेटे की मौत की धमकी कितनी दुखदायी होती है। यह एक पिता अच्छी तरह समझ सकता है। एक तरफ वेद के सामने पैसे का संकट तो दूसरी तरफ बेटे की जान बचाने की समस्या आ गयी थी। वह अपनी सारी जमापूंची देकर ही बेटे को कर्जदारो से छुड़वा सकता था।
जिस बेटे ने इतने बरसो तक अपने पिता की खोज खबर तक नही ली थी। उसने जिस पिता को बुढ़ापे में बोझ समझ लिया था। वह मनोज उस बूढ़े के आसरे फिर से आ गया था। ऐसे समय में वेद उसे नकार नही सका।
मनोज जो हर किसी से कर्ज के कारण छिपता फिर रहा था,जिन कर्जदारो से बचने के लिए उसका परिवार उसे छोड़ कर चला गया था। वे कर्जदार अब आये दिन वेद के कारखाने आकर मनोज का पता पूछने लगे उसे अपमानित करने लगे।
वेद उन इंसानो में से था जो आधा पेट भोजन करके इज्जत से जीने में अपनी शान समझते है। उस वेद को अब आये दिन कर्जदारो की धमकियों का सामना करना पड रहा था। वेद अपनी जिंदगी से बेजार हो गया था।
कई बार वह निराश हो कर कहता - क्या मेने ऐसी जिंदगी का सपना देखा था। जिसमे सिर्फ सारी उम्र मेहनत और दुःख सहना लिखा था।
जिस बेटे से मैने सारे रिश्ते तोड़ लिए थे। अब नई और अकेली जिंदगी जीते हुए उसके कर्जदार मुझे हर समय आकर अपमानित कर रहे है। वह उनसे बचता फिर रहा है। में अपना चलता हुआ काम छोड़कर कहाँ छिप जाऊ।
एक दिन हालत से बेजार होकर और मनोज की जिंदगी बचाने के लिए वेद ने अपनी सारी जमापूंजी कर्जदारो को देकर मनोज को कर्जमुक्त कर दिया। अब मनोज लोगो के सामने आने की हिम्मत जूटा पाया।क्योंकि कर्जदारो ने मनोज को ढूंढ कर उसको मारने के जुगाड़ कर लिए थे।
मनोज के पास कोई काम नही रहा था। उसे अपने को कामकाजी दिखाने का शगल पैदा हो गया। उसके पास करने के लिए काम नही था। वह अब अधिकतर वेद की फैक्टरी में आकर बैठने लगा। उसे अपने पिता को नीचा दिखाने और अपने को सर्वश्रेष्ठ दिखाने की कोशिश वेद को नागवार लगती। इसी बात पर वेद और मनोज की झड़प हो जाती।
वेद के कारखाने में कुछ दिन मनोज नही आता। लेकिन कुछ समय में वह फिर भूल जाता। वहां आकर फिर से वेद के कामो में नुक्स निकालता तो वेद को बुरा लगता।
वह कहता -तूने अपनी हठधर्मी से मेरा लगा -लगाया कारखाना बर्बाद कर दिया। मेने तुझे उस वक्त मौका दिया था। यदि तुझे अपनी काबिलियत दिखानी थी तो उसमे दिखाता। मेरी जिंदगी की सारी मेहनत तबाह करके मेरे कामो में नुक्स निकालने की जरूरत नही है।
इन शब्दों को सुनकर मनोज अपना आपा खो बैठता। अब मनोज को पहले से ज्यादा गुस्सा आने लगा था। वैसे भी हमारे समाज में लड़को की सारी गलतियाँ माफ़ करके उन्हें सिर पर चढ़ाते रहते है। उनके सारे गुस्से को उनका परिवार बर्दास्त करता रहता है। इसलिए वे अपनी गलतियाँ मानने की जगह समाज को ही गलत समझने लगते है।
मनोज का परिवार उससे दूर हो गया था। वह जब भी अपने परिवार के पास जाता उसकी पत्नी अब उसका लिहाज नही करती वह भी उसे खरी खोटी सुना देती। उसने भी कर्जदारो के कारण बहुत अपमान सहा था। वह नए सिरे से जिंदगी जीने के लिए जद्दोजहद कर रही थी। लेकिन मनोज उसका साथ देने की जगह उसके कामो में भी कमी निकाल देता। उसे उसके शब्द तिलमिला कर रख देते।
मनोज जहाँ भी जाता उसका वही झगड़ा हो जाता। वह दुसरो को समझ नही पा रहा था। दूसरे भी उसे समझने में नाकाम हो रहे थे। उस समय कोई उसकी समस्या समझ नही पाया। लेकिन इसे हम तनावग्रहस्थ कह सकते है। कुछ लोग समाज को अपने हिसाब से चलाने में सारा जीवन लगा देते है। लेकिन खुद को बदलने की कोशिश नही करते। मनोज भी उनमे से एक था।
वेद को मनोज के मकान बिकने की खबर भी अपनी बेटी हिना से चली। वे लोग इतने समय तक सबसे कट कर रहे। किसी ने उनके बारे में जानने की कोशिश भी नही की। जब वेद ने मनोज के ऊपर आई मुसीबत के बारे में जाना उसे बहुत दुःख हुआ। वेद को जिस बात का अंदेशा था अंतत वही मनोज के साथ घटा। वह पिता की सारी बातो को बेफजुल समझता था। उनकी आज्ञा का उल्लंघन करता था। इन्ही बातो के कारण मनोज ने घर छोड़ा।
जवानी में वेद से उसके पिता ने कारखाना ले लिया था। उसकी मेहनत के फल का कुछ ही समय में खात्मा हो गया था। वेद ने जवानी में उस दुःख को झेल लिया था। लेकिन बुढ़ापे में बेटे ने उसके लगाये कारखाने को ख़त्म कर दिया। उसके लिए इस दुःख से उबर पाना मुश्किल हो रहा था।
वेद का बेटा अपनी मर्जी का मालिक था। उसे अपने निर्णय सही लगते यदि पिता उसे समझाने की कोशिश करते तो वह आपे से बाहर हो जाता। वेद को नीचा दिखाने की कोशिश करता। वेद अपना सा मुँह लेकर रह जाता। अब मनोज के लेनदारों को उसके पिता के बारे में जानकारी मिल गयी थी कि वे साधन -सम्पन्न है । वह मनोज का कर्ज वसूलने के लिए वेद के कारखाने उसे धमकाने आने लगे। वेद सज्जन इंसान थे।
इस बात के लिए कर्जदारो को वह कहते -तुमने मुझसे पूछकर कर्ज दिया था। जो मुझसे वसूलने और यहाँ मेरा अपमान करने चले आते हो।
कर्जदार कहते -हमने पैसा दिया है। हमें यदि अपना कर्ज नही मिला तो हम मनोज को जिन्दा नही रहने देंगे।
एक पिता के लिए बेटे की मौत की धमकी कितनी दुखदायी होती है। यह एक पिता अच्छी तरह समझ सकता है। एक तरफ वेद के सामने पैसे का संकट तो दूसरी तरफ बेटे की जान बचाने की समस्या आ गयी थी। वह अपनी सारी जमापूंची देकर ही बेटे को कर्जदारो से छुड़वा सकता था।
जिस बेटे ने इतने बरसो तक अपने पिता की खोज खबर तक नही ली थी। उसने जिस पिता को बुढ़ापे में बोझ समझ लिया था। वह मनोज उस बूढ़े के आसरे फिर से आ गया था। ऐसे समय में वेद उसे नकार नही सका।
मनोज जो हर किसी से कर्ज के कारण छिपता फिर रहा था,जिन कर्जदारो से बचने के लिए उसका परिवार उसे छोड़ कर चला गया था। वे कर्जदार अब आये दिन वेद के कारखाने आकर मनोज का पता पूछने लगे उसे अपमानित करने लगे।
वेद उन इंसानो में से था जो आधा पेट भोजन करके इज्जत से जीने में अपनी शान समझते है। उस वेद को अब आये दिन कर्जदारो की धमकियों का सामना करना पड रहा था। वेद अपनी जिंदगी से बेजार हो गया था।
कई बार वह निराश हो कर कहता - क्या मेने ऐसी जिंदगी का सपना देखा था। जिसमे सिर्फ सारी उम्र मेहनत और दुःख सहना लिखा था।
जिस बेटे से मैने सारे रिश्ते तोड़ लिए थे। अब नई और अकेली जिंदगी जीते हुए उसके कर्जदार मुझे हर समय आकर अपमानित कर रहे है। वह उनसे बचता फिर रहा है। में अपना चलता हुआ काम छोड़कर कहाँ छिप जाऊ।
एक दिन हालत से बेजार होकर और मनोज की जिंदगी बचाने के लिए वेद ने अपनी सारी जमापूंजी कर्जदारो को देकर मनोज को कर्जमुक्त कर दिया। अब मनोज लोगो के सामने आने की हिम्मत जूटा पाया।क्योंकि कर्जदारो ने मनोज को ढूंढ कर उसको मारने के जुगाड़ कर लिए थे।
मनोज के पास कोई काम नही रहा था। उसे अपने को कामकाजी दिखाने का शगल पैदा हो गया। उसके पास करने के लिए काम नही था। वह अब अधिकतर वेद की फैक्टरी में आकर बैठने लगा। उसे अपने पिता को नीचा दिखाने और अपने को सर्वश्रेष्ठ दिखाने की कोशिश वेद को नागवार लगती। इसी बात पर वेद और मनोज की झड़प हो जाती।
वेद के कारखाने में कुछ दिन मनोज नही आता। लेकिन कुछ समय में वह फिर भूल जाता। वहां आकर फिर से वेद के कामो में नुक्स निकालता तो वेद को बुरा लगता।
वह कहता -तूने अपनी हठधर्मी से मेरा लगा -लगाया कारखाना बर्बाद कर दिया। मेने तुझे उस वक्त मौका दिया था। यदि तुझे अपनी काबिलियत दिखानी थी तो उसमे दिखाता। मेरी जिंदगी की सारी मेहनत तबाह करके मेरे कामो में नुक्स निकालने की जरूरत नही है।
इन शब्दों को सुनकर मनोज अपना आपा खो बैठता। अब मनोज को पहले से ज्यादा गुस्सा आने लगा था। वैसे भी हमारे समाज में लड़को की सारी गलतियाँ माफ़ करके उन्हें सिर पर चढ़ाते रहते है। उनके सारे गुस्से को उनका परिवार बर्दास्त करता रहता है। इसलिए वे अपनी गलतियाँ मानने की जगह समाज को ही गलत समझने लगते है।
मनोज का परिवार उससे दूर हो गया था। वह जब भी अपने परिवार के पास जाता उसकी पत्नी अब उसका लिहाज नही करती वह भी उसे खरी खोटी सुना देती। उसने भी कर्जदारो के कारण बहुत अपमान सहा था। वह नए सिरे से जिंदगी जीने के लिए जद्दोजहद कर रही थी। लेकिन मनोज उसका साथ देने की जगह उसके कामो में भी कमी निकाल देता। उसे उसके शब्द तिलमिला कर रख देते।
मनोज जहाँ भी जाता उसका वही झगड़ा हो जाता। वह दुसरो को समझ नही पा रहा था। दूसरे भी उसे समझने में नाकाम हो रहे थे। उस समय कोई उसकी समस्या समझ नही पाया। लेकिन इसे हम तनावग्रहस्थ कह सकते है। कुछ लोग समाज को अपने हिसाब से चलाने में सारा जीवन लगा देते है। लेकिन खुद को बदलने की कोशिश नही करते। मनोज भी उनमे से एक था।
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