#vibhrm ki sthiti

      नरेश सपनो में उड़ता हुआ बाबा के पास आया था। शुरू में उसे वेद के पास रहना अच्छा लगा जब वह अपने बाबा को दुसरो से इज्जत पाते देखता उसे बहुत अच्छा लगता क्योंकि जब से वह बड़ा हुआ था। उसने अपमानित जिंदगी जी थी वह भूल गया था आत्मसम्मान के साथ जीने पर केसा एहसास होता हे। वह सुख की खोज में बाबा के पास आ  गया था  .
       कुछ समय में उसका भरम दूर हो गया। यहाँ उसने वेद को रुखा सुखा भोजन करके मेहनत की जिंदगी जीते हुए देखा जहाँ रुकावटे ज्यादा थी और सहूलियतें ना के बराबर थी उसके सपनो की दुनियाँ से यहाँ का माहोल विपरीत था। कुछ समय वह बाबा के साथ रहा।
      उसके बाद वह फिर अपनी माँ के पास लौट गया। माँ बहुत मेहनत कर रही थी। उसने अपनी रुकी हुई पढ़ाई  फिर से शुरू कर दी थी। वह अब मेहनत करके सम्मान की जिंदगी जीने की कोशिश कर रही  थी.
       पहले वह कहती थी - आदमी का फर्ज पैसे कामना है। औरते घर के काम करने के लिए होती है।
      वह माहोल अब बदल चूका था उसके पास आदमी का सहारा नही रहा था उसे भरोसे अपने नाबालिग बच्चो की परवरिश करनी थी। उसे अपनी हिम्मत के भरोसे आगे का जीवन बिताना था लेकिन सारे मेहनत वाले कामो के बाद भी वह अपने बच्चो की जरुरतो का ध्यान रखती थी। नरेश को माँ के सामने किसी चीज के लिए मेहनत करने की जरूरत नही पड़ती थी।
       बाबा अपने सारे काम खुद करते थे उनके पास कोई सहायक नही था। उसे वहाँ बाबा की  देखा -देखी अपने काम करने पड़ते थे। बाबा उसके और अपने लिए खाना भी बनाते थे। पर माँ के खाने का स्वाद उसे बाबा के खाने में नही आता  था।
       उसने घर का सुख पाने के लिए वहाँ  जाकर उसने एक प्रायवेट विद्यालय में नौकरी कर ली। उसने योग टीचर के रूप में एक साल काम किया। उसका मन इस काम में नही लगा।उसका वेतन बहुत कम था।  यहाँ आगे बढ़ने के अवसर नही थे। वह इस जीवन में भी अपने आप को जोड़ ना सका।
     नरेश वापस एक साल बाद बाबा के पास आ गया। नरेश का मन एक जगह स्थिर नही था। उसका पढ़ाई में मन नही लगता था। इसलिए उसकी पढ़ाई भी ऐसी ना थी। जिसकी बदौलत वह इज्जतदार जिंदगी बिता सके  इसे बाबा के पास रहना भी अच्छा नही लगता था। इस कारण वह कई बार बाबा को छोड़ कर दूसरे रिश्तेदारो के पास गया। लेकिन वहाँ से भी उसका जल्दी मन भर जाता इस तरह बाबा के पास आता  जाता रहा।
       वेद ने उसे रुकने या जाने के बारे में कभी नही कहाँ।
      वेद हमेशा कहते -मेंरा जिन पर अधिकार था में उन्हें ही रोक नही पाया। इसका जब मन करता है। अपने -आप आ जाता है। जब उसे इससे अच्छी जगह मिल जाती है। यह उस दुनियाँ में सुख की खोज में चला जाता है। मै अपने बुढ़ापे में इसके पेरो की बेडिया नही बनाना बनाना चाहता। में चाहता हूँ ये अपनी मंजिल खुद ढूंढे। यदि इसे मेरी जरूरत होगी मै  इसकी सदा सहायता 

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