वेद को दिल की बीमारी का इलाज कराये एक साल बीत गया था। उसे अब किसी तरह की परेशानी नही थी। लेकिन कहते है -समय हमेशा एक सा नही रहता। यही कहाबत अब वेद के जीवन में चरितार्थ हो रही थी। उसकी बेटी सुमन काफी दिनों से बीमार चल रही थी। उसके घुटनो के कारण वह चलने से लाचार थी। उसने अपनी जिंदगी में बहुत काम किया था। लेकिन उसका शरीर अब उसका साथ नही दे रहा था। सुमन की उम्र इस समय 56 साल की हो रही थी। उसका अस्पताल में इलाज चलता रहता था। लेकिन एक दिन उसके पेट में बहुत दर्द हुआ। उसका पेट अपने आप बहुत बड़ा हो गया। उससे दर्द सहन नही हुआ। उसकी हालत देखकर उसे जल्दी से अस्पताल ले गए। वहाँ टेस्ट होने पर पता चला उसे कैंसर है। कैंसर उस स्थिति में पहुँच चुका है। जिसका कोई इलाज नही है.
सुमन के जीवन में शारीरिक परेशानियाँ बहुत सही थी। उसका और अस्पताल का सामना उसे अधिकतर करना पड़ता था। लेकिन इतनी बड़ी बीमारी उसे घेर लेगी इस बात की किसी को उम्मीद नही थी। जिसने भी उसकी बीमारी के बारे में सुना सब स्तब्ध रह गए। अभी तक बहुत दूर के लोगो को इस बीमारी से पीड़ित देखा था। इतना करीबी को इस बीमारी से ग्रसित होने की कल्पना किसी ने नही की थी।
सुमन की बीमारी अपने आखिरी पड़ाव पर पहुँच चुकी थी। जिस अस्पताल में उसका इलाज चल रहा था। उन्होंने उसके बचने की सम्भावना से इंकार कर दिया था।
उन्होंने साफ कह दिया था -इनका बचना अब नामुमकिन है। इन पर पैसा खर्च करना बेकार है।अब आप इन्हे घर ले जाओ।
जिंदगी की आस छोड़ देना इतना आसान नही होता लेकिन किसी को मौत की तरफ धीरे-धीरे से बढ़ते देखना उनके करीबियों के लिए बहुत दुखदायी होता है। उन्होंने सभी हॉस्पिटल में उनके इलाज को लेकर कोशिश की लेकिन अधिकतर ने उनका इलाज करने से मना कर दिया।
दिल्ली के सबसे बड़े अस्पताल वालो ने कहा -हम आपके मरीज को ठीक करने की कोशिश कर सकते है। आप चाहो तो आप हमारे यहाँ इनका इलाज करवा सकते हो लेकिन हम इन्हे बचाने का अस्वासन नही दे सकते। आप मरीज को हमारे पास बहुत देर से लाये हो।
वह अस्पताल दिल्ली के सबसे महंगे अस्पताल में आता था। सुमन का बेटा समर्थ हो गया था। उसका व्यवसाय बहुत अच्छा चल पड़ा था।
उसने सबसे कह दिया -आप पैसे की परवाह मत करो। जहाँ उम्मीद बधती है। उस अस्पताल में माँ का इलाज करवाओ।
अब सुमन का एक पाँव घर और दूसरा अस्पताल में रहता था। उसका इलाज बहुत कठिन था। उसकी भूख -प्यास सब मर गयी थी उसके कई मुस्किल ऑपरेशन हुए एक तरह से उसका सारा शरीर ही ऑपरेशन के नाम पर काट दिया गया। लेकिन उसे इतने अच्छे दर्द निवारक दिए जाते जिससे उसे बहुत कम दर्द का अहसास होता। मेने सुन रखा था की कैंसर का मरीज दर्द बर्दास्त नही कर पाता। उसकी चीख पड़ोसियों को भी बेचैन कर देती है। लेकिन सुमन को मेने कभी बुरी तरह चीखते नही सुना। वह हमेशा हमसे इस तरह बात करती थी। जैसे किसी और की बीमारी के बारे में बता रही हो। उन्होंने अपना धैर्य कभी नही छोड़ा। भगवान ने उन्हें बहुत हिम्मत दी थी। उनके पास जिंदगी के सारे सुख अब मौजूद थे। तो जिंदगी ने उनका साथ छोड़ दिया था।
सुमन को मेने कभी रोते और भगवान को कोसते हुए नही सुना था। वे कभी किसी की बुराई भी नही करती थी। वे सहन शक्ति की प्रतिमा थी।
उनकी सहनशक्ति को देखकर मेने उनसे एक बार पूछा -आपको इतनी हिम्मत कहाँ से मिलती है। आपको बचपन से अनेक तरह से दुखो का सामना करना पड़ा लेकिन कभी भी आपको बेचेंन और हतोत्साहित नही देखा। आप इतनी हिम्मत कहाँ से पाती हो।
सुमन बोली -जब भी मै जिंदगी से निराश होने लगती हूँ। तब बाउजी को याद कर लेती हूँ। मै ऐसे इंसान की बेटी हूँ जो जीवन की हर मुसीबत का डट कर सामना कर रहा है। उसने परेशानियों से कभी हार नही मानी इसलिए मै कैसे हार मान सकती हूँ। ये शब्द याद करते ही मेरे अंदर नया उत्साह पैदा हो जाता है। में जिंदगी की हर परेशानी का डट कर सामना करूंगी कभी नही हारूँगी।
उनकी जिजीविषा देखकर सब स्तब्ध रह जाते थे। सुमन को पूरी जिंदगी में मेने एक बार कहते सुना था - भगवान किसी को कैंसर जैसी बीमारी ना दे। इस बीमारी में बहुत दर्द सहन करना पड़ता है।
उनके चेहरे पर तब भी दर्द की शिकन नही थी। ये केवल शव्द थे। लेकिन उन शब्दों ने मुझे झकझोर डाला। उन शब्दों की गहराई में समझ गयी थी। वे अपने दर्द से जूझ रही थी।
सुमन अपने समय में अपूर्व सुंदरी रही थी। लेकिन इस बीमारी के कारण उनका रंग -रूप बिलकुल ख़त्म हो गया था। उनको पहचानना भी बहुत मुश्किल हो जाता था। अधिकतर उन्हें लोग पहचान ही नही पाते थे। इस तरह रंग -रूप बिगड़ते मेने जिंदगी में पहली बार देखा था।
एक दिन सुमन को दर्द से मुक्ति मिल गयी। वह सबको रोता -बिलखता छोड़कर दूसरी दुनियाँ में चली गयी। उसकी मौत पर वेद बहुत दुखी हुआ।
उन्होंने कहाँ -जब सुमन को इतनी जल्दी जाना था। तब मुझे इलाज करवाने के लिए मजबूर क्यों किया। मेरे जाने का वक्त रुकवा कर खुद प्रस्थान कर गयी।
सुमन वेद के हर दर्द और तकलीफ में उनका साथ देती थी। वेद हमेशा कहते थे -काश सुमन मेरे घर बेटे के रूप में पैदा हुई होती तो मै कितना भाग्यशाली होता।
वेद के शब्द सुनकर सुकन्या को बहुत गुस्सा आता था। वह हमेशा कहती -वह बेटी है। बेटी के रूप में जितना कर सकती है उसने उससे ज्यादा इस परिवार के लिए किया है। जिसमे उसका हाथ नही है। उसकी दुहाई मत दिया करो।
सुमन के जीवन में शारीरिक परेशानियाँ बहुत सही थी। उसका और अस्पताल का सामना उसे अधिकतर करना पड़ता था। लेकिन इतनी बड़ी बीमारी उसे घेर लेगी इस बात की किसी को उम्मीद नही थी। जिसने भी उसकी बीमारी के बारे में सुना सब स्तब्ध रह गए। अभी तक बहुत दूर के लोगो को इस बीमारी से पीड़ित देखा था। इतना करीबी को इस बीमारी से ग्रसित होने की कल्पना किसी ने नही की थी।
सुमन की बीमारी अपने आखिरी पड़ाव पर पहुँच चुकी थी। जिस अस्पताल में उसका इलाज चल रहा था। उन्होंने उसके बचने की सम्भावना से इंकार कर दिया था।
उन्होंने साफ कह दिया था -इनका बचना अब नामुमकिन है। इन पर पैसा खर्च करना बेकार है।अब आप इन्हे घर ले जाओ।
जिंदगी की आस छोड़ देना इतना आसान नही होता लेकिन किसी को मौत की तरफ धीरे-धीरे से बढ़ते देखना उनके करीबियों के लिए बहुत दुखदायी होता है। उन्होंने सभी हॉस्पिटल में उनके इलाज को लेकर कोशिश की लेकिन अधिकतर ने उनका इलाज करने से मना कर दिया।
दिल्ली के सबसे बड़े अस्पताल वालो ने कहा -हम आपके मरीज को ठीक करने की कोशिश कर सकते है। आप चाहो तो आप हमारे यहाँ इनका इलाज करवा सकते हो लेकिन हम इन्हे बचाने का अस्वासन नही दे सकते। आप मरीज को हमारे पास बहुत देर से लाये हो।
वह अस्पताल दिल्ली के सबसे महंगे अस्पताल में आता था। सुमन का बेटा समर्थ हो गया था। उसका व्यवसाय बहुत अच्छा चल पड़ा था।
उसने सबसे कह दिया -आप पैसे की परवाह मत करो। जहाँ उम्मीद बधती है। उस अस्पताल में माँ का इलाज करवाओ।
अब सुमन का एक पाँव घर और दूसरा अस्पताल में रहता था। उसका इलाज बहुत कठिन था। उसकी भूख -प्यास सब मर गयी थी उसके कई मुस्किल ऑपरेशन हुए एक तरह से उसका सारा शरीर ही ऑपरेशन के नाम पर काट दिया गया। लेकिन उसे इतने अच्छे दर्द निवारक दिए जाते जिससे उसे बहुत कम दर्द का अहसास होता। मेने सुन रखा था की कैंसर का मरीज दर्द बर्दास्त नही कर पाता। उसकी चीख पड़ोसियों को भी बेचैन कर देती है। लेकिन सुमन को मेने कभी बुरी तरह चीखते नही सुना। वह हमेशा हमसे इस तरह बात करती थी। जैसे किसी और की बीमारी के बारे में बता रही हो। उन्होंने अपना धैर्य कभी नही छोड़ा। भगवान ने उन्हें बहुत हिम्मत दी थी। उनके पास जिंदगी के सारे सुख अब मौजूद थे। तो जिंदगी ने उनका साथ छोड़ दिया था।
सुमन को मेने कभी रोते और भगवान को कोसते हुए नही सुना था। वे कभी किसी की बुराई भी नही करती थी। वे सहन शक्ति की प्रतिमा थी।
उनकी सहनशक्ति को देखकर मेने उनसे एक बार पूछा -आपको इतनी हिम्मत कहाँ से मिलती है। आपको बचपन से अनेक तरह से दुखो का सामना करना पड़ा लेकिन कभी भी आपको बेचेंन और हतोत्साहित नही देखा। आप इतनी हिम्मत कहाँ से पाती हो।
सुमन बोली -जब भी मै जिंदगी से निराश होने लगती हूँ। तब बाउजी को याद कर लेती हूँ। मै ऐसे इंसान की बेटी हूँ जो जीवन की हर मुसीबत का डट कर सामना कर रहा है। उसने परेशानियों से कभी हार नही मानी इसलिए मै कैसे हार मान सकती हूँ। ये शब्द याद करते ही मेरे अंदर नया उत्साह पैदा हो जाता है। में जिंदगी की हर परेशानी का डट कर सामना करूंगी कभी नही हारूँगी।
उनकी जिजीविषा देखकर सब स्तब्ध रह जाते थे। सुमन को पूरी जिंदगी में मेने एक बार कहते सुना था - भगवान किसी को कैंसर जैसी बीमारी ना दे। इस बीमारी में बहुत दर्द सहन करना पड़ता है।
उनके चेहरे पर तब भी दर्द की शिकन नही थी। ये केवल शव्द थे। लेकिन उन शब्दों ने मुझे झकझोर डाला। उन शब्दों की गहराई में समझ गयी थी। वे अपने दर्द से जूझ रही थी।
सुमन अपने समय में अपूर्व सुंदरी रही थी। लेकिन इस बीमारी के कारण उनका रंग -रूप बिलकुल ख़त्म हो गया था। उनको पहचानना भी बहुत मुश्किल हो जाता था। अधिकतर उन्हें लोग पहचान ही नही पाते थे। इस तरह रंग -रूप बिगड़ते मेने जिंदगी में पहली बार देखा था।
एक दिन सुमन को दर्द से मुक्ति मिल गयी। वह सबको रोता -बिलखता छोड़कर दूसरी दुनियाँ में चली गयी। उसकी मौत पर वेद बहुत दुखी हुआ।
उन्होंने कहाँ -जब सुमन को इतनी जल्दी जाना था। तब मुझे इलाज करवाने के लिए मजबूर क्यों किया। मेरे जाने का वक्त रुकवा कर खुद प्रस्थान कर गयी।
सुमन वेद के हर दर्द और तकलीफ में उनका साथ देती थी। वेद हमेशा कहते थे -काश सुमन मेरे घर बेटे के रूप में पैदा हुई होती तो मै कितना भाग्यशाली होता।
वेद के शब्द सुनकर सुकन्या को बहुत गुस्सा आता था। वह हमेशा कहती -वह बेटी है। बेटी के रूप में जितना कर सकती है उसने उससे ज्यादा इस परिवार के लिए किया है। जिसमे उसका हाथ नही है। उसकी दुहाई मत दिया करो।
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