#UDAYPUR PALACE

                             उदयपुर पैलेस                    

   


        यह भारत के भव्य महलो में से एक है। ये सिर्फ दीवारे ही नहीं बल्कि ऐसा महल है जिसे देखकर लगता है जैसे अभी राजमहल के लोग बाहर  गए  है। इसमें घुसते ही लगता है हम भी राजमहल में रहने वालो में से एक है। हर चीज बिलकुल साफ -सुथरी और सुसज्जित है। 

      ये महल इतना अधिक विशाल है। कि  इसमें  से दो होटल बनाये जा चुके है। एक हिस्सा राजा ने रहने के लिए अलग रखा हुआ है। उसके अतिरिक्त जनता के लिए जितना हिस्सा खोल रखा है। सिर्फ उतने हिस्से को देखने में हम कई बार थक कर बैठ गए।

          हमने  बहुत जल्दी  में यह महल देखा था क्योंकि हमें उसी दिन उदयपुर से निकलना था। हम सही ढंग से पूरा महल नहीं देख सके। यदि आपको यह देखने का मौका मिले तो  पूरा एक दिन इसे देखने के लिए रखना यह लाजबाब है।

        मैने  अब से पहले जितने महल देखे है। उन तक जाने का रास्ता बहुत सूंदर और भव्य होता था। लेकिन  इस महल के रस्ते में  पूरा बाजार लगा हुआ है। उस महल तक जाने का रास्ता मुझे सही नहीं लगा लेकिन उससे महल की भव्यता कम  नहीं होती है।  महल तक पहुंचने के दो रास्ते  है। दूसरा रास्ता झील से है।  


#jagdish temple udaypur

                           जगदीश मंदिर 

         



       उदयपुर का सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर का नाम जगदीश मंदिर है। इसकी नक्काशी लाजबाब है। इसका निर्माण 1651  इसवी  में हुआ था।  इसे राजा जगत सिंह ने बनवाया था। इसकी निर्माण कला अद्भुत है। इसमें अनेक देवी -देवताओ की मूर्तियां उकेरी गयी है।  यह संगमरमर के पत्थर से बना है।

          इसमें अनेक देवी देवताओ की प्रतिमाये लगी हुई है। कुछ मूर्तियां सामने बनी  हुई है। तो कुछ मूर्तियां बिलकुल पीछे की तरफ लगी हुई है जहां तक जाने का रास्ता अलग है। आप उसे छुपा हुआ मंदिर भी समझ सकते है।  हम शायद उस मंदिर तक जाते  भी नहीं। उस तरफ हमें एक औरत लेकर गयी तब हमे उस मंदिर का पता चला। 

       दोनों मंदिरो के बीच  में गरीब लोगो को खिलाने  के लिए मुफ्त खाना बांटा  जाता है। आपकी जितनी श्रद्धा हो आप वहां दान कर सकते है। यह मंदिर सिटी पैलेस के बिलकुल पास है। या ये समझ लो  रास्ते  में पड़ता है।  इस मंदिर के पास बहुत सारी  खाने -पीने  की दुकाने है। यहां आपको हर तरह का खाना मिल जायेगा। 


      

#sajjangad fort

                          सज्जनगढ़ किला 

         

         यह   किला राजा सज्जनसिंह  ने बनवाया था। यह पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी  पर बना हुआ है। इसके ऊपर से सारा उदयपुर दिखाई देता है।  यहां से उदयपुर झीलों से भरा हुआ और हरा -भरा दिखाई देता है। इसे यहां से देखने पर यह राजस्थान का हिस्सा नहीं लगता बल्कि धरती पर फैला हुआ स्वर्ग लगता है। इसकी सुंदरता आँखों में समाती  नहीं है। यहां का रहन -सहन और खान -पान  सब कुछ राजस्थानी है। बस प्रकृति राजस्थान से अलग दिखाई  देती है। 
         सज्जनगढ़ किले को मानसून पैलेस भी कहा जाता है। मानसून के समय इसपर पड़ती बारिश की बुँदे मन को मुग्ध कर देती है  .  इसे सफेद संगमरमर से बनवाया गया है। इसपर सफेदी भी सफेद रंग से  करवाई गयी है। जिसके कारण दूर से दिखाई देता है। इतनी ऊंचाई पर  पानी की कमी न हो इसके लिए इस पर बर्षा के पानी को इकट्ठा  करने का प्रबंध किया गया है। 
        हम राजस्थान को रेगिस्तान का पर्याय समझते है। लेकिन यहाँ के लोगो ने अपनी सूझ -बुझ से पानी को अच्छी तरह से संभालने की कोशिश की है। जबकि आज पूरा भारत पानी की कमी से जूझ रहा है। 
        इस किले को छोटे से संग्रहालय का रूप दिया गया है। यहां आकर आप राजस्थान से वाकिफ हो सकते है 

# VANICE OF INDIA

                           भारत का वेनिस 

         


  उदयपुर जो राजस्थान में है उसकी तुलना वेनिस से की जाती है। आप उदयपुर में अधिकतर स्थानों से झील को देख सकते है।  उदयपुर में सात झील है उनमे से मुख्य पांच झील फतह सागर झील ,पिछोला झील,स्वरूप सागर झील,रंगसागर झील ,दूध तलाई  झील उदयपुर में है। थोड़ी दूर पर जयसमंद झील,उदयसागर झील और राजसमंद झील है। आप जहां भी जाओगे हर तरफ पानी दिखाई देगा। कहने को राजस्थान का मतलब रेगिस्तान होता है। जहां पानी की कमी होती है। 

         वहां के अधिकतर होटलो के नाम झील से जुड़े हुए  मिलते है। आपने अधिकतर स्थानों पर खाने की व्यवस्था सबसे नीचे  होती देखी  होगी।  लेकिन उदयपुर में अधिकतर होटलो में खाने का इंतजाम   छत  पर होता है।

       हमें अधिकतर नीचे  के तल पर होटल देखने की आदत थी। लेकिन जब यहां का पूरा इलाका देखने के बाद किसी होटल में खाने के लिए पहुंचते तब सबसे ऊपर चढ़कर खाने का इंतजाम देखकर हमारी हिम्मत जबाब देने लगती थी। लेकिन वहां ऐसा ही प्रबंध था। इसलिए हिम्मत जुटाकर गिरते -पड़ते छत्त पर पहुंचना पड़ता था। 

        इतनी ऊंचाई पर खाने की व्यवस्था होने का एक कारण झीलों के दर्शन भी रहा होगा। हम उदयपुर में सर्दियों में गए थे। इसलिए हमें सर्दियों की धूप खाते  हुए झील को देखना बहुत अच्छा लग रहा था। 

 

#chintaman gnesh temple of ujjain

                  चिंतामन गणेश मंदिर 

     


   यह मंदिर उज्जैन का प्रसिद्ध मंदिर है। इसके बारे में कहा जाता है-जो इनके दरबार में आ जाता है। उसकी सभी इच्छाये  पूरी हो जाती है। ये स्वयंभू है।  इनकी उत्पत्ति अपने आप हुई है। इन्हे तराशा नहीं गया है। ये धरती से खुद निकले है। यहाँ पर गणेश जी की तीन मूर्तियां है। सबसे बड़ी चिंतामन गणेश जी है। दूसरी मूर्ति इच्छामण गणेश है। तीसरी मूर्ति सिद्धिविनायक जी है। यह गणेश जी के तीनो रूप है। 

       हिन्दू संस्कृति में जब भी शुभ काम होता है। उसमे सबसे पहले गणेश जी को निमंत्रण दिया जाता है। ताकि सभी कार्य बिना रुकावट के पूरे  हो जाये। 

       सबसे पहले इसे परमार राजाओ ने बनवाया था। उसके बाद रानी अहिल्याबाई ने इसको बनवाया। इस समय भी इसका निर्माण कार्य चल रहा है। यह बहुत बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। 

       कहा जाता है राम ,सीता और लक्ष्मण वनवास के लिए गए थे। तब कुछ समय के लिए इस मंदिर में ठहरे थे। तब लक्ष्मण जी ने यहां  बाबड़ी बनवाई  थी। जो लक्ष्मण बाबड़ी के नाम से प्रसिद्ध है।इसके कारण पानी की समस्या खत्म हो गयी थी।    

# ujjain ka kalbhairav mandir

                         उज्जैन का   कालभैरव  मंदिर 

           





     



  महाकालमंदिर के दर्शन तब तक पूर्ण नहीं माने  जाते जब तक आप कालभैरव मंदिर के दर्शन नहीं करते। इसलिए महाकालेश्वर मंदिर के बाहर से कालभैरव मंदिर तक जाने के लिए गाड़ियां मिल जाती है।  आप चाहे तो आने -जाने का किराया तय कर सकते है। वरना एक तरफ के हिसाब से भी जा सकते है। जैसी आपको सुविधा लगे। 

        कहा जाता है। कालभैरव मंदिर प्राचीन मंदिरो में से एक है।  यहाँ प्राचीन समय में शराब और  और बलि दोनों भेंट की जाती थी। लेकिन कुछ समय से बलि देने की मनाही कर दी गई है। अब केवल शराब का भोग लगाया जा सकता है। पूजा का समान मंदिर के बाहर मिल जाता है। 

       जिनकी मनोकामना पूरी हो जाती है। वे प्रसाद में अवश्य शराब चढ़ाते है। यहां पर बहुत  अधिक मात्रा में शराब मूर्ति को चढाई जाती है  सबको समझ नहीं आता ये जाती कहाँ है।  बाहर निकलने के लिए किसी नाली आदि की सुविधा भी नहीं है। अंग्रेजो ने इस मूर्ति के आस -पास खुदाई करवा कर  देखने की कोशिश की। लेकिन किसी को समझ नहीं आया। 

       इस मंदिर के पास एक गुफा है। जिसके अंदर एक बार में केवल एक इंसान ही जा सकता है। 

    इस मंदिर के बाहर दीपस्तम्भ भी बना हुआ है। जिसकी शाम के समय विशेष रूप से तैयार करके जलाया जाता है। इस मंदिर में मनोकामना पूर्ति के लिए आज भी अनेक लोग आते है। 

# जिस देवी को अपने राज्य में आने से मना किया

          जिस देवी को अपने राज्य में आने से मना  किया 

       



       जब मैंने भूखी माता के बारे में सुना तब में हैरान हो गई। ऐसी भी कोई माता होती है। मुझे इनका महत्व समझ नहीं आया। इनका मंदिर  शिप्रा नदी के पार  बना हुआ है। कहा  जाता है। एक समय में भूखी  माता हर घर से एक इंसान खाने के लिए मांगती थी। दुखी मन से सब उनकी इच्छा पूरी करते थे। 

         एक समय  विक्रमादित्य एक कुम्हारिन के घर के पास से  गुजर रहे थे। उन्हें उस घर से रोने की आवाज आ रही  थी। वह उस घर के अंदर गए।  उसका कारण पूछने पर उन्हें बहुत दुःख हुआ। उस घर के इकलौते बेटे की आज बलि दी जाएगी।    

         राजा ने उनका दुःख दूर करते हुए कहा-' आज आपका बेटा   नहीं उसकी जगह मै जाऊंगा। '

         राजा ने भूखी माता के मंदिर से लेकर राजमहल तक अनेक पकवान बनवा कर रखवा दिए। उसके बाद उन्हे  राजा की तरह तैयार किया गया। वह सही जगह पर जाकर लेट गए। उनके ऊपर चादर डाल  दी गई। उसके ऊपर तख्त बिछा कर अनेक पकवान रख दिए गए। 

         माता उनकी आवभगत से खुश हो गई। उन्होंने पूछा ये सब जिसने किया है  वह सामने आये। तब राजा बाहर निकले तब माता ने वरदान मांगने के लिए कहा। तब राजा ने कहा - 'आप कभी उज्जैन मत आना।' 

        आपको हैरानी हुई। मुझे भी हुई थी। एक माता को गुजरात से बुला कर लाये। दूसरी माता को राज्य में आने से मना कर रहे थे। 

        ये माता मृत्यु देने वाली थी दूसरी वर देने वाली थी। मृत्यु को कौन बुलाना चाहेगा। 

# temple of king vikrmaditya

                         विक्रमादित्य का मंदिर 

         


   मैने   उज्जैन में घूमते समय विक्रमादित्य का मंदिर देखा तो हैरान हो गई। तब मुझे उनके उज्जैन  के राजा होने का ध्यान नहीं था।जबकि वेताल पच्चीसी और सिंहासन बत्तीसी  पढ़   चुकी थी। उनमे अनेक बार राजा शब्द का प्रयोग अवश्य  हुआ है। लेकिन उन्हें विक्रमादित्य कहकर बहुत कम सम्बोधित किया गया है। 

       पहली बार बहुत बड़े आकार  की मूर्ति  मुझे  हैरान कर रही थी।  वह मूर्ति  बहुत बड़े कमरे में रखी  हुई थी। सड़क से चलते हुए ही उस बड़ी मूर्ति के दर्शन हो रहे थे। उसके आकार  को देखकर लग रहा था। उसे अंदर ले जाकर कैसे स्थापित किया गया होगा। 

           उज्जैन में उन्हें केवल राजा नहीं बल्कि देवता माना  जाता है।   सबसे पहले लगा उनके अंदर श्रद्धा है भी या नहीं बल्कि लोगो से पैसे लेने के बहाने उन्होंने ऐसी मूर्ति की स्थापना की है। 

        बाद में गहराई में जाने पर पता चला। यह वहां के जनमानस में रहने वाले है। उनके बाद के राजाओ का किसी को नाम याद  नहीं है। राजा का महल समय ने ढहा दिया है। उसके अवशेष भी कहीं नहीं मिलते।  उसके बाबजूद केवल एक राजा सबको आज तक याद  है। किसी से पूछा जाये तो वहां के वर्तमान राजा का नाम भी कितने लोगो को याद  होगा सोच कर देखिये। 

#temple of harsidhi mata

                   हरसिद्धि माता का भव्य मंदिर 

   

 हरसिद्धि देवी का नाम दिल्ली में रहते हुए मैंने कभी नहीं सुना था। उज्जैन में पहली  बार सुना तब बहुत अजीव लगा था। लेकिन थोड़ी देर में सब अच्छा  लगने लगा। इससे पहले मैंने  किसी देवी की केवल गले से ऊपर की मूर्ति नहीं देखी  थी।   उनका ये रूप अलग लगा। उस मंदिर में कई अन्य छोटे -छोटे मंदिर बने हुए है। लेकिन यह 51  शक्तिपीठ में से एक है। इसकी महत्ता बहुत  है। 
      इन्हे कृष्ण भगवान की कुलदेवी माना  जाता है। इस मंदिर में दो दीप स्तम्भ बने हुए। उसे देखकर मुझे शुरू में समझ नहीं आया।ये क्यों बने है।  इनका क्या महत्व है।  जब शाम चार बजे  पहुंची थी। तब कई लोग उस स्तम्भ पर काम कर रहे थे। उस समय उनकी साफ -सफाई का काम चल रहा था। उसे देखकर समझ नहीं आ रहा था ये क्या कर रहे है। आप सोच कर देखिये इस स्तम्भ का कार्य आरती शुरू होने से तीन घंटे पहले शुरू हो जाता है। जबकि आरती शाम 7  बजे शुरू हुई थी। इस मंदिर के 1111  दीपको में तेल डालने के लिए कनस्तर लाये गए थे।  सोच कर देखिये  इनमे कितना  तेल इस्तेमाल होता है 
       शाम को आरती के समय बहुत सारे  लोग इकट्ठे हो गए थे। उस समय माता के दर्शनों के लिए लम्बी पंक्ति लगी हुई थी। वहां पर बहुत सारे  गायक भक्तिपूर्वक गायन और वादन कर रहे थे। मैंने पहली वार वाद्य -यंत्रो के साथ डमरू का उपयोग होते सुना था। उसने बहुत अच्छा समा  बांध दिया था। मै  उसकी मधुरता में खो गई थी। 

#harsidhhi mata

             

हरसिद्धि माता 





 हरसिद्धि माता ने कहा  - 'ठीक है। मै  तुम्हारे साथ चलने के लिए तैयार हूँ। यदि तुमने मुझे मुड़कर देखा तब मै  उसी जगह रुक जाउंगी।।

         राजा माता के पायल की आवाज सुनता हुआ। आगे -आगे चलने लगा। बहुत समय बाद आवाज आनी  बंद हो गई तब राजा ने मुड़कर देखा। माता कहाँ  है।  उनकी आवाज क्यों नहीं आ रही लेकिन वह पीछे थी।

        तब  माता ने कहा - 'तुमने मुड़कर देखा अब मै  यही रुक जाउंगी। तुझे यदि मंदिर बनाना है तो यही बना लो अब मै  आगे नहीं जाउंगी। ' 

  उज्जैन अब पास ही था। तब राजा ने उसी जगह मंदिर बना दिया। यह मंदिर महाकालेश्वर मंदिर के बाद भव्य मंदिर है। वह महाकालेश्वर मंदिर से ज्यादा दूर नहीं है।  उसे देखकर मन खुश हो जाता है। 

         इससे पहले मेने कभी विक्रमादित्य का मंदिर नहीं देखा था। पहली बार सिंहासन पर विराजमान विक्रमादित्य का मंदिर देखा मुझे बहुत अच्छा लगा। कहा जाता है- विक्रमादित्य का महल भी पास में बना हुआ था। लेकिन अब उसके नामो -निशान नहीं है। लेकिन मुझे विश्वास है। कभी ये सच में रहा होगा। 


     

# reliever of others vikrmaditya

             परदुःखहर्ता विक्रमादित्य

           


      विक्रमादित्य हरसिद्धि माता को गुजरात के कोयला गढ़  के बियानी से उज्जैन लाये थे।  वियानी  के राजा प्रताप  सिंह  हरसिद्धि माता को अपनी पत्नी बनाना चाहते थे। लेकिन माता तैयार नहीं हुई। उन्होंने कहा -'तेरी पत्नी मेरी परम्  भक्त है। इसलिए मै तुझे मार  नहीं सकती हूँ। लेकिन तुझे दंड देती हूँ। तू रोज मेरे मंदिर में आएगा और खौलते  कड़ाहे में अपनी आहुति देगा। मै  तभी तेरी जान बख्शूंगी। '

       राजा इसके लिए तैयार हो गया।  रोज -रोज ऐसा करने से उसकी हालत ख़राब होती चली गई। इसके  बाद वह धीरे -धीरे कमजोर होने लगा। उसके लिए ये सब सहना बहुत मुश्किल था। 

        जब विक्रमादित्य प्रताप सिंह से मिले तब उनकी दुर्दशा देखकर बहुत दुखी हुए । उन्होंने मन में सोचा अब इसे मुक्ति मिलनी चाहिए। वह अगले दिन प्रताप सिंह के  उठने से पहले मंदिर पहुंच गए। उससे पहले उन्होंने अपने शरीर पर चाकू से अनेक  घाव बना लिए। उनमे सुगंधित पदार्थ भर लिए थे। जब वह  खौलते   कड़ाहे में कूदे  तब बदबू की जगह हर तरफ खुशबु फ़ैल गयी। 

       माता उनसे खुश हो गई। उन्होंने वरदान मांगने के लिए कहा - 'तब उन्होंने प्रताप सिंह को श्राप से मुक्त करने के लिए कहा। 'माता ने तथास्तु कहा।  माता ने कहा -'अब  तुम अपने लिए मांगो। ' तब राजा ने कहा -मै  आपकी पूजा करना चाहता हूँ। आप मेरे साथ उज्जैन चलो। ' माता इसके लिए तैयार हो गई। आज भी हरसिद्धि माता का मंदिर गुजरात और उज्जैन दोनों जगह है। 

#vikrmaditya aur raja bhoj

                    विक्रमादित्य और राजा भोज 

         







     

  विक्रमादित्य इतने पराक्रमी थे कि  उन्होंने 64  योगिनियो में से 32  योगिनियो को अपने नियंत्रण में कर लिया था।  64  योगिनियां साधारण औरते नहीं थी बल्कि सब में विशेष गुण  थे। उन्होंने बेताल को भी अपने इशारो पर चलाने  का हुनर हासिल कर लिया था। कहा जाता है ये योगिनियां और बेताल उन्हें राज -काज संभालने में मदद किया करते थे। तभी उनके कार्यो में गलतिया नहीं होती थी।                           

                विक्रमादित्य के सिंहासन में ये 32  योगिनियां पुतलियां बनकर विराजमान थी। जो भी उस सिंहासन पर बैठता था। उसमे भी अच्छे गुणों का उदय हो जाता था। 

            आपने एक टीले  पर बैठकर एक गड़रिये के न्याय करने के बारे में सुना होगा। उसकी महिमा जब दूर तक फैली तब राजा भोजराज ने उस गड़रिये को बुलाकर देखा। वह बिलकुल साधारण लगा। लेकिन उस टीले  पर बैठते ही उसके काम करने का तरीका बिलकुल बदल जाता था। राजा ने उस टीले  को  खुदवाकर देखा तब उसके नीचे से सिंहासन निकला।  

       जब भी राजा भोजराज ने उसपर बैठने की कोशिश की तब वह  नाकाम रहा। उसने उसपर बैठने का निश्चय छोड़ दिया। आप सोचकर देखिये विक्रमादित्य कितने गुणी  और पराक्रमी रहे होंगे जिन्होंने 32  योगिनियो और बेताल को अपने दास  बनने के लिए मजबूर कर दिया। जबकि राजा भोजराज भी प्रसिद्ध राजा रहे है। लेकिन विक्रमादित्य के सामने वे नगण्य थे। 

     

                विक्रमादित्य की महानता का कारण 

 







         

 विक्रमादित्य बहुत बहादुर थे। उनके अंदर किसी चीज का डर  नहीं था। जब उनके दरबार में एक साधु ने उन्हें शमशान घाट में जाकर एक शब को पेड़ से उतारकर  उस तक पहुंचाने    के लिए कहा तब वे इस काम को करने के लिए  ख़ुशी से  तैयार हो गए। उन्हें किसी अन्य को ऐसा करने का आदेश नहीं दिया। यदि वह चाहते तो उनकी आज्ञा का पालन करना पड़ता। 

        अकेले शमशान में जाकर पेड़ से शब उतारकर , उसे अपने कंधे पर लाद  कर  ,  उसकी सारी  बाते  सुनने की सामर्थ्य कितने लोगो में होती है। सोच कर देखिये। अंत में बेताल ने राज खोला-' वह साधु सही मायने में साधु नहीं है। बल्किढोंगी है।  वह मुझे यानि  अपने सगे  भाई को मार  चुका  है। उसके कारण में बेताल बना हूँ /. अब तुम्हारे द्वारा मुझे अपने सामने पाकर मेरे टुकड़े करके मुझे हवनकुंड में डालेगा। उसके बाद वह तुम्हारी बलि देगा। उससे कैसे बचोगे।' 

      विक्रमादित्य मौत को इतने पास देखकर   भी नहीं घबराया। जब साधु ने उसे सिर  झुकाने के लिए कहा तब राजा ने कहा -'मेरी परवरिश इस तरह से हुई है। मुझे किसी के  सामने झुकने  की आदत नहीं है। पहले जैसा आप चाहते हो मुझे करके दिखाओ उसके बाद में आपके अनुसार करूंगा। '

       साधु को उसकी बात ठीक लगी वह जैसे ही झुका राजा ने अपनी तलवार निकाल  कर उसकी गर्दन धड़ से अलग कर दी।  उसकी बलि से देवी प्रसन्न हो गई। उसे सारी  सिद्धियां देकर अंतर्ध्यान हो गई। जिसके कारण राजा में इतने अधिक गुण  आ गए जिसके कारण आज भी हजारो बर्षो बाद लोग उन्हें याद  करते है।   

betal pachhisi

                                बेताल पच्चीसी 

         

  उज्जैन के राजा विक्रमादित्य की न्यायप्रियता साबित करने के लिए बेताल पच्चीसी की रचना की गई। जब में बचपन में ये कहानियां पड़ती थी तब मुझे इसका अंत समझ नहीं आता था। लेकिन अब मुझे इसका सही मतलब समझ आने लगा। 
          एक राजा और एक न्यायधीश की भूमिका का कितना अधिक महत्व होता है। ये अब अच्छी तरह समझ आने लगा है। किसी की जिंदगी और मौत इनके हाथो में होती है। इसलिए इनका समझदार और जागरूक होना बहुत जरूरी है। विक्रमादित्य की बुद्दिमता का गुणगान करती हुई बेताल पच्चीसी बहुत प्रसिद्ध हुई है। यह प्रिंट मिडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मिडिया हर तरफ छाई  हुई है। 
       एक राजा ढोंगी साधु के शब्दों पर यकीं करके शमशान घाट से मुर्दे को कंधे पर लेकर चलता है। वह हर बार उसे एक नई  कहानी सुनाता है। राजा से कहता है-' तू बोला  तो मै  चला जाऊंगा।' कहानी सुनाने के बाद राजा से कहता है-'  इसका जबाब पता होने पर और न देने पर तेरे  सर के टुकड़े हो  जायेंगे। 'इसकी  धमकी  देकर उसे अनेक बार परेशान करता है। 
            राजा के जबाब देने पर  बेताल के बार -बार  गायब हो जाने के बाबजूद वह  अपना धैर्य नहीं खोता। वह लगातार शमशान में जाकर पेड़ से उसका शब् उतारता रहता है । अंत में बेताल उसके धैर्य के सामने झुक जाता है। 
          पच्चीस कहनियो के बाद बेताल  विक्रमादित्य के साथ उस साधु के पास चला जाता है। जहां उसे पता होता है वह साधु उसके शरीर के दुकड़े करके हवन कुंड में  डाल  देगा। 
        वह राजा को पहले से बता देता है। वह साधु उसकी बलि देकर बहुत सारी  उपलब्धियां पाना चाहता है। अत : सावधान रहकर  काम करना। वह साधु धोखेबाज है।  उसने पहले अपने धोखे से उसे मार दिया   जबकि वह उसका भाई था। अब वह  तुम्हारे माध्यम से सीद्धि  प्राप्त करना चाहता है।  इसके आगे राजा ने अपनी  जान कैसे बचाई यह अगली बार बताएँगे। क्योंकि यह कहानी अब बहुत लम्बी होने लगी है।  

#SINHASAN BATTISI

                         सिंहासन बत्तीसी

 

     महान  सम्राट विक्रमादित्य आज के कलेंडर से भी पहले हुए थे। लेकिन उस समय का इतिहास किवदंती के रूप में बिखरा हुआ है। लेकिन 11  सदी के राजा भोज के युग में सिंहासन बत्तीसी के माध्यम से विक्रमादित्य के बारे में जानकारी हासिल होती है। उनका पराक्रम, दानवीरता, शूरवीरता और न्यायप्रियता की बराबरी कोई अन्य इंसान कभी नहीं कर सका। 
     यह सिंहासन एक कुम्हार के बेटे को मिला था। जिसने इसे राजा भोज तक पहुंचा दिया। राजा भोज ने जब भी पूजापाठ करके विधिपूर्वक  इस सिंहासन पर बैठने की कोशिश की तभी एक पुतली राजा विक्रमादित्य के गुणों से जुडी हुई एक कहानी सुना देती थी। जिसके कारण राजा भोज  को विक्रमादित्य से अपनी तुलना करनी  पड़ती  थी ।                राजा भोज कभी भी विक्रमादित्य के सामान गुणों की खान साबित नहीं हो पाते  थे। उनके सारे  उपाय वही  ढेर हो जाते थे। हर पुतली राजा से सम्बन्धित  एक कहानी सुनाती  थी। इस तरह उनके गुणों का बखान करते हुए उन बत्तीस पुतलियों ने बत्तीस कहानी सुनाई। 
      जब राजा भोज ने स्वयं को उस सिंहासन के काबिल नहीं समझा तब उसने जिस स्थान से उसे  निकाला गया  था। वही दफन करने करने के बारे में  सोचा । तब सारी  पुतलियां उस सिंहासन से निकल कर अंतर्ध्यान हो गई। उसके बाद वह सिंहासन कान्तिविहीन हो गया। उसका महत्व भी खत्म हो गया। आज केवल सिंसासन बत्तीसी की कहानी मिलती है। वह कही नहीं मिलता 



 

#mahan vikramaditya

                        महान  विक्रमादित्य  


उज्जैन के राजा विक्रमादित्य का नाम आप सबने सुना होगा। वह बहुत न्यायप्रिय थे। उनके  राज्य में जनता खुशहाल थी। लेकिन ये आज के  ग्रिगेरिएन कैलेंडर से पहले हुए है। उन्होंने विक्रम संबत नाम से एक कैलेंडर चलाया था। जिसे हम हिन्दू कलेंडर के नाम से  जानते है विक्रम कैलेंडर अंग्रेजी कलेंडर से 57  साल पहले से लागु हो गया था। यानि आज का कैलेंडर सं 2022  दिखा रहा है तो विक्रम संबत में 2079  का समय होगा।

          विक्रमादित्य  का समय जीजस से पहले का था। ये  केवल कहानी नहीं है। बल्कि इसके सबूत इतिहास में दिखाई देते है। विक्रमादित्य इतने प्रसिद्ध राजा थे कि  बाद के 14  राजाओ  ने इसे पदवी की तरह इस्तेमाल किया। चन्द्रगुप्त द्वितीय और आखिरी राजा हेमचन्द्र  ने अपने नाम के साथ विक्रमादित्य जोड़ा  था।  आज कुछ लोग इसे सच्चाई के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते। लेकिन इनकी न्यायप्रियता के सभी कायल है। 

      विक्रमादित्य के पिता का नाम गंधर्वसेन था। जिनकी  शक राजाओ  ने हत्या कर दी। बाद में विक्रमादित्य ने अपने पिता की हत्या का बदला लिया था। उनके भाई का नाम भतृहरि था। वह एक प्रसिद्ध राजा हुए है। भतृहरि के वैराग्य लेने के बाद विक्रमादित्य ने उनके राज्य की शासन व्यवस्था भी अच्छे तरीके से संभाली थी। 

# how to visit in ujjain

                           उज्जैन में घूमने के साधन 



             उज्जैन छोटा शहर है। उसमे घूमने की जगह ज्यादा नहीं है। लेकिन अपने मंदिरो के कारण विशेषकर  महाकालेश्वर मंदिर के कारण लोग उज्जैन आते है। उज्जैन के लिए गाड़ियां सभी स्थानों से आती है। बसे भी हर स्थान से उज्जैन आने के लिए  मिल जाएँगी। इसलिए आपको वहां पहुंचने में दिक्क्त का सामना नहीं करना पड़ेगा। 

        यदि आप हवाईजहाज  से आना चाहते है तब आपको इंदौर के एयरपोर्ट पर उतरना होगा। वहां से केवल डेढ़  घंटे में आप किसी भी वाहन से उज्जैन पहुंच सकते है। आपको उज्जैन में घूमने के लिए कार ,बस और दोपहिया वाहन हर तरह की सुविधा उपलब्ध हो जाएगी। आपको बस अपनी हैसियत के हिसाब से  जेब खाली  करनी पड़ेगी।  

          उज्जैन में किराये के दोपहिया वाहन मिल जाते है। कुछ रुपया देकर आप  उसे 24  घंटे के लिए ले सकते है। उसपर दो लोग आराम से अपनी जरूरत मुताबिक पेट्रोल डलवाकर कही  भी घूमने का कार्यक्रम बना सकते है। यह मुझे सस्ता और समय बचाने  का साधन लगता है। 

       उस स्थान पर जाने के लिए ऑटोरिक्शा भी आसानी से मिल जाते है। उनका किराया भी ज्यादा नहीं होता है। बस थोड़ा ज्यादा बोलते है। उनसे भावताव करने की जरूरत पड़ती है। वहां आने -जाने में आपको दिक्क्त का सामना नहीं करना पड़ेगा। 

# testy food of ujjain

                        उज्जैन का स्वादिष्ट खाना 


 

उज्जैन में पोहा बहुत स्वाद से खाया जाता है। वैसे पोहा अधिकतर भारत का प्रिय भोजन है। उज्जैन में सुबह के समय अधिकतर स्थानों पर पोहा और जलेबी बिकती दिखाई दे जाएगी। आपको सोचकर हैरानी होगी एक तरफ गरिष्ठ जलेबी तो दूसरी तरफ हल्का फुल्का पोहा। 

       उज्जैन में सुबह के समय लोग कचौरी  का नाश्ता करना भी पसंद करते  है। कचौरी  के साथ आलू की सब्जी की सुगंध हमे दुकान तक खींचे ले जा रही थी। वहां गुलाब जामन  भी मुँह में रस भर देते है। मसालेदार कचौरी  और सब्जी साथ में मिठास घोलता गुलाब -जामुन क्या बात है। 

       मध्य प्रदेश में खास -तौर पर वाफ्ले  भी मिलते है। यह आटे  की गोल लोई होती है। जिसे पहले गर्म पानी में उबाला  जाता है। उसके बाद उसे तला जाता है। इसका स्वाद भी निराला होता है साथ में सब्जी  खाकर लगता है  जैसे दावत का खाना खा लिया है। पेट बहुत समय तक भरा रहता है। 

      हर प्रदेश में पकोड़ो का नाम और तरीका बदल जाता है। कही बेहद बारीक़ सब्जियां काट कर  पकोड़े बनाये जाते है तो कही  बिलकुल गोल बड़े -बड़े पकोड़े बनाये जाते है।  यहाँ  इसे आलू बड़ा कहा  जाता है जो मुश्किल से दो खाने पर पेट भर जाता है।  इन सब चीजों का स्वाद मन को भाने  बाला था।

            उत्तर भारत में मिलने वाले सभी तरह के खाने आपको यहां मिल जायेंगे। जिसका स्वाद आपके मन मुताबिक होगा।  यहां आपको खाने से सम्बन्धित कोई परेशानी नहीं होगी। 


 

UJJAIN SAFE CITY

               उज्जैन का माहौल सुरक्षित 

 


          जब भी आप उज्जैन जायेंगे तब आपको भस्म आरती देखने की इच्छा जरूर होगी। बिना भस्म आरती देखे   आपको उज्जैन में मजा नहीं आएगा। भस्म आरती के लिए पंक्तियाँ रात  एक बजे से लगनी शुरू हो जाती है। जब रात  एक बजे से पंक्तियाँ लगती है। तब यात्रियों को रात  में रुकना जरूरी हो जाता है। आप रात  एक बजे  मंदिर में जाने के लिए तभी निकलना पसंद करोगे जब आप सुरक्षित होगे । असुरक्षा के कारण कोई भी रात  को बाहर नहीं निकलना चाहेगा। इसलिए रात  को निकलने से नहीं डरना चाहिए। आप खुद को सुरक्षित महसूस करेगे। 

         वहां महाकालेश्वर मंदिर के कारण आसपास रौनक होती है। इस समय अधिकतर भक्त और श्रद्धालु दिखाई देंगे। यहाँ की आबादी ज्यादा नहीं है। आसपास का माहौल ठीक है। 

       रात  में ठहरने से राजनीतिज्ञो   को डरना चाहिए। कहा  जाता है- जो भी शासक रात  के समय उज्जैन में रुकता है। उसकी सत्ता चली जाती है.  भारत के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और कर्नाटक के मुख्यमंत्री Y  S  येदियुरप्पा एक बार रात  में उज्जैन में रुके थे। उनकी उसके बाद सत्ता चली गई। उसके बाद कोई भी इस मिथक को तोड़ने की हिम्मत नहीं करता। क्योंकि सत्ता में आना बहुत मुश्किल होता है। इसे छोड़ने का मोह बहुत दुखदाई होता है।  

# bade ganesh ji ka mandir

          उज्जैन में बड़े गणेश जी का मंदिर 




 

  बड़े गणेश जी का मंदिर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर के बहुत पास है। यह अपने बड़े आकर के लिए बहुत प्रसिद्ध है। इसे देखकर आंखे चकाचौंध हो जाती है। मैंने इतने  बड़े आकर के गणेश जी  इससे पहले नहीं देखे है। यह सबसे बड़े  है। इसको देखकर मन में सपने साकार होने लगते है कि  अब हमारी सारी  मनोकामना इनकी कृपा से पूरी हो जाएगी 

                इनके निर्माण के बारे में सुनकर और भी हैरानी होती है कि  इन्हे मसालों  से बनाया गया है। आपको समझ आया यानि रसोई में इस्तेमाल होने वाले खाने की  चीजे ।  आपने सुना था कभी चावल का माड़  ,चुना ,गुड़ और मेथी जैसे मसालो  से मूर्तियां  बनाई जाती है।  इसे बनाये हुए काफी साल बीत  चुके है। तब भी इसमें कोई कमी दिखाई नहीं देती है। इसे देखकर लगता है जैसे अभी इसे बनाया गया है।  इसमें निर्माण कला से सम्बन्धित चीजे भी मिलाई  गई है। इन्हे  मजबूत बनाने के लिए इसमें मसाले डाले  गए है। आजके समय में हमे मसाले  सुनकर हैरानी होती है हमारे पुराने घर , महल, यहां तक की चीन की दीवार के बनाने में भी चावल के पानी और चूने का इस्तेमाल हुआ है। 

      इसे बनाने के लिए अधिकतर तीर्थ स्थलों से जल और  मिटटी  लाई  गई है।  इस मूर्ति को बनाने में ढाई बर्ष  लगा था।  यह मूर्ति 18  फीट  ऊँची और 10  फ़ीट चौड़ी है मूर्ति में गणेश की सूंड दक्षिण की तरफ है। मूर्ति के माथे पर त्रिशूल और स्वस्तिक बने हुए है 

         जब महाकालेश्वर मंदिर  से बाहर निकलते है तब बाये तरफ यह मंदिर है। अधिकतर लोग इसमें जाकर आत्मिक शांति का अहसास करते  है। महाकालेश्वर मंदिर में घूमने के कारण   थके हुए शरीर को आराम भी देते दिखाई दे जायेंगे।

 इस मंदिर के अंदर जाने पर अन्य देवी -देवताओ की मूर्तियां भी  है। श्रद्धालु लोग उनके सामने भी सिर  झुकाते है। 

#confluence of longitude and tropic of cancer at ujjain

             देशांतर और कर्क रेखा का संगम उज्जैन में 


         भारत में विक्रमादित्य के शासन काल में सम्पूर्ण भारत का समय उज्जैन से तय होता था।  ग्रीक ,फ़ारसी ,अरबी और रोमन लोगो ने भारतीय कालगणना  से प्रेरणा लेकर ही अपने  अपने यहाँ के समय को जानने के लिए अपने तरीके  की वेधशालाएं  बनाई थी।  कैलेंडर निर्धारित किये थे। 

       प्राचीन भारत की ग्रीनविच   यह नगरी देश के मानचित्र में 23. 9  अंश उत्तर  अक्षांश एवं 74. 75 अंश पूर्व रेखांश पर समुद्र सतह से लगभग १६५८ फीट  ऊंचाई पर बसी है। वर्तमान में ग्रीनविच मान से उज्जैन 23. 11  अंश पर स्थित है। भौगोलिक गणना के अनुसार प्राचीन आचार्यो ने उज्जैन को शून्य रेखांश पर माना  जाता है कर्क रेखा भी यही से गुजरती है। देशांतर रेखा और कर्क रेखा यही एक -दूसरे को काटती  है। 

 प्राचीन भारतीय मान्यता के अनुसार जब उत्तरी ध्रुव की स्थति पर 21  मार्च से प्राय 6  मास का दिन होने लगता है प्रथम 3  माह पूरे होते ही सूर्य दक्षिण क्षितिज  से बहुत दूर हो जाता है। यह वह  समय होता  है जब सूर्य उज्जैन के ठीक ऊपर होता है। उज्जैन का अक्षांश व् सूर्य की परम् क्रांति दोनों ही २४ अक्षांश पर मानी  गई है सूर्य के ठीक सामने होने की यह स्थिति संसार के किसी और नगर की नहीं है। 

        स्कंदपुराण के अनुसार  महाकालेशवर  को कालगणना का प्रव्रतक   भी माना  गया है  प्राचीन भारत की समय गणना का केंद्रबिंदु होने के कारण ही काल के देवता महाकाल है 

#Navel of the world

                  विश्व की नाभिस्थली उज्जैन 


भारतीय समय के अनुसार एक दिन और रात सूर्योदय से लेकर अगले दिन तक में पूरा होता है जबकि अंग्रेजी समय अनुसार रात  के 12  बजे जबरन दिन बदल दिया जाता है जबकि उस वक़्त उस दिन की रात  ही चल रही होती है। समय की यह धारणा  अवैज्ञानिक है। 

     टाइम जॉन को सामान समय क्षेत्र कहते है। दुनिया की घडियो के समय का केंद्र इस समय में ब्रिटेन का ग्रीनविच शहर है। यही से दुनिया की घडियो का समय तय होता है। इंडियन स्टेंडर्ड टाइम भी यही से तय होता है। आज के जमाने में घड़ियाँ स्थानीय स्टेंडर्ड टाइम के अनुसार चलती है। उसी हिसाब से सारे काम  होते है। क्या यह जरूरी है कि  हर देश में एक ही टाइम जॉन हो ?

      19  शताब्दी से पहले  भारत  में विक्रमादित्य के समय से चले आ रहे समय को सूर्य के मुताबिक तय किया जाता था लेकिन अंग्रेजो ने भारत में सब कुछ बदल दिया। विक्रमादित्य के समय में पूरे भारत का समय उज्जैन से तय होता था। .रोमन कैलेंडर भी भारत के विक्रमादित्य कैलेंडर से ही प्रेरित थे । 

      उज्जैन स्थित ज्योतिर्लिंग को महाकाल  भी  इसीलिए कहा  जाता था ,क्योंकि वही  से दुनियाभर का समय तय होता था। खगोलशास्त्रियो  के अनुसार उज्जैन की भौगोलिक  स्थिति विशेष है। यह नगरी पृथ्वी  और आकाश की सापेक्षता में ठीक मध्य में स्थित है इसलिए इसे पूर्व के ग्रीनविच के रूप में भी जाना जाता है। इसलिए स्वय जयसिंह  ने उज्जैन में कालगणना के लिए जंतर -मंतर  का निर्माण करवाया। 

     वराहपुराण में उज्जैन को शरीर का नाभि देश और महाकालेश्वर को अधिष्ठाता  कहा  गया है महाकाल की यह नगरी विश्व की नाभिस्थली है।  

#ANOTHER NAME FOR UJJAIN IS KUMUDVATI

                  कुमुद्वती उज्जैन का अन्य नाम 

       


 लोमश ऋषि एक बार तीर्थ यात्रा करते हुए उज्जैन पहुंचे तब उन्होंने यहां के तालाब, नदी  और पोखरों को  कुमुदिनी तथा कमलो से भरे हुए देखा  .उन जगहों को देखकर उन्हें लगा मानो धरती अनेक चंद्रो से सजी हुई है। कमल के पत्ते अर्ध चंद्र के सामान लग रहे थे।  शिव के माथे पर स्थित चंद्र की शोभा तथा  उनसे निकले प्रकाश से यह कुमुदिनी वन सदा खिला रहता था। इसलिए लोमश ऋषि ने इसका नाम कुमुदवती रख दिया। इस नामकरण का कारण यहाँ की आकर्षक प्राकृतिक शोभा रही है।  

        यहां की जनसंख्या ज्यादा नहीं है। खुले हुए प्राकृतिक स्थान आज भी मन को लुभाने में समर्थ है। 

#avantika ya avanti nagari

                     अवंतिका या अवन्ति नगरी 

 


          `अव `-में रक्षणे धातु ,रक्षा करने के अर्थ में प्रयोग होती है। अत: अवंतिका का अर्थ है -`रक्षा करने में समर्थ। `उज्जैनी के सारे  नामो  में `अवन्ती ` नाम ने अधिक प्रसिद्धि पाई है। संस्कृत ,पाली और प्राकृत साहित्यिक ग्रंथो में उज्जैनी के साथ ही इस नाम का प्रयोग मिलता है। पौराणिक इतिहास के अनुसार हैहय वंश के शासको ने इस राज्य  की  स्थापना की। 

           स्कंदपुराण के अवन्ती  खंड के 43  अध्याय में अवंतिका नाम पड़ने की कथा नीचे  है। पूर्व समय में दैत्यों और देवताओ में युद्ध हुआ। इस युद्ध में देवता हार  गए.तब हारे हुए  देवो ने मेरु पर्वत पर स्थित विष्णु के पास आश्रय लिया। विष्णु ने उन्हें शक्ति एवं अक्षय पुण्य प्राप्त करने के लिए कुशस्थली नगरी में जाकर रहने को कहा। यहां आने के बाद देवताओ ने अपनी शक्ति दुबारा से प्राप्त की। उसके बाद दैत्यों से युद्ध  करके अपना स्वर्ग लोक वापस पाया।  उनकी मनोकामना पूरी हुई।  तब से प्रसिद्ध हो गया। जो यहाँ आकर रहेगा उसकी सभी इच्छाएं पूरी हो जाती है।                       

               महाकाल वन में स्थित यह नगरी समस्त कामनाओ को पूरा करने वाली है। यहां प्रत्येक युग में देवता,तीर्थ,औषधि ,बीज तथा सारे  जीवो का पालन होता है। यह पूरी सबकी रक्षा करने में सक्षम है। यह पापो से रक्षा करती है।अत : इस काल  में इसका नाम अवंतिका या अवन्ति नगरी हो गया। 

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...