#FINE THREADS OF LOVE

              प्रेम की डोर 

  जिन्हे हम प्यार करते है उन्हें कभी अपने प्यार का अहसास सही तरह से नहीं करवा पाते। हमारा पूरा जीवन उनके लिए समर्पित है। हमारा त्याग और बलिदान उनके लिए नगण्य होता है। वह सारा जीवन हमारे किये कामो में कमियां ही निकालते   रहते है और हम हमेशा कसमसाते रह जाते है। हमसे ऐसी क्या गलती हो गई जिस कारण हमारे सारे  कार्यो को व्यर्थ समझा जा रहा है।  

       हमें जीवन में हमेशा अधूरेपन का अहसास होता रहता है। ये सभी के जीवन की विडंबना है। उनके किये निस्वार्थ कार्यो को समझने की कोई कोशिश नहीं करता। वे दूर रहने वालो के किये एक काम के भी गुणगान कर रहे होते है जबकि जो साथ में रहते हुए, पूरी जिंदगी उनपर   कुर्बान कर देते है उनके कार्यो को समझने की कोशिश नहीं करते है। 

        लोग परिवार चाहते है लेकिन परिवार के कार्यो को महत्व नहीं देते है। उन्हें उनके हर काम में कमियां दिखाई दे रही होती है। उनका  परिवार के प्रति कड़वाहट से मन भरा होता है। 

        बुरा व्यवहार करने वाले लोग कुछ होते है। जबकि परिवार के अच्छे कार्यो को भी महत्त्व देने से सभी डरते है। जब परिवार से दूर हो जाते है तब उन्हें परिवार का महत्त्व समझ आता है। यदि परिवार में रहते हुए ही उसका महत्त्व समझ जाये तो सभी का जीवन ख़ुशी से भर जाये। 

     आजकल सिंगल परिवार होते है बच्चे और बड़े दोनों परस्पर बेजार होते है। वे एक दूसरे को कड़वे शब्द सुनाने से नहीं चुकते। जब बड़े हो जाते है तब उन्हें बड़ो के हर काम में कमियां दिखाई देती है।

        बचपन का विरोध सहनीय  हो जाता है क्योंकि हम सोचते है उन्हें दुनियां की समझ नहीं है  वे हमसे अलग होकर कहाँ जायेंगे। 

      बड़े होने पर उन्हें दुनियां की इतनी अधिक समझ आ चुकी होती है कि उन्हें बड़े दुनियां के सामने कमतर नजर आने लग जाते है। 

         हम जिनके साथ रहते है उनके साथ प्यार के बंधन में बंधे होते है। इस बंधन की डोर पतली होती है लेकिन जिस प्यार के धागे से बंधी होती है उसे हम नजरअंदाज कर जाते है। 

        उस डोर को तोड़ देते है डोर टूटते ही दुनियां की सच्चाई सामने आती है। लेकिन जब तक डोर  से जुड़े होते है तब तक उसका महत्व नहीं समझ पाते  है। इसकी समझ बरसो बाद आती है  तब बहुत देर हो चुकी होती है। काश हम समय रहते ही उस डोर का महत्त्व समझ लेते। 

#families break up due to anger and pride

    तलाक श्रृंखला 

 गुस्से और घमंड के कारण टूटते परिवार 

   इंसानी आदत ऐसी होती है। लोग मन से दुखी होते है उस दुःख से बाहर निकलना चाहते है लेकिन अपने घमंड के कारण झुकने के लिए तैयार नहीं होते। ऐसे में उन्हें घर में रहना ,खाना और पीना कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा होता है। लेकिन घमंड के कारण सब कुछ खत्म कर लेते है। पर शब्दों के माध्यम से सामने वाले को माफ़ करने के लिए तैयार नहीं होते है। 

         मैंने ऐसे इंसान भी देखे है  जो सामने वाले की एक गलती  माफ़ नहीं कर पाते  और पूरा जीवन अलग रहते हुए  छटपटाते रहते है।

        वे एक बार झुकना नहीं चाहते बल्कि दुसरो की सुखी जिंदगी को देखकर जलते रहते है। वे एक बार भी  नहीं समझ पाते ,उन्हें   जिनकी   जिंदगी सुखी लग रही है। उन्होंने जीवन में बहुत समझौते किये होते है। उन्हें सुख थाली में परोस कर नहीं मिले बल्कि इसके लिए उन्होंने खुद  बहुत प्रयास किये है।  

     लोग सुख की उम्मीद ऊपर वाले से करते है। वे पूजा पाठ  के माध्यम से हर समय भक्ति में लगे रहते है लेकिन जिसके सामने आकर  शब्दों को संभालने की जरूरत होती है उसके सामने आने से भी कतराते है उनका मुँह भी नहीं देखना चाहते  ऐसे में  वे अपने जीवन को खुद ही यातनामय बनाते चलते है।

        उसके  लिए प्रयास करने वाले भी उन्हें दुश्मन लगने लगते है। उनपर भी गुस्सा उतारने में उन्हें देर नहीं लगती। वो कुछ समय बाद बहुत चिड़चिड़े हो जाते है। उनके सामने आने से शुभचिंतक भी डरने लगते है। वे अपनी जिद के कारण अपने आप और सभी को नुकसान पहुंचा रहे होते है। 

      अपनी इस आदत के कारण एक दिन वे एकाकी हो जाते है। उस समय वे ऐसे लोगो को ढूंढ  रहे होते है। जिससे वे अपने मन की बात साझा कर सके लेकिन  वे इस समय तक अपने सभी हमदर्दो को खो चुके होते है। क्योंकि कब तक  कोई अपना अपमान करवा सकता है। हर चीज की एक सीमा  होती है। 

    उस सीमा  के खत्म होने से पहले संभलने  में  बुराई नहीं है। आप एकाकी रहकर दुखमय जीवन बीता कर अकेले मौत को गले लगाओ। इससे अच्छा है सामने वाले को माफ़ कर दो। 

        इससे अच्छा है सम्बन्धो को सुलझाने के लिए कदम उठाये जाये।  जिंदगी हमे एक बार मिली है। उसे हर समय दुःख में बिताने की जगह कुछ झुक जाये ,यदि सामने वाला झुकने के लिए तैयार है। उसे माफ़ करने में कोई बुराई नहीं है।

         भारतीय समाज में एक का दुःख पुरे परिवार का दुःख होता है ऐसे मे  अपने जीवन में खुशियां वापिस लाने  में कोई बुराई नहीं है।  

#EXPRESS LOVE THROUGH FOOD

 तलाक श्रंखला 

      खाने के माध्यम से प्यार का इजहार 

  जो लड़कियां प्यार करके शादी करती है। वे बहुत लाढ -प्यार  से पली  होती है। उनपर घर की जिम्मेदारी का बोझ डाला नहीं जाता बल्कि सपनो की दुनियां में पलने वाली लड़कियां होती है। जब ससुराल में आकर उन्हें सारी  जिम्मेदारी संभालने के लिए कहा  जाता है। तब  वे एकदम धरती पर आ गिरती है।

         वे घर के काम संभालने की कोशिश करती है। लेकिन काम में गलती होती जाती है क्योंकि उससे पहले उन्होंने काम नहीं किया होता है। क्योंकि पहली बार काम में गलती सभी से  होती है। मायके में यदि बेटियां काम करे तो गलत काम पर भी कोई उसके  काम में नुक्स नहीं निकालता जबकि ससुराल में सही काम में भी  नुक्स ढूंढे जाते है  उस समय उसका मजाक उड़ाया  जाता है। उनका अनेक प्रकार से अपमान किया जाता है तब उनके अंदर की ख़ुशी और  आत्मविश्वास खत्म होता जाता है।

      यहां तक जब उसके हाथ का बनाया हुआ खाना ठुकरा कर या फेंक कर चले जाते है। कई बार तो खाना फेंकते समय इतना भी नहीं सोच पाते कि  उस थाली से बहु को चोट तो नहीं लग रही. माना  ख़राब खाना खाना  सबके बस की बात नहीं होती लेकिन उस अनजानी  लड़की की भावनाओ को समझने की कोशिश कितने लोग करते है। जिसने पहली बार  सबको खुश करने के लिए खाना बनाने  की कोशिश की होती है।    सोचो उसका कैसा हाल  होता होगा।

         वह पति जो शादी से पहले प्राण देने के लिए तैयार रहने की कसमे  खाता  था। जब वही अपमानित करने वालो में शामिल हो जाता है तब उसके दिल पर क्या गुजरती होगी। वह उसके बाद जिंदगी भर खाना बनाने का विश्वास  अपने अंदर नहीं जुटा  पाती। 

     मैने  ऐसी औरते भी देखी  है। जो ऐसे माहौल के बाद कभी भी खाना नहीं बनाती।  यहां तक उस इंसान से पैदा हुए बच्चो को  भी खाना बना कर देने के लिए तैयार नहीं होती। उस बच्चे की सारी  जरूरते पापा पूरी करते है  यहां तक ऐसे घरो में  बेटी की जिम्मेदारी भी माँ नहीं लेती । वह उस बेटी को भी बाप के भरोसे छोड़ कर उसी घर में रहते हुए अपनी जिंदगी जीती थी। उसका सारा मोह खत्म हो जाता है।  . 

     वे सारी  जिंदगी नौकरानी के हाथ से खाना बनवाती है। जब काम वाली नहीं आती तब बाहर जाकर या बाहर से खाना मंगवा कर खाती  है। पुराने समय में तलाक नहीं होते थे लेकिन उस जमाने में भी घरो में तलाक जैसा माहौल देखा जा सकता था। 

      इसके बाद  यदि  पति अपने कृत्य की सारी  जिंदगी माफ़ी मांगता रहे। लेकिन उसे माफ़ी नहीं मिलती ।

      आज के समय  औरत अपना बदला तलाक लेकर पूरा करती  है।  कुछ समय बाद किसी अन्य के संग फिर से गृहस्थी बसा लेती है।

       दोनों तरीके मेरे हिसाब से गलत है। आपको क्या सही लगता है सोच कर देखो ?

#THE PAIN OF HAPPINESS BEHIND WHICH IS NO LONGER AVAILABLE

 तलाक श्रंखला 

              पिछले सुख का दर्द 

  हम अपने अब के दुःख से जितने दुखी होते है। उससे ज्यादा अपने पिछले सुख से भी दुखी होते है। जो हमे अब नहीं मिल रहा। मेरी सखी बताती है। मैं  अपने पति के साथ शादी से पहले  जब भी घूम रही होती थी तब वह जहां फुलवाला दिखाई देता था तो मुझे गाड़ी रोककर फूल खरीद कर  देता था। यदि उसकी निगाहो से फुलवाला ओझल हो जाता था। मेरे याद  दिलाने पर गाड़ी मोड़कर वापिस उसके पास जाकर फूल खरीदकर देता था। 

       शादी के बाद मेरे फूल मांगने के बाद भी  कभी फूल खरीद कर नहीं देता था । उसे मेरा बचपना कहकर टाल  देता है। 

     शादी से पहले उसके पति का घर शाहदरा में था। करोलबाग के विद्यालय में  नौकरी करती थी। उसका मायका जनकपुरी में था। उसका पति उसे छुट्टी होने पर रोज करोलबाग से जनकपुरी छोड़ने जाता था। उसे उस समय अपने आराम की कोई चिंता नहीं थी। आप सोच कर देखिये शाहदरा से करोलबाग होते हुए जनकपुरी जाने में कितना समय लगता होगा। 

       शादी के बाद उसने शाहदरा में स्थानांतरण करवा लिया। उसके ससुराल से विद्यालय का रास्ता मुश्किल से अपनी गाड़ी से केवल 5  मिनट का  था। लेकिन उस 5  मिंट का समय उसके पति के  पास नहीं था। जब सुबह गाड़ियां नहीं मिलती तब वही 5  मिनट  का रास्ता कितने घंटो में बदल जाता है सोच कर देखिये।  उसके साथ ही घर में खड़ी हुई गाड़ियों और  सोते हुए लोगो को देखकर कितना गुस्सा आता होगा। 

     भारत में रहने वाले अधिकतर पतियों का यही हाल  होता है। शादी से पहले जिसे इतने अधिक सपने दिखाए होते है उसके सपने शादी के बाद  एक- एक  करके  तोडना शुरू कर दिया जाता है। उस हाड़मांस की लड़की को सब पत्थर की समझने लग जाते है।

        जिस लड़की का दिल शादी से पहले किसी ने नहीं तोडा होता। उसका दिल पल -पल टूट रहा होता है। वह सिसक रही होती है। उसके आंसू निकल रहे होते है।  लेकिन उन आंसुओ को मगरमच्छ के  आंसू समझे जाते है। 

    उस औरत की टूटन एक दिन परिवार को भी तोड़ सकती  है।  .इसका अहसास उसके घर में रहते हुए किसी को नहीं होता।जब वह इसे बर्दास्त नहीं कर पाती  .घर छोड़कर चली जाती है। 

      उसके जाने के बाद उन दिनों को वापिस पाना बहुत कठिन होता है। धीरे -धीरे वह भी पति के लिए कठोर होती जाती है। उसके आंसू उसकी अपनी आंख से नहीं निकल रहे होते बल्कि वह पूरे  परिवार की आंख से निकलवा रही होती है।  समय रहते उसके आंसुओ के दर्द को समझो। 

   

# INDIAN MEN AND WOMEN OF TODAY

            भारतीय पुरुष और आज की नारी 

         मै  आपको समाज में हो रहे तलाक पर लड़कियों का  नजरिया बताना चाह  रही हूँ। समाज में होने वाले तलाक से लड़कियां,लड़के या उनके परिवार वाले सभी दुखी होते है। अभिभावक  अपने बच्चो से जुड़े होते है। उनके दुःख अभिभावकों को भी परेशान कर देते है। उनका दुःख केवल उनका नहीं होता। बल्कि पूरा परिवार इसे झेल नहीं पाता  है। 

       दूर के लोग इससे खुश भले हो। लेकिन परिवार वाले हर हालत में दुखी हो जाते है। उनका दुःख बच्चो के दुःख से भी बड़ा होता है। क्योंकि बच्चे  केवल अपने बारे में सोचते है। उनकी सोच में उनका परिवार शामिल नहीं होता। इस तलाक का असर बहुत सारे  लोगो पर पड़ता है। इसलिए मै किसी परिवार को टूटने से बचा पाई तो इससे बड़ी ख़ुशी मेरे लिए नहीं होगी। 

      मेरी एक सखी ने अपनी  पसंद के इंसान से  शादी की थी। हम सोच रहे थे उसका जीवन खुशियों से भर जायेगा लेकिन  वह शादी के बाद बहुत परेशान रहने लगी। उसे देखकर उससे परेशानी का कारण पूछा, तब  उसने बताया -" मै  घर से रोज भूखी आती हूँ।  चाय भी नहीं पी  सकती।" उस पर हमें बहुत हैरानी हुई। तब  उसने कहा-" मेरी ससुराल में सारी  चीजे सुबह बिलकुल ताजी  इस्तेमाल होती है। रात  को दूध भी बचाया नहीं जा सकता। मेरे कहने के बाबजूद कोई मेरी बात सुनता ही नहीं है। इतनी जल्दी सुबह दूध वाला आता नहीं है। तो क्या बनाऊँ  या खा कर आऊं." उसकी ससुराल में कोई  बदलने के लिए तैयार नहीं था। 

     आखिर कार  वह ससुराल वालो से अलग होकर पति के साथ रहने लगी।

        पति के साथ अलग रहकर भी उसका दुःख कम नहीं हुआ क्योंकि उसका पति  MBBS  डॉ था। डॉ को अच्छी नौकरी MD  करने के बाद ही मिलती है उससे पहले उसे सही नौकरी नहीं मिल पाती  है। जबकि  वह सरकारी विद्यालय में   अध्यापिका थी  इस कारण यदि  वह कभी पति से पैसे मांगती तब वह देने से इंकार कर देता या  उसका पति कहता -'अपने बैंक से निकलवा लो।'क्योंकि उसके पास अच्छी नौकरी नहीं थी।  

        घर के कामो में भी कोई सहायता नहीं करता था। जब वह सुबह उठ कर घर के काम कर रही होती तब वह सोता रहता। कभी किसी तरह की मदद नहीं करता था। देर होने पर विद्यालय तक छोड़ने के लिए भी तैयार नहीं होता था। 

       तब उसने कहा  -इस रिश्ते में बंधे रहने का क्या फायदा। जब पतिदेव किसी तरह की मदद नहीं करते। उनसे अच्छे पैसे मै  कमा लेती हूँ।

 उसके बाद वह पति से हमेशा के लिए अलग हो गई। मुझे  शुरू में  उसके निर्णय से हैरानी हुई थी। लेकिन आज हर तरफ ऐसा माहौल ही दिखाई दे रहा है। मुझे लगता है  नौकरीपेशा औरत को घर से जोड़ने का कोई कदम परिवार वालो को उठाना पड़ेगा।  परिवार में रहते हुए अकेले जिम्मेदारी उठाना उस नाजुक कली  के बस की बात नहीं है। 

      

papa"s angel or maid

         पापा की परी  या नौकरानी 

  पहले समय में लड़कियों को घर के काम  संभालने के हिसाब से पाला  जाता था। उनसे नौकरी की उम्मीद नहीं की जाती थी। इसलिए उन्हें घरेलू  काम में दक्ष होने पर जोर देते थे। लड़कियों का   सुदर और काम में निपुण होना काफी होता था। लेकिन आजकल लड़के वाले लड़कियों से  नौकरी करवाना पसंद करते है 

        .लड़कियों को नौकरी उनके लड़की होने के आधार पर नहीं मिलती बल्कि उनके अंदर काबिलियत भी लड़को के बराबर देखी  जाती है। इसलिए लड़कियों को घरेलु काम

 सिखाना  इतना जरूरी नहीं समझा जाता बल्कि उसको पढ़ने  लिखने के लड़को के बराबर अवसर दिये  जाते है। जिसके कारण अधिकतर लड़कियां घरेलू काम नहीं सीख पाती। लेकिन ससुराल में जाने के बाद उन्हें मायके जैसा माहौल नहीं मिलता। उसे घर की हर जिम्मेदारी का भार  अकेले सहने के लिए मजबूर किया जाता है। लड़को के बारे में मानसिकता अब भी हजारो साल पुरानी  है। कि  लड़को को घर के काम नहीं करने चाहिए।  तब लाढ -प्यार से पली  बेटियों को ससुराल जेल लगने लगती है।

          उन्हें वहां उन्हें अपनेपन का अहसास नहीं होता है। वे उस कैदखाने से निकलने के  लिए छटपटाने लगती है। क्योंकि उनके बराबर पढ़ाई  करके और नौकरी करने के बाद लड़के यदि पानी भी अपने हाथ से पी  लेते है तो उनकी पत्नी कामचोर समझी जाती है। ऐसे मै  घर -परिवार के साथ नौकरी की जिम्मेदारी अकेले उठाना उसे सजा लगने लगती है। शादी होने के बाद भारतीय पति  को अधिकतर  लगता है। मेने शादी कर  ली मेरी जिम्मदेदारी पूरी हो गई अब ये कैसे भी घर संभाले , मुझे सोचने की जरूरत नहीं है। 

      इतने अधिक काम की जिम्मेदारी वह अकेले उठा नहीं पाती क्योंकि उसने इससे पहले कभी इतना अधिक काम नहीं किया होता है।  आज के जमाने में पति -परमेश्वर के रूप में नहीं देखा जाता। उसे भी अपने समान इंसान समझा जाता है. औरते अकेले सारी  जिम्मेदारी उठाते हुए गुस्सैल और चिड़चिड़ी हो जाती है। पापा की परी   नौकरानी से बदतर समझी जाने लगती है।

        आजकल इसलिए बहुत सारी लड़कियां शादी नहीं करना चाहती। उन्हें पता है ससुराल स्वर्ग का द्वार नहीं है। जो लड़कियां शादी कर लेती है। वे जल्दी ही इस से बाहर  निकलना चाहती है। क्योंकि आसपास तलाक को बुरा नहीं समझा जाता।  .अकेले लड़कियों का रहना हिकारत की निगाह से नहीं देखा जाता। इस कारण बहुत सारे  परिवार टूटते दिखाई  दे रहे है। 

    अब हमे खुद ही सोचना पड़ेगा हम अपनी मानसिकता बदले या अपने परिवार को टूटने दे।   

#importance of love

   


                        

   







   प्यार की महत्ता 


     भारतीय परिवेश में दम्पत्ति का प्यार जताना बेशर्मी कहलाता है। जिसके कारण बाहर समाज में आते समय वे दर्शाते है जैसे वे परस्पर अजनबी है। जिसके कारण उनके बच्चे भी अभिभावकों के सम्बन्ध के बारे में नहीं जान पाते।  ऐसा ही एक संयुक्त परिवार का उदाहरण देने जा रही हूँ। 

     उस परिवार में जब दो भाई -बहनो ने घर में हो रही शादियों के बारे में आपस में बात करते हुए पूछा-" यहाँ सबकी शादी होती है। हमारे मम्मी  पापा की शादी क्यों नहीं होती है।" क्योंकि हमारे समाज में बच्चो को समझाया ही नहीं जाता।  तब उनकी बात सुनकर हंसी भी आयी क्योंकि संयुक्त परिवार में रहते हुए उनका अधिकतर समय अपने दादी -बाबा के साथ बीतता था। 

       मेने कभी अपने मम्मी -पापा या सास -ससुर को परस्पर हाथ पकड़े नहीं देखा था। इस कारण में भी कभी कमरे से बाहर पति का हाथ नहीं पकड़ सकी।

        एक बार कश्मीर में फोटो खिचवाते समय फोटोग्राफर ने जब मुझे इनका हाथ पकड़ने के लिये  कहा तब मुझे बहुत अजीब लगा। उसके बहुत  जोर देने पर जब हाथ पकड़ा तो एक अलग सा अहसास हुआ। जो इतनी पाबंदियों में रहते हुए कभी नहीं हुआ था।

          भारत में रहते हुए हम इतना  अधिक नियंत्रण  रखते है। कि कोमल भावनाओ का अहसास करना भूल जाते है। धीरे -धीरे जीवन में रूखापन उभरता चला जाता है।

      जब में पोर्टब्लेयर  मे समुद्र के   किनारे घूम रही थी तब हाथ पकड़ने पर आत्मविश्वास बड़ा क्योंकि जब लहरे आकर वापिस लौटती है तब वापिस जाते हुए पैर  के नीचे  की रेत  भी ले जाती है। जिसके कारण गिरने और बह  जाने का डर  लगता है। 

   पोर्टब्लेयर में बहुत सारे नवविवाहित जोड़े घूम रहे थे उन्हें देखकर हमारे अंदर  जो  प्यार सूख चुका   था वह अहसास जग उठा।जीवन में प्यार का अलग महत्व है उसे नकारते रहने से किसे सुख मिलता है। सोच कर देखो ? 

       मै  सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ। जो प्यार हमारे अंदर होता है। उसे बाहर दिखाने  में बुराई नहीं है। क्योंकि आजकल तलाक बहुत हो रहे है लोग अपनी नफरत को उजागर कर देते है। लेकिन प्यार और अपनापन दर्शाने से झिझकते है। 

#show love

                               प्यार को दर्शाना  

   

   पहले समय में दम्पत्ति आपस में कितना भी प्यार करते हो लेकिन कभी जताना पसंद नहीं करते थे। बल्कि अपनी भावनाओ को मन तक सीमित  रखने में शान समझते थे। वे शब्दों में ऐसा महसूस करवाते थे जैसे उनका साथी उनपर बोझ है। या उसके साथ रहकर वह  उसपर  अहसान कर रहे है। शब्दिक प्यार कभी दिखाई नहीं देता था। औरत का प्यार तो कभी  दिखाई भी दे जाता था।  लेकिन आदमी हमेशा अपनी पत्नी को जूते  की नोक पर रखता है। यही साबित करने में जिंदगी बीता  देता था। उस जमाने में तलाक नहीं होते थे इसलिए पत्नी अवांछित महसूस होते हुए भी जिंदगी उसी घर में बीता देती थी। 
      मेने ऐसे आदमी  भी देखे है। जो नौकरी खत्म होने के बाद भी इधर -उधर बैठ कर रात  12  बजे घर में घुसते थे। उनके लिए समय पर घर आना शर्मिंदगी का कारण था । ऐसे में औरते भी पूरी तरह आजादी महसूस करती है। उनके ऊपर बड़ो का अंकुश न रहने के कारण, वे भी आजादी के साथ किसी और से संबंध बना सकती है। जब उनके  पति की   आंखे खुलती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। 
        यदि एक आदमी औरत को पटाना  चाहता है तो उसे इसके लिए काफी प्रयास करने पड़ते है। लेकिन औरतो के लिए एक मुस्कुराहट ही काफी है।  ऐसे समय औरतो को नजरअंदाज करना कितना सही है सोच कर देखना ?
     मेने आदमियों को पत्नी के न रहने पर बौराया हुआ देखा है। उनका सारा आत्मविश्वास खत्म होते देखा है  लेकिन जब तक पत्नी सामने रहती है। उसे अपमानित करने में शान समझते है। उनके जाने के बाद उनकी तारीफ के पुल  बांध रहे होते है। यदि यही तारीफ पहले हो जाती तो उनके साथी को  कितनी ख़ुशी मिलती इसे सोच कर देखो ?  साथी के जाने के बाद मुझे नहीं पता उनके ये प्यारे शब्द उनके साथी तक पहुंच भी पाते  है या नहीं। इसलिए समय रहते चेत जाओ। 
      पहले जमाने में मायके में भी लड़कियों को इज्जत नहीं मिलती थी। इसलिए ससुराल में कितना भी अपमान मिले  वह सह जाती थी लेकिन आजकल लड़कियों को मायके में इतना अपमान नहीं मिलता। उनपर प्यार की बौछार हो रही होती है। इसलिए वे ससुराल में रहकर अपमान नहीं झेल पाती  है। 
      यदि लड़की नौकरीपेशा है तो उसे आर्थिक तंगी नहीं होती। पैसे से मिलने वाला सम्मान भी वह अपने दम  पर पाती   है इसलिए उसके लिए तलाक लेते देर नहीं लगती है। 
       यदि आप अपने साथी को प्यार करते हो तो उसे दर्शाना  सीखो वरना  परिवार टूटते देर नहीं लगेगी। 

#omicron "s panic

                        ओमीक्रॉन  की दहशत 


  मेने अपने जीवन में महामारी का इतना भयानक रूप इससे पहले नहीं देखा था। करोना  की दहशत फैले दो साल हो गए है। लेकिन अभी  कोई भी इससे मुक्त नहीं हो सका है। पहले केवल करोना ,फिर डेल्टा, अब ओमीक्रॉन का डर  बना हुआ है।

        हमने करोना  की दोनों डोज लगवा ली है। लेकिन सकूँ  नहीं मिल रहा है। कई देशो ने इसके आलावा अपने नागरिको को बुस्टर डोज भी लगानी शुरू कर दी है ऐसे समय में हमारे  वेक्सिनेशन को कई महीने बीत  चुके है। समझ नहीं आ रहा हमारी वेक्सिनेशन का असर ओमिक्रोम पर होगा या नहीं। 

     हमने ढंग से रिस्तेदारो से मिलना -जुलना भी शुरू नहीं किया है। त्योहारों पर भी घर तक सीमित  रहे लेकिन अफ्रीका से करोना  का नया वैरियंट तबाही मचाने  आ गया है। 

       कुछ जन -जीवन खुला था. वह फिर से बंद होता लगता है। कई देशो ने अफ्रीका से आने वाली उड़ाने  रद्द कर दी है। एयरपोर्ट पर फिर से करोना  टेस्ट होने शुरू हो गए है। सभी लोग डर  रहे है। 

    1920  में स्पेनिश फ्लू के कारण  संसार से 20  करोड़  लोग रुखसत  हो गए थे। ये फ्लू चार साल तक रहा था। भारत में भी डेढ़ करोड़ लोग मर गए थे। जबकि उस समय भारत की जनसँख्या केवल 25  करोड़ थी। उसके सामने सवा  अरब जनसंख्या में कितनी मौतों का सामना करना पड़ेगा। सरकारी बयानों पर बिस्वास करने का मन नहीं करता। 

    अब करोना  ने दो साल से कोहराम मचा रखा है। रोज लगता है कल क्या होगा आने वाले समय में किससे  वास्ता खत्म हो जायेगा। जिसका मुख आज देख रहे है क्या कल भी उसे देख पाएंगे। 

       इस समय केवल भगवान  पर ही भरोसा रह गया है। 

#DIFFERENCE BETWEEN PEACE AND UNREST

                        शांति और अशांति का अंतर् 


  हम सोचते है जहाँ भी मुसलमान होते है वे दूसरे समुदाय वालो को पसंद नहीं करते। इसलिए वे  उन्हें अनेक तरह से परेशान करते रहते है। लेकिन ये अधूरी सच्चाई है। क्योंकि जिन देशो ने राष्ट्रीय धर्म इस्लाम बना दिया है। जहाँ उनके धर्म के आलावा अन्य धर्म के लोग बचे नहीं है।  वे अपने धर्म से निकली अनेक शाखाओ वालो को परेशान करने लगे है। वहां अनेक तरह के दंगे फसाद अब पहले से ज्यादा हो रहे है। 

       अफगानिस्तान में हाजरा समुदाय वालो का इस कदर मारा गया है कि  इस समुदाय वालो को 75 % तक खत्म कर दिया गया है। वहां शिया - सुन्नी का झगड़ा चल रहा है। अभी मस्जिद में हुए बम विस्फोट को क्या कहेंगे जिसमे सौ से अधिक लोग मारे  गए है।

          ये मानव इतिहास का काला  पहलू  है। जिसमे प्यार और नफरत साथ -साथ चलती है। इतने लोग तब भी मारे  नहीं जाते थे। जब मानव जंगली जीवन जीता था। जितने अब लोग हिंसात्मक कार्यवाही के कारण मारे  जा रहे है। जितने भी मुस्लिम राष्ट्र है सब हिंसा की आग में सुलग रहे है।

           उनके लिए अपने देश में रहना मुहाल हो रहा है। दूसरे देशो की तरफ भाग रहे है। कोई देश उन्हें पनाह देने के लिए  तैयार नहीं है। उन लोगो के बारे में सोच कर देखिये जो अपना भरा -पूरा घर छोड़ कर भाग रहे है। कितने बेबस होकर वे घर छोड़ते है उनके दर्द के बारे में सोच कर रूह कांप  उठती है। वे सिर्फ सुकून और जिन्दा रहने के लिये दर -बदर भटक रहे है।

         हर इंसान की जान अपने घर की हर चीज में बसती  है। वे  कितनी मुश्किल से घर  छोड़कर खाना -बदोश की जिंदगी बिताने के लिए निकलते है। जबकि उन्हें पता है। उन्हें किसी भी देश में स्वीकार नहीं किया जायेगा। उन्हें हर जगह दुत्कारा जायेगा लेकिन अपनी और अपनों की जिंदगी के लिए घर बार छोड़ने के लिए मजबूर होते है। 

      इसलिए कहा जाता है स्वर्ग से सुंदर अपना देश होता है। अपने देश में रहते हुए जो सम्मान पा  सकते है। वह कही  और नहीं मिलेगा। देश के हिसाब से भी सम्मान और अपमान का सामना करना पड़ता है।

        इसलिए कहा जाता है - अपने देश के लिए सर्वस्व त्यागने में भलाई है। यदि आपके पास सभी सुख के साधन है लेकिन देश में अशांति है तब आपके सुख रखे रह जायेंगे। जैसे अफगानिस्तान के अमीर  लोग जिंदगी के लिए जान हथेली पर लिए भाग रहे है। 

#afghan thinking and sobbing man

          अफगानिस्तान की सोच और सिसकता इंसान 

   


   अफगानिस्तान जैसे देशो में औरतो के ऊपर इतनी अधिक पाबंदियां रही है कि  उनसे अच्छी  जिंदगी जीने के सारे  अधिकार छीन लिए गए है। जरा सी गलती होने पर सरे -आम कोडो  से पीटा  जाता है। किसी गलती के लिए सड़को पर पत्थर मारते हुए मरने पर विवश करना, उन्हें घर से बाहर निकलते समय किसी मर्द को साथ लेकर चलने की मजबूरी। जबकि पिछले  पचास साल के युद्ध काल ने लाखो मर्दो  को मार  डाला है। बहुत सारे  घर मर्द विहीन हो गए है। ऐसे घरो में साथ चलने के लिए औरते मर्द कहाँ  से लाये। 

      वहां पर बहुत सारी  औरते भीख मांगती दिखाई दे जाएँगी। क्योंकि जब बाहर निकलकर  काम काम करने का अधिकार नहीं है, पढ़ने  का अधिकार नहीं है। ऐसे समय में बच्चो का पेट भरना भी बहुत मुश्किल होता है।वहां शरिया कानून लागु करने वाले नहीं सोच पा  रहे, उनके मरने के बाद उनके  परिवार का क्या होगा  ?

         इस हिसाब से कहा  जाता है भारतीय  सेना में नौकरी करने वाले बड़े दिल के होते है। क्योंकि वे अपने परिवार के हर सदस्य को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश करते है। क्योंकि वे अपने परिवार को खुद के  मरने के बाद भी जिन्दा और खुश देखना चाहते है।

        वहां भी अधिकतर जीने की उम्मीद कम है। पता नहीं बच्चे और पति जैसे लोग बाहर निकलते समय कब जिंदगी   गवां बैठे ,कुछ पता नहीं है। जो सबसे ऊँचे पायदानों पर बैठे है उनके साथ भी निश्चित नहीं है कि  कब तक जिन्दा रहेंगे। फिर भी अपनी आधी आबादी को दोयम दर्जे का समझ कर उसे बाहर निकलने की आजादी नहीं दे पाते  .वे आज भी पांच सौ  साल पहले का माहौल वापिस लाना चाहते है। उन्हें आजादी देकर आत्मनिर्भर बनाने में संकोच हो रहा है। वहाँ  हजारो साल पहले का शरिया कानून लागु करना ही मात्र मकसद रह गया है। 

          मुझे आज भी तालिवानों की सोच से डर  लगता है। जो आधी दुनियां पर अधिकार करके उनपर शरिया कानून थोपना चाहते है। भारत जैसे देश में भी मुश्लिम इलाको में अभी भी औरतो पर बहुत पाबंदी है।

        कुछ समय पहले कश्मीर जैसे राज्य में  एक लड़की को  जींस पहनने पर गोली मार  दी गयी थी। यदि उनका राज हो गया तो हम भी सिसक -सिसक कर  जियेंगे हमारे आंसू पोंछने वाला भी कोई नहीं होगा।  

#HABIT OF STUDENTS AND SCHOOL

           विद्यार्थियों की आदते और विद्यालय 

     


   आज से सरकार  ने विद्यालय खोल दिए है। सरकार ने बच्चो को सुरक्षित रखने के उपाय सुझाये है। उनका पालन बच्चे केवल अध्यापिका  की उपस्थिति में करते है। बाकि समय एकजुट बैठना पसंद करते है। उनका नकाब भी डांटने पर लगता है या आधा -अधूरा लगा कर सोचते है दूसरो  पर अहसान कर रहे है। बहुत जल्दी नकाब नीचे हो जाता है। उनके पास नकाब नीचे  रखने के अनेक बहाने तैयार रहते है।  उनके लिए जिंदगी से खिलवाड़ करना आसान है। 

       कोई छीकता है या खांसता है तब भी वह और अन्य बच्चे सावधानी नहीं बरतते। उसके भी अनेक बहाने  तैयार होते है। वैसे बच्चे बहुत समय से घर में रहकर परेशान हो गए है। वे आजादी की तलाश में विद्यालय जाना जरूर चाहते है। उन्हें चारदीवारी में बंद रह्ना  बिलकुल पसंद नहीं है। 

       एक दूसरे की चीजों को छूने से परहेज नहीं करते। वे जिस तरह परिवार में रहते है कक्षा में भी वैसे ही रहते है। बड़ी कक्षाओं में हर कालांश  के बाद  अध्यापिका बदलती है। उस समय बच्चे पूरा आजादी का फायदा उठा लेना चाहते है। 

      ये खाना मिल बाँट कर अब भी खाना चाहते है। उन्हें बहुत समझाने  पर भी ये बात समझ में नहीं आती। करोना  दबे पांव किसी पर भी हमला कर सकता है। इस बीमारी के लक्षण कई दिन बाद दिखाई देते है।  तब तक दूसरे के अंदर विषाणु  पहुंच चुके होते है। 

     सरकारी सुविधाओं का जिस तरह से बंदरबांट होता है। उससे सभी तक सुरक्षा के उपाय पहुंचने में मुझे संदेह है।  बच्चो को सुरक्षित रखना उनके अभिभावकों का काम है। यदि उन्हें सुरक्षित और जीवित देखना चाहते है तो उन्हें अभी विद्यालय न भेजना ठीक है। बाकि आपकी मर्जी। 

#THE SORROWS OF KRISHNA" S LIFE



                         कृष्ण के जीवन के दुःख 


    हमारे दिमाग में कृष्ण का रूप तस्वीरों वाला बसा हुआ है। हम मथुरा के प्रत्येक आदमी को कृष्ण के प्रतिरूप में देखते है। जब मै  पहली बार मथुरा गई उस समय मैने  जितने आदमियों को देखा उनमे कृष्ण को ढूंढने लगी। लेकिन मेरा मोहभंग हो गया। उनके जैसे इंसान कहीं दिखाई नहीं दिए। 

      जब हम अपने जीवन की तुलना कृष्ण के जीवन से करते है। तब हमे अपना दुःख बहुत कम प्रतीत होता है। खुद सोच कर देखिये कितनो  का जन्म जेल की कोठरी में हुआ,उनके माँ -बाप ने पैदा होते ही उन्हें अपने से दूर कर दिया ताकि जिन्दा रख सके। भरी बरसती  रात  मै  उफनती नदी में टोकरी में छुपा कर ले जाना पड़ा। एक राजा के बेटे को ग्वालो के बीच  में रहना पड़ा। जहां हर पल चारो तरफ मौत (कालिया नाग, शकटासुर,पूतना आदि के रूप में  ) मंडराती रहती थी।  उन्हेोने  किसी से इनकी शिकायत नहीं की। मुझे उनके बचपन में राक्षसो के मारने  के तरीको पर यकीन नहीं आता था। लेकिन अतिश्योक्ति में कुछ सच्चाई जरूर रही होगी। बचपन शिक्षा के अभाव  में गाये  चराते हुए बिता।  मानव हारे  हुए लोगो को कभी याद  नहीं करता बल्कि विजेता को भूलता नहीं है। जिसके कारण सबका जीवन बदल जाता है। 

      अपनों के रहते हुए हम खुद को सुरक्षित महसूस करते है। उन्हें अपनों के कारण ही कष्ट सहने पड़े। दुनियां से छुपना पड़ा। कंस मामा  के वध के बाद जरासंध से युद्ध रोकने के लिए वे मथुरा से द्वारका बस गए। इसके कारण उनका नाम रणछोड़दास पड़ा क्योंकि  युद्ध के कारण जान माल  की हानि होती है। 

     उन्होंने महाभारत के युद्ध को रोकने की भरसक कोशिश की। युद्ध रोकने में असफल रहने की स्थिति में उन्होंने हथियार उठाने की अपेक्षा सारथी  बनाना पसंद किया। किसके खिलाफ युद्ध करे जबकि सभी अपने थे। 

    किवदंती है -उनकी सोलह हजार आठ रानियां थी। लेकिन उनकी केवल आठ रानियां थी। सोलह हजार औरतो को उन्होंने राजा की कैद से मुक्ति दिलवाई थी। मुक्त होने के बाद उन्होंने कहा -हमें समाज में कोई स्वीकार नहीं करेगा। हमारा मर जाना ही सही होगा। तब उन्होंने औरतो को दिलासा देते हुए कहा था तुम मेरी पत्नी कहलवाओगी। 

     उनके अंतिम समय में उनके कुल में इतना  अधिक  कलह बढ़  गया कि  यादव कुल खुद ही अपना विनाश कर बैठा। उनकी आँखों के सामने सारे मर्द मर गए। उन्हें अपने  कुल की  औरतो की सुरक्षा के लिए  अर्जुन की सहायता लेनी पड़ी। 

     अर्जुन और कृष्ण दोनों का बुढ़ापा था। इसलिए वे उनकी सुरक्षा करने में असमर्थ रहे।  उनके सामने ही उनके परिवार की औरतो को डकैत ले गए। वे उन्हें सुरक्षित रख पाने में असमर्थ रहे। 

   सबके विनाश के कारण दुखित अवस्था में सन्यांस लिया। वहां  उनकी शिकारी के तीर से मृत्यु हो गयी। उनकी मृत्यु के बाद द्वारका नगरी समुद्र में समा  गई।

        अब खुद देखिये इतना दुःख कितने लोगो के जीवन में होता है।  उनके जीवन में कृष्ण की अपेक्षा कुछ कम दुःख होते है। लेकिन हम सारी  उम्र दुखो का विलाप करते रहते है। कभी सुखो के बारे में बात नहीं करते। 

    मै चाहूंगी आज के बाद यदि अपने को दुखी महसूस करो तो एक बार कृष्ण से अपनी तुलना जरूर करके देखना।कृष्ण भी इस दुनियां में इंसान के रूप में आये थे लेकिन उन्होंने हर परेशानी का सामना डट कर किया। लोगो के जीवन के अंधकार को दूर करने की कोशिश की इसलिए उनका नाम युगांधर पड़ा। 

     हम जिन्हे ईश्वर के रूप में पूजते है। उन्होंने दुनियां में इंसान के रूप में जन्म लिया था। लेकिन अपने अद्भुत कार्यो के कारण लोगो का जीवन बदलने की कोशिश की इसलिए लोगो ने उनसे प्रेरणा लेकर   पूजना   शुरू किया  आज हमारे मंदिर में विराजमान है। 

#INDIRECT EFFECT OF OBESITY

           मोटापे के परोक्ष प्रभाव 

   माधव अपने मोटापे से खुद भी बहुत परेशान था। लेकिन मोटापे को कम करने के लिए  जितनी दृढ़ इच्छाशक्ति चाहिए वह उसमे नहीं थी। वह रोज निश्चय करता कल से व्यायाम करूंगा और खाने पर भी नियंत्रण करूंगा लेकिन वह उसे निभा नहीं पाता  था। उसके जीवन में कल कभी नहीं आ सका। जब उसने एक किलो भी वजन कम करने के लिए प्रयास किये हो।  

            उसके अभिभावकों ने अनेक विशेषज्ञों से परामर्श किया जो उसका एक दिन में एक किलो तक वजन कम करवा  सकते थे। लेकिन उसे अपने शरीर को तकलीफ देना बिलकुल पसंद नहीं था।वो तरीके  वह दूसरो  को बता कर खुश होता था। लेकिन अपने ऊपर आजमाने की कभी कोशिश नहीं की। 70  किलो से कब उसका वजन डेढ़ सौ  किलो पर पहुंच गया। वह इसका अंदाजा नहीं लगा पाया। 

        उसके लिए केवल व्यायाम और खाने के द्वारा वजन कम करने के प्रयास किये गए। यदि अदनान सामी या आकाश अम्बानी की तरह  माधव  ने सर्जरी की सहायता ली होती तो  शायद उसका मनोबल बढ़ जाता।  वह वजन कम करने के लिए उत्साहित हो जाता। 

     मेने उसके सामान एक मोटे  इंसान को  जाने की सलाह दी तब उसने कहा - ""मैं सर्जरी करवा लुंगा  लेकिन  मुझसे व्यायाम नहीं होता।  मैं  खाना भी कम  नहीं खा सकता हूँ। "" मैं  मध्यवर्गीय इंसान  के मुँह से  सर्जरी की बात सुनकर हैरान हो गयी। क्योंकि मुझे लगता है बिना मतलब सर्जरी करवाने से  दूसरी परेशानियां पैदा हो जाती है। अधिकतर लोग सर्जरी से इसलिए डरते रहते है ,

         माधव को करोना  हो गया। उसके साथ ही उसके बूढ़े  माँ -बाप को भी करोना  हो गया. हम उसके अभिभावकों की बढ़ती उम्र और करोना  से डरे हुए थे।क्योंकि वे पक्षाघात और दिल के मरीज थे उन्हें रक्तचाप और मधुमेह की बीमारी थी। अधिकतर  अस्पताल वाले उनके अभिभावकों को अस्पताल में प्रवेश देने के लिए तैयार  नहीं थे क्योन्कि उनकी उम्र ज्यादा थी जबकि माधव को हर अस्पताल  प्रवेश  देने के लिए तैयार था।  उसने प्रण  ले लिया था जिस अस्पताल में माँ =पापा का इलाज  हो सकेगा उसी में अपना इलाज करवाऊंगा। बड़ी मुश्किल से एक अस्पताल उसके अभिभावकों को लेने के लिए तैयार हुआ  तब सब अस्पताल में इलाज करवा पाए। उसका सोचना सही था। हम सब इकट्ठे होंगे तब सबकी अच्छी तरह से देखभाल कर सकेंगे।  हमें माधव को लेकर कोई चिंता नहीं थी। हमें लग रहा था। उसकी जवान उम्र इस बीमारी को झेल जाएगी। उसे कुछ नहीं होगा।

       लेकिन माधव करोना  का सामना नहीं कर सका और दुनियां छोड़ कर चला गया। उसके  बिना उसका पूरा परिवार उजड़ गया। उसके अभिभावक  करोना बच गए। लेकिन बेटे के बिना  वह हर रोज भगवान  से मौत मांगते है।  जिस व्यवसाय को उसने उन्नति के शिखर पर पहुंचा दिया था। वह उसके जाते ही खत्म हो गया। 

          उसकी पत्नी बिना पति  के ससुराल में रहने के लिए तैयार नहीं थी। वह मायके चली गयी।  उनके बच्चे दादा -दादी,बाप और बुआ का प्यार  सभी से महरूम हो गए हें।

        एक इंसान की मौत उसकी लापरवाही किस तरह परिवार  की तबाही का कारण बन जाती है। यह माधव की मौत ने मुझे दिखा दिया। उनके सभी हमदर्द उसकी मौत के सबा साल बाद भी गम से उबर नहीं सके है। यदि वह किसी भी तरिके से अपना वजन कम कर लेता तो उसके परिवार को ये दिन नहीं देखना पड़ता। 

#GROWING OBESITY CONCERNED FAMILY

          बढ़ता मोटापा ,फिक्रमंद परिवार 

   माधव का मोटापा दिनोदिन बढ़ता जा रहा था।  उसका मोटापा अब सबका ध्यान खींचने लगा था। उसका पेट लटका हुआ दिखने लगा था। उसे चलने में दिक्क्त आने लगी थी। वह लेटने के बाद गहरी नींद सो नहीं पाता  था। उसे साँस संबंधी परेशानियां शुरू हो गई थी। अब उसे सीढ़ियां चढ़ने , चलने, उठने बैठने में भी दिक्क़ते आने लगी थी। उसे समाज से  जुड़ने में भी परेशानी होने लगी थी। उसमे नकारात्मक भावनाए  भी पनपने लगी थी। लेकिन उसने अपने फैलते शरीर को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की। 

          उसके घर में पैसों  की कमी नहीं थी। उसके पापा उसे जरूरत से ज्यादा पैसे देते थे। वह  बचपन में घर से नाश्ता करने के बाबजूद , विद्यालय में पहुंचने से पहले खोमचे वालो से लेकर कुछ औऱ खा  लिया करता था। लंच में घर का खाना होने के बाबजूद केंटीन से भी कुछ लेकर खा लेता था। विद्यालय से छुट्टी के बाद ,वह बाहर निकल कर  कुछ मनपसंद  खा  कर  ही घर जाता था।  घर पहुंचने पर घर का बना खाना भी चुपचाप खा लेता था। उसे भरे पेट खाना खाने में कोई दिक्क्त महसूस नहीं होती थी।  इस कारण जितना काम करता था। उससे कई गुना ज्यादा खाता  था ,हमारे समाज में गोल -मटोल बच्चे अच्छे लगते है। लेकिन एक सीमा  के बाद जब  शरीर बैडोल होने लगता है उसे संभालना बहुत मुश्किल हो जाता है। 

         जब माधव  छोटा था यानी नौ साल का होने पर उसके अभिवावको ने  उसके मोटापे  की तरफ ध्यान देना शुरू किया। उसके घर में सभी  अमीरी का मतलब आराम दायक जिंदगी  को  समझते थे। तब वह भी आरामदायक जिंदगी जीना ही पसंद करता था।

        उसके अभिवावको ने उसे खेलो की तरफ प्रोत्साहित करने की कोशिश की। उसे जबरदस्ती खेलने भेजने लगे। तब वह खेलने जाता जरूर था। लेकिन क्रिकेट खेलते वक्त, बेटिंग करना पसंद करता था। दौड़ने के काम  या बॉलिंग करने के लिए,दूसरो   को किसी न  किसी तरह मना  लेता था।

        खेलने के बाद भी जब उसका  वजन कम नहीं हुआ तब उन्होने  उसके खेलने के तरीके  का पता लगाया।वह उसके कारनामे पर हैरान हो गए। तब  अभिभावको ने उसे बाहर जबरदस्ती खेलने  भेजना बंद कर दिया। 

       छोटे बच्चो को शारीरिक काम के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। लेकिन बड़ा होने पर पर उनसे काम करवाना कठिन हो जाता है। आजकल यह समस्या बढ़ती जा रही है। आजकल बच्चे जिम आदि में जाकर खाने पर नियंत्रण करके,  कुछ समय के लिए वजन जरूर कम कर लेते है। व्यायाम और खाने पर नियंत्रण हटते ही फिर से मोटे  हो जाते है। 

       माधव ने किसी तरह से भी वजन कम  करने के बारे में सोचा ही नहीं। अभिवावको  के सारे  प्रयास बेकार गए। उसे उनकी रोकटोकी पसंद नहीं आती थी। उसके फैलते शरीर के कारण  सभी फिक्रमंद थे। लेकिन जिसे फ़िक्र करनी चाहिए थी। वह लापरवाह था। 

             

# INDIA & PAKISTAN AFTER INDEPENDENCE

          पाकिस्तान और भारत आजादी के बाद 

  15 अगस्त  को भारत आजाद हुआ था। 14  अगस्त को पाकिस्तान ने आजादी पाई थी देखा जाये तो पाकिस्तान भारत से एक दिन पहले आजाद हो गया था। लेकिन पाकिस्तान ने आजादी  के बाद कोई खास तरक्की नहीं की है।  उसका देश ताकतवर देशो से हर तरह से मदद की गुहार करता रहता है। हर देश के सामने दान का कटोरा लिए घूम रहा है।  

।                           पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अपनी छवि साफ दिखाने  के लिए खुद को आतंकपीडित दिखाते  है। यदि आपका देश आतंक से परेशान है तो आप अपने देश में आतंकवादियों को क्यों पाल  रहे है। उनके अड्डे क्यों नहीं खत्म कर देते। जब  आपका पाला हुआ भस्मासुर आपको ही नष्ट करने पर तुला है। तब अपनी इतनी बड़ी सेना के द्वारा  उनके अड्डों को खत्म करके उन्हें नेस्तनाबूत क्यों नहीं कर   देते। यहाँ उनकी इच्छाशक्ति की कमी दिखाई देती है। जो सेना भारत पर कब्जा करने के सपने देखती है।  वह आतंकवादियों का खात्मा क्यों नहीं कर पा  रही है इसे कहते है- दूसरो  के लिए गड्ढा  खोदोगे तब खुद भी गिर सकते हो। उसके पाले  हुए आतंकवादी अब पूरे  संसार में तबाही मचाने  पर तुले है।   पाकिस्तान का नाम खुले -आम आतंकवादियों से जोड़ा जा रहा है।             

        भारत अपनी पहचान बना चूका है। आप भारत से किसी भी देश में जाते है। जबसे मोदी जी प्रधानमंत्री बने है। भारतीयों को सम्मान की निगाहो से देखा जाता है। जबकि अब पाकिस्तानी विदेशी भूमि पर पहुंचकर अपनी पहचान पाकिस्तानी के तौर पर नहीं देते बल्कि खुद को दक्षिण एशियाई या भारतीय के रूप में देते है। उन्हें पाकिस्तानी कहने में शान का अहसास नहीं  होता है । 

     जिस देश में रहते हुए मुस्लिम भारत की कमियां बताते रहते है। इसे रहने  योग्य  नहीं मानते ,वही जब नागरिकता का प्रश्न उठता है। तब धरने पर बैठ जाते है इसके मायने क्या हुए। 56  देश  मुस्लिम है हिन्दू राष्ट्र बताइये पूरे  संसार में कितने है।  

            हिन्दुओ को दूसरे देशो में परेशान किया जाये तब भी भारत की नागरिकता नहीं ले सकते। उन्हें नागरिकता लेने का अधिकार तभी मिलना चाहिए जब मुस्लिमो को नागरिकता मिले। ये कहाँ का न्याय है। वे हिन्दू शरणार्थी  जिन्हे भारत में रहते हुए बरसो बीत गए। उन्हें भारतीय नागरिक नहीं समझा जाता था। जबकि सारे  संसार के मुस्लिम लाखो की संख्या में भारत में बस सकते है। लुटे उजड़े अनेक देशो से ठुकराए  हिन्दुओ के लिए भारत शरणस्थली नहीं बन सकता।  क्योकि भारतीय सरकार दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं दिखा सकी. अब बिल पास हुआ तो कितनी रूकावट आ खड़ी  हुई है। 

# विधि की विडंबना

                            विधि की विडंबना 

       रुक्मी के बच्चे अब बड़े हो गए थे। वह जिम्मेदार और सभ्य नागरिक बन गए थे। उसने जिंदगी भर बहुत मेहनत की थी। उसके बराबर मेहनत करते मैंने बहुत कम  औरतो को देखा था।उनकी जिंदगी का रुख एकदम बदल जायेगा।  वह मेरी सोच से बढ़कर था।  जितनी तरक्की उसके बेटे ने की थी। उतनी तरक्की करते मैने  अपने आसपास के लोगो को नहीं देखा था। उसकी तरक्की कल्पनातीत थी।

         उसके बेटे को फालतू सड़क पर खड़े या फालतू किसी से बात करते नहीं देखा था। मैंने अपने पड़ोस से इतनी पढ़ाई  करके इतना  सफल होने वाले लड़के नहीं देखे थे। उसकी तरक्की उसकी खुद के प्रयास से संभव हुई थी।  हम ये भी कह सकते है। उसने जिंदगी भर परिवार को दुःख से जूझते देखा था इसलिए वह भी मेहनती बन गया था। उसने छोटी उम्र से पैसे कमाने का हुनर सीख  लिया था। उसने अपना समय व्यर्थ नहीं गवाया  था बल्कि अपने हर पल का सदुपयोग किया था। 

        इतने दुःख सहने के बाद रुक्मी का शरीर छलनी हो गया था।  उसके पैर  और घुटने उसका साथ नहीं देते थे। काफी साल परेशानी झेलने के बाद उसने पैरो का ओपरेशन  करवाना ठीक समझा। ओपरेशन  करवाने के बाद कुछ साल वह सही ढंग से काम करने में समर्थ हो सकी. अब उसे अपने स्वस्थ शरीर की कीमत समझ आने लगी थी। ये शरीर एक समय के बाद हमारा साथ छोड़ने लगता है। इस शरीर का विकल्प कोई नहीं बन सकता। अपने शरीर से पैदा हुए बच्चे भी सुख नहीं दे सकते जब तक शरीर स्वस्थ नहीं है। 

        विधि की विडंबना देखिये  उसने अभी पैरो का सही तरह से सुख उठाया भी  नहीं था। एक दिन सड़क पर चलते हुए कार  टक्कर मार  गई दुर्घटना भयंकर थी उसके कूल्हे की हड्डी टूट गयी । वह अपने शरीर से लाचार  हो कर बिस्तर पर पड़  गई थी।

        उसकी    बहु अपने दो बच्चो के साथ सास की सेवा  करते वक्त अब  चिड़चिड़ाने लगी थी। रुक्मी तन और मन से बहुत दुखी थी। उसके जैसे कर्मठ इंसान को भगवान् ने बिस्तर पर ला पटका था। उसकी आँखों में हर वक्त आंसू रहते थे। 


#now helpless husband

                अब बेबस पति 

  जब मेनका के मायके वालो को उसकी मौत की खबर हुई तब उन्होंने उसे इंसाफ दिलाने की हर सम्भव कोशिश की। उन्होंने सारे  संचार माध्यमों के द्वारा उसे न्याय दिलाने की  फरियाद की। उन्होंने अस्पताल के सामने धरना  दिया। उसके घर वालो का नींद और चैन सब उड़ गया। उन्हें मेनका के लिए इंसाफ चाहिए था। जिस महकमे में जाकर फरियाद कर सकते थे ,वहां तक पहुंचे। उन्होंने उसे इंसाफ दिलाने के लिए एड़ी -चोटी  का जोर लगा दिया।                     

         औरत की मौत के बाद सबकी निगाहे बदल जाती है। अब तक जो लोग  महेश को सही ठहराते थे उसे गलत व्यवहार करने का बढ़ावा देते थे।  अब वे उसका साथ देने के लिए तैयार नहीं थे। सबने उससे मुँह मोड़ लिया था।                     उसको जो अपने मर्द होने  का और अच्छी सरकारी नौकरी का   घमंड था। वह मेनका के दम  तोड़ते  ही खत्म हो गया। अब सबसे    बचा लेने की फरियाद करने लगा. सरकार के सख्त कानूनों के सामने कौन  उसका साथ देता। सभी खुद को पुलिस की गिरफ्त   से बचाने  में लगे थे।  सभी रिश्तेदारों ने उसका साथ छोड़ दिया। 

          महेश बहुत दिनों तक गायब रहा लेकिन अपने घर और नौकरी छोड़कर  कितने दिनों तक बाहर   रहा जा सकता है।  पुलिस की तेज निगाहो से बचना इतना आसान नहीं होता है। एक दिन वह पुलिस के   शिकंजे में आ ही गया।        

          अंतत उसे सरकार के सामने झुकना पड़ा। अब वह जेल में बंद है। उसका कोई साथ नहीं दे सका। उसे कई साल की जेल हो गई है.  जिस   नौकरी का घमंड था वह भी छूट गई है। अब वह जेल के  कमरे में बैठ कर पुराने वक्त को याद  करता है। लेकिन पुराना  वक्त वापिस नहीं आता। यदि वापिस आ सकता तब वह  हर कोशिश करके वक्त को बदल देता।

            यही इंसानी फितरत है। जो पास होता है उसका मोल  नहीं समझता जो दूर चला जाता है उसे याद  करके पछताता है। इसलिए कहते है। हमेशा केवल गर्म नहीं रहना चाहिए। रिश्ते निभाने लिए ;कभी नरम तो कभी गर्म दोनों का तालमेल होना चाहिए। 

        कुछ लोग दूसरो  को देखकर शिक्षा ले लेते है। कुछ तब तक नहीं सुधरते जब तक उस दलदल में नहीं फंसते। उन्हें समझाना  भी चाहे तब वे हमें टोक देते है। हम जैसे लोग ऐसे लोगो के सामने मुँह बंद रखने में ही  भलमनसाहत समझते है। 

        यदि आप इससे शिक्षा लेना चाहो तो बहुतो को बर्बाद होने से बचा सकते हो। 

     अब उनका बेटा  मौसी के यहाँ पल रहा है। उस पांच साल के बच्चे का क्या कसूर था। जिसने अपने माँ -बाप दोनों का प्यार खो दिया। 

sad end of helplessness

                  बेबसी का दुःखद  अंत 

        दुखों की एक सीमा  होती है। उससे ज्यादा दुःख मिलने पर शरीर और मन दोनों बगावत करने लगते है। मेने एक बार आपको अपनी सखी मेनका की बेबसी के बारे में बताया था। मेनका ने अच्छी बहु बनने की सारी  कोशिशे की अच्छी बहु के साथ ही उसने सरकारी नौकरी पाकर तन ,मन और धन से सबको खुश करने की कोशिश की लेकिन उसकी सारी कोशिशे नाकाम हो गयी। धीरे -धीरे वह  अंदर से टूटने लगी। उसकी टूटन को किसी ने समझने की कोशिश नहीं की। उसे सुबह से लेकर शाम तक  हर समय काम करने के बाबजूद  कोई भी इंसान  गलतियों पर डांटने से नहीं चुकता था।

        वह चार  बहनो और एक भाई  के बीच  में पली  थी। उसने सुख और दुःख दोनों देखे थे। उसके  अंदर ससुराल में  सबको खुश करने के संस्कार भरे गए थे।चुप रह कर वक्त बदलने का इंतजार करने के लिए कहा गया था।गलत सुनकर भी  किसी को पलट कर जबाब नहीं देना।  लेकिन सबको खुश करते हुए कब उसकी सारी  खुशियां   खो गयी। उसे पता नहीं चला।

        उसके पति चंडीगढ़ में नौकरी करते थे। वह सप्तांहत पर घर आते थे। लेकिन उसे पति के आने पर भी ख़ुशी का अहसास नहीं होता था। क्योंकि वह उससे मिलने पर कोई ख़ुशी जाहिर नहीं करते थे बल्कि जितने समय साथ रहते थे, उसमे केवल कमियां निकालते  रहते थे   और अपने भाग्य को कोसते रहते थे। 

   आदमी कितनी भी ऊँचे  पद पर हो। उसके पद और पैसे से ज्यादा उसका व्यवहार मायने रखता है। लेकिन यह बात महेश नहीं समझ सके। उन्हें हमेशा  लगता है। यह मेनका मेरे हिसाब से नहीं बनी.इसे सुधारने  की जरूरत है। ससुराल का प्रत्येक सदस्य उसे सुधारने  में अहम भूमिका निभाता था। 

        इतना दुःख सहने की ताकत उसमे नहीं थी। एक दिन उसके अंदर जीने की इच्छा ही खत्म हो गयी। जब उसके पति ने उसपर हाथ उठा दिया। . उसने बहस करने की कोशिश भी नहीं की। सबको नाश्ता कराने के बाद अपने कमरे में जाकर फांसी लगा ली। उसे उसके बच्चे का मोह भी नहीं रोक सका। उसे रोता बिलखता छोड़ कर दुनियां से चली गयी। 

       उसके पति ने जब कमरे में आकर उसे फांसी पर लटका पाया तब उसके होश उड़ गए। उसने शोर मचाया सब इकठ्ठे हुए उसे नीचे  उतारा गया   लेकिन अब कुछ नहीं किया जा सकता था। वह इस दुनियां को छोड़ कर जा चुकी थी।  उन्हें इतने बड़े अंजाम का अहसास नहीं था।

          उनके हाथो के तोते उड़ चुके थे। पुलिस केस बन चुका  था। किसी तरह उसका अंतिम संस्कार करने के बाद परिवार के सब सदस्य दरवाजे पर ताला  लगाकर भाग  गए। जिन्हे हर समय लगता था उन्होंने इस घर में मेनका को रख कर उस पर अहसान किया है। आज उनका वही आलिशान घर उसके बिना वीराना हो गया है । उसका बच्चा  लावारिसों की तरह पल रहा है। जिसे मेनका बहुत प्यार करती थी। इसके लिए आप किसे जिम्मेदार कहेंगे। 

portblair life

                                 पोर्टब्लेयर की जिंदगी 

   पोर्टब्लेयर के.  होटल्स में बहुत एहतियात बरती जा रही थी। उन्होंने दरवाजे पर ही हमारे हाथ और सारा सामान सेनीटाइज़  कर   दिया।  होटल उद्योग भी बर्बादी की कगार पर पहुंचे हुए है।  उन्हें भी ग्राहकों की दरकार  है। सबसे पहले जिस होटल में हम रुके उसमे हमारे आलावा कोई और पर्यटक नहीं था। यदि हमारे आलावा कोई और होता तो ठहरने की हिम्मत नहीं जुटा  पाता। 

         ऐसी जगहों  पर बहुत जल्दी शाम हो जाती है। शहर की रौनक भी  शाम होते ही खत्म हो जाती है। शाम के सात बजे लगता है। बहुत रात  हो  गई है। यहाँ पर  नाईट  लाइफ के कोई मायने नहीं है। घर से काम और काम से घर वाली साधारण जिंदगी जीने वाले लोगोके   लिए यहाँ सुकून है। यदि शांति की तलाश में आये  हो तो हर तरफ शांति है। कही भागदौड़ नहीं है। धरती से जुड़े हुए लोग है। यहाँ पर चोरी -चकारी  का कोई खतरा नहीं है।  आप अपना सामान कही भूल जायेंगे तो  वह भी मिल जायेगा। 

        सड़को पर बहुत कम  गाड़ियां चलती है प्रदूषण रहित ,भीड़ -भाड़ रहित सड़के देखनी है तो यहाँ अवश्य आये।  कुछ द्वीपों पर कुल दस गाड़ियां है तो कुछ पर कुल दो गाड़ियां मिलेंगी। क्योंकि यहाँ सब कुछ समुद्र के रास्ते  आता है। इस कारण आधुनिक चीजे बहुत महँगी पड़ती है। वैसे ही ईंट  पत्थरो के मकान  भी बहुत महंगे है। यहाँ के लोकल चीजों से बनाई चीजे सस्ती पड़ती है। लेकिन अमीर  लोग अपनी अमीरी दिखाने  के लिए पैसा खर्चने से नहीं चूकते।

            यहां  प्राकृतिक चीजों से बने बहुत से जुगाड़ू  सामान  मिल जायेंगे। मै  जिस दुनियां में रहती हूँ वैसी हुबहू  चीजे देख्नने का मुझे शौक नहीं है। में उस जगह की विशेष चीजे देखना और जानना पसंद करती हूँ।  यहाँ की हर चीज मुझे लुभा रही थी 

         कंक्रीट के जंगल में रहने वालो के लिए असली अनछुई प्रकृति देखने का अनुभव अनोखा है। जिसका शहरी सभ्यता से मन भर गया है  उसके लिए ये जन्नत है। मै  जब भी ऐसी जगह जाती हूँ मेरा कमरों से निकल कर बाहर ही घूमने का मन करता है। चारदीवारी में तो शहरो में ही रह लेती हूँ। यहाँ की अनोखी दुनिया देखकर मन ही नहीं भर रहा था।  

#astonishing journey

                   हैरान कर देने वाला  सफर  

       हमारी दिल्ली से कराई गई करोना  टेस्ट  रिपोर्ट किसी काम नहीं आयी। क्योंकि वह एक दिन ज्यादा पुरानी  थी   .  वहां एयरपोर्ट पर दुबारा से टेस्ट करवाना पड़ा।रिपोर्ट नेगेटिव आ गई। तब जाकर हमे   पोर्टब्लेयर घूमने के काबिल समझा गया। तब जाकर  हमने राहत की साँस ली। क्योंकि मन में डर  बना हुआ था। कही पॉजिटिव रिपोर्ट आ गयी तो हमें वापिस भेज दिया जायेगा।

              इससे पहले हमारी  फ्लाइट  पांच दिन पहले की थी तब हम फ्लाइट  में बैठने के बाद सफर का मजा   ले रहे थे। हमें नाश्ता आदि  दे  दिया गया था। उसके  एक घंटे बाद घोषणा हुई कि हमे  चैन्नई एयरपोर्ट पर उतरने की इजाजत नहीं मिल रही है। क्योंकि वहां तूफान आ गया है। इसलिए हम वापिस दिल्ली जा रहे है।  हम सुनकर हैरान हो गए। ऐसा इससे पहले मेरे साथ नहीं हुआ था।

         मेने सुबह के समाचारो में तूफान के बारे में सुन लिया था। मैने  अनेक तरह से जानकारी हासिल करने की कोशिश की थी।  मैने कई बार दिल्ली एयरपोर्ट वालो से भी  जानकारी हासिल करने की कोशिश की थी लेकिन किसी ने इस बारे में नहीं बताया था। जबकि कई एयरलाइन्स वालो ने दिल्ली से ही फ्लाइट  खत्म कर दी थी।  मुझे दिल्ली से आखिरी पल तक उम्मीद थी कि  हमारी फ्लाइट  केन्सिल हो जाएगी हम एयरपोर्ट से वापिस आ जायेंगे  लेकिन तब ऐसा नहीं हुआ। लेकिन अचानक इस खबर को पचाना  मेरे लिए बहुत मुश्किल हो रहा था। 

          मै  शाहदरा में रहती हूँ। यहाँ से  एयरपोर्ट  के लिए दो घंटे पहले निकलना  पड़ता था और  दो घंटे पहले एयरपोर्ट पर पहुंचना यानि फ्लाइट  से चार घंटे पहले  घर से निकलना पड़ता है। फिर एक फ्लाइट  पकड़ने के लिए हमारा पूरा दिन लग जाता है। हमारा घर और एयरपोर्ट  दोनों दिल्ली के दो किनारो पर है। दिल्ली वापिस आकर एयरलाइन्स वालो से पैसे वापिस कैसे मिलेंगे या नहीं मिलेंगे ? उसकी भी चिंता सता  रही थी।    

          दिल्ली   वापिस आने के बाद हमे " फ्लाइट   केन्सिल कर दी गई है" इसका लेटर लेना भी जरूरी था। उसमे भी हमारे कई घंटे  बर्बाद हो गए। फिर तीन घंटे लगाकर हम घर वापिस लौटे  थे सोचकर देखिये उस समय हमारी कैसी  हालत होगी। 

      उसके बाद हमें पांच दिन बाद की टिकट उसी एयरलाइन्स वालो ने दे दी। तब  हमारी प्रतीक्षा खत्म हुई। 

         दिल्ली की करोना रिपोर्ट  का अमान्य करार कर  देना।  दुबारा रिपोर्ट करवाना सोचो अगर किसी के साथ ऐसा हो तब उसकी हालत कैसी होगी।

          फिर भी रिपोर्ट का नेगेटिव आने  पर हमने चैन की साँस ली। वर्ना   हमने  पूरा समय  डरते हुए गुजारा  था। 

#development of culture

                         # संस्कारो का विकास 


    हम सभी अच्छे संस्कारी बच्चे और समाज चाहते है। लेकिन ये मिलना संभव नहीं होता है।  कुछ घरो में लोग हर तरह से सभी के मन को लुभाने वाले होते है। जबकि अन्य घरो में कुछ लोग ऐसे होते है जिन्हे कोई पसंद नहीं करता है। ये सब कैसे हो जाता है।  भगवान किसी  को गलत पैदा नहीं करता है। ये गलती कहाँ हो जाती है। ये सोचना जरूरी है। 

         जब बच्चा छोटा होता है हम उसे लाढ -प्यार से पालते है। उन्हें इतना अधिक प्यार देते है कि  उसकी गलतियाँ  नजरअंदाज कर देते है। दूसरो के सलाह देने पर हमे वह नागवार गुजरते  है।उनसे सम्बन्ध तक तोड़ लेते है। 

        जब तक हम हालत को बदलने की सोचते है तब तक सब कुछ नियंत्रण से बाहर हो जाता है। हम हाथ मलते रह जाते है। सारी  दुनियां को दोष देने लगते है। 

       आप सोच के हैरान रह जायेंगे कि  अच्छे संस्कारो की बुनियाद बचपन से ही डाली जा सकती है। आप बच्चे के अच्छे आचरण को बढ़ाबा  दीजिये। बुरी  आदतों  को नकार दीजिये। आप देखेंगे बच्चा  अपने आप सुधरता जा रहा है। उसे अपने बड़ो के प्यार की जरूरत होती है। वह उनसे दूर रहना नहीं चाहता। उनसे दुरी उसे सजा लगती है। वह इस सजा से बचने के लिए सारी  कोशिशे  करने लगता है। अंतत: उसमे अपने आप अच्छे गुण  आते जाते है। 

      आप अपने बच्चे को अच्छे विद्यालय में अच्छे गुणों के विकास के लिए ही भेजते है। उसके लिए अपनी हैसियत से भी जायदा खर्चने के लिए तैयार हो जाते है क्योंकि वहां बच्चे को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं दिया जाता बल्कि उसमें हर प्रकार के गुणों का विकास किया जाता है। किताबी ज्ञान तो कहीं से भी प्राप्त किया जा सकता है। अच्छे गुणों की जरूरत सभी नहीं दे सकते है। बच्चा कच्ची मिटटी के सामान होता है। उसे जिस रूप में ढालोगे वह वैसा ही बन जायेगा। 

        बच्चे में अच्छे गुणों के विकास का काम सबसे पहले घर, फिर विद्यालय के द्वारा किया जा सकता है। हम अच्छे नागरिक केवल समाज के लिए ही नहीं अपने भविष्य के लिए भी चाहते है। 

       जब हमारा शरीर कमजोर हो जाता है तब हमें दूसरो  की मदद की जरूरत पड़ती है। तब हमे पता चलता है हमसे कितनी बड़ी गलती हो चुकी है। इसलिए हमे अभी से सावधान अपने कर्तव्यों के प्रति हो जाना चाहिए। जिससे अच्छे बच्चो  और समाज का निर्माण हो सके। ये किसी एक इंसान के बस का कार्य नहीं है। हम सभी को कोशिश करनी पड़ेगी। यह बहुत मुश्किल नहीं है। कोशिश करके देखिये।  

#DETERIORATING HEALTH SYSTEM

     चरमराती हुई स्वास्थ्य व्यवस्था 

     आज वित्त मंत्री जी की स्वास्थ्य सेवा के लिए पैकेज  सुनकर मुझे भारत में फैले हुए भ्रस्टाचार की याद  आ गई। मै  इससे पहले छोटे राज्यों के स्वास्थ्य विभाग के बारे में  बता चुकी हूँ। जबकि उससे मेरा वास्ता कम पड़ा है। लेकिन दिल्ली में रहते हुए स्वास्थ्य विभाग के हाल  भी अच्छे नहीं है। 

        मै  पिछले दिनों दिल्ली सरकार की डिस्पेंसरी में दवाई के लिए गई। उनसे अपनी बीमारी के लिए दवाई मांगी। उन्होंने खिड़की में से ही पूछा किसी डॉ का परचा लाई  हो।  मैने  कहा- नहीं। 

    उन्होंने कहा - ऐसे हम दवाई नहीं देते। 

     मैने कहा - आप देख लीजिये। फिर दवाई दे देना।

     लेकिन वे देखने और दवाई देने के लिए तैयार नहीं हुई। 

   अधिकतर सरकारी दवाखानो में बिना जान -पहचान के अपना इलाज करवाना बहुत कठिन होता है। वहां  की भीड़ और पिछली खिड़की  से इलाज के कारण  सीधे -सादे लोग बिना इलाज के रह जाते है। 

 यहाँ तक की BP  देखने के नाम पर मशीन न होने का बहाना बना देते है। बाद में पता चलता है. सभी डॉ के पास BP  की मशीन होती है। 

     अधिकतर उनसे दवाई मांगने के नाम पर बाहर से लेने के लिए कह देते है. ऐसे में हम जैसे लोग निजी अस्पतालों में जाते है या बाहर से दवाई खरीदते है। हमे    न चाहते हुए   अपने  वेतन  का बड़ा हिस्सा इलाज पर खर्च करना पड़ता है।

     गरीब लोगो को ऐसे अस्पतालों में कैसा इलाज होता होगा। आप खुद सोच कर देखिये। करोना काल में अस्पतालों की खस्ता हालात की पोल खोल दी है। 

  सरकार  को भेजे गए पैसे का सही हिसाब रखने का तरीका खोजना चाहिए। जिससे सही से इलाज और दवाई जरुरतमंदो को मिल सके। वरना  ऊपर से नीचे  तक फैले भ्रस्टाचार के कारण  मौतों की संख्या अनगिनत हो जाएगी। 

#villain or hero

                खलनायक या महानायक 

 


    हम हमेशा समझते थे। लोग कभी कभार अच्छे होते है। वरना जो बुरा होता है वह हमेशा  बुरा ही रहता है। दुनिया बुरे लोगो से भरी पड़ी है।  अब लगता है अच्छाई  सभी में होती है उसे सामने लाने  में इंसान  हिचकिचाता है। यदि कोई अपनी हिचकिचाहट से हटकर सामने आता है। तब उसके पीछे चलने वाले सामने आते चले जाते है। मुझे एक कवि के शब्द याद   आ रहे है - "मै  अकेला ही चला था भीड़ जुटती गई। "

          एक इंसान को आगे आने की जरूरत होती है। पीछे चलने वाले बहुत मिल जाते है। इसका उदाहरण सोनू सूद है। करोना  काल  में मजदूरों की दुर्दशा देखकर सोनू सूद द्रवित हो गए। उन्होंने अपनी सम्पतियाँ  बेचकर कुछ मजदूरों को उनके घर तक पहुंचाने में मदद की।  उसकी मदद को सर्वप्रथम सबने ढकोसला समझा। लेकिन जब उन्होंने 350  लोगो को उनके घर तक पहुंचा दिया तब उनके  साथ जुड़ने के लिए बहुत लोग तैयार हो गए। शुरुरात में उन्होंने महाराष्ट्र के लोगो की मदद की थी पर  अब उनके साथ इतने अधिक लोग जुड़ गए है उन्हें आर्थिक मदद देने के लिए तैयार हो गए है  कि उन्होंने पूरे भारत के  लोगो की मदद करनी शुरू कर दी है। शुरू में किसी को यकीन नहीं आ रहा था कि सोनू जी में  इतनी हिम्मत कहाँ  से आ गयी। 

       उन्हें देखकर बाल्मीकि जी की कवि बनने की  कथा याद  आ गई - क्रोंच पक्षी की हत्या देखकर बाल्मीकि जी के  सहसा मुँह से निकल पड़ा दोहा , जिसने  उन्हें महाकवि बना दिया।  उन्होंने रामायण जैसा महाकाव्य लिख दिया जिसके कारण हम आज हजारो साल बाद भी उन्हें श्रद्धा से याद  करते है। 

       अच्छे कार्यो का नतीजा भी भला होता है। सोनू जी को अभिनेता के रूप में लेने से निर्देशक हिचकिचाते थे। लेकिन अब  उनके अच्छे कार्यो के कारण उन्हें खलनायक के रूप में लेने से सभी हिचकिचा रहे है। मै  भी उन्हें अच्छा इंसान नहीं समझती थी। दिमाग में हमेशा बैठा होता है खलनायक माने  बुरा काम करने वाला लेकिन सोनू जी ने इस मिथक को तोड़ दिया है। 

         कई पार्टी के नेता उनकी स्वच्छ छवि देखकर अपनी पार्टी में लेने के लिए तैयार हो गए है। लेकिन अभी वे  कलाकार के रूप में ही काम करना चाहते है। 

      उनका सेवाकार्य उनके सहायको की मदद  के द्वारा बिना किसी रुकावट के चल रहा है। उन्हें में आज का महानायक समझती हूँ। जिसने इंसानो के दर्द को समझा। 

#our health infrastructure

                                  हमारा स्वास्थ्य ढांचा 

         

      भारतीय परिवेश में भ्रष्टाचार हर तरफ फैला हुआ है। हम चाहते है सब ठीक हो जाये लेकिन उसे ठीक करने की जिम्मेदारी किसी अन्य की समझते है। हम अपनी तरफ से कोई कोशिश नहीं करना चाहते है। सब के मन में एक डर बैठा होता है। यदि कोई काम ठीक करने की कोशिश करेंगे तब हमे बहुत सारी  परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।हम उन आने वाली परेशानियों से बचना चाहते है।हम हर काम की जिम्मेदारी दुसरो की समझते है। एक इंसान सब कुछ ठीक नहीं कर सकता। 
      करोना  काल  में अधिकतर लोग पैसा कमाने में लगे रहे। जिसके पास दवाइयां थी ,ऑक्सिजन सिलेंडर, अस्पताल  में दाखिला सब पर लूट -खसोट  मची आपने देखी  होगी। अधिकतर लोगो का जमीर मर गया था। लाशो के ढेर पर महल बनाने में लोग लगे हुए है। 
       जब करोना  काल  में सरकार ने लोखड़ाऊं लगाया था। तब लोगो को सही तरह से इसका कारण समझ नहीं आया था। लेकिन आज के समय में हमारी जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खुल गई है। शहरों में हमारी स्वास्थ्य  सेवाएं कुछ ठीक है लेकिन गावो में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर सही तरह से एक मकान  तक नहीं बना है। उसमे सामान तो विल्कुल नहीं है। कई जगह पर अस्पताल के नाम पर जो ढांचा खड़ा है। उसमे जानवर बंधे है,भूसा भरा हुआ है या उसमे ताला  लगा हुआ। बेसिक चीजे तक नहीं है  .गरीब। अनपढ़ जनता को आवाज उठाने पर डरा -धमका कर भगा दिया जाता है।
       राजीव गाँधी जी ने कहा  था-"अगर हम जनता के लिए एक रुपया भेजते है तो उनके पास केवल पंद्रह पैसे पहुंचते है। "  लेकिन  गावो के बंद  अस्पतालों में एक पैसा पहुँचता भी नहीं दिखाई देता है.
       सरकार     हर जगह की फोटो और विडिओ मंगवाती है। उसी तरह का ट्रेक प्रणाली इसके लिए भी बनवायी  जाये। ताकि स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था सही हो सके। 
      सरकार जितने मौत के आंकड़े बता रही है। विदेशी संस्थाएं  उससे दस या बीस  प्रतिशत जायदा बता रही है।  उस पर बहस भी हो रही है। यदि आपको मेरी बातो पर यकीन नहीं आ रहा तो अपने आस पास का माहौल देखिये जबकि हम  शहरो में रह रहे है। गावो की कल्पना कितनी भयावह होगी।  

indian mentelity in corona time

          भारतीय परिवेश की रूढ़िवादिता और करोना 

       भारत में आदमियों को घर के काम करना सीखाया  नहीं जाता है। इसे केवल औरतो के करने का काम समझा जाता है। यदि औरत बीमार भी हो जाये तब भी उसे काम करना पड़ता है।  आदमी अपने लिए घर के  काम करना पसंद नहीं करते। उन्हें करोना  काल  में संक्रमित होकर मरना  ठीक लगता है वनिस्वत घर के काम करना। 
      इसी से सम्बन्धित आपको दो घरो की दास्ताँ बताने जा रही हूँ। एक घर में जब औरत संक्रमित हो गई। उसकी जवान बेटी से पूछा। उसका जबाब सुनकर हैरानी हुई - "खाना तो माँ ही बनाएगी। हम कैसे बना सकते है।  " उस संयुक्त  परिवार  में दस सदस्य है। कभी कोई उम्र में बड़ा है तो कोई मर्द है इस कारण घर की जिम्मेदारी निभाना घर की औरत का काम है। 
        उस परिवार की जेठानी घर से बाहर कुछ दिनों के लिए गई हुई थी। उसे जल्दी से घर के काम करने के लिए बुलाया गया। उसकी टिकट बुक कराने  और आने में कुछ दिन की देरी हो गई। लेकिन इतने समय में कई परिवारिक सदस्य  संक्रमित हो चुके थे।  लेकिन अपने बचाव के लिए काम करके अपनी मर्दानगी पर चोट पहुँचाना  पसंद नहीं था। 
     दूसरे [परिवार में बच्चे को जन्म देने वाली मां  से काम करवाना गवारा था। लेकिन अपने कमरे में रखे हुए बर्तनो को साफ करना  गवारा नहीं था।उन्हें अलग कमरे में रखकर कोरंटीन  किया गया था। उनसे अपने कमरे में रखे हुए झूठे बर्तन साफ करने या उन्हें निकालकर  बाहर रखने में शर्म आ रही थी।  उन्हें उस बच्चे की मां  और अपने शिशु के प्रति कोई हमदर्दी नहीं थी। यदि उनकी पत्नी और बच्चे को कुछ हो गया तब उनकी मर्दानगी को तसल्ली देने कौन  आएगा।  इस बारे में सोचने का वक्त उनके पास नहीं है। जबकि बच्चे का जन्म ऑपरेशन  से हुआ है। बच्चे के जन्म से  माँ बहुत बीमार चल रही है। वह बीमारी की हालत में सारे  काम कर रही है। लेकिन जिन्हे उसका पालनहार समझा जाता है। उन्होंने उसकी तबियत के बारे में जानने की भी कभी कोशिश नहीं की। 
        जिससे भी बात करो। सभी यही कह रहे है। घर के काम करना तो औरत की जिम्मेदारी है। आदमी कैसे काम कर  सकते है.अब आप ही बताइये इतनी मौतो  का जिम्मेदार केवल करोना  है या हमारी मानसिकता है।  

MEANING OF NAME

                             नाम की सार्थकता 

   

   गृहलक्ष्मी का  मतलब होता है घर की रानी। लेकिन लोग  नाम  रखते वक्त सब कुछ शुभ सोचते है। लेकिन कई लोगो का नाम उनके जीवन के विपरीत साबित होता है। मै  ऐसी ही एक औरत के बारे में आपको बताने जा रही हूँ।                  
        गृहलक्ष्मी  ने अलीगढ़ से MSC . BED  की  थी । उसकी दिल्ली में सरकारी नौकरी लग गई।  कुछ साल नौकरी करने के बाद उसकी शादी की कोशिश की जाने लगी। हर तरफ  शादी योग्य वर ढूंढे जाने लगे। सभी कोशिश कर रहे थे दिल्ली में सुयोग्य वर मिल जाये।दिल्ली में कोई लड़का पसंद नहीं आया।   उन्हें अलीगढ़ में ही शादी  योग्य वर मिला।  वह LLB  था। सब ने सोचा -गृहलक्ष्मी का दूल्हा अपना काम दिल्ली में रह कर भी कर सकता है।दिल्ली में कई न्यायालय है।  गृहलक्ष्मी को नौकरी नहीं छोड़नी पड़ेगी। 
      शादी के बाद गृहलक्ष्मी दो साल तक अलीगढ़ में छुट्टियां लेकर पति के साथ रही।  वह उन्हें दिल्ली में आने के लिए मनाती रही। लेकिन वह दिल्ली में आने के लिए तैयार नहीं हुए।
         उसके बाद उसने सोचा कोई बच्चा आ जाये तो उसके बहाने  से नौकरी छोड़ दूंगी  लेकिन यहां भी भगवान  ने नहीं सुनी। आरम्भ में पति के साथ एक घर में रहना अच्छा लगा पर नौकरी करने वालो के लिए हर वक्त घर की चारदीवारी में बिना मकसद के रहना  संभव नहीं होता। दो साल बाद उसका मन उचाट  होने लगा। वह नौकरी पर आने के लिए बैचेन होने लगी। 
          अंतत उसने सोचा जब मै  दिल्ली आ जाउंगी तब ये भी विवश होकर आ ही जायेंगे। लेकिन उसके पति कभी दिल्ली उससे मिलने नहीं  आये  .उसने इतने कड़े रुख की  कभी उम्मीद नहीं की थी। पति इतने अड़ियल होंगे।शादी के बीस साल बाद  भी उनका दिल नहीं पसीजा। 
        वह छुट्टियों में अलीगढ उनके पास चली जाती थी। लेकिन पति ने एक बार भी दिल्ली  आकर उससे मिलने की कोशिश नहीं की। 
        उसके पति बहुत सुंदर और  अच्छा काम करने वाले थे। लेकिन उन्होंने घर को बनाये रखने की कभी कोशिश नहीं की।  दोनों का जीवन बिना तलाक लिए अलग -अलग रहते हुए बीत  गया। किसी ने झुकने की कोशिश नहीं की। 
           अब गृहलक्ष्मी को दुनियां छोड़े  हुए बरसो बीत गए है। उसकी जमा रकम नोमनी के आभाव में सरकारी खजाने में पड़ी हुई है। जिसके लिए उसने सारी जिंदगी लगा दी।    मुझे आज तक उसके जीवन का मकसद समझ नहीं आया। 

NEW BORN CHILD AND PROBLEM

                                      नवजात शिशु

   

   नवजात शिशु को गोद  में लेते ही अलग अनुभूति का अहसास होता है। कुदरत का करिश्मा लगता है। हम कितनी भी उन्नति कर ले लेकिन  ऐसी कलाकृति बनाना असम्भव है। जो लोग अपने बच्चे को लेकर घमंड करते है। यदि उनसे कहा जाये। इस बच्चे  जैसी एक तस्वीर बना दो। तो वह  उसकी  हूबहू तस्वीर भी नहीं बना सकेंगे। उसमे जान डालना अलग बात है। भगवान की कारीगरी पर नतमस्तक होने का मन करता है। 
       आजकल बाजार में बच्चे का सामान खरीदने जाओ तब दुकानदार बच्चे से सम्बन्धित अनेक वस्तुएँ  आपके सामने ले आता है। आप उनको नकार नहीं पाते। घर ले आते है। जबकि अच्छे डॉक्टर बच्चे के लिए उन चीजों को अनावशयक बताते है। उनकी बच्चे को जरूरत नहीं है। 
      मेने बच्चे के जन्म से पहले बच्चे के लिए अनेक तरह की किट खरीद ली। मेहमान भी बच्चे से सम्बन्धित सामान ले आये। मेरे घर में बहुत सारा सामान आ गया , लेकिन उनका इस्तेमाल करते ही बच्चे को त्वचा की तकलीफ शुरू हो गई। 
       उसकी पीड़ा ने हमें परेशान कर दिया। उसे लेकर डॉक्टर के पास गए। उसके अनुसार बच्चे के लिए माँ का दूध  और साफ पानी सबसे अच्छा है।  उसे अनेक तरह की क्रीम और तेल  इस्तेमाल करने की जगह सिर्फ असली घी  का इस्तेमाल करो।  बाजार में बिकने वाले सारे उत्पाद भ्रामक है। इनसे बच्चे को फायदा नहीं होता है। हमारी जेब खाली  होती है।     
       बच्चे को साफ करने वाले वाइप्स और डायपर आपकी सुविधा भले ही देते है। लेकिन बच्चे को नुकसान करते है  .  माँ का दूध पीने  वाले बच्चे की  तकलीफ के लिए डॉ ने कोई भी चिंता जाहिर नहीं की। किसी तरह की दवाई देने से साफ मना  कर दिया। ये सब प्राकृतिक है। परेशान होने की जरूरत नहीं है। ये विचार प्रसिद्ध डॉक्टर्स के है। जिनपर विश्वास किये बिना नहीं रह सकी।  

#FERRY TRIP

                                      फेरी का सफर                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  


                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                               

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  मै पोर्टबलेअर  से हैवलॉक द्वीप के लिए फेरी से यात्रा करने  निकली। उसके लिए मुझे टिकट खरीदनी पड़ी। उसकी लाइन बहुत लम्बी थी। उसके लिए हमें करोना  टेस्ट की रिपोर्ट और ID  प्रूफ भी देना पड़ा। वहां हमसे ज्यादा हर स्थान पर ID  प्रूफ  और करोना  टेस्ट रिपोर्ट की जरूरत पड़ी। आप भी इन जगहों पर जाने का इरादा रखते है तो ID प्रूफ की बहुत सारी फोटोस्टेट लेकर जाना। पैसो के आलावा इनका होना बहुत जरूरी था। हम सोच रहे थे करोना काल में लोग घर से नहीं  निकल रहे होंगे। लेकिन इस लाइन में हमें टिकेट के लिए दो घंटे लग गए।आप ही सोचिये यहां कितनी भीड़ होगी।  
        यहाँ जाने पर सभी के चेहरे पर मास्क लगाना जरूरी था। लेकिन तब तक कोई भी करोना मरीज इस द्वीप पर  नहीं था एयरपोर्ट पर पता चलते ही उसे वापिस भेज दिया जाता था । इसलिए हम आजादी से घूम सके। होटल आदि स्थानों पर भी अच्छी तरह से सेनिटाइज़ किया जा रहा था। 
      पोर्टब्लेयर की सैर करने के बाद हम द्वीपों की सैर करने निकले। वहां एक द्वीप से दूसरे द्वीप पर जाने के लिए फेरी  की जरूरत पड़ती है 
     फेरी में घुसते हुए हमें एक थैली दी गई। मुझे बहुत हैरानी हुई ये ऐसा क्यों कर रहे है। उसका मतलब मुझे बाद में समझ आया। जब फेरी चलनी शुरू हुई तभी अधिकतर लोग कमरे से बाहर निकल गए। उन्हें देखकर शुरू में मुझे जलन हो रही थी। इन्हे जल्दी टिकट मिल गयी सब खिड़की के साथ बैठ गए। और हमे बीच  की सीट पर बैठना पड़  रहा है। फेरी के चलते ही आधी सीट खाली  हो चुकी थी। 
       बाद में पता चला सबको उलटी हो रही है। मुझे उलटी की कोई परेशानी नहीं है। लेकिन सबको उलटी करते देखकर मेरा भी जी घबराने लगा। हर तरफ बंद कमरे में गंध फ़ैल गयी थी। मै भी बंद कमरे   से निकल कर बाहर खुले में आ गयी। जो लोग कमरे से गायब हुए थे वे भी मुझे बाहर खड़े हुए मिले। 
        लेकिन इसके बाद वाले सफर में मैने किसी को थैली देते नहीं देखा। इस तादात में लोगो को उलटी करते भी नहीं देखा। 
     मेने अनेक बार फेरी का सफर किया है लेकिन मेरी कभी तबियत खराब नहीं हुई लेकिन बंद फेरी के कारण मेरा जी मिचलाने लगा था। आप भी इसके लिए तैयार रहना। 
     

IN THE LAP OF NATURE

            प्रकृति की गोद में 

   पोर्टब्लेयर में जिंदगी बाकी  भारत से बिलकुल अलग है। वहां 500  से अधिक द्वीप है। जहां आबादी बहुत कम  है। अधिकतर आबादी बंगाली है।

         उन्हें देखकर लगता है आजादी की लड़ाई की शुरुरात बंगाल से हुई थी। आपको मेरी बात सुनकर हैरानी हो रही होगी। लेकिन सच में सबसे पहले आजादी की अलख जगाने में बंगालियों   का योगदान था। उन्हें अंग्रेजो ने अपने यहाँ काम करने के लिए ,अंग्रेजी भाषा सीखने  पर जोर दिया। जिसके कारण उनके साथ वे उनके देश में भ्रमण करने गए। उनके साहित्य को पढ़ने  के बाद उन्हें भारतीय और अंग्रेजो के व्यवहार का अंतर् पता चला इस विसंगति को देखकर  उनके अंदर विद्रोह की चिंगारी फूटने लगी।उनके विरोध को देखकर इन राजनीतिक कैदियों के लिए जेल बनाई गई। 

         उन्हें दबाने के लिए उन्हें सेलुलर जेल का निर्माण, उनके हाथो से, उन्हें सजा देने के लिए किया गया।आजकल वहां घूमने के लिए पर्यटक आते है। जबकि ये जेल बनने के 70 साल बाद बंद कर दी गई। वहां रहने वालो को कितनी भयंकर यातनाये दी जाती होंगी जिसके कारण इस जेल को बंद करना पड़ा। उसकी भयावहता सोच कर रोंगटे खड़े हो जाते है। 

         बंगाल से पोर्टब्लेयर की दूरी  भी कम  थी। बांग्ला देश में भारतीयों के साथ अमानवीय व्यवहार होने पर उनके निर्वासितों को इन द्वीपों पर बसाया गया। इसी  कारण यहां बंगाली 62 परसेंट है। यहाँ के खान -पान पर बंगाली असर देखने को मिलता है। यहाँ के लोग हिंदी अच्छी तरह समझ लेते है। भाषा की कोई परेशानी नहीं होती है। 

      कंक्रीट के जंगल से दूर प्रकृति की गोद में जाने का मन हो तो इन द्वीपों पर जरूर जाना चाहिए। 

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...