पापा की परी या नौकरानी
पहले समय में लड़कियों को घर के काम संभालने के हिसाब से पाला जाता था। उनसे नौकरी की उम्मीद नहीं की जाती थी। इसलिए उन्हें घरेलू काम में दक्ष होने पर जोर देते थे। लड़कियों का सुदर और काम में निपुण होना काफी होता था। लेकिन आजकल लड़के वाले लड़कियों से नौकरी करवाना पसंद करते है
.लड़कियों को नौकरी उनके लड़की होने के आधार पर नहीं मिलती बल्कि उनके अंदर काबिलियत भी लड़को के बराबर देखी जाती है। इसलिए लड़कियों को घरेलु काम
सिखाना इतना जरूरी नहीं समझा जाता बल्कि उसको पढ़ने लिखने के लड़को के बराबर अवसर दिये जाते है। जिसके कारण अधिकतर लड़कियां घरेलू काम नहीं सीख पाती। लेकिन ससुराल में जाने के बाद उन्हें मायके जैसा माहौल नहीं मिलता। उसे घर की हर जिम्मेदारी का भार अकेले सहने के लिए मजबूर किया जाता है। लड़को के बारे में मानसिकता अब भी हजारो साल पुरानी है। कि लड़को को घर के काम नहीं करने चाहिए। तब लाढ -प्यार से पली बेटियों को ससुराल जेल लगने लगती है।
उन्हें वहां उन्हें अपनेपन का अहसास नहीं होता है। वे उस कैदखाने से निकलने के लिए छटपटाने लगती है। क्योंकि उनके बराबर पढ़ाई करके और नौकरी करने के बाद लड़के यदि पानी भी अपने हाथ से पी लेते है तो उनकी पत्नी कामचोर समझी जाती है। ऐसे मै घर -परिवार के साथ नौकरी की जिम्मेदारी अकेले उठाना उसे सजा लगने लगती है। शादी होने के बाद भारतीय पति को अधिकतर लगता है। मेने शादी कर ली मेरी जिम्मदेदारी पूरी हो गई अब ये कैसे भी घर संभाले , मुझे सोचने की जरूरत नहीं है।
इतने अधिक काम की जिम्मेदारी वह अकेले उठा नहीं पाती क्योंकि उसने इससे पहले कभी इतना अधिक काम नहीं किया होता है। आज के जमाने में पति -परमेश्वर के रूप में नहीं देखा जाता। उसे भी अपने समान इंसान समझा जाता है. औरते अकेले सारी जिम्मेदारी उठाते हुए गुस्सैल और चिड़चिड़ी हो जाती है। पापा की परी नौकरानी से बदतर समझी जाने लगती है।
आजकल इसलिए बहुत सारी लड़कियां शादी नहीं करना चाहती। उन्हें पता है ससुराल स्वर्ग का द्वार नहीं है। जो लड़कियां शादी कर लेती है। वे जल्दी ही इस से बाहर निकलना चाहती है। क्योंकि आसपास तलाक को बुरा नहीं समझा जाता। .अकेले लड़कियों का रहना हिकारत की निगाह से नहीं देखा जाता। इस कारण बहुत सारे परिवार टूटते दिखाई दे रहे है।
अब हमे खुद ही सोचना पड़ेगा हम अपनी मानसिकता बदले या अपने परिवार को टूटने दे।
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