भारतीय पुरुष और आज की नारी
मै आपको समाज में हो रहे तलाक पर लड़कियों का नजरिया बताना चाह रही हूँ। समाज में होने वाले तलाक से लड़कियां,लड़के या उनके परिवार वाले सभी दुखी होते है। अभिभावक अपने बच्चो से जुड़े होते है। उनके दुःख अभिभावकों को भी परेशान कर देते है। उनका दुःख केवल उनका नहीं होता। बल्कि पूरा परिवार इसे झेल नहीं पाता है।
दूर के लोग इससे खुश भले हो। लेकिन परिवार वाले हर हालत में दुखी हो जाते है। उनका दुःख बच्चो के दुःख से भी बड़ा होता है। क्योंकि बच्चे केवल अपने बारे में सोचते है। उनकी सोच में उनका परिवार शामिल नहीं होता। इस तलाक का असर बहुत सारे लोगो पर पड़ता है। इसलिए मै किसी परिवार को टूटने से बचा पाई तो इससे बड़ी ख़ुशी मेरे लिए नहीं होगी।
मेरी एक सखी ने अपनी पसंद के इंसान से शादी की थी। हम सोच रहे थे उसका जीवन खुशियों से भर जायेगा लेकिन वह शादी के बाद बहुत परेशान रहने लगी। उसे देखकर उससे परेशानी का कारण पूछा, तब उसने बताया -" मै घर से रोज भूखी आती हूँ। चाय भी नहीं पी सकती।" उस पर हमें बहुत हैरानी हुई। तब उसने कहा-" मेरी ससुराल में सारी चीजे सुबह बिलकुल ताजी इस्तेमाल होती है। रात को दूध भी बचाया नहीं जा सकता। मेरे कहने के बाबजूद कोई मेरी बात सुनता ही नहीं है। इतनी जल्दी सुबह दूध वाला आता नहीं है। तो क्या बनाऊँ या खा कर आऊं." उसकी ससुराल में कोई बदलने के लिए तैयार नहीं था।
आखिर कार वह ससुराल वालो से अलग होकर पति के साथ रहने लगी।
पति के साथ अलग रहकर भी उसका दुःख कम नहीं हुआ क्योंकि उसका पति MBBS डॉ था। डॉ को अच्छी नौकरी MD करने के बाद ही मिलती है उससे पहले उसे सही नौकरी नहीं मिल पाती है। जबकि वह सरकारी विद्यालय में अध्यापिका थी इस कारण यदि वह कभी पति से पैसे मांगती तब वह देने से इंकार कर देता या उसका पति कहता -'अपने बैंक से निकलवा लो।'क्योंकि उसके पास अच्छी नौकरी नहीं थी।
घर के कामो में भी कोई सहायता नहीं करता था। जब वह सुबह उठ कर घर के काम कर रही होती तब वह सोता रहता। कभी किसी तरह की मदद नहीं करता था। देर होने पर विद्यालय तक छोड़ने के लिए भी तैयार नहीं होता था।
तब उसने कहा -इस रिश्ते में बंधे रहने का क्या फायदा। जब पतिदेव किसी तरह की मदद नहीं करते। उनसे अच्छे पैसे मै कमा लेती हूँ।
उसके बाद वह पति से हमेशा के लिए अलग हो गई। मुझे शुरू में उसके निर्णय से हैरानी हुई थी। लेकिन आज हर तरफ ऐसा माहौल ही दिखाई दे रहा है। मुझे लगता है नौकरीपेशा औरत को घर से जोड़ने का कोई कदम परिवार वालो को उठाना पड़ेगा। परिवार में रहते हुए अकेले जिम्मेदारी उठाना उस नाजुक कली के बस की बात नहीं है।
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