IN THE LAP OF NATURE

            प्रकृति की गोद में 

   पोर्टब्लेयर में जिंदगी बाकी  भारत से बिलकुल अलग है। वहां 500  से अधिक द्वीप है। जहां आबादी बहुत कम  है। अधिकतर आबादी बंगाली है।

         उन्हें देखकर लगता है आजादी की लड़ाई की शुरुरात बंगाल से हुई थी। आपको मेरी बात सुनकर हैरानी हो रही होगी। लेकिन सच में सबसे पहले आजादी की अलख जगाने में बंगालियों   का योगदान था। उन्हें अंग्रेजो ने अपने यहाँ काम करने के लिए ,अंग्रेजी भाषा सीखने  पर जोर दिया। जिसके कारण उनके साथ वे उनके देश में भ्रमण करने गए। उनके साहित्य को पढ़ने  के बाद उन्हें भारतीय और अंग्रेजो के व्यवहार का अंतर् पता चला इस विसंगति को देखकर  उनके अंदर विद्रोह की चिंगारी फूटने लगी।उनके विरोध को देखकर इन राजनीतिक कैदियों के लिए जेल बनाई गई। 

         उन्हें दबाने के लिए उन्हें सेलुलर जेल का निर्माण, उनके हाथो से, उन्हें सजा देने के लिए किया गया।आजकल वहां घूमने के लिए पर्यटक आते है। जबकि ये जेल बनने के 70 साल बाद बंद कर दी गई। वहां रहने वालो को कितनी भयंकर यातनाये दी जाती होंगी जिसके कारण इस जेल को बंद करना पड़ा। उसकी भयावहता सोच कर रोंगटे खड़े हो जाते है। 

         बंगाल से पोर्टब्लेयर की दूरी  भी कम  थी। बांग्ला देश में भारतीयों के साथ अमानवीय व्यवहार होने पर उनके निर्वासितों को इन द्वीपों पर बसाया गया। इसी  कारण यहां बंगाली 62 परसेंट है। यहाँ के खान -पान पर बंगाली असर देखने को मिलता है। यहाँ के लोग हिंदी अच्छी तरह समझ लेते है। भाषा की कोई परेशानी नहीं होती है। 

      कंक्रीट के जंगल से दूर प्रकृति की गोद में जाने का मन हो तो इन द्वीपों पर जरूर जाना चाहिए। 

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