#internet ke karn khatm hoti padne ki adat

     आज मै  आपसे अपना अनुभव साझा करना चाहती हूँ।  मै  भाषण प्रतियोगिता में भाग लेने गयी। वहाँ  पर बहुत से विद्व्दजन उपस्थित थे। उनके सामने मै  स्वय को बौना  महसूस कर रही थी। उस प्रतियोगिता का विषय "-इंटरनेट के कारण पढ़ने  की ख़त्म होती आदते " था। मेने इस विषय पर बहुत सी किताबो में ढूंढा। इंटरनेट पर शोध किया। लेकिन मुझे कोई भी सामग्री पसंद नही आई। लेकिन मेने अपने हिसाब से इस विषय पर बोल दिया।
      उन सबके सामने अपने विषय पर बोल कर आई तो मेरे अंदर निराशा भर गयी। जो मेने इस विषय पर बोला था वह बाकि सबसे अलग था। मेने उसमे किसी लेखक का उद्धहरण और कविता की पंक्तिया नही जोड़ी थी। मुझे लग रहा था। मेरा सभी लोग मजाक उड़ाएंगे। मुझे पुरुस्कार मिलने की  कोई उम्मीद नही थी इसलिए मै  पीछे के रास्ते से कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद निर्णायक पल का इंतजार करने की अपेक्षा  वापस आने में अपनी भलाई समझी।
      मै  पीछे के रास्ते  से निकलने की कोशिश कर रही थी। तो वहाँ  बैठे लोगो ने कहाँ आपने  बहुत अच्छा भाषण दिया है। आपके हर शब्द मन को छू रहे थे। सिर्फ आपका बोला हुआ हमें समझ आया है  बाकि किसी का हमें समझ नही आया वे क्या बोल गए।
     जहाँ  मुझे अपने प्रयास पर ग्लानि हो रही थी। वही उन शब्दों ने मेरे मन में उत्साह भर दिया। वही  भाषण में आपके सामने प्रस्तुत कर रही हूँ। इसके दुवारा में आपसे शाबासी की उम्मीद नही कर रही हूँ। बल्कि मेरी जैसी स्थिति में फंसे लोगो को एक विषय चुनने में मदद करना चाहती हूँ।
    " मेरे हिसाब से इंटरनेट ने हमारी सोचने और काम करने की दुनिया बदल दी है। पहले समय में हमें किताबे ढूँढना और उन तक पहुंचना बहुत मुश्किल होता था। मुझे बचपन से ही किताबे पड़ने की आदत थी। हमें बचपन से ही पुस्तकालय का मेंबर बनबा  दिया गया था। हमारे पड़ोस में दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी की बस आती  थी। हम वहाँ  से कहानियों की  किताबे लेकर  पढ़ते  थे।
     उसके बाद बड़े होने पर हमें नोट्स  बनाने के लिए किताबो की जरूरत पड़ने लगी तब मुश्किलो का सामना करना पड़ा। हमें कॉलेज और स्कूल की लायब्रेरी में किताबे  मिलती नही थी या जो विषय किताब में चाहिए होता था उसके पन्ने  फ़टे होते थे। हमारी सारी  मेहनत बेकार चली जाती थी। ऐसे मै  हमारा समय और पैसे दोनों बर्बाद हो जाते थे..
      बिना काम के पूरा हुए घर पहुचने पर माँ की डांट  साथ में खानी  पड़ती थी। उन्हें लगता था हम झूठ बोल रहे है। उन्हें अपनी बात समझाने  में असफल होते थे। शायद आप मेरी विपदा समझ सके। 
       हम बहुत अमीर  नही थे। हमें बहुत सारी  किताबे खरीदने के लिए बहुत सारे पैसे भी नही मिलते थे। इसलिए  हम हमेशा अच्छी और साबुत किताब के मिलने के लिए एक से दूसरी लायब्रेरी के चककर  ही लगाते  रहते और डांट  खाते  रहते थे।
     जब पैसे की तंगी ख़त्म हो गयी। हम पढ़ाई  पूरी कर चुके तो हमें विविध विषयो की किताबे ढूंढने में एड़ी -चोटी  का जोर लगाना पड़ा। हमारे आस -पास के लोग किताबो के शौकीन नही थे इसलिए दुकान दार जिस किताब के ग्राहक ज्यादा होते थे केवल वही  किताबे रखते थे। हम जैसे लोगो की किताबे उनके पास मिलती ही नही थी। उनसे अनुग्रह करने पर भी वे हमारी पसंद की किताबे मंगवाने के लिए तैयार नही होते थे। हमारी सारी मेहनत और दौलत  हमारी  जरूरत पूरी करने में असमर्थ थी।
      जब से इंटरनेट का प्रयोग शुरू हुआ। हमें सारी  सामग्री उपलब्ध आसानी से हो जाती है। या इसके माध्यम से हम अपनी पसंद की पुस्तके आसानी से मंगवा सकते है। अब मन में कोई घुटन का अहसास नही होता है।
   मेरे पास समय का आभाव हे क्योंकि में खुद नौकरी करती हूँ। घर के कामकाज के बाद किताब पढ़ने  का समय निकालना और भी मुश्किल होता है। लेकिन मेरी ये उलझन लेपटोप और मोबाइल के कारण दूर हो जाती है। में जब भी खाली  होती हूँ। अपने मोबाईल के द्वारा पसंद की किताब ढूंढ  कर पढ़ने  लगती हूँ।
     नई पीढ़ी ने प्रसिद्ध साहित्यकारों की किताबे नही पढ़ी  है। लेकिन वे इंटरनेट या t.v के द्वारा उनकी नाटकीय प्रस्तुति देख कर उनसे रूबरू हो जाते है। एक इन्द्रिय से प्राप्त ज्ञान याद करने में मुश्किल होती है। लेकिन नाटक के माध्यम  से  कई इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान भुलाये नही भूलता। बच्चे उनका साहित्य नई  विधा के माध्यम से प्राप्त कर रहे है। इसका हमें अफ़सोस नही करना चाहिए। ज़माने की दौड़ से उन्हें पीछे रखना कहाँ  का इंसाफ है.
     इंटरनेट के माध्यम से सभी देशो के अच्छे साहित्यकारों की किताबे आज हम घर बैठे मँगवा  लेते है जो पहले असंभव था। हमें पुराने समय के लोगो के सामान नई  पीढ़ी को बंधनो में बांधने  की अपेक्षा उन्हें खुले आकाश में उड़ने की सहूलियत देनी चाहिए। इंटरनेट के द्वारा हमारे बहुत से काम आसान हो गए है। सभी चीजो से लाभ और हानि दोनों  होते है लेकिन हानि के डर  से लाभ की उपेक्षा करने से सभी को नुकसान का सामना करना पड़ेगा। इसलिए ये कहना उचित है की इंटरनेट ने हमारी पढ़ने  की आदतो को कम  नही किया है बल्कि हम पहले से अधिक जागरूक हो गए है। हम नए माध्यमो के द्वारा उनसे रूबरू होते रहते है। 

#cansar

   वेद को दिल की बीमारी का इलाज कराये एक  साल बीत गया था। उसे अब किसी तरह की परेशानी नही थी। लेकिन कहते है -समय हमेशा एक सा नही रहता। यही कहाबत अब वेद के जीवन में चरितार्थ हो रही थी।               उसकी  बेटी सुमन काफी दिनों से बीमार चल रही थी। उसके घुटनो के कारण वह चलने से लाचार  थी। उसने अपनी जिंदगी में बहुत काम किया था। लेकिन उसका शरीर अब उसका साथ नही दे रहा था। सुमन की उम्र इस समय 56  साल की हो रही थी। उसका अस्पताल में इलाज चलता रहता था। लेकिन एक दिन उसके पेट में बहुत दर्द हुआ। उसका पेट अपने आप बहुत बड़ा हो गया। उससे दर्द सहन नही हुआ। उसकी हालत देखकर उसे जल्दी से अस्पताल ले गए। वहाँ  टेस्ट होने पर पता चला उसे कैंसर है। कैंसर उस स्थिति में पहुँच चुका  है। जिसका कोई इलाज नही है.
      सुमन के जीवन में शारीरिक परेशानियाँ  बहुत सही थी। उसका और अस्पताल का सामना उसे अधिकतर करना पड़ता था। लेकिन इतनी बड़ी बीमारी उसे घेर लेगी इस बात की किसी को उम्मीद नही थी। जिसने भी उसकी बीमारी के बारे में सुना सब स्तब्ध रह गए। अभी तक बहुत दूर के लोगो को इस बीमारी से पीड़ित  देखा था। इतना करीबी को  इस बीमारी से ग्रसित होने  की कल्पना किसी ने नही की थी।
     सुमन की बीमारी अपने आखिरी पड़ाव पर पहुँच चुकी थी। जिस अस्पताल में उसका इलाज चल रहा था। उन्होंने उसके बचने की सम्भावना से इंकार कर दिया था।
     उन्होंने साफ कह दिया था -इनका बचना अब नामुमकिन है। इन पर पैसा खर्च करना बेकार है।अब आप इन्हे घर ले जाओ। 
       जिंदगी की आस  छोड़ देना इतना आसान नही होता लेकिन किसी को मौत  की तरफ धीरे-धीरे  से बढ़ते देखना  उनके करीबियों के लिए बहुत दुखदायी होता है। उन्होंने सभी हॉस्पिटल में उनके इलाज को लेकर कोशिश की लेकिन अधिकतर ने उनका इलाज करने से मना  कर दिया।
      दिल्ली के सबसे बड़े अस्पताल वालो ने कहा -हम आपके मरीज को ठीक करने की कोशिश कर सकते है। आप चाहो तो आप हमारे यहाँ इनका इलाज करवा सकते हो लेकिन हम इन्हे बचाने  का अस्वासन नही दे सकते। आप मरीज को हमारे पास बहुत देर से लाये  हो।
     वह अस्पताल दिल्ली के सबसे महंगे अस्पताल  में आता  था। सुमन का बेटा  समर्थ हो गया था। उसका व्यवसाय बहुत अच्छा चल  पड़ा था।
       उसने सबसे कह दिया -आप पैसे की परवाह मत करो। जहाँ  उम्मीद बधती है। उस अस्पताल में माँ का इलाज करवाओ।
      अब सुमन का एक पाँव  घर और दूसरा अस्पताल में रहता था। उसका इलाज बहुत कठिन था। उसकी भूख -प्यास सब मर गयी थी उसके  कई मुस्किल ऑपरेशन हुए एक तरह से उसका सारा शरीर ही ऑपरेशन के नाम पर काट दिया गया। लेकिन उसे इतने अच्छे दर्द निवारक दिए जाते जिससे उसे बहुत कम  दर्द का अहसास होता।  मेने सुन रखा था की कैंसर का मरीज दर्द बर्दास्त नही कर पाता। उसकी चीख पड़ोसियों को भी बेचैन कर देती है। लेकिन सुमन को मेने कभी बुरी तरह चीखते नही सुना। वह हमेशा हमसे इस तरह बात करती थी। जैसे किसी और की बीमारी के बारे में बता रही हो। उन्होंने अपना धैर्य कभी नही छोड़ा। भगवान  ने उन्हें बहुत हिम्मत दी थी। उनके पास जिंदगी के सारे  सुख अब मौजूद थे। तो जिंदगी ने उनका साथ छोड़ दिया था।
     सुमन को मेने कभी रोते  और भगवान  को कोसते हुए नही सुना था। वे कभी किसी की बुराई भी नही करती थी। वे सहन शक्ति की प्रतिमा थी।
       उनकी सहनशक्ति को देखकर मेने उनसे एक बार पूछा -आपको इतनी हिम्मत कहाँ  से मिलती है। आपको बचपन से अनेक तरह से दुखो का सामना करना पड़ा लेकिन कभी भी आपको बेचेंन  और हतोत्साहित नही देखा। आप इतनी हिम्मत कहाँ  से पाती  हो।
   सुमन बोली -जब भी मै जिंदगी से निराश होने लगती  हूँ। तब बाउजी को याद कर लेती हूँ। मै  ऐसे इंसान की बेटी हूँ जो जीवन की हर मुसीबत  का डट कर सामना कर रहा है। उसने परेशानियों से कभी हार  नही मानी  इसलिए मै  कैसे हार  मान सकती हूँ।  ये शब्द याद करते ही मेरे अंदर नया उत्साह पैदा हो जाता है।  में जिंदगी की हर परेशानी का डट कर  सामना करूंगी कभी नही हारूँगी।
   उनकी जिजीविषा देखकर सब स्तब्ध रह जाते थे। सुमन को पूरी जिंदगी में मेने एक बार कहते सुना था - भगवान  किसी को कैंसर जैसी बीमारी ना  दे। इस बीमारी में बहुत दर्द सहन करना पड़ता है।
     उनके चेहरे पर  तब भी दर्द की शिकन नही थी। ये केवल शव्द थे। लेकिन उन शब्दों ने मुझे झकझोर डाला। उन शब्दों की गहराई में  समझ गयी थी। वे अपने दर्द से जूझ रही थी।
     सुमन अपने समय में अपूर्व सुंदरी रही थी। लेकिन इस बीमारी के कारण उनका रंग -रूप बिलकुल ख़त्म हो गया था। उनको पहचानना भी बहुत मुश्किल हो जाता था। अधिकतर उन्हें लोग पहचान ही नही पाते  थे। इस तरह रंग -रूप बिगड़ते मेने जिंदगी में पहली बार देखा था।
     एक दिन सुमन को दर्द से मुक्ति मिल गयी। वह सबको रोता -बिलखता छोड़कर दूसरी दुनियाँ  में चली  गयी। उसकी मौत  पर वेद बहुत दुखी हुआ।
     उन्होंने कहाँ -जब सुमन को इतनी जल्दी जाना था। तब मुझे इलाज करवाने के लिए  मजबूर क्यों किया। मेरे जाने का वक्त रुकवा कर खुद प्रस्थान कर गयी।
    सुमन वेद के हर दर्द और तकलीफ में उनका साथ देती थी। वेद हमेशा कहते थे -काश सुमन मेरे घर बेटे के रूप में पैदा हुई होती तो मै कितना भाग्यशाली होता।
      वेद के शब्द सुनकर सुकन्या को बहुत गुस्सा आता  था। वह हमेशा कहती -वह बेटी है। बेटी के रूप में जितना कर  सकती है  उसने उससे ज्यादा इस परिवार के लिए किया है। जिसमे उसका हाथ नही है। उसकी दुहाई मत दिया करो। 

#dincharya

     वेद की तबियत काफी खराब हो गयी डॉ  ने उन्हें दिल की बीमारी बता दी। साथ ही बहुत बड़ा खर्चा इस इलाज के लिए बताया। जिसे सुनकर वेद ने साफ मना  कर दिया।
      उन्होंने कहा -इतना जी चुका। और अधिक जी कर क्या करूँगा। आज भी मरना  है  कल भी मरना  है। मै  अपने इलाज पर इतनी मुश्किल से कमाया पैसा खर्च नही करूँगा।
      वेद की इस बात को सुनकर सुमन को बहुत गुस्सा आया। वह बोली -यह पैसा आपने  कमाया  है। आप किसी से अपने इलाज के लिए पैसे नही मांग रहे हो। आपको केवल अपनी बीमारी पर पैसा खर्च करना है। यह इलाज आपको अवश्य करवाना पड़ेगा।
   निराश वेद को अपना  इलाज करवाने के लिए सुमन ने बहुत जोर देकर तैयार किया। वेद को इस इलाज के बाद अपने जीवित आने की उम्मीद नही थी। इसलिए उसने अपनी फैक्टरी नरेश के नाम कर दी। यदि उसे इस दरम्यान कुछ हो जाये तो नरेश को इस फैक्टरी में आने से कोई रोक नही पाये। वेद को देखकर नरेश को जीवन मिल जाता था। उसे भी लगने लगा था। उसका और दादाजी का साथ अब अंत की तरफ है। दादाजी कुछ समय के मेहमान है।  नरेश के चेहरे  पर उदासी दिखाई देने लगी थी। वह हर समय दादाजी की तीमारदारी में लगा रहता था। .
     वेद का इलाज सही हो गया। वह अस्पताल से ठीक हो कर घर आ  गए। इन सबके कारण वेद काफी कमजोर दिखने लगे थे। उन्हें तंदरुस्त होने में काफी समय लग गया। लेकिन अब वे फिर से तंदरुस्त होकर कारखाने जाने लगे।
    वेद को देखकर सबको बहुत हैरानी होती थी। उनको कार्यरत देख कर लोग उनकी उम्र का अंदाजा नही लगा पाते  थे। उनकी जिजीविषा देखकर लोग अचंभित रह जाते थे। वे पोते के उठने का इंतजार नही करते थे। वे उससे पहले ही उठ कर  तैयार होकर कारखाने पहुँच जाते थे।
     वे कहते थे -जब मालिक समय से पहले आ  जाये तो नौकरो  को भी समय का पावंद होना पड़ता है। वेद हमेशा बस से कारखाने जाते थे। जवानी में वेद मोटर साइकिल  चलाते  थे। उम्र बढ़ने के बाद उन्होंने गाड़ी चलाना बंद कर दिया था। अब उन्हें बस का सहारा था।
      वेद को बस से सफर करते देख और नरेश को गाड़ी चलाते  देख कर लोग उनको उनकी उम्र का वास्ता देकर कहते थे- पोता गाड़ी में आता  है दादा बस में ये कैसे।
    उन्होंने नरेश के खिलाफ कभी कुछ नही कहा बल्कि उसका पक्ष लेते हुए कहते -वह जवान है उसकी सुबह नींद नही खुलती है। मै बूढ़ा हो चुका हूँ। मुझे देर तक नींद नही आती। मै घर में बिस्तर पर रहकर परेशान हो जाता हूँ।  इसलिए उसे परेशान किये बिना खुद चला आता हूँ।  मेरी बरसो से यही दिनचर्या रही है।  वह तो अभी मेरे पास आया है। नामालूम कब तक मेरे पास रहेगा। ये भी मुझे मालूम नही इसलिए  मै उस पर निर्भर नही रहना चाहता हूँ।

 . 

#man ki bat

     नरेश अपने दादाजी के पास आना नही चाहता था। वह कई अन्य रिश्तेदारो के पास रहा। लेकिन कुछ दिनों में उसका मन वहाँ  से भी  उचट जाता। नरेश जिसके घर जाता सबके अपने परिवार थे। उनके परिवार के साथ उसे कुछ समय अच्छा लगता लेकिन कुछ समय में  वह अपने को   बेगाना महसूस करने लगता तो वह वहाँ  से दूसरी मंजिल की तलाश में निकल पड़ता अंतत उसकी तलाश  दादाजी के पास आकर ख़त्म हो जाती।क्योंकि दादाजी अकेले रहते थे। वे नरेश का पूरा ध्यान रखते थे। जिसे कहते है -तुझे और नही मुझे ठौर  नही। ये हालत वेद और नरेश की थी। दोनों को एक दूसरे का सहारा था इसलिए नरेश कभी भी वेद के पास आ  जाता था।
     अचानक  वह एक दिन चुपचाप दादाजी के पास आकर रहने लगता ऐसा कई बार हुआ। वेद ने नरेश से कभी भी उसके आने और जाने का कारण नही पूछा। लेकिन और रिश्तेदारो के मन में जिज्ञासा पैदा होती थी। ये सब क्या है। नरेश जिस रिश्तेदार के घर जाकर रहता। वे वेद को आकर उसकी लाचारी बताते तो वेद को बहुत दुःख होता। लेकिन वेद का बुढ़ापा और अपनों से मिली अवहेलना ने उसे मजबूर कर दिया था।    
     वह कहते- बेटा  बुढ़ापा लाचारी का नाम है। मेरा क्या मै कितने दिन का मेहमान हूँ। मै खुद नही जानता इसे किस बात का दिलासा दू। इसे अपने पास रखने का अधिकार भी मेरे पास नही  है। जिन पर मेरा अधिकार था। वे मुझसे दूर हो गए। ये  दूसरे की अमानत है। जितने दिन चाहे आकर रह सकता है। मै  इसे जाने के लिए नही कह सकता। इसका मुरझाया चेहरा देख कर मेरा दिल कचोटता है। आखिर हे तो मेरा खून। कभी इसमें मेरी जान बसती  थी। इसके बाप का किया इस पर कैसे उतार  सकता हूँ..
      वेद के दर्द में डूबे शब्द सबका मुँह  बंद कर  देते थे।वेद अब काफी बीमार रहने लगे थे। उनकी उम्र अब 80  साल से ज्यादा हो गयी थी।  वेद  कर्मठ  थे इसलिए वे अपनी उम्र के  लोगो से ज्यादा स्वस्थ और काम कर रहे थे।
     वे हमेशा अपनी फैक्टरी में जाकर बैठते थे। उनकी फैक्टरी का काम उनके सहायक सँभालते थे। जब वेद बहुत बीमार हो जाते तो सहायको को लगता इनके ना रहने से वे बेरोजगार हो जायेंगे। कुछ सहायको को लगता इनके ना  रहने पर शायद वेद अपने कारखाने की जिम्मेदारी उसे सौंप जाये। जैसे  सभी  की  साँस वेद  की सांसो के साथ जुडी हुई थी।
      ऐसे में उन्हें  नरेश का वेद के साथ आकर रहना उचित लगता। वेद के अंदर पुराने संस्कार थे जिनके कारण वे बेटियो के घर जाकर नही रहना चाहते थे..उनकी कर्मठता उन्हें खाली  बैठने नही देती थी। वे बीमारी से जरा सा स्वस्थ होते ही अपने कारखाने में जाकर बैठ  जाते। जब भी कोई उन्हें घर में आराम से रहने के लिए कहता।
     उनका एक  जबाब होता -लाली में खाली नही बैठ सकता। मेरा मन ऊब जाता.jजब चार लोगो से मिलता हूँ।मुझे अपनी बीमारी याद नही आती। मुझे घर की  चार  दीवारी काटने को आती  है।
    वेद हमेशा काम में लगे रहे। सुकन्या  को हमेशा वेद का हर समय काम करना खलता था। उन दोनों में इस बात को लेकर अक्सर झगड़ा होता था.सुकन्या को वेद के साथ रहने का वक्त नही मिला। अब वेद के पास वक्त था तो उससे  मन की बात करने   वाला साथी नही रहा था। उसे अब सारी खुशियाँ कारखाने में पहुँच कर ही मिलती थी।  

#kanjak

    आज नवरात्र का त्यौहार है। हमारे यहाँ अंतिम दिन कंजक के रूप में लड़कियों को बुला कर उनका आबभगत  किया जाता है। दिल्ली जैसी जगह पर लड़कियों की कमी दिखाई देती है। जब एक परिवार कंजक के लिए लड़कियों को बुला लेता है। उन्ही लड़कियों को दूसरा परिवार अपने घर आमंत्रित कर लेता है। इस तरह एक परिवार में बुलाई गयी लड़कियाँ एक साथ कई परिवारो की मेहमान बन के अपने घर बापिस लौट पाती है।
     इसी तरह मेरे साथ वाले परिवार ने जब अपने घर कंजक बुलाई उन्ही को मेने अपने घर आमंत्रित कर लिया। उसमे  हिन्दू परिवार की लड़कियों के आलावा दो बच्चे मुस्लिम परिवार के भी थे। उन्हें कंजक के रूप में देखकर मुझे काफी हैरानी हुई। मुझे समझ नही आया। इनके बारे में दूसरे परिवार को पता था या नही। वह मुस्लिम परिवार अभी हमारे पड़ोस में रहने आया था। उनको अपने घर कंजक के रूप में बुलाते हुए कुछ झिझक मुझे हो रही थी। क्योंकि नौकरी में तो  मुस्लिम लोग मेरे दोस्त रहे थे। लेकिन इस तरह के त्यौहार में ऐसा मौका कभी नही आया था।
    मेने उन्हें भगवान  का रूप समझ कर उनकी भी पूजा कर दी। जब उनके माता -पिता को झिझक नही थी तो मेने भी बंधनो में बंधने की अपेक्षा उनका स्वागत किया। मेरे घर से निकलने के बाद वे बच्चे कई और घरो में कंजक खाने गए।
    इस बात को उठाने का कारण केवल इतना है। जब हिन्दू मुस्लिम पास रहते है तो उनमे सौहाद्र पनपने लगता है। वे दुश्मन की तरह व्यवहार नही करते लेकिन जब दोनों समुदाय के लोग दूर रहते है। उनमे एक झिझक और डर होता है। लेकिन वे परस्पर दुश्मन नही होते बल्कि अपनी जिंदगी अपने तरीके से जी रहे होते है।
    इस तरह के संबंधो को अराजक तत्व या नेता लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए साम्प्रदायिकता का नाम दे देते है। में उन लोगो को ईद मुबारक कह देती हूँ। हमारे बीच बहुत अच्छे सम्बन्ध नही है। लेकिन उन्हें आप बुरा भी नही कह सकते। जैसे और पड़ोसियों के साथ सम्बन्ध होते है। उतना सम्बन्ध उनके साथ भी है।      मेने इस बारे में अपने परिवार में बताया तब मेरे बच्चे कहने लगे -इनके लिए कंजक का महत्व है। ये बच्चे इस खाने को सही ढंग से खाएंगे। बाकि बच्चो को इस दिन इतनी अधिक संख्या में खाने के लिए मिल जाता है कि  वे खाने का निरादर करते है। उन्हें इस दिन मिलने वाले पैसे और उपहार से मतलब होता है। बहुतायत में होने के कारण खाने का सही उपयोग नही हो पाता।
      हमारे यहाँ कंजक का खाना सिर्फ छोटे बच्चे ही खाते है। इस खाने की बर्बादी ज्यादा होती है। मेरे घर से कंजक खाकर गए बच्चो को लगभग एक घंटा हुआ था। मेने एक परिवार को थाल  भरकर खाना गाय के सामने डालते देखा। मुझे देखकर दुःख हुआ इतनी मेहनत से बना हुआ खाना आज के समय में इतना बर्बाद हो रहा है।  आज भी बहुत बच्चे अच्छे और पेट भर खाने से महरूम है। दूसरी तरफ इतनी खाने की बर्बादी मन को झकझोर जाती है। 

#hamare sampradayik neta kitna sach

    भारतीय सरकार को सांप्रदायिक साबित करने की अनेक कोशिश भारत में रहने वाले लोग ही  कर रहे है। उन लोगो को मै उनका मुखौटा  उतारने के लिए आईना दिखा रही हूँ।
      भारत के आलावा और कोई देश ऐसा नही होगा जहॉ पर किसी विशेष समुदाय का नेता अपने बेटे की दस्तारबंदी की रस्म में उस देश के राष्ट्राध्यक्ष को न बुलाये बल्कि दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्ष को उस रस्म में बुलाये। इसका जोर शोर से प्रचार भी करता है। सारे समाचार उस की हिम्मत की दाद  देते हुए दिखाई देते है। लेकिन कोई समाचार ऐसा मेने नही देखा जिसमे इस घटना को अपमानजनक कहा गया हो.
     इस घटना को लेकर हमारी सरकार ने अपना कोई विचार प्रकट नही किया। उसके बाबजूद सरकार को सांप्रदायिक कहा जाता है।
    भारत ही ऐसा एकलौता देश है जहॉ की खिलाडी सानिया मिर्जा पाकिस्तान के खिलाडी शोएब मलिक  से शादी कर लेती है। उसके बाबजूद भारतीय उसे अपना प्यार और दुलार दे रहे है। जबकि कोई भी लड़की जब किसी  दूसरे देश के नागरिक से शादी कर लेती है। वह दूसरे देश  की नागरिक मान ली जाती  है। लेकिन भारत ही आपको ऐसा देश मिलेगा जहॉ उस देश का सबसे बड़ा और पहली महिला को  खिलाड़ियों को दिया जाने वाला सबसे बड़ा सम्मान " खेलरत्न सम्मान" दे रहा  है।
     ये सम्मान इससे पहले किसी अन्य महिला खिलाडी को नही दिया गया है।भारत ने नियमो में बदलाव करके उसे इस से सम्मानित किया। भारतीय नेता किसी को भी सम्मानित करने के लिए नियमो में फेरबदल करने से भी नही घवराते है। फिर भी उन्हें सांप्रदायिक कहा जा रहा है।
    भारत में किसी भी इलाके में आये दिन भारत में रहने वाले पाकिस्तानी झंडे लहराते देखे जा सकते है। लेकिन भारतीय सरकार इसके खिलाफ आपको कार्यवाही करती दिखाई देती है।  कभी नही ?
   मैने पाकिस्तानी  झंडे भारत में लहराने वालो का विरोध करते किसी भी समाचार वालो को नही देखा है।
    पाकिस्तान में रहने वाले किसी भारतीय को आपने कभी भारतीय झंडे के साथ देखा है। कभी नही ?
     वहाँ भारतीय लोगो को जिन्दा रहने की सहूलियत ही मिल जाये ये उनको बहुत सुख दायक लगता है। पाकिस्तान में रहने वाले सारे हिन्दुओ से मानवाधिकार के नियम के खिलाफ कार्यवाही की जा रही है। उनकी बेटियो का अपहरण कर लिया जाता है। जबरदस्ती दूसरे समुदाय के लोगो से शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है। किसी भी हिन्दू को कैद कर लिया जाता है। किसी भी हिन्दू को मार  दिया जाता है। वहाँ का हिन्दू अपनी आवाज बुलंद नही कर पाता।  पाकिस्तान में भारतीय लोगो के साथ जो हो रहा है  दोनों सरकारों को अच्छी तरह से मालूम है। कभी भारतीय राजनितिक को इसके खिलाफ आवाज उठाते देखा है। कभी नही ?
     जो हिन्दू किसी भी तरह भारत आते है वे दुवारा पाकिस्तान जाना नही चाहते। वे यहाँ की नागरिकता मांगते है। ऐसा कभी आपने किसी पाकिस्तान जाने वाले, किसी मुस्लिम से पाकिस्तानी नागरिकता मांगते देखा हे। कभी नही ? उसके बाबजूद आप भारतीय नेताओ को सांप्रदायिक साबित कहने में लगे रहते है।
     पाकिस्तान में एक राज्य बलोचिस्तान है। वहाँ के नागरिक पाकिस्तान से  अलग होने के लीये जी तोड़ कोशिश कर रहे है। उनके नेताओ को मार दिया जाता है। पुरे बलोचिस्तान को सैनिक छावनी में बदल दिया गया है। वहाँ की जनता से सारे अधिकार छीन लिए गए है। कभी आपने भारतीय सरकार को कहते सुना है। "हम बलोचिस्तान को आजादी दिलवा के रहेंगे।"जैसे पाकिस्तानी नेता हमेशा  कश्मीर को लेकर बयानबाजी करते रहते है। उसके बाबजूद भारतीय नेताओ को सांप्रदायिक कहा जा रहा है।
     में किसी धर्म या समुदाय की बुराई नही कर रही हूँ। में किसी नेता की तरफ दारी भी नही कर रही हूँ  मै केवल अपना नजरिया आपके सामने रख रही हूँ। आप गहराई से इस बारे में जाँच करे फिर समाचारो की सच्चाई पर यकीं करे। समाचार हमेशा सारी सच्चाई सही रूप में हमारे सामने नही रखते बल्कि कुछ लोगो के विचारो को प्रकट करने की कोशिश करते है। वे वही  समाचार बारम्बार दिखाते है जो लोग देखना चाहते है। उनकी सच्चाई को आँखे बंद करके स्वीकार करने से पहले जरा सोचने की कोशिश करके देखिये।
   
     . 

#sarkar ka insaf

      आज कल हर जगह समाचारो में दिखाई दे रहा है। मुस्लिम समुदाय के साथ बुरा बर्ताव हो रहा है। इसके विरोध स्वरूप अलग तरह से लोग कार्य कर रहे है।
     जव एक हिन्दू ने  केरल में कुछ मुस्लिम  धर्म के विरोध में बोल दिया तो  उसके दोनों हाथ काट दिए गए। किसी समाचार में उसके बारे में बताया गया। ऐसी खबरे समाचार वाले दिखाते ही नही है।
      केरल जैसे राज्य जो भारत का एक हिस्सा है। कोई रिक्शेवाला हिन्दू देवी देवता की फोटो नही लगा सकता। किसी समाचार में इसको विशेष खबर में दिखाया जाता है।
     मै किसी समुदाय के विरोध में नही हूँ। ना किसी धर्म की तरफदारी कर रही हूँ। मुझे किसी धर्म विशेष से कोई लगाव या नफरत नही है। में सिर्फ आपके सामने सच्चाई लाना चाहती हूँ। आप खुली आँखों से जिंदगी को देखने की कोशिश कीजिये।
    में जिस इलाके में रहती हूँ वहाँ मुस्लिम समुदाय के लोग  ज्यादा नही है  लेकिन दो मस्जिदे आमने -सामने बनी  हुई है। एक मस्जिद सड़क के एक तरफ तो दूसरी सड़क  के दूसरी तरफ है। एक सीधी रोड पर चार मस्जिदे बनी  हुई है। मुझे मस्जिदो के इतनी अधिक संख्या पर बने होने पर हैरानी होती है। जहाँ मुस्लिम समुदाय के लोग बहुत कम है वहाँ चार मस्जिदो का क्या औचित्य है। ये हमारी सरकार की धर्म के प्रति सहिष्णुता नही तो और क्या है।
    कुछ साल पहले उत्तेर प्रदेश सरकार की आई एस ऑफिसर दुर्गावती नागपाल  को नौकरी से निलंबित कर दिया गया था। आपको मालूम है क्यों। उस इलाके में एक मस्जिद बनायीं जा रही थी। उसने उसे रुकवाने के लिए प्रयास किये। उसके फलस्वरूप उस की दीवार गिरबा  दी । मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उसे पद से हटा दिया ।
    उसके बाद दूसरा अफसर  आया। उसने मस्जिद के मामले में कोई दखल नही दिया। आज वह मस्जिद बन के तैयार हो गयी है।  लेकिन उसकी खबर किसी समाचार में दिखाई और सुनाई नही दी।
    कई बार लगता है हम भारत में नही रहते बल्कि किसी मुस्लिम देश में रहते है। जहाँ  हिन्दुओ पर अत्याचार किसी मुस्लिम दुवारा होने पर कोई खबर नही बनती लेकिन यदि गुंडे किसी मुस्लिम के साथ अपराध को अंजाम देते है तो एकदम प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से इस्तीफा माँगा जाता है।
    हिन्दुओ की सुनवाई किसी और देश में नही है लेकिन भारत जैसे देश में भी हिन्दुओ को सिसक -सिसक कर जीना  पड़ेगा।
    कुछ समय पहले एक मुस्लिम आई  पी अफसर की मौत के एवज में अखिलेश सरकार ने उसके परिवार को  मुआवजे के रूप में 55  लाख रूपये दिए। इसकी खबर किसी समाचार में नही दिखाई दी। सिर्फ उसकी मौत पर शोर मचता रहा।
      अभी एक हिन्दू अफसर मनोज मिश्रा  की मौत ड्यूटी पर हो गयी। उसकी मौत पर उसके परिवार को मात्र 10  लाख दिए गए. इस अंतर पर कोई खबर नही दिखाई गयी। इस तरह की खबरे देखने पर लगता है। इतना अंतर सरकार कर रही है। इस अंतर पर आवाज उठाने के स्थान पर लोग केवल सरकार की नाकामी गिनाने में क्यों लगे है। सरकार का केवल काला पक्ष ही दिखाई देता है उनके द्वारा किया अच्छा काम कोई समाचार वाला क्यों नही दिखा रहा है।
      हम लोकतंत्र में रह रहे है। लोकतंत्र में कोई भी शासक निरंकुश नही हो सकता वह सीमाओ में रह कर ही काम  करना चाहते है। उन्हें काम करने का मौका दीजिये उसके हाथ मत बांधिए। उसका परिणाम हमें ही भोगना पड़ेगा। एक डरा हुआ इंसान कैसे किसी के साथ इंसाफ कर पायेगा। हमें उसके हाथ मजबूत करने चाहिए ना की उसके हाथो में जंजीरे बांध दी जाये, उसे नाकाम कर दिया जाये,उसका खामियाजा हम सभी को उठाना पड़ेगा। ये केवल वोट बैंक की राजनीति  है। उससे अपने आप को अलग करके सोचिये हमें क्या करना चाहिए।   

#arkshan ke karn felta akrosh

      हमारा लोकतान्त्रिक देश  विशेष लोगो को इतनी ज्यादा सहूलियतें देने की कोशिश कर रहा है कि उन्हें देखकर सामान्य वर्ग के मन में कड़वाहट भर्ती जा रही है। जब जाति  के आधार पर सहूलियतें दी  जाती है। तो जिन लोगो को सहूलियतें नही मिलती उनके अंदर आक्रोश भर जाता है। उनके सवालो के जबाब देने हम जैसे लोगो के लिए मुश्किल हो जाते है।  जैसे कक्षा  12 के sc  छात्रों को बोर्ड फ़ीस 50 रूपये देनी होती है। जबकि सामान्य वर्ग के बच्चो को 445 रूपये देने होते है। वे इस  का विरोध करते है।
    मेने अपने आस -पास बहुत से सामान्य वर्ग के गरीब बच्चे देखे है जो पढ़ने में अच्छे है लेकिन उनके घर में पैसे की कमी है  वे बोर्ड की फीस भरने से लाचार  है  हम जैसे संवेदनशील लोग उनके लिए पैसो का प्रबंध करते है।
      उनकी लाचारी हमें सोचने पर मजबूर कर देती है। इन सर्वश्रेष्ठ बच्चो का भविष्य पैसो की कमी के कारण बर्बाद हो जायेगा। अभी तो कम  फ़ीस होने के कारण हम जैसे लोग मदद कर देते है। आगे की  पढ़ाई  महगी होने के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़कर घर बैठना पड़ेगा। उनका उज्ज्वल भविष्य घर की चार -दीवारी तक सीमित रह जायेगा।
     सरकार को मेधावी और गरीब बच्चो की तरफ भी ध्यान देना चाहिए।  सामान्य वर्ग के गरीब लोगो  को भी आगे बढ़ने के मौके  मिलने चाहिए। उनका समाज गरीब लोगो को मुँह नही लगाता। सभी वर्गों के गरीब लोगो की जाति  एक सामान होती है.अमीर लोग अपने गरीब  रिश्तेदारो से मिलना भी पसंद नही करते। ऐसे में उनकी ऊँची जाति के लोग या  उनकी जाति उनका पेट नही भर्ती।  उनकी  ऊँची जाति का गौरव उनके उपहास का कारण बन जाता है।
      छोटी जाति  के अमीर  लोग वैसे  तो  अपने को सर्वे सर्वा  समझने लगते है। लेकिन जब उनके बच्चो को सहूलियतें मिलने लगती है तो वे उसे किसी हालत में छोड़ना नही चाहते।  मेने संपन्न लोगो को भी फर्जी कागज बनवा कर सारी  सहूलियतें लेते देखा है।
    भारत में भ्रष्टाचार का बोलबाला होने के कारण साधन -संपन्न लोग अपने और अपने परिवार के लिये  सारी सहूलियतें प्राप्त कर लेते है।
      गरीब लोगो तक आज भी सरकारी रियायतें नही पहुँच पाती। क्योंकि जो अनपढ़ लोग है। उन्हें हर कदम पर ठोकरे खानी पड़ती है। उन्हें अपमान का सामना करना पड़ता है। उनकी हिम्मत इतने मुश्किल हालतो का सामना नही कर पाती।  उनके अंदर आत्मविश्वास की कमी होने के कारण वे जिंदगी से समझोता करके रह जाते है। वे और उनका परिवार आज भी सरकार की दी रियायतों से महरूम है।
     इसलिए ये कहना उचित है -सरकार को गरीबी के आधार पर रियायतें देनी चाहिए। इस  के  लिए कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत है। जाति के आधार पर बनायीं गयी व्यवस्था अब लचर हो चुकी है।
      बच्चो को जब जाति के आधार पर स्कालरशिप दी जाती है तो हमें बहुत अजीव लगता है जब हम बच्चो से खास तौर पर पूछते है तुम्हारी जाति  क्या है। इस जाति व्यवस्था ने हमें कई टुकड़ो में बाँट दिया है.
     इस जाति  व्यवस्था के कारण हम सोचने पर मजबूर हो जाते है। जब मेरी शादी हुई तो मैने शादी से पहले का उपनाम लगाना उचित नही समझा। मेने अपना उपनाम लगाना बंद कर दिया। इस कारण कुछ लोग विशेष तौर   से अलग से मेरी जाति  दुसरो से पूछते। मै सभी जातियों के साथ सामान व्यवहार करती थी इस कारण मुझ पर भी लोगो को शक होने लगा।अंतत मुझे अपना शादी के बाद का उपनाम लगाना पड़ा।
     इस  के कारण सभी दुबारा से जाति के चक्रव्यूह में फंस कर अपना उपनाम लगाने के लिए मजबूर हो जाते है.. जहा तक मेरा विचार है जाति का कलंक हमें आत्म विश्वास से जीने नही देता। जो विशेष जाति के लोग है वे सम्मानित जीवन जीना  चाहते है  . लेकिन वे सहूलियतें छोड़ना नही चाहते।हो सकता है  इस कारण आने वाले समय में गुजरात के समान सारे भारत में विस्फोटक स्थिति पैदा हो जाये।
    इससे बचने के लिए सरकार को आर्थिक आधार पर सहूलियतें दी जानी  चाहिए। आज ५० % के आस -पास आरक्षण है। जिस हिसाब से हर समुदाय आरक्षण की मांग कर रहा है आने वाले समय में हर समुदाय आरक्षित हो जायेगा। फिर से पुराना जाति वाद का दंश हमे बंधनो में बंधने के लिए मजबूर कर देगा। इसलिए जाति की जगह आर्थिक आरक्षण होना चाहिए।
      मोदी जी से मेरा अनुरोध है -जैसे उन्होंने सभी गरीबो के लिए बेंको में जनधन योजना चलायी ऐसी ही किसी योजना का आरम्भ करे। जिससे सभी गरीब लोगो को सामान उन्नति के अवसर मिल सके।  

#sanchar tantr or muslim

      आजकल सुनने में आ रहा है पुरुस्कृत लोग अपने पुरुस्कार दादरी कांड के विरोध में लौटा रहे है। उनके पुरुस्कार लौटाने से क्या सरकार पर दबाब पड़ेगा। अख़लाक़ नामक इंसान को मरवाने के लिए सरकार ने लोगो को सुपारी दी थी। उत्तर प्रदेश सरकार या केंद्र सरकार ने उसे मरवाने के लिए क्या किया।
        लोग मोदी सरकार से सामने आकर जबाब देने के लिए कह रहे है.अखिलेश यादव या मोदी ने इस वारदात को अंजाम देने के लिए क्या किया था। वे लोग ये भी तो बताये।
    इस  कांड की खबर सुनकर उस स्थान को छावनी में बदल दिया गया। एक कत्ल होने के बाद वहाँ के माहौल  को शांत करने के लिए सैकड़ों की संख्या में पुलिस तैनात कर दी गयी है।
      सरकार ने उसके परिजनों को 45  लाख रूपये दिये। उनको वसंत विहार जैसी जगह पर बसाया। उसके परिवार के दो सदस्यों को सरकारी नौकरी देने का बचन दिया।
       भारत जब आजाद हुआ तब मुस्लिम आबादी 7 %  थी जो अब  बढ़कर 18  % हो गयी है। यदि भारत में दूसरे समुदाय के लोग अपने को सुरक्षित ना  समझ रहे होते तो वे भारत में इतनी संख्या में रह रहे होते। किसी भी और देश में मुस्लिमो को स्कॉलरशिप दी जाती है या हज के लिए भत्ता दिया जाता है।आपको मालूम हो तो मुझे जरूर बताये।
       यदि मुस्लिमो को इससे ज्यादा फायदा किसी अन्य देश में मिल रहा होता तो वे वहाँ जाकर रहते या भारत जैसे गरीब और पिछड़े देश में रहना पसंद करते, आम मुस्लिम या हिन्दू एक दुसरो को नुकसान पहुचाने के बारे में नही सोचता बल्कि हारे  हुए नेता, लोगो की भावनाए भड़का कर अपना वोट बैंक बनाने में लगे रहते है। इसका सबूत दादरी के लोगो ने दिया है। वे साफ शब्दों में नेताओ को अपने इलाके में आने का विरोध कर रहे है।
      भारत  के 90  % मुस्लिम हिन्दुओ से ही मुस्लिम बने है। बाहर से आये १०% मुस्लिम थे। यदि आप उनसे बात करो तो वे  भारतीय मुस्लिम  से अपने को ऊँचे दर्जे के मानते है। हमारी सभ्यता बहुत पुरानी है उस समय मुस्लिम धर्म का उदय ही नही हुआ था। हर तरफ हिन्दू धर्म था.
      कभी आपने  किसी कटटर हिन्दू के मुँह से सुना होगा। हमारे शिव लिंग के ऊपर मक्का बनी  है। लेकिन यह उस समय की बात है जब मुस्लिम धर्म का उदय ही नही हुआ था। हर तरफ हिन्दू धर्म का बोल -बाला  था। हमेशा ऊचाई के साथ पतन भी होता है। हिन्दू धर्म  का उदय लगभग ५००० साल पहले हुआ उसके बाद उसने उन्नति की फिर धीरे -धीरे उसका पतन होता चला गया।
     पतन का कारण आक्रमणकारियों के द्वारा जवर्दस्ती अपने धर्म में आने के लिए मजबूर किया जाना था। भारतीय जनता आज अलग -अलग कई धर्मो में बंट गयी है। ये लोग अपने मन से धर्म नही बदलते बल्कि उनको लोभ -लालच, अत्याचार   के द्वारा धर्म बदलने के लिए मजबूर किया जाता है।
     आप भूल रहे हे अफगानिस्तान ,पाकिस्तान और बांग्ला देश हिन्दू देश थे।  अफगानिस्तान का नाम पहले आर्यना  था। पाकिस्तान और बांग्ला देश का उदय आपके सामने हुआ है  इससे पहले जितने मुस्लिम देश है वहाँ  तक हिन्दू धर्म था वहाँ जबरदस्ती लोगो का धर्म बदलवाया गया वे सभी देश अपने को मुस्लिम देश कहने पर गौरवान्वित महसूस करते है। लेकिन वहाँ के लोग कई पीढ़ियों बाद भूल गए है उनके पूर्वजो ने कितने परेशान होकर अपना धर्म बदला होगा। ,इस समय मुस्लिम धर्म की उन्नति का समय है।
     आप समाचार सुनने की कोशिश करेंगे तो आपको मालूम होगा आज मुस्लिम धर्म आतंक का पर्याय बन रहा है। अधिकतर देशो में मुस्लिमो को खास नजर से देखा जा रहा है। अन्य देशो में मुस्लिम धर्म का पतन शुरू हो गया है।
      केवल भारत ही ऐसा देश है जहाँ मुस्लिम धर्म  पनप रहा  है। आज भी  सेकड़ो की संख्या में हिन्दू धर्म बदल कर मुस्लिम बन रहे है। लेकिन संचार तंत्र उनका प्रचार नही करता लेकिन यदि एक परिवार मुस्लिम से हिन्दू बन जाता है तब उसे सरकार की नाकामी ठहरा दिया जाता है।
        हमारा देश आजाद हुए 70 साल हो रहे है। इन सालो में मुस्लिम 11 %  कैसे बड़  गए जबकि पाकिस्तान में 21 %हिन्दुओ से हिन्दू १% कैसे हो गए कोई मुझे इसका राज तो बताये।  केवल भारत ही लोकतान्त्रिक देश है। बाकि जहाँ भी मुस्लिम बहुल देश है वहाँ लोकतंत्र छटपटा रहा है या तानाशाही  कायम है।
     मुस्लिम समुदाय के लोगो से पूछे तो आपको पता चलेगा वे उसके कटटर होने के डर  से परेशान है.उन्हें फतवे का डर ना हो तो बहुत से मुस्लिम अपना धर्म बदल दे या उसके खिलाफ अपना मुँह खोल दे। जरा सी गलतबयानी के कारण कटटरपंथी लोगो का जीना मुहाल कर देते है। उन्हें अपनी जान गवानी पड़ती है या देश छोड़कर जाना पड़ता है। 
        हम खुद दुसरो की सुरक्षा कितनी कर पाते  है। कभी अपने अंदर झांक कर देखो। हम हमेशा किसी गलत काम के लिए दुसरो को दोष देकर अपने कर्तव्य की पूर्ति समझ लेते है। हम मोदी या यादव की तरह काम करके देखेंगे तब पता चलेगा कोई भी काम करना कितना मुश्किल होता है। हम हमेशा काम की जिम्मेदारी दुसरो  को  सौंप के इतिश्री समझ लेते है। यदि हर कोई अपने स्थान पर रहते हुए अपनी जिम्मेदारी समझे तब कोई भी गलत काम नही हो सकता। 

#vibhrm ki sthiti

      नरेश सपनो में उड़ता हुआ बाबा के पास आया था। शुरू में उसे वेद के पास रहना अच्छा लगा जब वह अपने बाबा को दुसरो से इज्जत पाते देखता उसे बहुत अच्छा लगता क्योंकि जब से वह बड़ा हुआ था। उसने अपमानित जिंदगी जी थी वह भूल गया था आत्मसम्मान के साथ जीने पर केसा एहसास होता हे। वह सुख की खोज में बाबा के पास आ  गया था  .
       कुछ समय में उसका भरम दूर हो गया। यहाँ उसने वेद को रुखा सुखा भोजन करके मेहनत की जिंदगी जीते हुए देखा जहाँ रुकावटे ज्यादा थी और सहूलियतें ना के बराबर थी उसके सपनो की दुनियाँ से यहाँ का माहोल विपरीत था। कुछ समय वह बाबा के साथ रहा।
      उसके बाद वह फिर अपनी माँ के पास लौट गया। माँ बहुत मेहनत कर रही थी। उसने अपनी रुकी हुई पढ़ाई  फिर से शुरू कर दी थी। वह अब मेहनत करके सम्मान की जिंदगी जीने की कोशिश कर रही  थी.
       पहले वह कहती थी - आदमी का फर्ज पैसे कामना है। औरते घर के काम करने के लिए होती है।
      वह माहोल अब बदल चूका था उसके पास आदमी का सहारा नही रहा था उसे भरोसे अपने नाबालिग बच्चो की परवरिश करनी थी। उसे अपनी हिम्मत के भरोसे आगे का जीवन बिताना था लेकिन सारे मेहनत वाले कामो के बाद भी वह अपने बच्चो की जरुरतो का ध्यान रखती थी। नरेश को माँ के सामने किसी चीज के लिए मेहनत करने की जरूरत नही पड़ती थी।
       बाबा अपने सारे काम खुद करते थे उनके पास कोई सहायक नही था। उसे वहाँ बाबा की  देखा -देखी अपने काम करने पड़ते थे। बाबा उसके और अपने लिए खाना भी बनाते थे। पर माँ के खाने का स्वाद उसे बाबा के खाने में नही आता  था।
       उसने घर का सुख पाने के लिए वहाँ  जाकर उसने एक प्रायवेट विद्यालय में नौकरी कर ली। उसने योग टीचर के रूप में एक साल काम किया। उसका मन इस काम में नही लगा।उसका वेतन बहुत कम था।  यहाँ आगे बढ़ने के अवसर नही थे। वह इस जीवन में भी अपने आप को जोड़ ना सका।
     नरेश वापस एक साल बाद बाबा के पास आ गया। नरेश का मन एक जगह स्थिर नही था। उसका पढ़ाई में मन नही लगता था। इसलिए उसकी पढ़ाई भी ऐसी ना थी। जिसकी बदौलत वह इज्जतदार जिंदगी बिता सके  इसे बाबा के पास रहना भी अच्छा नही लगता था। इस कारण वह कई बार बाबा को छोड़ कर दूसरे रिश्तेदारो के पास गया। लेकिन वहाँ से भी उसका जल्दी मन भर जाता इस तरह बाबा के पास आता  जाता रहा।
       वेद ने उसे रुकने या जाने के बारे में कभी नही कहाँ।
      वेद हमेशा कहते -मेंरा जिन पर अधिकार था में उन्हें ही रोक नही पाया। इसका जब मन करता है। अपने -आप आ जाता है। जब उसे इससे अच्छी जगह मिल जाती है। यह उस दुनियाँ में सुख की खोज में चला जाता है। मै अपने बुढ़ापे में इसके पेरो की बेडिया नही बनाना बनाना चाहता। में चाहता हूँ ये अपनी मंजिल खुद ढूंढे। यदि इसे मेरी जरूरत होगी मै  इसकी सदा सहायता 

#badle halat

       वेद ने खुद को काम में डुबो दिया। उसकी ख़ुशी और गम सब काम थे। उसके अपने एक -एक करके उससे दूर होते जा रहे थे। उसका पोता इस समय  कक्षा 12 का पेपर दे रहा था।
      उसने उसे कह दिया था -यदि मेरे पास पढ़ाई पूरी करने के बाद आकर रहना चाहते हो तो आ सकते हो।
    पोते नरेश ने कहा -हा दादाजी में दिल्ली आपके पास आकर रहना चाहता हूँ।
    नरेश ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वेद के पास आकर रहना शुरू कर दिया। नरेश के आने से उसके चाचा शेखर को बहुत बुरा लगा। वह वेद से बहुत लड़ने लगा। वेद की बेटियो को भी नरेश का वेद के पास आकर रहना अच्छा नही लगा। उनके सामने मनोज का व्यवहार उन्हें सोचने पर मजबूर कर देता था।
    वे कहती -जैसा बाप था उसका बेटा भी वैसा होगा। आप इसके लिए कितना भी अच्छा करो ये कभी आपका उपकार नही मानेगा। आप इसके कारण फिर से दुःख उठाओगे। हमसे आपका दुःख देखा नही जायेगा। बेटियाँ पिता के लिए कुछ कर नही पाती लेकिन उनके दुखी होने पर उनसे रहा नही जाता। अब जमाना ऐसा हो गया है कोई किसी को अच्छे के लिए सलाह दे तो भी वह उसे तीर के सामान चुभती है। अभी वह आपका आभारी है। लेकिन कुछ समय बाद उसे आपका किया हुआ त्याग दिखाई नही देगा बल्कि उसे आपके हर काम में कमी दिखाई देगी। आपने अपने रिश्तेदारो  के कारण बहुत  दुःख उठाया है। अब आप अपने पोते के कारण भी सुखी नही रह पाओगे।
     अधिकतर वेद उनके कहने पर चुप रह जाते। कभी -कभी कहते -मै अपने बेटो के सामान कैसे हो सकता हूँ। जब नरेश चुप -चाप मेरे सामने आकर खड़ा हो जाता है। मै उससे जाने के लिए कैसे कह दू। आखिर वो बिन बाप का बेटा है। मेरा पोता है। जिसके पैदा होने पर मेरे जीवन में खुशियाँ बिखर गयी थी। उसका उतरा मुँह देखकर मेरा दिल कचोटता है। लाली मै इतना सख्त कभी नही था। अब तो मेरे सामने मेरा पोता निराश -हताश होकर आता है। मुझसे उसका दर्द देखा नही जाता। नरेश मेरे सामने गलत शव्द नही बोलता जबकि मेरे बेटे हमेशा मेरा अपमान करते थे। उसके बाद भी मेने हमेशा  उनकी मदद की। अब नरेश के लिए मुझे कुछ करने से मत रोको। जब तक वह मेरे साथ रहना चाहता है। उसे मै मना नही कर सकता।
     वेद की दो बेटियाँ उनका उत्तर सुनकर शांत हो गयी। उन्होंने सोचा सारी मेहनत और पैसा बाउजी का है। वे अपने पैसो को जैसा चाहे वैसा खर्च करे। उन्हें यदि नरेश के लिए कुछ करके ख़ुशी मिलती है तो हम रोकने वाले कौन होते है। उनकी ख़ुशी ही हमारी ख़ुशी है।
      वेद की दूसरी दो बेटियो ने नरेश को कभी स्वीकार नही किया। वे मनोज की मौत के लिए उसके परिवार को जिम्मेदार मानती  रही ।
        वे साफ शब्दों में वेद के सामने कह देती थी -आप अपने बेटे की मौत भुला सकते हो लेकिन हम उसकी मौत के लिए जिम्मेदार लोगो को कभी माफ़ नही कर सकते।
       वेद के लिए नरेश को अपने साथ रखना आसान नही था क्योंकि सभी के लिए उसके अभिभावकों का व्यवहार ठीक नही था। वे वेद के साथ का व्यवहार भुला नही पाते थे। ऐसे ही कारखाने के मोर्चे पर भी वेद को अपने पार्टनर का विरोध सहन करना पड़ा।
    उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया -यदि आपका पोता इस कारखाने में बैठेगा तो हम आपके साथ काम नही करेंगे। हमारे साथ काम करने के लिए आपको अपने पोते को यहाँ से हटाना होगा।
    वेद ने उनसे अपना पक्ष रखते हुए कहा -जब मेने आपके सहयोग से कारखाना खोला था तब के हालात कुछ और थे। उस समय मेने ऐसी स्थिति आएगी कल्पना भी नही की थी। आज  उसका बाप नही है। में उसकी जिम्मेदारी लेने के लिए मजबूर हो गया हूँ। में आपका प्रस्ताव नही मान सकता।
     इस पर देवदत्त ने वेद के साथ पार्टनरशिप खत्म कर दी। उनके अनुसार  देवदत्त ने वेद पर जो  पैसा लगाया था। वह वेद को ब्याज सहित  चुकाना था। इसके बाद ही नरेश उसके कारखाने में बैठ सकता था अन्यथा वे नरेश को अपने कारखाने में बैठा नही सकते थे।
     वेद ने कहा -मै आपका सारा पैसा चूका देता हूँ। आप मुझे कुछ समय की मोहलत दीजिये।
  वेद ने देवदत्त का सारा पैसा चुका दिया। अब वह अपने कारखाने का सर्वेसर्वा था। उस पर किसी की रोक टॉक नही थी। . लेकिन इसकी कीमत उसे बहुत बड़ी चुकानी पड़ी। उसे अब मकान का किराया चुकाना पड़ता था। अबसे पहले मकान देवदत्त का होने के कारण उसे कुछ नही देना पड़ता था।सारी मशीनो की कीमत उसने एक मुश्त दी।
इसके कारण वेद के पास नकद पैसा बिलकुल ख़त्म हो गया लेकिन  अब नरेश जब चाहे वेद के कारखाने में आकर बेठ सकता था।
    देवदत्त एक सफल व्यापारी था। वह लोगो के गुणों को देखकर उन पर पैसा लगाता  था। उसने वेद पर ये सोच कर पैसा लगाया था जब तक वेद मेहनत कर रहा है उसकी मेहनत का फल उसे मिलता रहेगा। उसके जाने के बाद सारा सामान अपने आप उसे वापस मिल जायेगा।  उसने लिखित मै  ऐसे पेपर बनवा कर पार्टनरशिप की थी। उस समय किसी को भी ऐसे हालत बदल जायेंगे इसकी  उम्मीद नही थी। 

#amit dukh

       मनोज अपनी जगह दुसरो को बदलना चाहता था। इस कारण वह दिनों -दिन परेशान होता जा रहा था। उसको सभी समझाने की कोशिश करते लेकिन वह चाहता दूसरे उसके हिसाब से चले। ऐसा होना अब संभव नही था।
     वह सबसे कहता -मै किसी दिन आत्महत्या कर लूंगा।
     किसी को उसकी बात पर यकीन नही आता था  क्योंकि वेद के परिवार ने कष्टो का सामना किया था। वेद ने कई दुर्घटनाओ का सामना करने के बाद भी अपने अंदर के जुझारूपन के कारण हर समस्या से बाहर निकल आये  थे।इस कारण सब को लगता मनोज सबका ध्यान अपनी तरफ खीचने के लिए ऐसा बोलता है। ऐसे पिता का बेटा आत्महत्या नही कर सकता।
    वेद का 75 जन्मदिन धूम धाम से मनाया जा रहा था। मनोज के चेहरे की सारी  रौनक खत्म हो चुकी थी। उस दिन भी मनोज जिससे भी मिलता आत्महत्या करने की बात कर रहा था। उसकी बातो पर किसी ने ध्यान नही दिया। सभी को लग रहा था। लोगो का ध्यान खीचने के लिए ये ऐसे बोल रहा है। वेद ने मनोज को कुछ सामान देने की कोशिश की तब उसने मना  कर दिया जबकि वेद का जन्म दिन मनाने की इच्छा नही थी मनोज ने ही जबरदस्ती उनका जन्मदिन मनाने   पर उन्हें विवश किया था । किसी को मनोज का व्यवहार समझ नही आ  रहा था।
   वेद के जन्मदिन के कुछ दिन बाद मनोज ने इस दुनियाँ से प्रस्थान कर लिया। अब सबको उसके निराशावादी दृष्टिकोण का ध्यान आया। उसके मन से जीने की इच्छा ख़त्म हो चुकी थी। इसलिए वह सबके सामने ख़ुदकुशी की बाते कर रहा था। सिर्फ सुमन ही उसे दिलासा देने की कोशिश करती थी। बाकि सब उसकी भावनाओ से अनजान रहे। अब सभी जार -जार आंसू बहा रहे थे। उन्हें समझ नही आ रहा था। उनसे कहाँ  गलती हुई।  वह  किस तरह मनोज को बचा सकते थे।
      मनोज चार बहनो का प्यारा भाई था। सभी बहनो ने उसकी मदद करने की कोशिश की थी लेकिन  सबको वह समझ नही पाया। उनकी मदद भी उसकी तरक्की नही करवा पा  रही थी। वह निराशा के गर्त में डूबता जा रहा था। किसी की दिलासा उस पर असर नही कर रही थी आखिर वह सबको  रोता बिलखता छोड़ कर इस दुनियाँ से चला गया।
      सबसे बड़ा झटका वेद को लगा। उसने अपनी कमाई हुई सारी जमा -पूंजी उसके कर्जदारो को दे दी। लेकिन उसके बाद भी वह मनोज को जिन्दा रखने में सफल ना  हो सका। यदि मनोज कुछ समय और जिन्दा रहता  तो हालत बदल सकते थे। उसने वक्त के  बदलने का इंतजार नही किया।
       मनोज ऐसे बाप का बेटा  था जिसकी मदद कभी किसी ने नही की थी क्योंकि उसका अपना कहने वाला दुनियाँ में कोई नही था। वह केवल अपने जुझारू पन और ना हारने  की आदत के कारण आज तक जिंदगी का अपने हौंसले से सामना कर रहा था।
      वेद रोते हुए  कह रहे थे  - मनोज जब मुझसे कह रहा था बाउजी आपका ये जन्मदिन में अवश्य मनाऊँगा। आखिर 75 साल कितने लोग देखते है। अगला  जन्म दिन आपका केसा मनेगा कोई नही जानता। कोई  रहता है या नही। में इसे  अपने लिए समझ रहा था। मुझे क्या पता था। वह अपनी मौत के बारे में कह रहा है। मै उसे हमेशा बड़  -बोला समझता था। उसके आखिरी शव्द नही समझ पाया।
    मनोज सबको अमिट  दुःख देकर चला गया। उसे अब किसी तरह वापिस नही बुलाया जा सकता था। अब सबके पास रोने के सिबा दूसरा चारा नही था।   

#nakami

    मनोज  के ऊपर बहुत ज्यादा कर्ज चढ़ गया। उसका इस बीच मकान भी बिक गया। उसके परिवार के लोग उसे छोड़कर चले गए।  वेद को तब उसके ऊपर आई विपदा पता चली। उसे मनोज के बारे में ज्यादा जानकारी नही थी।
     वेद को मनोज के मकान  बिकने की खबर भी अपनी बेटी हिना से चली। वे लोग इतने समय तक सबसे कट कर रहे। किसी ने उनके बारे में जानने की कोशिश भी नही की। जब वेद ने मनोज के ऊपर आई मुसीबत के बारे में जाना उसे बहुत दुःख हुआ। वेद को जिस बात का अंदेशा था  अंतत वही मनोज के साथ घटा। वह पिता की सारी  बातो को बेफजुल समझता था। उनकी आज्ञा का उल्लंघन करता था। इन्ही बातो के कारण मनोज ने घर छोड़ा।
     जवानी में वेद से उसके पिता ने कारखाना ले लिया था। उसकी मेहनत के फल का कुछ ही समय में खात्मा हो गया था। वेद ने जवानी में उस दुःख को झेल लिया था। लेकिन बुढ़ापे में बेटे ने उसके लगाये कारखाने को ख़त्म कर दिया। उसके लिए इस दुःख से उबर पाना मुश्किल हो रहा था।
     वेद का बेटा अपनी मर्जी का मालिक था। उसे अपने निर्णय सही लगते यदि पिता उसे समझाने की कोशिश करते तो वह आपे से बाहर हो जाता। वेद को नीचा दिखाने की कोशिश करता। वेद अपना सा मुँह लेकर रह जाता। अब मनोज के लेनदारों को उसके पिता के बारे में जानकारी मिल गयी थी कि वे साधन -सम्पन्न है । वह मनोज का कर्ज वसूलने के लिए वेद के कारखाने उसे धमकाने आने लगे। वेद सज्जन इंसान थे।
        इस बात के लिए कर्जदारो को वह कहते -तुमने मुझसे पूछकर कर्ज दिया था। जो मुझसे वसूलने और यहाँ मेरा अपमान करने चले आते हो।
     कर्जदार कहते -हमने पैसा दिया है। हमें यदि अपना कर्ज नही मिला तो हम मनोज को जिन्दा नही रहने देंगे।
  एक पिता के लिए बेटे की मौत की धमकी कितनी दुखदायी होती है। यह एक पिता अच्छी तरह समझ सकता है।  एक तरफ वेद के  सामने पैसे का संकट तो दूसरी तरफ बेटे की जान बचाने की समस्या आ  गयी थी। वह अपनी सारी  जमापूंची देकर ही बेटे को कर्जदारो से छुड़वा सकता था।
       जिस बेटे ने इतने बरसो तक अपने पिता की खोज खबर तक नही ली थी। उसने जिस पिता को बुढ़ापे में बोझ समझ लिया था। वह मनोज उस बूढ़े के आसरे  फिर से आ  गया था।  ऐसे समय में वेद उसे नकार नही सका।
      मनोज जो हर किसी से कर्ज के कारण छिपता फिर रहा था,जिन कर्जदारो से बचने के लिए उसका परिवार उसे छोड़ कर चला गया था। वे कर्जदार अब आये दिन वेद के कारखाने आकर मनोज का पता पूछने लगे उसे अपमानित करने लगे।
     वेद उन इंसानो में से था जो आधा पेट भोजन करके इज्जत से जीने में अपनी शान समझते है। उस वेद को अब आये  दिन कर्जदारो की  धमकियों का सामना करना पड  रहा था। वेद अपनी जिंदगी से बेजार हो गया था।
     कई बार वह निराश हो कर कहता - क्या मेने ऐसी जिंदगी का सपना देखा था। जिसमे सिर्फ सारी उम्र मेहनत और दुःख सहना लिखा था।
    जिस बेटे से मैने  सारे रिश्ते तोड़ लिए थे। अब नई और अकेली जिंदगी जीते हुए उसके कर्जदार मुझे हर समय आकर अपमानित कर रहे है। वह उनसे बचता फिर रहा है। में अपना चलता हुआ काम छोड़कर कहाँ छिप जाऊ।
     एक दिन हालत से बेजार होकर और मनोज की जिंदगी बचाने के लिए वेद ने अपनी सारी  जमापूंजी कर्जदारो को देकर मनोज को कर्जमुक्त कर दिया। अब मनोज लोगो के सामने आने की हिम्मत जूटा  पाया।क्योंकि  कर्जदारो ने मनोज को ढूंढ कर उसको मारने के जुगाड़ कर लिए थे।
      मनोज के पास कोई काम नही रहा था। उसे अपने को कामकाजी दिखाने का शगल पैदा हो गया। उसके पास करने के लिए  काम नही था। वह अब अधिकतर  वेद की फैक्टरी में आकर बैठने लगा। उसे अपने पिता को नीचा दिखाने  और अपने को सर्वश्रेष्ठ दिखाने की कोशिश  वेद को नागवार लगती। इसी बात पर वेद और मनोज की झड़प हो जाती।


    वेद के कारखाने में कुछ दिन मनोज नही आता। लेकिन कुछ समय में वह फिर भूल जाता। वहां आकर फिर से वेद के कामो में नुक्स निकालता तो वेद को बुरा लगता।
     वह कहता -तूने अपनी हठधर्मी से मेरा लगा -लगाया कारखाना बर्बाद कर दिया। मेने तुझे उस वक्त मौका दिया था। यदि तुझे अपनी काबिलियत दिखानी थी तो उसमे दिखाता। मेरी जिंदगी की सारी मेहनत तबाह करके मेरे कामो में नुक्स निकालने की जरूरत नही है।
    इन शब्दों को सुनकर मनोज अपना आपा खो बैठता। अब मनोज को पहले से ज्यादा गुस्सा आने लगा था। वैसे भी हमारे समाज में लड़को की सारी गलतियाँ माफ़ करके उन्हें सिर पर चढ़ाते रहते है। उनके सारे गुस्से को उनका परिवार बर्दास्त करता रहता है। इसलिए वे अपनी  गलतियाँ  मानने की जगह समाज को ही गलत समझने लगते है।
     मनोज का परिवार उससे दूर हो गया था। वह जब भी अपने परिवार के पास जाता उसकी पत्नी अब उसका लिहाज नही करती वह भी उसे खरी खोटी सुना देती। उसने भी कर्जदारो के कारण बहुत अपमान सहा था। वह नए सिरे से जिंदगी जीने के लिए जद्दोजहद कर रही थी। लेकिन मनोज उसका साथ देने की जगह उसके कामो में भी कमी निकाल  देता। उसे उसके शब्द तिलमिला कर रख देते।
     मनोज जहाँ भी जाता उसका वही झगड़ा हो जाता। वह दुसरो को समझ नही पा रहा था। दूसरे भी उसे समझने में नाकाम हो रहे थे। उस समय कोई उसकी समस्या समझ नही पाया। लेकिन इसे हम तनावग्रहस्थ कह सकते है। कुछ लोग समाज को अपने हिसाब से चलाने में सारा जीवन लगा देते है। लेकिन खुद को बदलने की कोशिश नही करते। मनोज भी उनमे से एक था।  

#police ka himmat app

    कुछ दिन पहले दिल्ली पुलिस ने हिम्मत एप निकाला  था। मेरी बेटी ने अपनी सुरक्षा के लिए इसे अपने मोबाइल  में डॉउनलोड कर लिया। उसने कभी मुसीबत के बक्त इस्तेमाल करने के लिए सोचा था। लेकिन अचानक दफ्तर से आते हुए उससे गलती से इसका बटन दब गया। उसे अपनी गलती का पता नही चला इसका परिणाम उसे शीघ्र पता चल गया।
     कुछ समय बाद उसे दिल्ली पुलिस से फोन आया-अपने हमें कैसे याद किया।
     मेरी बेटी सुधा ने उन्हें एकदम बता दिया -ये बटन गलती से दब गया है। मुझे किसी तरह की परेशानी नही है।
    उसके बाद वह भूल गयी उससे कोई गलती हुई है। उसके कुछ समय बाद उसके फोन की बैटरी ख़त्म हो गयी।
  मुझे लगता है।
         हिम्मत का बटन कई जगह से जुड़ा हुआ है। उन्होंने  फोन के  द्वारा उसकी बहन  चंदा को सुधा के  साथ कुछ गलत हुआ है। इसका सन्देश भेज दिया। चंदा अपने कॉलेज में पढ़ाई  कर रही थी। पढ़ाई  के बाद उसने जहाँ  से सन्देश आया था। उस फोन पर  बात करने की कोशिश की। तो वह नंबर नही मिला। उसके बाद उसने सुधा को फोन मिलाने की कोशिश  की सुधा का नंबर भी  नही मिला। उसे बहुत डर  लगने लगा।  उसने सोचा सुधा के साथ बहुत गलत हो गया है। तभी वह फोन नही उठा रही। उसने अपने अभिभावकों को फोन मिलाया।
       फोन पर उसने उन्हें रोते  हुए बताया -मम्मी दीदी का फोन नही मिल रहा है। पुलिस वालो ने मुझे फोन किया है। मम्मी मुझे कुछ समझ नही आ  रहा मै क्या करू। आप कहाँ  हो।
      ।मेने कहा - हम  वैशाली  में  है।
   चंदा बोली -मम्मी आप जल्दी घर पहुँचो। दीदी का कुछ पता नही चल रहा है।
    उसके बाद मेने अपने पति  रमेश को इस घटना के बारे में बताया। रमेश भी सुधा और चंदा को फोन मिलाने लगे। इधर में भी दोनों को फोन मिला रही थी। रमेश की चंदा के  फोन  पर बात हुई ।
      उसके साथियो ने बताया - उसकी हालत अच्छी नही थी। उसकी सहेलिया और अद्यापक उसे समझाने की कोशिश कर रहे थे। वह फोन उठाने की हालत में नही थी।
     उसकी अद्यापक ने कहा- चंदा बहुत रो रही है। उसे हम किसी के साथ घर भेज रहे है। आप चिंता मत कीजिये
   
  इतना सुनते ही   हमारी ऊपर की साँस ऊपर और नीचे  की साँस नीचे। हमें  कुछ समझ नही आ  रहा था। ऐसे में हम क्या करे। मुझे केवल पुलिस याद रहा। हम जैसे घरो में पुलिस से कम वास्ता पड़ता है। हमें बुरे वक्त के साथ ही पुलिस दिखाई  देती है। हमें पूरा यकीन हो गया सुधा के साथ दुर्घटना हो गयी है या उसका अपहरण हो गया है। मेने वही  से पुलिस  का १०० नंबर मिला दिया।
      वहाँ  से मुझे जबाब मिला-अभी आप यू, पी , में है। आपके साथ दुर्घटना दिल्ली में हुई है। आप कृपया दिल्ली पुलिस से बात करे।
    मेने उनसे कहा -हमें समझ नही आ  रहा। हम किससे  बात करे। आप कृपया हमें कोई नंबर बता दीजिए। जिससे हम मालूम कर सके।
     उन्होंने हमें दिल्ली पुलिस का नंबर दे दिया। उन्होंने हमारी हरसंभव मदद करने का आश्वासन दिया।
     दिल्ली पुलिस से जब हमारी बात हुई। उन्होंने हमें तसल्ली बक्श जबाब दिया। मै  पुरे समय फोन पर लोगो से पूछताछ करती रही। इस बीच आधा घंटा बीत  गया।
    इतने में चंदा का फोन आया - दीदी घर पर पहुंच गयी है। आप परेशान मत होना।
    मेने तब दिल्ली पुलिस को सुधा के सकुशल मिल जाने की बात बता दी। इसके बाद हम निश्चिन्त हो गए।         लेकिन हमें बहुत हैरानी हुई जब हमें कई बार दिल्ली पुलिस का इसके बाद भी फोन आया। आपकी बेटी सुरक्षित पहुंच गयी है।  मेरे दिमाग में दिल्ली पुलिस की ख़राब याद बसी हुई थी वह एकदम बदल गयी। दिल्ली पुलिस आम जनता के साथ अच्छा सलूक कर रही है।
    लेकिन एक फरियाद दिल्ली पुलिस से है -यदि उन्हें सब कुछ ठीक होने का पता चल गया था तब उन्हें हमें भी बता देना चाहिए था।
हमारा काफी समय बुरा बीता  यदि हमें सब कुछ ठीक पता चल जाता तब हम इतने अधिक परेशान ना  होते।  में दिल्ली पुलिस की मदद के लिए आभारी हूँ।
     

#mehnat ka fal

    वेद ने फिर से अपनी फैक्टरी नए सिरे से जमा ली। अब उसके काम के सभी प्रशसक हो गए। इससे पहले 71 साल की उम्र में नए सिरे से नया काम करते बिना पैसो के किसी को  नही देखा था।  किसी ने इस बात की उम्मीद नही की थी। जिन बेटो ने पिता की तरफ देखना बंद कर दिया था। उनका फिर से पिता की तरफ ध्यान गया। जिसे वो अपने उपर   बोझ समझ रहे थे। वह फिर से समर्थ हो कर खड़ा था।
    वेद के दोनों बेटो में मेहनत करने की आदत नही थी। उन्हें लगता था। दुसरो पर रौब ज़माने से कारखाना चला करते है। वे  जमीदारो के सामान दुसरो को डरा के काम करवाने में अपनी समझदारी समझते थे।
      वे कहते थे -पैसा अधिक खर्च करो तभी तुम अधिक कमाने के बारे में सोचोगे।
     इसलिए उन्होंने अपनी कमाई से ज्यादा पैसा खर्चने पर ध्यान दिया। जिसका फल यहाँ असफलता से मिला। उन दोनों की फैक्ट्री में नुकसान होने लगा। उनके उपर  कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा था।
     वेद को हर समय डर लगता था। इन फैक्टरी के सारे पेपर मेरे नाम से है। कही ये इतना बुरा न कर दे कि मेरे हाथो में हथकड़ी लगवा दे। वे अपना डर अपनी बेटियो को बताते। उनकी बेटियाँ सुन कर परेशान हो जाती। वे अभी भी अपने बेटो के प्रति दयाद्र थे। उनके अंदर रिश्तो के प्रति अभी कोमल भाव थे। वे इतना होने के बाद भी अपने बेटो के साथ सहज सम्बन्ध बनाने की कोशिश करते रहते थे। सभी कहते इनका अँधा मोह बेटो के प्रति कभी ख़त्म नही हो सकता।
       इधर वेद के काम में तरक्की दिखाई देने लगी उधर दोनों बेटो की फैक्टरी ख़त्म होती चली गयी. वे नुकसान को देख कर भी नही जागे। अंतत उनका काम ख़त्म हो गया। मनोज बुरी तरह बर्बाद हो गया। इस बीच उसके दो बच्चे हो गए थे। उसके दरवाजे पर कर्जदार खड़े रहते ।वे उसका हर तरह से अपमान करते रहते। लेकिन उसके पास उनका कर्ज उतारने का कोई जरिया नही बचा था।   उसका सारा काम खत्म होता जा रहा था। 
     वेद जितना कमाता था उसका बहुत कम हिस्सा खर्च करता था। उसके पास फिर से धन जुड़ना शुरू हो गया था। अब उसके बेटेउससे  अनेक बहानो  से पैसे खीचने की कोशिश करते। वेद को  लगता मेरे पिता ने कभी मेरी मदद नही की। लेकिन में समर्थ होने के कारण इनकी मदद कर सकता हूँ। वह आये दिन उनकी मदद करते रहते।उनके बेटे बहुत नाशुक्रे थे। वे पैसे लेने के बाद भी अपने पिता को गलत सुनाते  रहते जिससे वेद का मन बहुत दुखी रहता।  

#karmath insan

       वेद के दोस्त देवदत्त उनको बचपन से जानते थे। उनकी जानपहचान लाहोर के दिनों से थी। दोनों ने भारत बिभाजन का दंश समान रूप से झेला  था। उस कटुता ने उनको सोना बना दिया था। उनकी जवानी संघर्षो का सामना करते हुए बीत गयी। लेकिन उनके संघर्षो ने उन्हें आज बुलंदी पर पहुंचा दिया था। वह अपने इलाके की जानी -मानी हस्ती बन गए थे।
      वे बहुत गरीबी में पले  थे। उनके पिताजी का छोटी उम्र में देहावसान हो गया था। उनकी माँ ने मजूरी करके बच्चो को पाल -पोस  कर  बड़ा किया। छोटी उम्र में पैसो के अभाव के कारण वे विद्यालय जाने में असमर्थ रहे। इसलिए उन्हें आप अनपढ़ कह सकते है।
       देव की कई फैक्टरी थी। उसने अपना बहुत सा पैसा प्रॉपर्टी खरीदने और बेचने में लगा रखा था।   उनके पास अब  शाम के समय बहुत  अधिक नोट आते थे। उन्हें इन नोटों को गिनना तक नही आता था। वे उसको एक के ऊपर एक रखकर समझते थे ये एक लाख हो गए या दो  लाख हो गए। उनके सहयोगी जब चाहे उनकी रोज की आमदनी में से कुछ नोट निकाल लेते तो वे इसका अंदाजा नही लगा सकते थे।    लेकिन वे अपने बुरे दिन आज भी नही भूल पाये थे।
     वेद को  अपनी लाचारी के दिनों में देवदत्त की याद आयी।  जब वेद उसके पास पहुंचे तब देवदत ने वेद का बड़े जोश के साथ स्वागत किया। उसकी विपदा सुनकर देवदत्त को बहुत दुःख हुआ।
    उसने कहा - क्या भगवान से ऐसे दिन देखने के लिए बेटे मांगते है। जो बुढ़ापे में अपने पिता का ध्यान ना  रखे। तू चिंता मत कर जब तक तेरे पास कोई काम नही है। तू मेरे पास आ जा। तेरे जैसे मेहनती काविल  और ईमानदार  इंसान के लिए  कामो की कोई कमी नही होगी। अभी मुझे तेरे लायक काम समझ नही आ  रहा लेकिन गल्ले पर एक ईमानदार इंसान की मुझे हमेशा जरूरत रहती है। तू जानता हे में पढ़ाई नही कर सका। इस लिए जो कुछ मेरे पास हे किस्मत से मिला है। मुझे कोई भी पेसो के मामले में धोखा दे सकता है। तू पड़ा लिखा है। मुझे तुझ पर भरोसा है तू मेरा सहायक बनेगा तो कोई मुझे धोखा नही दे सकेगा।  तुझे देखकर मुझे लाहौर के दिन याद आ जायेंगे। तू अपनी जिम्मेदारियों से आजाद हो चूका है। मेरी भी सारी  जिम्मेदारी पूरी हो चुकी है। हम दोनों बुड्ढों के लिए लोगो के पास समय भी नही है। हम दोनों हमउम्र है  एक दूसरे को अच्छी तरह समझते है। दोनों परस्पर आपस में बोल- बतिया कर अपने दुःख - दर्द साझा करेंगे।
    वेद को उसके शब्द सुनकर हैरानी हुई कि उसके जैसे अमीर इंसान के जीवन में भी दुःख हो सकते है या वह उसका मन रखने के लिए ऐसे शव्दो का इस्तेमाल कर रहा है।
     वेद से दोनों बेटो ने मुँह  मोड़ लिया था। उन्होंने ये भी जरूरी नही समझा उनका पिता अपना पेट कैसे भरता है। वे अपने जीवन की रंगीनियों में खोये रहे।
         देवदत्त ने वेद का ध्यान रखा।  देवदत्त ने वेद को अपने साथ बिठाने के बदले आर्थिक मदद करनी शुरू कर दी। दोपहर के समय जब देव खाना खाने जाता तो वह वेद को भी जबरदस्ती अपने साथ ले जाता। उसे खाना खाने के लिए मजबूर करता। इस तरह एक समय के खाने का इंतजाम देव के साथ हो गया। सुबह वेद दूध और ब्रेड का नास्ता करके चले जाते।  शाम के समय फिर से किसी तरह अपना पेट भरने का इंतजाम कर लेते। लेकिन किसी भी बेटे ने उनसे खाने के लिए आग्रह नही किया इसी तरह काफी समय बीत गया।
     एक दिन देवदत्त ने वेद से कहा -मेरे पास मशीनो के  काम की पेशकश लेकर  कोई आया है उन मशीनो को ठीक करने के लिए बाजार में कोई नही  है। उसकी हमारे बाजार में बहुत मांग हे।  तुम्हारे पास तकनिकी ज्ञान है। मेरे पास पैसा है। यदि दोनों मिल जाये तो कैसा  रहे। इसमें हम पार्टनर बन कर नए रास्ते पर निकल सकते है।
    वेद को उसका प्रस्ताव पसंद आया। दोनों ने नई पार्टनर शिप में काम शुरू कर दिया। फैक्टरी खोलने के लिए देव ने जगह भी मुहैया करा दी अब वेद को उसमे मेहनत करनी थी। उसको जोखिम का सामना करने के लिए एक मजबूत साथी भी मिल गया था।
     वेद की मेहनत और उसकी इच्छाशक्ति ने फिर से उसे अपने पैरो पर खड़ा कर दिया। वेद ने बहुत साधारण जिंदगी जी थी। उसकी महत्वाकांक्षा ज्यादा बड़ी नही थी.वह केवल इज्जतदार और सम्मान के साथ जिंदगी जीना चाहता था। उसने 71 साल की उम्र में फिर से एक नई फैक्टरी खड़ी  कर ली थी।
    इसे कहते है -जहाँ  चाह होती है वहाँ राह निकल आती है.वरना कौन सोचता है। 71 साल का इंसान नए इरादो के साथ नई मंजिल तक पहुँच सकता है। उनके बेटो ने उन्हें अपने ऊपर जबरदस्ती की जिम्मेदारी समझना  शुरू कर दिया था। ये वेद को मंजूर नही था। एक कर्मठ इंसान दुसरो के रहमोकरम पर जीना कभी पसंद नही करता। ये वेद ने फिर से अपनी मेहनत से चरितार्थ करके दिखा दिया था।  

#KORT

वेद   ने बच्चो की शादी करने के बाद शांति से अपना जीवन बिताने के बारे में सोचा  । उसके जीवन के सभी उद्देश्य पूरे  हो गए थे। उसकी उम्र हो गयी थी। 
      इतने में उसने किसी से सुना उसके बेटे कह रहे थे -ये कारखाना हमारी माँ के नाम था। माँ के मरने के बाद इस पर हमारा अधिकार है।  पिताजी हम पर फालतू का रौब  जमाते है।  हम इनके खिलाफ कोर्ट में जायेंगे। 
   इस बात को जानकर वेद को बहुत दुःख हुआ। उसने इन्ही बेटो के लिए दिन रात मेहनत करके  दो कारखाने शुरू किये । लोग उसकी हिम्मत की दाद  देते थे।   वेद ने किसी की सहायता लिए बिना अपनी मेहनत के जरिये दो कारखाने खड़े कर दिए।  दोनों को अलग -अलग कारखानो का मालिक बना दिया।  उसके बेटे उसकी मेहनत की इज्जत करने के स्थान पर कोर्ट जाकर सब कुछ छीन लेना चाहते है। 
       उसने अपने दिल का दर्द किसी से नही कहा। उसने दोनों कारखानो में जाना बंद कर दिया। उसके किसी बेटे ने उनके कारखाने में ना आने का कारण पूछा। उनके  पिता कहाँ  से खा पी  रहे हे.इस बारे में किसी से कोई चर्चा नही की। दोनों को पिता के ना  आने और खाने पीने की चिंता नही थी।
    उसे सुकन्या का दुःख अब और भी ज्यादा सताने लगा। यदि सुकन्या होती तो वह इन दोनों बेटो के सामने सख्ती से खड़ी  हो जाती। दुसरो के सामने वेद के लिए आसमान  सर  पर उठा लेती। उन दोनों बेटो को ऐसा किसी हालत में नही करने देती। वह वेद के लिए दुनियाँ  से लड़ जाती। वह वेद के अकेलेपन का साथी होती। 
     बेटियाँ अपने घर बार की हो चुकी थी। माँ के मरने के बाद वे बहुत कम  घर आती  थी। इसलिए उन्हें इस बारे में कुछ भी पता नही चला। वेद के पास जब कुछ नहीं बचा। उसके दोनों बेटे उसके पास मनाने  नही आये। तो एक दिन वेद अपनी बेटी हिना से कुछ पैसे माँगने  लगा तब उसे घर के हालत पता चले। उसे सब सुनकर बहुत दुःख हुआ। उसकी बेटी को बहुत गुस्सा आया। 
     वह बोली - सब कुछ आपका लगाया हुआ है। वह आपसे कैसे सबकुछ छीन सकते है। में उनसे इस बारे में बात करूंगी। 
    वेद बोला -मै नही चाहता जिन बेटो के लिए मेने अपना सारा जीवन लगा दिया। वे बेटे सामान के लिए कोर्ट में जाये। में कोर्ट -कचहरी से बचने के  लिए सब कुछ छोड़ कर आ गया हूँ। मै नही चाहता दुनियाँ  हमारा मजाक बनाये। बाप इतना सख्त था कि  उससे सब कुछ लेने के लिए बेटो को कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। में लोगो को हँसने का मौका नही देना चाहता। 
     हिना बोली -आपको लगता है। वे कोर्ट में मुकदमा जीत जायेंगे। उन्हें ये नही पता जो कुछ आज माँ का कहलाता है। वह माँ ने अर्जित नही किया। वे तो अनपढ़ थी आप के बिना अकेले समाज का सामना करने में अक्षम थी वह अकेले कारखाना कैसे शुरू कर सकती थी।  उन्हें उपहार के रूप में कुछ नही मिला। यह पैतृक सम्पत्ति नही है जिस पर वे अपना अधिकार जमा रहे है ये सब कुछ आपकी मेहनत का फल है। आप हमें बोलने का मौका दो। हम उन्हें समझायेंगे। 
    वेद बोला - उनके मन में बाप के लिए सम्मान नही है। में नही चाहता उन्हें इस बात की याद दिलाई जाये। मुझे उन लोगो की दया पर रहना पसंद नही है। वे मुझे अब फालतू का इंसान समझने लगे है जो जबरदस्ती उनके साथ जुड़ने की कोशिश कर रहा है। मेरे हाथ पैर चलते है। मै खुद अपने लिए नया रास्ता ढूंढ लूंगा। 
    हिना बोली -आपकी उम्र 70  साल की हो रही है। आप इस उम्र में नया कारखाना खोलने की हिम्मत जुटा रहे  हे। ये काम उन दोनों बेटो को करने दो। आप अपना काम मत छोडो। सारी जिंदगी आपने मेहनत की है। इस समय लोग आराम करते है। सरकार भी ६० साल के इंसान को रिटायर कर देती है। आप इस समय ७० साल के हो  रहे हो। अपनी उम्र का विचार करके देखो।  आप अकेले नही हो आपके लिए में दोनों भाइयो का सामना करने के लिए तैयार हूँ। 
    वेद बोला -मेरी गैरत  मुझे मना  कर रही है। इसलिए तुम भी इस मामले में चुप रहो। जब मुझे तुम्हारी जरूरत होगी ,मै तुम्हे बता दूंगा। हम लोगो में कोई लड़ाई नही हुई है। जिसे सुलझाने के लिए किसी और की जरूरत पड़े। मेने सब कुछ अपनी मर्जी से छोड़ दिया है। में अपने भाग्य से एक बार फिर से लड़ना चाहता हूँ। क्या भगवान इस उम्र में भी मेरा साथ देंगे। 
     वेद फिर से नयी मंजिल की तलाश में निकल पड़े। 

# apman ka ghunt

      सुकन्या मनोज की शादी के सिलसिले में एक लड़की देखने गयी थी। वहाँ लड़की वालो से मिलवाने वाले सुकन्या के करीब से जानने वाले थे। सुकन्या को वह लड़की पसंद आ  गयी। बिचोलिये ने घर पर ही  बता दिया था। लड़की बहुत गोरी और सुन्दर है। आप इस लड़की की सुंदरता में कोई नुक्स नही निकाल पाओगे। उन्हें लड़की अच्छी लगी। उन्होंने अगले दिन विचार विमर्श करके जबाब देने के लिए कहा।
    लड़की वाले कहने लगे-आप अभी जबाब दे दीजिये। हमें आपके जबाब का इंतजार हे।
     पहली बार सुकन्या इस लड़की को पसंद करवाने के लिए पुरे परिवार के साथ आई थी। उनके पास कोई बहाना  नही था। उनके हिसाब से लड़की ठीक थी। सुकन्या और वेद ने आपस मे विचार करके लड़की को पसंद कर लिया।  उन्होंने  लड़की के लिए हाँ  में जबाब दे दिया।
      लड़की की पसंद के बारे में पता चलते ही लड़की वालो ने उनसे गॉद  भराई की रस्म करने के लिए कहा।        अब सुकन्या और वेद ने कई बहाने बनाये -हम इस के लिए तैयार होकर नही आये। ये हमारा पहला लड़का है। हमारे मन में  अपने  बेटे को लेकर कई  इच्छाए है वह सही ढंग से पूरा करना चाहते है। अचानक हमें ये रस्मे निभाना उचित नही लग रहा। आप हमें समय दीजिये। हम पुरे प्रबंध के साथ रस्मे निभाएंगे।
    लड़की वाले उनके जबाब से संतुष्ट नही थे। उन्होंने कहा - आज के  समय जेब में रूपये होने चाहिए। सामान  हर जगह से ख़रीदा जा सकता है। हम किसी वीराने में नही रहते। यहाँ भी बाजार है। आपको जो चाहिए सारा सामान इसी बाजार में मिल जायेगा। आपको किसी तरह की परेशानी नही होगी।
    वेद पर उन्होंने इतना अधिक दबाब डाला उनसे ना कहना मुश्किल हो गया। वे उनके घरवालो के साथ बाजार सामान खरीदने  चले गए। उस रस्म की जरूरत के अनुसार कुछ सामान लेकर वेद और सुकन्या वापस आ  गए।
    कुछ समय के अंदर सबने रस्मे शुरू कर दी। सुकन्या बहुत गोरी थी उस पर लाल रंग बहुत अच्छा लगता था। यह लड़की भी सुकन्या के सामान बहुत गोरी थी। इसलिए वेद दुल्हन के लिए भी लाल रंग की साड़ी  लाये। दुल्हन लाल रंग की साड़ी  में फब  रही थी।उसे सबलाल  रंग की साड़ी में देखकर  सराह  रहे थे।
     लेकिन लड़की की माँ लाल रंग की साड़ी  को देख कर भड़क गयी। उसने कहा -कोई लड़की के लिए लाल रंग की साड़ी  लाता  है। ये रंग अच्छा नही है। आजकल लाल रंग का फैशन नही है। आपने लाल रंग की साड़ी  लाकर   सही नही किया। आपको कोई और रंग लाना चाहिए था। लाल रंग शादी के बाद पहना जाता है। आपने अभी से ये रंग ला  दिया इसे दिखाते हुए हमें शर्म आएगी।
    सुकन्या ने कहा -मनोज  के पिताजी को  ये रंग बहुत पसंद है। वे आपकी लड़की का  गोरा रंग देखकर अपनी पसंद की साड़ी  लाये  हे। आपको इनकी पसंद पर इतना नाराज नही होना चाहिए। आपकी बेटी पर ये रंग आप खुद देखिये कितना खिल रहा है। आप अपनी बेटी की सुंदरता को एक बार सही ढंग से निहार कर देखिये। आपकी नाराजगी बिलकुल मिट जाएगी।
    लड़की की माँ बोली -शादी से पहले यह इस साड़ी  को पहन नही सकेगी। इस लिए में कह रही थी।
     इसके बाद मेकअप  का सामान देखकर भी वह अनुचित शब्दों का प्रयोग करने लगी। उसने कहा -ये सस्ता सामान लेकर  आप क्यों आये। ऐसा सामान हमारी बेटी इस्तेमाल नही करती। आपको महँगा सामान लाना चाहिए था। इससे मेरी बेटी की त्वचा खराब हो जाएगी।
      इसके बाद  लड़की वाले कहने लगे -आप इसे किसी सोने की चीज भी पहना दो। तब हमें लगेगा रिश्ता पक्का हो गया।
     उस लड़की को सुकन्या अपनी पहनी हुई जंजीर उसके गले में डालने लगी। उनके पास इस समय कोई और सोने की चीज नही थी। उसकी माँ के चेहरे की नाराजगी माला ने देख ली थी उसके मुँह  से निकले शब्दों के कारण सबका मन ख़राब हो रहा था।
    उनकी बेटी माला  ने कहा - माँ आप शादी में सोने की जंजीर दे देना। अभी ये मेरी अंगूठी आप इसे पहना दो।
     सुकन्या को उसकी बात उचित लगी। उसने अंगूठी पहना कर रस्म पूरी कर दी।
     इसके बाद सब अपने घर आ  गए। सबने लड़कीवालों के घर के बारे में बात करनी शुरू की। सबको उनका व्यवहार अनुचित लगा। सुकन्या को उनकी बातो के कारण बहुत गुस्सा आ  रहा था।
    उसने कहा -उन्हें पता था।अभी तो हम सिर्फ लड़की देखने आए थे। हमारे  पास कोई  इंतजाम नही है। रिश्ता सही तरह से पक्का भी नही हुआ। इन्होने हमारी सभी चीजो में नुक्स निकाल दिया। किसी बात को मन में दबाने की इन्होने जरूरत नही समझी। जब ये रिश्तेदार बन जायेंगे। तब ये हमारा बुरा हाल कर देंगे। में सारे  रस्ते सोचती आ  रही हूँ। उसका रिश्ता मुझे इतना सुनाने का कैसे हो गया। मै लड़के की माँ होकर चुपचाप सुनती रही। उसने एक बार भी सोचने की जरूरत नही समझी उसकी कही बात दूसरे को बुरी भी लग सकती है। जब माँ का अपने शव्दो पर नियंत्रण नही है। तो वह अपनी बेटी को भी यही शिक्षा   देती होगी।  मै इस लड़की से मनोज का किसी हालत में रिश्ता नही होने दूँगी। इसकी माँ मेरा जिन मुहाल कर देगी। उसका अपनी जबान पर कोई नियंत्रण नही है। मुझे ऐसे सम्बन्धी नही चाहिए।
     वेद ने कहा -हम रस्मो में इतना खर्च  कर आये  है। हमें काफी नुकसान उठाना पड़ेगा। समाज वाले भी इस बारे में गलत कहेंगे।
    सुकन्या बोली -मै इस समय का नुकसान उठाना बर्दास्त कर सकती हूँ। सारी जिंदगी उस औरत को सहन करना मेरे बस का नही है। उसे अपनी बेटी की सुंदरता का बहुत घमंड लगता है। उसे पता नही चला हमारे  घर में सुंदरता की कमी नही है। तब भी इतना अधिक बोलती रही।
     सुकन्या के शब्दों का असर सब पर हो रहा था। लेकिन इतना बड़ा कदम उठाने की हिम्मत किसी में नही हो रही थी। सुकन्या को समझाना सब के लिए मुश्किल हो रहा था।
    अन्तत  सभी ने लड़की वालो को सारी  बात बता कर ना कहलवा दिया।अब सबको लड़की की माँ के शव्दो पर ध्यान गया। उनको भी माँ के  शब्द अनुचित   लगे। उन्होंने उनसे माफ़ी मागने का प्रस्ताव रखा। लेकिन सुकन्या राजी नही हुई।
    सुकन्या बोली -अभी वह रिश्ता जोड़ने के लिए माफ़ी मांग लेगी। लेकिन उसको इसी तरह से दुसरो को अपमानित करने की आदत होगी। इस रिश्ते को जोड़कर मै  सारी जिंदगी अपमान का घूंट पीना नही चाहती। सबके अनुनय -विनय के बाद भी सुकन्या ने  इस  रिश्ते  को तोड़ दिया।
    उसने कहा -जब माँ को अपनी बेटी की सुंदरता को लेकर इतना घमंड है। तो उसकी बेटी में भी उसने कुछ तो घमंड भर दिया होगा। उसकी बेटी हमारा जीना हराम कर देगी।
    सुकन्या के इस तरह अड़ जाने के कारण मनोज का उस परिवार से रिश्ता नही जुड़ सका। यदि सुकन्या जरा सी नरमी दिखाती तो किसी में इतना सख्त कदम उठाने का जज्बा नही था।
      इसलिए कहते है -माँ अपने बच्चो की भलाई के लिए हर मुसीबत का डट  कर सामना  करती है। ऐसे में माँ के सामान बलबान कोई नही होता। 

#rishte svarg me bante he

     वेद का छोटा बेटा शेखर को हमेशा सोनी में कमी दिखाई देती रहती थी। लेकिन कोई और उसके विचारो से संतुष्ट नही था। शेखर की उम्र शादी लायक हो गयी थी। शेखर की शादी की  किसी को जल्दी नही थी। शेखर जल्दी शादी करना चाहता था। वेद लड़के वाले होने के कारण किसी के घर शादी के प्रस्ताव को भेजने से झिझक रहा था।
       मनोज की शादी के लिए बहुत छोटी उम्र से रिश्ते आने शुरू हो गए थे। लेकिन शेखर के लिए 25 साल की उम्र तक कोई लड़की वाला रिश्ता लेकर  नही आया था। सुकन्या की मौत के कारण कोई शेखर की शादी को लेकर उत्साहित नही था। शेखर ने सोनी जैसी लड़की में बहुत सारे  अवगुण दिखा दिए थे जबकि सोनी का बाहरी रंग -रूप असाधारण था। सबको लगता था यदि इसके लिए लड़की देखने गए। लड़की में कोई कमी रह गयी तो  ये सारा दोष हम पर लगा देगा। जब ये सोनी जैसी लड़की की सुंदरता को लेकर संतुष्ट नही है तो इसके लिए हूर की परी कहाँ  से आएगी।
   शेखर के लिए एक प्रस्ताव आया। वेद लड़की को अकेले देखने के बारे में सोचने से झिझक रहा था। अब तक सुकन्या के साथ उसने सारे निर्णय खुद लिए थे। इस समय उसे सुकन्या की कमी बहुत खल रही थी। उसने इस समय अपनी बड़ी बेटी सुमन को लड़की देखने के लिए बुला लिया।सुमन शेखर के विचार जानती थी उसका इरादा इस मामले में सामने आने का नही था लेकिन वेद की परेशानी समझ कर उसने हाँ  कर दी।  शेखर के साथ सुमन लड़की वालो के घर गयी  ।
     वहाँ शेखर और सुमन का बहुत आवभगत हुआ । सुमन ने लड़की देखने की इच्छा जाहिर की। वे   उसे एक कमरे में ले गए। वहाँ कन्या बैठी हुई थी। सुमन ने लड़की को देखा। लड़की का रंग बहुत गोऱा था। उसके नैननक्श बहुत अच्छे थे। उसके बाल बहुत लम्बे और काले थे। शेखर उस लड़की को देखकर सम्मोहित हो गया।
     सुमन ने लड़की के पास   बैठने के बारे में कहा तो शेखर बोल उठा- अब लड़की देख ली है हमें यहाँ बैठने की क्या जरूरत है..हमारे बैठने से ये शर्मा जाएगी। हम दूसरे कमरे में चलते है।
   वह सुमन को जबरदस्ती दूसरे कमरे में ले आया। सुमन का इरादा उस लड़की से बात करने का था। वह चाहती थी उसके बारे में कुछ जानकारी  मिल जाती। उसका जिंदगी के बारे में नजरिया  क्या है। उसके विचार हमारे जैसे है या अलग है। उसके साथ शेखर सही ढंग से जिंदगी गुजार पायेगा या नही।
      सुमन उसे खड़ा करके चलवा के देखना चाहती थी। उसके लिए ये अजूबा था कि  लड़की को कमरे में बैठा दिया गया था। और लड़के  वालो को दूसरे कमरे में चलने के लिए कहा गया था। उसने अपने जीवन में इससे पहले ऐसा कभी नही देखा था। उसके गले से ये सब नही उत्तर रहा था। अब तक जब भी लड़की को दिखाया जाता था। लड़की लड़के वालो के सामने चलकर आती थी। उसने  कमरे में बैठी हुई लड़की देखने की कल्पना नही की थी।
     उसका मन अभी निर्णय   करने का नही था। लेकिन शेखर उस लड़की की  सुंदरता को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया था।
    सुमन से लड़की वालो ने जबाब माँगा। सुमन अभी जबाब देने से बचना चाहती थी। लेकिन शेखर ने उसे हाँ कहने के लिए विवश कर दिया। उपरी तोर पर लड़की में कोई कमी नही थी। इसलिए सुमन ने अपनी रजामंदी दे  दी। सब खुश हो गए। वेद को सुमन के सही निर्णय पर भरोसा था। शादी की तेयारिया शुरू कर दी गयी।
     शादी के बाद रचना घर आई तो सबको उसका कद देखकर बहुत हैरानी हुई उसका कद पांच फीट से कम था जबकि शेखर का कद ५"9 इंच  था। शेखर को बहुत गुस्सा आया। ये कैसे हो गया। उसने इस बात की कल्पना नही की थी। उसने सब कुछ अच्छा होगा सोचा था।
    रचना के बोलने पर उसकी आवाज की कमी पता चली। उसकी आवाज सुनने में साफ नही थी। उसकी बात सुनने के लिए बहुत प्रयास करना पड़ता था। नया इंसान उसकी बात का मतलब समझ नही पाता  था। अक्सर लोग उससे बात करने से बचने की कोशिश करते थे।
     शेखर सारा दोष सुमन पर मढ़ने लगा। उसके कहने पर मेने हाँ की थी। उसने मेरे साथ धोखा किया। सुमन अपना पक्ष रखती। अब दोनों के सम्बन्धो में कड़वाहट आ  गयी थी।
     उसने कहा -में माँ नही थी मै केवल बहन थी। माँ के सामान अड़ नही सकती थी। मेरे मन में पहले ही ऐसे विचार आ  रहे थे। लेकिन इसके जोर देने पर मेने ज्यादा कहना  ठीक नही समझा।
    अब सबको सुकन्या की याद आ  रही थी। वह अपने सामने कभी ऐसा नही होने देती। वह हर तरह से संतुष्ट होने के बाद ही हाँ  करती।  एक माँ अपने बच्चो के लिए सारी दुनिया से टकरा जाती है.ऐसे कहते है  रिश्ते स्वर्ग में बनते है ,केवल धरती पर निभाए जाते है। शेखर और रचना का रिश्ता देखकर उस बात की सच्चाई पर यकीन  पक्का हो जाता है।  

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...