#TOUCH THE HEART

                 मन को छूना 

   इंसान अपनी मर्जी का मालिक बन कर जीना चाहता है।  वह हमेशा सोचता है -उसका जब मन करे तब काम करे, जब मन न करे तब कुछ भी न करे। हम सब सामाजिक प्राणी है। इसका मतलब सब  परस्पर जुड़े होते है। इसके कारण प्रत्येक के काम का असर दूसरे पर पड़ता है। जब एक इंसान काम नहीं करता है तब उसके साथ रहने वाले को दुगुना काम करना  पड़ता है। 

       एक सीमा  तक कोई भी किसी के लिए काम करता है। जब उसे पता चलता है सामने वाले के लिए मेरी हैसियत नौकर की बन गई है। तब वह छटपटाने लगता है। उसका मन विद्रोह करने लगता है। जब इस  इंसान  के लिए मेरी अहमियत नहीं है तब मै  भी इसके लिए कोई काम नहीं करूंगी। 

         तब उस इंसान को अपनी लापरवाही समझ में आने लगती है। लेकिन उस समय तक इतने मन फट  चुके होते है। कि  वह उसकी मूल भूत  जरूरते पूरी नहीं करना चाहती बल्कि उसका दिल पत्थर बन चुका  होता है। वह उसकी बीमारी में भी उसकी देखभाल करने के लिए तैयार नहीं होती है। 

       उसके सुख -दुःख उसके लिए कोई मायने नहीं रखते बल्कि उसे दुखी देखकर उसे आत्मिक ख़ुशी महसूस हो रही होती है। वह मन ही मन दोहराती है- जैसे को तैसा होना  चाहिए। वह अब पथरदिल बन होती है। 

       समाज के सामने काम से बचने के लिए   बीमारी का बहाना ढूंढने लगती है। भले ही छोटी सी बीमारी हुई हो वह उसे बड़ा कर  दिखाती  है ताकि समाज के काम न करने के तानो  से बच सके। धीरे -धीरे उसे काम न करने पर आनंद की अनुभूति होने लगती है।  वह काम न करके हर समय बिस्तर पर पड़े  रहना पसंद करने लगती है। 

        कोई भी तभी काम करना पसंद करता है। जब उसे अपने काम  का  फल अच्छा दिखाई दे रहा होता है। लेकिन जब उसके किये हुए काम के कारण कुछ भी सही होता नहीं दिखाई दे रहा होता है तब वह भी काम से बचने के लिए बीमारी का मकड़जाल बुनने लगती है। एक दिन यही  कल्पनाये उसे लुभाने लगती है। क्योंकि अब कोई भी उसे कामचोर नहीं कह रहा होता है। बल्कि हर एक उससे सहानुभूति दिखा रहा होता है। 

      किसी को ऐसी मानसिक स्थिति में पहुंचाने  से अच्छा है। सही समय पर उसके व्यवहार में आये बदलाब का कारण समझ लो क्योंकि एक दूसरे के लिए काम करने से प्यार बढ़ता है। काम से बचने पर वही इंसान  धीरे -धीरे पत्थरदिल होता चला जाता है। उसमे संवेदनाये खत्म होती चली जाती है। 

       इसलिए कहा जाता है -तन को छूने से ज्यादा जरूरी मन को छूना  है। जिसके मन पर अधिकार कर लोगो आपको  अपने सामने संसार की सारी  सुंदरता बिखरी नजर आने लगेगी।  अब वह वक्त नहीं रहा जब आप किसी को डरा कर काम करवा सको बल्कि उसे  शब्दों से आहत होने से बचाओ। तलवार के घाव से  ज्यादा शब्दों के घाव खतरनाक  होते है। 

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