# HUMAN NATURE

                    इंसानी फितरत 

 आदमियों और औरतो के व्यवहार में बहुत अंतर होता है। औरते अपनी इच्छाओ को सबके सामने व्यक्त करने से पहले सोचती है। औरतो की मूल आवश्यकताओ  पर भी कई नियम -कानून बनवा कर उन पर रोक लगाने की कोशिश की जाती है। जबकि आदमियों की हर आवश्यकता को पूरा करने के लिए सारा समाज उठ खड़ा होता है..

       आप भारतीय इतिहास को देखिये। औरत को बाल  विधवा होने   पर दूसरा  विवाह करने की छूट नहीं थी। मैने  ऐसी कई विधवाएं देखी थी जिनकी शादी हुई  थी लेकिन वे अपने पति की शक्ल तक देख नहीं पायी थी. उसके बाबजूद उनसे जिंदगी के सारे  अधिकार छीन लिए गए क्योंकि वे विधवा हो चुकी है।   दूसरी शादी तो सपने में भी नहीं सोचा जाता था। 

   आदमियों की पत्नी के मरते ही,  जब उसकी पहली पत्नी की चिता  जल रही होती है। तभी  लोग उसकी दूसरी शादी करने के बारे में सोच रहे होते है।     

        आदमियों को साठ  साल की उम्र में भी शादी करने के लिए बढ़ावा देते हुए कहा  जाता था -साठा  सो पाठा।  मतलब    बूढ़ा  इंसान भी जवान के सामान है एक आदमी अपने जीवन काल  में अनेक शादियां कर सकता था।  इसका उसे   अधिकार समझा जाता था।

          आजादी के बाद कानून पास हुआ कि  एक इंसान एक पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरी औरत से  शादी  नहीं कर सकता है। इस हालत से बचने के लिए बहुत सारे  आदमी धर्म तक बदलने के लिए तैयार हो जाते है। पर अपने मन पर नियंत्रण नहीं कर पाते।  लेकिन कानून आने के बाद लोगो के अंदर दूसरी शादी का डर  जरूर बैठ गया है। 

        आप देखेंगे हर शहर में आदमियों की जरूरत पूरी करने के लिए अनेक तरह के वेश्यालय चलाये जाते है। समय के हिसाब से उनका नाम बदल जाता है। ये  कहीं मसाज सेण्टर तो कही स्पा सेण्टर के नाम से भी बुलाये जाते है।  जहां विशेष रूप से सेवा करने के लिए सुंदर औरते तैनात की जाती है।  आये दिन सरकारी छापे पड़ने पर इन्हे बंद करवाया   जाता  है।  अगर इसमें सिर्फ मसाज हो रही होती तो बंद करवाने की जरूरत क्या थी।  अनेक स्थानों पर अनेक लोग  उनके मन मुताबिक औरते उपलब्ध करवाने  के काम में लगे होते  है। जैसी जेब में पैसे है वैसी औरते उपलब्ध करवा दी जाती है।

       मैंने बहुत सारे तानाशाहों  को देखा है जो अपने सुरक्षा कर्मचारी के रूप में औरते तैनात करते है। उससे उनका क्या अभिप्राय होता है.क्या ये सिर्फ विश्वास के कारण या कुछ और होता है। कठोर से कठोर तानाशाह भी औरतो के सामने झुक कैसे जाते है सोच कर देखे।  

         इंसानी कठोरता कब सख्ती में बदल जाती है। कब कोमलता में बदल जाती है। ये कुदरत का करिश्मा ही कहा जा सकता है 

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