#HAPPINESS AND FAMILY

         खुशियां और परिवार 

            प्यार का अहसास बहुत सूंदर होता है। जो प्यार में डूबा होता है एक नयी उमंग    उसकी नसों में बह रही होती है। दुनियां  बहुत सूंदर लग रही  होती  है। हर तरह खुशियां ही खुशियां  बिखरी  हुई  होती है।  प्यार में  एक नशा होता है। जो दुनियां  के हर नशे  से बढ़कर होता है। 

         लेकिन   इंसान जिसके साथ रहता है  उससे   सबसे ज्यादा नफरत करता है। एक दिन  जिसे पाने के लिए दुनियां से लड़ जाता  है। कुछ  दिन बाद  उसकी शक्ल देखना  तक  पसंद नहीं   करता।  उसकी बाते  मन में कड़वाहट भर देती है। इसका असर सबसे ज्यादा आप  अपने आस -पास देख सकते हो।

        हर तरफ जो लोग परस्पर साथ रहते है उनके पास जाकर देखो जो भी रिश्ते है वे सब टूटने के कगार पर पहुंचे हुए है। उनके अंदर की सारी  मिठास गायब हो गई है। जो हमारे पास है उनसे दूर जाने के उपाय ढूंढे जा रहे है। हम एकरसता से ऊब चुके है। जो चीज हमे आज सूंदर लग रही है। वे भी कुछ समय बाद बेकार लगने लगेगी ये मानव फितरत है। 

         वे नहीं सोच पा  रहे दूर के ढोल हमेशा सुहावने होते है।  पास आकर जब वे ढोल बज रहे होते है तब लगता है मानो  कान  के परदे फट जायेंगे। ऐसा ही रिश्तो में होता है। माँ -बेटे , बेटी,सास -बहू  दमाद  , भाई -बहन और पति -पत्नी सभी रिश्ते जब साथ रहते है तब ये आपस में नफरत कर रहे होते है। सभी को दुसरो के रिश्ते में मिठास लग रही होती है। जो साथ रह रहे है वे भी खुश नहीं होते है वे केवल रिश्तो को निभा रहे होते है।  

        मन परिवर्तनशील होता है। हम बहुत जल्दी एक ही माहौल से ऊब जाते है। जैसे रोज -रोज घर का खाना ही  बेस्वाद लगने लगता है।और बाहर का खाना कहने के लिए उतावले हो रहे होते है।  जो रोज बाहर खाना खाते  है वे बाहर के खाने से ऊब जाते है। वो घर के खाने के लिए तरस  रहे होते है।  कितने भी सूंदर कपड़े हो उन्हें हम रोज नहीं पहन सकते। एक ही घर में रहते हुए वह घर जेल लगने लगता है। इसलिए हम अपनी ऊब को मिटाने  के लिए बाहर घूमने जाते है।

         जानवरो के अंदर ऐसी ऊब नहीं होती। वे सदा एक जैसा खाना खाते  है। एक ही माहौल में रहकर पूरी जिंदगी काट लेते है। इसे इंसान की खासियत कहूँ  या कमी। जो हर समय बदलाब के लिए छटपटाता रहता है।

       यदि ऐसे ही उनके माँ -बाप उन्हें छोड़कर दूसरे बच्चो को घर ले आये या उन्हें छोड़कर दूसरो  के घर रहने लगे। उनकी कोई जरूरत पूरी न करे। क्योंकि कोई अभिभावक जिम्मेदारी निभाना नहीं चाहता। क्योंकि शादी से पहले वे भी आजाद परिंदे थे। उन्होने  समाजिक बंधनो को स्वीकारा इसलिए अपने सारे  फर्ज पूरे  करते हुए कठोर परिश्रम कर रहे है। उनका मन भी घुट रहा होता है। 

      जो लड़कियां शादी से पहले आठ बजे उठ रही होती है। वे ससुराल में जाकर कैसे पांच बजे उठने लगती है।हर चीज मायके में उन्हें जगह पर मिलती थी. . उनका   सुबह उठ कर सबके फर्ज निभाते हुए कितना मन मसोसता होगा। वे शादी के बाद अपने लिए जीना भूल जाती है  फिर भी परिवार को परिवार बनाने के लिए अपनी सुविधाओं से ऊपर उठकर  सबको खुश करने की कोशिश कर रही होती है। क्योंकि परिवार तोड़कर सबकी आँखों में आंसू भर देना आसान है। लेकिन सबके  होठो पर ख़ुशी लाना आसान नहीं होता। वे पति ,बच्चे ,सास -ससुर, ननद   देवर ,भाई -बहन या माँ बाप हर रिश्ता निभाना चाहती है। हर रिश्ता  कुर्बानी  मांगता है। 

      कुर्बानी  हम इसलिए देते है।  क्योंकि हम सामाजिक प्राणी है। हर ख़ुशी ,गम बीमारी में हमें किसी के साथ की जरूरत होती है.खुनी रिश्तो में भले ही हम कड़वाहट महसूस करे। लेकिन अंतिम समय तक वे ही रिश्ते सबसे ज्यादा हमारे लिए बलिदान देते है। जिन बाहरी रिश्तो की तरफ भाग रहे होते है। वे पहले अपने परिवार को महत्व देते है उसके बाद हमारा नंबर आता है।

        हम खून के रिश्तो को कितना भी नकारे लेकिन सारी  जिंदगी उनसे ही हमारी पहचान बनती है।   जवानी के जोश में हम अकेले रहने की कल्पना कर सकते है। लेकिन बुढ़ापे में हमें परिवार की जरूरत पड़ती है। यदि हमने परिवार के लिए क़ुरबानी नहीं दी होती तो परिवार भी हमें भुला देता है। 

          ये आपकी मर्जी है आप  अपने अहम के साथ अकेला जीवन जिए या सबकी खुशियों में शामिल होकर हँसते हुए , खुद को भुला कर हँसते हुए जिए। कहते है। आप एक बार नकली हंसी हंस कर देखे थोड़ी देर में वही असली हंसी में बदल जाएगी। हमें हर रिश्ते की जरूरत होती है। जो सोचते है हम अकेले जी लेंगे बे झूठ बोल रहे होते है।    

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