#sorrow is in our mind

            दुःख हमारे मन का होता है 

 हम सुख हमेशा दूसरो  में ढूंढते है। जबकि हर कोई सुख की तलाश में घूम रहा है। सुख की तलाश में हर इंसान घूम रहा है. इसका मतलब वह भी दुखी है। अगर दुखी न होता तो सुख क्यों ढूंढ  रहा होता।  जब सामने वाला दुखी है। जो खुद दुखी है वह हमे सुख कैसे दे सकता है। इसलिए हम सभी दुखी है। 

          जो चीज दूसरो से मांगी जा रही है। वह हमें तभी देगा जब वह चीज उसके पास फालतू होगी। जब उसके पास ही  सुख की कमी है तो ऐसी चीज वह हमे कैसे दे सकता है।जो उसके पास नहीं है।  इसलिए हर तरफ दुःख है कोई सुखी नहीं है। 

      सुख हमारे खुद के अंदर होता है। जिसे हम महसूस नहीं कर पाते  है। उसे हर तरफ, हर इंसान में ढूंढ रहे होते है। जो चीज बाहर नहीं है वह हमे कैसे मिलेगी। इसलिए हम दुखी रहते है। दुःख के लिए सामने वाले को जिम्मेदार ठहरा रहे होते है। जबकि सामने वाले को भी समझ नहीं आ रहा होता -" मैंने इसे कब और किस रूप में दुःख दिया। "

         हमे दुःख वही इंसान दे सकता है। जिसके सामने हमारी कोई अहमियत न हो। जिसके सुख के कारण हम है। वह हमे दुःख देने से पहले कई बार सोचेगा। हर इंसान सुख पाना चाहता है। इसके लिए हर कोशिश कर रहा होता है। जिसकी हर जरूरत हमसे जुडी हुई है। वह उन जरूरतों के कारण हमसे प्यार करता है। जब उसकी  जरूरत पूरी नहीं होंगी। तब वह   भी दुःख में डूब  जायेगा। इसलिए अपनी अहमियत को समझो। जब तक तुम्हारी जरूरत सामने वाले के लिए बनी रहेगी। वह जानबूझकर तुम्हे दुःख नहीं देगा। 

         दुःख हमारे मन का होता है। हर इंसान दुखी होता है क्योंकि वह खुद दुखी रहना चाहता है। हमारी सोच हमे दुखी बनाती  है। किसी को आधा भरा हुआ गिलास आधा खाली  दिखाई देता है। तो दूसरे इंसान को वही गिलास आधा भरा हुआ दिखाई देता है। 

          ये हमारा नजरिया है। हम कब खुश होते है या दुखी। इसके लिए दूसरो  को दोष देने वाले हमेशा दुखी रहते है। नजरिया बदलते ही दुनियां बदल जाएगी। मैंने ऐसे बहुत सारे  लोग देखे है। जिनके सामने खुश रहने से सम्बन्धित किताबे रख दो। वो उसे पढ़ने  से पहले ही कह देते है। हमे पहले से ही पता है जो इसमें लिखा है पढ़  के कोई फायदा नहीं होता इसलिए उस किताब को खोल कर देखना भी नहीं चाहते है। लेकिन जो पता है उसे अमल में लाओगे तभी जिंदगी संवरेगी। वरना  उसका जानना बेकार है।

          एक दिन हर इंसान दुनियां से चला जाता है। कुछ लोग सारी  जिंदगी दूसरो  को अपने दुःख का कारण मानते हुए  दुखी रहकर दुनियां से जाते है। कुछ अपनी जिंदगी को खुशहाल मानते हुए दुनियां से जाते है  दुःख हमारे मन का होता है। जितना चाहे सुखी हो लो या दुखी हो लो। 

#bato ke vishay badlo sathi nahi

                बातो के विषय बदलो साथी नहीं  

   शादी से पहले जब साथी से बात होती है। तब मन में सिर्फ खुशी  का  अहसास होता है। हर समय उमंग से भरे होते है। उन कुछ घंटो में हम साथी के सामने अपने श्रेष्ठतम रूप में आते है। दूसरा भी  सबसे अच्छा व्यवहार कर रहा होता है।  हम अपनी पूरे  दिन में हुई  सारी  अच्छी बातो को  उससे साझा करने के लिए ललायित होते है।              बहुत सारे  लोग अपने समय का अधिकतम इस्तेमाल, बाते  करते हुए बिताते है। उनकी बाते खत्म ही नहीं होती है। यहां तक की फ़ोन के बिल की परवाह भी नहीं करते है। उनकी बाते  करने की आदतों से भले सारा परिवार दुखी हो रहा हो ,उन्हें इससे मतलब नहीं होता। वे हर समय बाते  करना पसंद करते है। उसके लिए उन्हें दिन और रात  कम महसूस हो रहे होते है। 

        शादी के कुछ समय बाद उनकी बाते  बहुत कम  हो जाती है। वे इस कमी को अपने प्यार में कमी महसूस कर रहे होते है। ऐसा नहीं है। बल्कि शादी से पहले जब कुछ समय के लिए मिलते है तब पूरे  दिन की हर बात साथी को बताना चाहते है। लेकिन शादी के बाद जब एक साथ रहते है  तब दोनों पूरे  दिन क्या खाया ,पिया , पहना और  किससे  बात की आदि  ये सब चीजे साथी को दिखाई दे रही होती है। इसलिए क्या तुम बताओगे या वह क्या तुमसे पूछेगा।  इन बातो का महत्व खत्म होता चला जाता है। इसलिए  इससे सम्बन्धित बाते   करना भी जरूरी महसूस नहीं होता है। 

          इसलिए बातो का सिलसिला धीरे -धीरे कम  होता चला जाता है। इसे प्यार की कमी नहीं समझना चाहिए बल्कि एक -दूसरे के साथ का लुत्फ़ उठाना चाहिए। जिंदगी में साथ रहने के मौके  बहुत कम मिल पाते  है। क्योंकि  आजकल दोनों का  काम  के  प्रति रुझान होता है। कोई परिवार के लिए नौकरी नहीं छोड़ना चाहता है। नौकरी के कारण दोनों को एक दूसरे से  दूर भी रहना पड़  सकता है।   इसलिए जो पल साथ साथ रहने के लिए मिल रहे है उनका लुत्फ़ उठाना चाहिए। जिंदगी परिवर्तन शील है। जो आज है वह कल नहीं होगा। जो कल होगा उसका अभी  हमें पता भी नही है 

     जब तक बच्चे नहीं होते है। तभी तक एक -दूसरे के समय की ज्यादा जरूरत महसूस होती है। बच्चो के बाद उन्हें आपस में बात करने का समय मिलना मुश्किल हो जायेगा।उसके बाद वे बच्चे से सम्बन्धित बाते  ही करेंगे। उनके आपस के विषय न के बराबर रह जायेंगे।  

         जो लोग परस्पर बहुत बाते  करते है अब वे दुनियां जहां की बाते  करते है न की एक दूसरे की बातो में खोये रहते है। इसलिए वक्त की नजाकत को समझो। बात करने के नए विषयो का चुनाव करो। क्योंकि शादी से पहले के प्यार  का रूप बदल गया है. खत्म नहीं हुआ है। 

     

#MAN ME BASA DAR

                   मन में बसा डर 

     कुछ लोग शादी के बाद बहुत जल्दी जिंदगी से  बोर  होने लगते है। शादी से पहले की जिंदगी हमने बचपन से देखी  होती है। हमे उसकी आदत पड़  गई होती है। जबकि शादी के बाद का माहौल बिलकुल अलग होता है। शादी से पहले हम हर समय बात करते रहते है क्योंकि हमे पता होता है हमारी बातो की सबको आदत है।
          हमारे अंदर किसी से बात करते समय कोई संकोच नहीं होता है। सब हमारी  गलतियां भी माफ़ करते  है। सबको पता होता है। बड़े हमारी भलाई के काम करेंगे उनकी गलियां या डांट ज्यादा बुरी नहीं लग रही होती है। क्योंकि बचपन से इसकी आदत पड़  चुकी होती है। 
          जब ससुराल जाते है मन में अनजानेपन का डर  समाया  होता है।  डर  के कारण सही काम भी गलत हो जाते   है। जितना ज्यादा सोच समझकर काम करते है। उतनी ज्यादा गलती हो जाती है। एक बार गलती होने पर  शब्दों में यदि कोई हमारी गलती न निकाले  तब भी सोच -सोच कर कल्पनाओ में कितनी बार रुसवा होते रहते है। हम अपनी कल्पनाओ के कारण कितनी अपमानजनक जिंदगी  महसूस कर रहे होते है। 
               अब आप ही सोचिये ऐसे में हर समय डर  लगा रहता है। हम अपने को संपूर्णगुणसम्पन्न साबित करने में लगे रहते है। जबकि सभी में कमियां होती है। मायके में गलती सामने आने पर भी हम झुकने या गलती मानने  की जगह दूसरो  पर सारा दोष डाल  कर अलग हो जाते है।  यहाँ सबकी चुप्पी के भी हम दस अर्थ निकाल  कर अपनी जिंदगी को दुःख में डूबा रहे होते है। 
     खुशहाल जिंदगी जीने के लिए पहले जमाने की औरते कहती थी - "औरत को चिकना घड़ा होना चाहिए। " लेकिन आजकल की औरतो का अहम बहुत ऊँचा हो गया है। वे बिना शब्द सुने  भी मन ही मन में अनेक अर्थ निकाल  लेती है। जिंदगी इतनी बुरी नहीं होती है। जितनी हम सोच रहे होते है। 
          जिंदगी में हम जितना सामने वाले से डरते है। सामने वाला भी हमसे उतना ही डर  रहा होता है। जिस दिन हम सामने वाले से डरना छोड़ देते है। उस समय  हमसे बहादुर कोई नहीं होता है। जिसने दूसरो  के डर  को समझ लिया।  वही जिंदगी का असली मजा ले सकता है। वरना  डरते और सिसकते जीना  पड़ता है। 
        जिंदगी इतनी बुरी नहीं होती जितनी हम समझ रहे होते है। जब कोई हमे अपने साथ ले जा रहा होता है तो उसका अर्थ होता है वह खुद दुखी है वह अपने दुःख को कम करने के लिए ले जा रहा है। इसलिए मन में मत  सोचना कि  सामने वाला हमें दुःख देने ले जा रहा है। जिस दिन अपने दिमाग से इस विचार को निकाल  दोगो। उस दिन दुनियां के सबसे सुखी इंसान बन जाओगे। 

# your desire is paramount

             अपनी इच्छा सर्वोपरि 

  कुछ लोग सामाजिक नियम कायदो को समझते है। लेकिन अपनी जरूरतों के कारण लाचार  हो जाते है।  वे आसपास नजर डालने लगते है। उन्हें घर की औरतो के साथ मुँह काला  करना शोभा नहीं देता। वे ही बाहर की औरतो  की  तरफ  बढ़ते है। 

       उन्हें पता होता है। घर में यदि किसी की बहन या  रिश्तेदार पर निगाहे डाली तब पिटाई  और रुसवाई  का डर  हमेशा बना रहेगा। उसके प्रति जिम्मेदार लोग उसे कहीं का नहीं छोड़ेंगे। लेकिन ये ऐसा फल है जिसके बिना रहना मुश्किल हो जाता है।लोग शिकारी की तरह घात  लगाए रहते है। जहाँ अकेली लड़की सुनसान रास्ते  पर  दिखी, वे अपना नियंत्रण खो बैठते है  

        भले ही ऐसे मामले 5 %  होते है। लेकिन खबरों में छाये रहते है। कोई भी संचार माध्यम इनसे बचा नहीं रहता। अपने इस कार्य के बाद भले ही बदनामी के डर  से उस लड़की को मौत की गोद  में सुलाना पड़े लेकिन अपनी इच्छा सर्वोपरि होती है। 

       ऐसे मामले आजकल खबरों में बहुत ज्यादा आ रहे है। क्योंकि अब लड़की के घर वाले इसकी रिपोर्ट लिखवाने लगे है। उन्हें लड़की की रुसवाई से ज्यादा उसे न्याय दिलवाना अच्छा लगने लगा है। 

           तब भी किसी ताकतवर इंसान का कृत्य अभी भी सामने नहीं आ पाता  हेै। भारत में जितने बलात्कार होते है उसके मुकावले  रिपोर्ट  केवल 25 % की लिखवाई  जाती है। बाकि लड़की के  भविष्य के बारे में सोच के चुप्पी लगा ली जाती है। ऐसी खबर आने के बाद इससे कौन शादी करेगा सारी  जिंदगी हम इसे किस तरह अपने घर में रख  पाएंगे। समाज में हमारी नाक  नीची हो जाएगी आदि ।   

      दिव्यांग और  लावारिस लड़कियों पर सबकी नजर होती है। क्योंकि उनके प्रति जिम्मेदारी लेने वाले नहीं होते। वे जहां भी, जिसके साथ  रह रही होती है। वे उन्हें बोझ के सामान लग रही होती है। वे अपने भाग्य को कोस रहे होते है।   ये उसके आसपास वाले भी समझते है. लोगो की मानसिकता आसानी से उपलब्ध रहने वालो पर पहले जाती है। ऐसी लड़कियों के साथ सबसे ज्यादा बलात्कार होते है।  जिनकी सुनवाई कहीं नहीं होती है।  

         भारत में ऐसे मामले थाने  तक केवल 4000  तक पहुंच पाते  है। जबकि अमरीका जैसे देश में 70000  तक पहुंचते है। बलात्कार के मामले भारत के आलावा सभी देशो में फैले होते है। ये इंसानी फितरत है। जो नहीं मिल पा  रहा है उसे हर हालत में हासिल करना है। इसके लिए भले ही सामाजिक रुसवाई का सामना करना पड़े। या मौत को गले लगाना पड़े। सब मंजूर है। लेकिन अपनी जरूरत सबसे पहले है। बाद की बाद में देखेंगे। 

         इस मामले में जानवर और इंसान दोनों एक श्रेणी में आ जाते है। वे  अपनी इच्छाओ पर नियंत्रण करने में असमर्थ हो जाते है। 

# woman"s wish

                औरत की इच्छा 

आदमियों के अंदर बहुत सारी  आदते ऐसी होती है जिनपर वे नियंत्रण नहीं कर पाते  है। उसके बदले में जान हथेली पर रखने के लिए तैयार रहते है। जैसे औरत की इच्छा। आपने देखा होगा बहुत सारे  बलात्कार केस आते  है।

         पहले समय में कहा जाता था - "लड़कियां अपनी हरकतों के कारण या कम कपड़े पहनती  है। जिसके कारण आदमी  अपना नियंत्रण खो बैठते है।  ये सारा लड़कियों का कसूर है।" लेकिन जब तीन या चार साल की लड़कियों के साथ ऐसा होता है तब इसे किसकी गलती कहेंगे। ये मासूम लड़कियां इस तरह के रिश्तो के बारे में जानती ही नहीं है। तो दूसरो  को आकर्षित करने के लिए या उकसाने के लिए  क्या करती होंगी। आदमियों को  अपनी इच्छा के कारण उम्र की सीमा  लांघते भी देर नहीं लगती है।  

          सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 95%  बलात्कार घरो में होते है।  जिनका थानों  तक पहुंचना ही मुश्किल होता है। औरते  अपने घरो के मर्दो के खिलाफ रिपोर्ट करने से डरती  है। क्योंकि उनके घर आदमियों की कमाई से चलते है। जब वे सलाखों के पीछे चले जायेंगे। तब घर का खर्चा कौन उठाएगा। 

     दूसरे  जब मर्द सलाखों के पीछे चले जायेंगे तब उस घर की औरतो को बाहरी  दरिंदो से कौन बचाएगा। ऐसा ही एक केस मेरे सामने आया। जिसमे लड़की के पिता नहीं थे। बड़ा भाई अपनी बहन के साथ रोज शारीरिक सम्बन्ध बनाता  था। माँ दूसरे कमरे में सोती रहती थी. वह उसे रोकने के प्रयास नहीं करती थी। या शुरू में  विरोध करने पर उसके  बेटे ने  उसे अपमानित  कर दिया होगा। ऐसे लोगो के अंदर सामाजिक नियम मानने की इच्छा नही होती। उनके लिए अपनी इच्छा ही सर्वोपरि होती है।

       जिसके कारण माँ आंख बंद करके सोने का नाटक करती होगी। क्योंकि अपने घर की इज्जत के परखच्चे वह बाहरी  दुनियां के सामने उड़ते कैसे देख सकती थी। .   

          जिसके कारण वह लड़की  बहुत चिड़चिड़ी हो गई थी। क्योंकि लड़कियों को बचपन से सही गलत में अंतर् करना आ जाता है ।  सबसे इसका जिक्र करती थी। लेकिन किसी को इसकी  बात पर यकीन नहीं आता था।  कोई भी कदम उठाने के लिए तैयार नहीं हो रहा था। घर के ऐसे मामले में बाहर वाला क्या कर सकता है। लेकिन  हमने जब यह सुना पुलिस को बुलाकर उसका केस दर्ज करवाया। 

       उसके बाद पुलिस ने उसे  महिला  आश्रम भिजवा दिया। लेकिन कुछ समय बाद पता चला उस आश्रम में भी उसके साथ  शारीरिक सम्बन्ध बनाने वाले अनेक पैदा हो गए है । 

        उसके बाद कई घरो के अंदर सम्बन्ध बनाने वाले मामले हमारे सामने आये। लेकिन उस लड़की की दुर्गति देखकर हमारा उन  मसलो  को पुलिस तक पहुंचाने  की हिम्मत नहीं हुई। 

      घर में तो एक लड़की से  जबरदस्ती सम्बन्ध केवल एक इंसान  बनाता है। लेकिन बाहर निकलते ही उसके साथ कितने लोग सम्बन्ध बनायेगे। ये सोच कर मन सिहर उठता है।   हम चाहते हुए भी लड़कियों के  लिए घर की चारदीवारी छोड़ कर  अलग आशियाना ढूंढ  नहीं पाते  है। 

       इसलिए बेटियों को यही सिखाया जाता है उनके लिए एक घर होना चाहिए। घर के बिना ये संसार उनका बुरा हाल  कर देगा।  इसलिए वे लड़कियां माँ ,बहन या बेटी के रूप में आशियाना  बनाये रखने की भरसक कोशिश करती रहती है। . 

# HUMAN NATURE

                    इंसानी फितरत 

 आदमियों और औरतो के व्यवहार में बहुत अंतर होता है। औरते अपनी इच्छाओ को सबके सामने व्यक्त करने से पहले सोचती है। औरतो की मूल आवश्यकताओ  पर भी कई नियम -कानून बनवा कर उन पर रोक लगाने की कोशिश की जाती है। जबकि आदमियों की हर आवश्यकता को पूरा करने के लिए सारा समाज उठ खड़ा होता है..

       आप भारतीय इतिहास को देखिये। औरत को बाल  विधवा होने   पर दूसरा  विवाह करने की छूट नहीं थी। मैने  ऐसी कई विधवाएं देखी थी जिनकी शादी हुई  थी लेकिन वे अपने पति की शक्ल तक देख नहीं पायी थी. उसके बाबजूद उनसे जिंदगी के सारे  अधिकार छीन लिए गए क्योंकि वे विधवा हो चुकी है।   दूसरी शादी तो सपने में भी नहीं सोचा जाता था। 

   आदमियों की पत्नी के मरते ही,  जब उसकी पहली पत्नी की चिता  जल रही होती है। तभी  लोग उसकी दूसरी शादी करने के बारे में सोच रहे होते है।     

        आदमियों को साठ  साल की उम्र में भी शादी करने के लिए बढ़ावा देते हुए कहा  जाता था -साठा  सो पाठा।  मतलब    बूढ़ा  इंसान भी जवान के सामान है एक आदमी अपने जीवन काल  में अनेक शादियां कर सकता था।  इसका उसे   अधिकार समझा जाता था।

          आजादी के बाद कानून पास हुआ कि  एक इंसान एक पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरी औरत से  शादी  नहीं कर सकता है। इस हालत से बचने के लिए बहुत सारे  आदमी धर्म तक बदलने के लिए तैयार हो जाते है। पर अपने मन पर नियंत्रण नहीं कर पाते।  लेकिन कानून आने के बाद लोगो के अंदर दूसरी शादी का डर  जरूर बैठ गया है। 

        आप देखेंगे हर शहर में आदमियों की जरूरत पूरी करने के लिए अनेक तरह के वेश्यालय चलाये जाते है। समय के हिसाब से उनका नाम बदल जाता है। ये  कहीं मसाज सेण्टर तो कही स्पा सेण्टर के नाम से भी बुलाये जाते है।  जहां विशेष रूप से सेवा करने के लिए सुंदर औरते तैनात की जाती है।  आये दिन सरकारी छापे पड़ने पर इन्हे बंद करवाया   जाता  है।  अगर इसमें सिर्फ मसाज हो रही होती तो बंद करवाने की जरूरत क्या थी।  अनेक स्थानों पर अनेक लोग  उनके मन मुताबिक औरते उपलब्ध करवाने  के काम में लगे होते  है। जैसी जेब में पैसे है वैसी औरते उपलब्ध करवा दी जाती है।

       मैंने बहुत सारे तानाशाहों  को देखा है जो अपने सुरक्षा कर्मचारी के रूप में औरते तैनात करते है। उससे उनका क्या अभिप्राय होता है.क्या ये सिर्फ विश्वास के कारण या कुछ और होता है। कठोर से कठोर तानाशाह भी औरतो के सामने झुक कैसे जाते है सोच कर देखे।  

         इंसानी कठोरता कब सख्ती में बदल जाती है। कब कोमलता में बदल जाती है। ये कुदरत का करिश्मा ही कहा जा सकता है 

#TOUCH THE HEART

                 मन को छूना 

   इंसान अपनी मर्जी का मालिक बन कर जीना चाहता है।  वह हमेशा सोचता है -उसका जब मन करे तब काम करे, जब मन न करे तब कुछ भी न करे। हम सब सामाजिक प्राणी है। इसका मतलब सब  परस्पर जुड़े होते है। इसके कारण प्रत्येक के काम का असर दूसरे पर पड़ता है। जब एक इंसान काम नहीं करता है तब उसके साथ रहने वाले को दुगुना काम करना  पड़ता है। 

       एक सीमा  तक कोई भी किसी के लिए काम करता है। जब उसे पता चलता है सामने वाले के लिए मेरी हैसियत नौकर की बन गई है। तब वह छटपटाने लगता है। उसका मन विद्रोह करने लगता है। जब इस  इंसान  के लिए मेरी अहमियत नहीं है तब मै  भी इसके लिए कोई काम नहीं करूंगी। 

         तब उस इंसान को अपनी लापरवाही समझ में आने लगती है। लेकिन उस समय तक इतने मन फट  चुके होते है। कि  वह उसकी मूल भूत  जरूरते पूरी नहीं करना चाहती बल्कि उसका दिल पत्थर बन चुका  होता है। वह उसकी बीमारी में भी उसकी देखभाल करने के लिए तैयार नहीं होती है। 

       उसके सुख -दुःख उसके लिए कोई मायने नहीं रखते बल्कि उसे दुखी देखकर उसे आत्मिक ख़ुशी महसूस हो रही होती है। वह मन ही मन दोहराती है- जैसे को तैसा होना  चाहिए। वह अब पथरदिल बन होती है। 

       समाज के सामने काम से बचने के लिए   बीमारी का बहाना ढूंढने लगती है। भले ही छोटी सी बीमारी हुई हो वह उसे बड़ा कर  दिखाती  है ताकि समाज के काम न करने के तानो  से बच सके। धीरे -धीरे उसे काम न करने पर आनंद की अनुभूति होने लगती है।  वह काम न करके हर समय बिस्तर पर पड़े  रहना पसंद करने लगती है। 

        कोई भी तभी काम करना पसंद करता है। जब उसे अपने काम  का  फल अच्छा दिखाई दे रहा होता है। लेकिन जब उसके किये हुए काम के कारण कुछ भी सही होता नहीं दिखाई दे रहा होता है तब वह भी काम से बचने के लिए बीमारी का मकड़जाल बुनने लगती है। एक दिन यही  कल्पनाये उसे लुभाने लगती है। क्योंकि अब कोई भी उसे कामचोर नहीं कह रहा होता है। बल्कि हर एक उससे सहानुभूति दिखा रहा होता है। 

      किसी को ऐसी मानसिक स्थिति में पहुंचाने  से अच्छा है। सही समय पर उसके व्यवहार में आये बदलाब का कारण समझ लो क्योंकि एक दूसरे के लिए काम करने से प्यार बढ़ता है। काम से बचने पर वही इंसान  धीरे -धीरे पत्थरदिल होता चला जाता है। उसमे संवेदनाये खत्म होती चली जाती है। 

       इसलिए कहा जाता है -तन को छूने से ज्यादा जरूरी मन को छूना  है। जिसके मन पर अधिकार कर लोगो आपको  अपने सामने संसार की सारी  सुंदरता बिखरी नजर आने लगेगी।  अब वह वक्त नहीं रहा जब आप किसी को डरा कर काम करवा सको बल्कि उसे  शब्दों से आहत होने से बचाओ। तलवार के घाव से  ज्यादा शब्दों के घाव खतरनाक  होते है। 

# age difference

                उम्र का अंतर 

  हम सारी  दुनियां को अपने इशारो पर चलाना  चाहते है। लेकिन सारी  दुनियां तो क्या हम परिवार के कुछ लोगो को भी अपने हिसाब से चला नहीं पाते  है। उनसे काम करवाते समय  हमारे तरकश में रखे सारे   तीर बेकार चले जाते है। हम सामने वाले को गलती करने से रोक नहीं पाते  है। 

          उम्र का अंतर मायने रखता है लेकिन सभी बड़े लोग बेबकूफ  नहीं होते उनका अनुभव सामने वाले को गलतियां करने से रोक रहा होता है। चाहे जवानी में भले ही बड़ो ने वे गलतियां की हो लेकिन उन्होंने अपने अनुभव से जाना होता है।   गलतियों के परिणाम भयानक होते है। वे अपने प्रिय को वे गलतियां नहीं करने देना चाहते है। उन्हें रोकने के भरसक प्रयास करते है। यही वे दूसरो की आँखों में खटकने लगते है। 

        अपने माँ -बाप या सास -ससुर कभी भी बच्चो का बुरा होता नहीं देख सकते है। जिन्हे हम सास -ससुर कहते है वे भी तो आपके साथी  के माँ -बाप होते है। उन्होंने भी बच्चे की परवरिश करते समय अपने आराम से समझौता किया होता है। उनकी आधी  जिन्दगी   बच्चे की परवरिश में बीती होती है। जैसे अपने अभिभावकों के कार्य हमे दिखाई देते है। वैसे दूसरो  के कार्य देखने की कोशिश करनी चाहिए। 

        बुढ़ापे में सबका शरीर कमजोर हो जाता है। इसलिए अपने  जैसे जोश की उम्मीद न करे तभी बेहतर है। उनका दर्द भी समझने की कोशिश करनी चाहिए। पहले समय में लोग सास -ससुर की कमियां निकालते  थे                        आजकल के बच्चे अपने अभिभावकों की कमियां सामने लाने  में पीछे नहीं रहते। उन्हें इसका अहसास नहीं होता। अभिभावक तन ,मन और धन का इस्तेमाल अपने से ज्यादा अपने बच्चो पर करते है। एक बच्चा होने के बाद सारी  जिंदगी अपनी इच्छाओ पर रोक लगाकर केवल बच्चे की जरूरत पूरी करने में लगा देते है। 

         उनके लिए जितना उनके अभिभावक करते है। उतना उनके लिए कोई नहीं कर पाता। वे दूसरो  के किये एक काम की सराहना करते रहते है लेकिन वे अपने बड़ो के अनेक कामो को उनका फर्ज कहकर नकारते देर नहीं लगाते। फर्ज केवल उनके लिए होता है जो मानते है। यदि वे भी अपनी सुखद जिंदगी के लिए  आपको नकार देते तब सोच कर देखो आपकी जिंदगी कैसी  होती।  

       उम्र को सम्मान देने में बुराई नहीं है। सभी को अपनी क्षमता के अनुसार काम करना चाहिए। रिश्तो पर अधिकार समझ कर हाथ पर हाथ रखने   से किसी का भला नहीं होता है। जो जितना काम करता है। उतनी ही उसकी कीमत होती है। वरना आजकल  किसी स्वस्थ इंसान को बैठा  कर खिलाने  वाले नहीं रहे है।

         दूसरो  का सहारा बनो दूसरो  में सहारा मत ढूंढो। वरना  जीना मुश्किल हो जायेगा। काम करते लोग सभी को अच्छे लगते है। जिनके लिए काम करना पड़ता है। आज के समय में उसे विदा करने में लोग देर नहीं लगाते   है।      


#time to take care of relationships

      

 रिश्तो को संभालने के लिए समय की जरूरत होती है 

इंसान जिस रिश्ते में रह रहा होता है। हमेशा उसे बुरा समझ रहा होता है। उसके मन में उससे निकल कर आजाद रहने की इच्छा बलबती है। उससे निकलने के बाद उसे लगता है उसके जीवन में हर तरफ खुशियां ही खुशियां होंगी लेकिन ऐसा नहीं होता है। जैसे रस्सी टूटने के बाद  उसका अधूरा पन मन को  दुःख देता है। वेसे  ही रिश्ते का अधूरापन हमे सोचने  के लिए मजबूर कर देता है। क्या सारी  गलती केवल दूसरे की थी। या हम ही उस डोर को सही तरह से पकड़ नहीं सके। 

         हर रिश्ते के टूटने पर काफी समय बाद हमें दोनों ही तरफ की गलतियां नजर आ रही होती है। रिश्ते तोड़ते समय हमारा अहम सबसे बड़ा लग रहा होता है। जब सब कुछ टूट जाता है। रिश्ते का कोई किनारा नजर नहीं आ रहा होता है। तब आइना साफ होता है।  उस साफ  आईने  में अपनी सही तस्वीर नजर आती है। जब गुस्से में भरे होते है तब केवल  सामने वाले  की गलतियां दिखाई  देती  है। हमें हर रिश्ते को समझने के लिए समय की  जरूरत  होती है। इसलिए रिश्तो को तोड़ने से पहले कुछ समय के लिए भूल जाना चाहिए। क्योंकि समय बाद वही रिश्ता अच्छा लगने लगता है। 

        

#WHERE IS THE FEELING OF HAPPINESS

                         सुख का अहसास कहाँ 

  जब हम किसी से नफरत करते है तब उसकी शक्ल भी देखना नहीं चाहते है। उसके सामने आने पर उन्हें बददुआ  देने से भी नहीं चूकते। दिन रात  उसके बारे में बुरा सोचते रहते है। उसके लिए भगवान  के सामने झुक कर मनौती मांगते है। वह हमारे रास्ते  से हट  जाये या   उसे मौत आ जाये। 

       लेकिन जब उसकी मौत हो जाती है तब हम  खालीपन महसूस करने लगते है। उसे माफ़ न करने के लिए खुद को दोष देने लगते है। लेकिन वह वक्त वापिस नहीं आता है। हम हमेशा यही सोचते है। जो हमारे पास है वह हमेशा रहेगा। लेकिन मौत ऐसा सच है। जो हमें हिला देता है। 

         जब किसी की मौत हो जाती है। वह अंतिम समय तक हमसे माफ़ी मांग रहा होता है। तब हमे अपनी गलती का अहसास होता है। यदि हमने उसके सामने उसे माफ़ कर दिया होता तो शायद वह इस दुनियां में होता। उसके जानने वाले उसके साथ सुखद जीवन बीता रहे होते। लेकिन न हम उसके साथ  सुखद जीवन बीता सके,उसके अपने भी उनके साथ से महरूम हो गए। हमारा फूट -फूट  कर रोने का मन करता है। दीवारों से सिर  टकराने का मन करता है। जोर -जोर से चीखने का मन करता है लेकिन हम घुट कर रह जाते है। ये ऐसा सच जिसे नकारा नहीं जा सकता है। जिसे बदला नहीं जा सकता है।  

        ये अहसास हमें दिन रात  आराम से रहने नहीं देता है। रात  को सोते हुए भी वही सपने में दिखाई देता रहता है। हम उसके पास जाना चाहते है लेकिन वह हमारी पहुंच से बहुत दूर जा चूका होता है। उसकी मौत के बाद हम बरसो तक साधारण जिंदगी नहीं जी पाते  है। 

       लोग उसकी याद  में जब आंसू बहा रहे होते है। तब हम सबके सामने आंसू भी नहीं बहा पाते  .क्योंकि शब्दों के माध्यम से हम हमेशा उसके प्रति नफरत भरी बाते  करते रहते थे। भले ही उसके प्रति मन में नफरत से ज्यादा प्यार भरा था।  

      नफरत उसी इंसान से की जाती है। जिससे हम जुड़े होते है। संसार में करोड़ो लोग है। उनके बारे में कभी सोचते भी नही है।

         जिनसे हमारी जरूरते जुडी होती है उनसे ही शिकवे -शिकायते होती है। वह इंसान कितना भी हमारे हित  के काम करे लेकिन उसके हर काम में कमियां दिखाई देती है। ये इंसानी फितरत है।

         इंसान  खुद जब काम अपने लिए करता है  तब भी उसमे कमियां दिखाई दे रही होती है। लेकिन अपने किये काम में हम खुद गलती निकालेंगे तब दूसरो से क्या उम्मीद करे।  वे तो अनगिनत गलतियां निकालेंगे। ये सोच कर चुप हो जाते है लेकिन दूसरो  के किये काम में कमियां अपने आप दिखाई देने लगती है। वह इंसान भले ही हमारे मन -मुताबिक काम करे लेकिन हम संतुष्ट नहीं हो पाते  है। इसे मैने  अनेक बार देखा है।

       मुझे कभी कोई बाहर वाला संतुष्ट नहीं कर सकता है। संतुष्टि का अहसास मुझे अपने अंदर से लाना होता है। 

       संसार में जो लोग खुश रहते है। वे किसी दूसरो  के दिए सुख से नहीं  बल्कि अपने अंदर की सुख की अनुभूति से  खुश होते है।   आप अपने अंदर के सुख को पहचानिये। वह दूसरो  के देने से कभी नहीं मिलेगा।

       मुझे हमेशा दूसरो  को ख़ुशी देने से सुख का अहसास होता है। आप अपने अंदर किस बात से खुश होते है सोच कर देखिये। सच्ची ख़ुशी तभी मिलेगी। 

#LIFE BURNING IN THE FIRE OF HATRED

          नफरत की आग में जलती हुए जिंदगी 

  लोग नफरत और प्यार में अंतर नहीं कर पाते  वे नफरत करने के अनेक कारण गिना देते है। लेकिन जिससे नफरत करते है। वे उसका 10  % मुश्किल से नुकसान पंहुचा पाते  है। जबकि अपना 90  % नुकसान पहुंचाते  है। आपको अजीब लग रहा होगा ऐसा कैसे हो सकता है। लेकिन यही सच्चाई है।  

          आप खुद सोच कर देखिये हम जिससे नफरत करते है उसके बारे में 24  घंटे सोचते रहते ही उसको ऐसा कहेंगे, इतना सुनाएंगे कि  उसकी आँखों में आंसू आ जाये। हमारे अनुसार हम उसे कई घंटे तक उटपटांग बोलते रहेंगे और वह सुनता रहेगा। लेकिन सच्चाई में ऐसा नहीं होता है। जब उसके पास पहुंचते है तब पता चलता है जिसे हम सुनाने के बारे में  घंटो सोच रहे होते है उसके सामने मुश्किल से दस मिंट बोल पाते  है जबकि हमने उसके बारे में सोचते हुए अनगिनत घंटे गुजार  दिए होते है ।  

      उन घंटो की बैचेनी याद  करके देखिये उस समय आपका खून खौल  उठता होगा। आपके मन में कोई हथियार उठा कर  घायल करने का मन करता होगा। लेकिन हम सभ्य प्राणी होने के कारण शब्दों के माध्यम से भी उसका उतना बुरा नहीं कर पाते  जितना सोच रहे होते है। 

         उसे सुनाने के बाद भी हमारे अंदर भरा हुआ गुबार खत्म नहीं हुआ। उसे सुनाने के बाद भी दिल का बोझ कम  नहीं हुआ। उसके बाबजूद हम खुद को अपराधी महसूस कर रहे होते है। क्योंकि बचपन से बुरा बोलने के संस्कार हमे नहीं मिले होते है। इसलिए  बुरा बोलने के बाद भी  ख़ुशी नहीं मिल रही होती है। बहुत कम  लोग होते है जो ईंट  का जबाब पत्थर से देकर खुश होते है। सभी ऐसे नहीं होते है।

          ग्रीक में एक कहावत है -यदि आप दुश्मन को मारने  जा रहे हो तो  पहले दो कब्रे खोद जाओ क्योंकि जब उसे मारोगे  तो सामने वाला  आसानी से मरने के लिए तैयार नहीं होगा वह तुम्हे भी नुकसान पहुंचाएगा। हो सकता है उससे पहले तुम्हे ही मौत आ जाये।

          यदि उसे तुमने मार  भी दिया तो कानून तुम्हे भी सजा देगा। किसी लाश को छुपाना आसान काम नहीं होता। गुस्से के कारण हम अपने प्रियजनो के बारे में नहीं सोच पाते  हमारे बाद उनका क्या होगा उनका जीवन कितना दुखदाई हो जायेगा। 

        इसलिए गुस्से और नफरत पर नियंत्रण करने से हम बहुत लोगो को दुःख की आग से बचा पाएंगे।   ये अपराधबोध कई दिन तक हमे तड़पाता  रहता है। इससे अच्छा है किसी के बारे में बुरा  सोचा ही नहीं जाये। 

 हम अपनी नफरत करने की आदत नहीं छोड़ेंगे तो एक दिन  सारी दुनियां में कमियां दिखाई देंगी। आप किसी को देखकर खुश नहीं रह पाएंगे।  जिसे भी देखेंगे आपको वह आपका बुरा करता हुआ प्रतीत होगा। जबकि ऐसा नहीं होता है। हमारे जीवन में बुरे लोग मुश्किल से १ % होते है 99  % हमेशा बुरे नहीं होते है। बल्कि  हमे उनसे काम लेना नहीं आता।

        हम चाहते है सारी  दुनियां हमारे हिसाब से चले लेकिन हर इंसान का जीने का तरीका अलग  होता है। वह अपने हिसाब से हमारा बुरा नहीं कर रहा होता है यहाँ तक की  उसे खुद  पता नहीं होता उसके व्यवहार से सामने वाले को दुःख पहुंच रहा है। वह केवल अपनी ख़ुशी ढूंढ  रहा होता है। उसकी ख़ुशी में किसी न किसी रूप में हम अड़चन बन रहे होते  है।  

  जो लोग हमेशा नफरत की आग में जलते रहते है उनका जीवन बहुत कम होता है क्योंकि नफ़रत करते समय हमारे शरीर के अंदर  बहुत सारे  बदलाव आते है। जिसके कारण चेहरे की रौनक खत्म हो जाती है।  समय से पहले बाल  सफेद हो जाते है। चेहरे पर झुर्रियां पड़  जाती है। रंग काला  पड़  जाता है। बुढ़ापा जल्दी दिखाई देने लगता है। शब्दों में कड़वाहट घुल जाती है। कड़वे शब्द बोलने वाले के पास कौन आना चाहेगा।  सब उसे देखते ही दूर होने की  कोशिश करेंगे। वह दोस्तों को ढूंढेगा लेकिन कड़वे शब्द सुनने के लिए उसके पास कौन आना चाहेगा।  समय से पहले  मृत्यु उसे  ले जाएगी। 

       आप सोच कर देखिये आपने नफरत करके किसे  नुकसान पहुंचाया ?

 

#HAPPINESS AND FAMILY

         खुशियां और परिवार 

            प्यार का अहसास बहुत सूंदर होता है। जो प्यार में डूबा होता है एक नयी उमंग    उसकी नसों में बह रही होती है। दुनियां  बहुत सूंदर लग रही  होती  है। हर तरह खुशियां ही खुशियां  बिखरी  हुई  होती है।  प्यार में  एक नशा होता है। जो दुनियां  के हर नशे  से बढ़कर होता है। 

         लेकिन   इंसान जिसके साथ रहता है  उससे   सबसे ज्यादा नफरत करता है। एक दिन  जिसे पाने के लिए दुनियां से लड़ जाता  है। कुछ  दिन बाद  उसकी शक्ल देखना  तक  पसंद नहीं   करता।  उसकी बाते  मन में कड़वाहट भर देती है। इसका असर सबसे ज्यादा आप  अपने आस -पास देख सकते हो।

        हर तरफ जो लोग परस्पर साथ रहते है उनके पास जाकर देखो जो भी रिश्ते है वे सब टूटने के कगार पर पहुंचे हुए है। उनके अंदर की सारी  मिठास गायब हो गई है। जो हमारे पास है उनसे दूर जाने के उपाय ढूंढे जा रहे है। हम एकरसता से ऊब चुके है। जो चीज हमे आज सूंदर लग रही है। वे भी कुछ समय बाद बेकार लगने लगेगी ये मानव फितरत है। 

         वे नहीं सोच पा  रहे दूर के ढोल हमेशा सुहावने होते है।  पास आकर जब वे ढोल बज रहे होते है तब लगता है मानो  कान  के परदे फट जायेंगे। ऐसा ही रिश्तो में होता है। माँ -बेटे , बेटी,सास -बहू  दमाद  , भाई -बहन और पति -पत्नी सभी रिश्ते जब साथ रहते है तब ये आपस में नफरत कर रहे होते है। सभी को दुसरो के रिश्ते में मिठास लग रही होती है। जो साथ रह रहे है वे भी खुश नहीं होते है वे केवल रिश्तो को निभा रहे होते है।  

        मन परिवर्तनशील होता है। हम बहुत जल्दी एक ही माहौल से ऊब जाते है। जैसे रोज -रोज घर का खाना ही  बेस्वाद लगने लगता है।और बाहर का खाना कहने के लिए उतावले हो रहे होते है।  जो रोज बाहर खाना खाते  है वे बाहर के खाने से ऊब जाते है। वो घर के खाने के लिए तरस  रहे होते है।  कितने भी सूंदर कपड़े हो उन्हें हम रोज नहीं पहन सकते। एक ही घर में रहते हुए वह घर जेल लगने लगता है। इसलिए हम अपनी ऊब को मिटाने  के लिए बाहर घूमने जाते है।

         जानवरो के अंदर ऐसी ऊब नहीं होती। वे सदा एक जैसा खाना खाते  है। एक ही माहौल में रहकर पूरी जिंदगी काट लेते है। इसे इंसान की खासियत कहूँ  या कमी। जो हर समय बदलाब के लिए छटपटाता रहता है।

       यदि ऐसे ही उनके माँ -बाप उन्हें छोड़कर दूसरे बच्चो को घर ले आये या उन्हें छोड़कर दूसरो  के घर रहने लगे। उनकी कोई जरूरत पूरी न करे। क्योंकि कोई अभिभावक जिम्मेदारी निभाना नहीं चाहता। क्योंकि शादी से पहले वे भी आजाद परिंदे थे। उन्होने  समाजिक बंधनो को स्वीकारा इसलिए अपने सारे  फर्ज पूरे  करते हुए कठोर परिश्रम कर रहे है। उनका मन भी घुट रहा होता है। 

      जो लड़कियां शादी से पहले आठ बजे उठ रही होती है। वे ससुराल में जाकर कैसे पांच बजे उठने लगती है।हर चीज मायके में उन्हें जगह पर मिलती थी. . उनका   सुबह उठ कर सबके फर्ज निभाते हुए कितना मन मसोसता होगा। वे शादी के बाद अपने लिए जीना भूल जाती है  फिर भी परिवार को परिवार बनाने के लिए अपनी सुविधाओं से ऊपर उठकर  सबको खुश करने की कोशिश कर रही होती है। क्योंकि परिवार तोड़कर सबकी आँखों में आंसू भर देना आसान है। लेकिन सबके  होठो पर ख़ुशी लाना आसान नहीं होता। वे पति ,बच्चे ,सास -ससुर, ननद   देवर ,भाई -बहन या माँ बाप हर रिश्ता निभाना चाहती है। हर रिश्ता  कुर्बानी  मांगता है। 

      कुर्बानी  हम इसलिए देते है।  क्योंकि हम सामाजिक प्राणी है। हर ख़ुशी ,गम बीमारी में हमें किसी के साथ की जरूरत होती है.खुनी रिश्तो में भले ही हम कड़वाहट महसूस करे। लेकिन अंतिम समय तक वे ही रिश्ते सबसे ज्यादा हमारे लिए बलिदान देते है। जिन बाहरी रिश्तो की तरफ भाग रहे होते है। वे पहले अपने परिवार को महत्व देते है उसके बाद हमारा नंबर आता है।

        हम खून के रिश्तो को कितना भी नकारे लेकिन सारी  जिंदगी उनसे ही हमारी पहचान बनती है।   जवानी के जोश में हम अकेले रहने की कल्पना कर सकते है। लेकिन बुढ़ापे में हमें परिवार की जरूरत पड़ती है। यदि हमने परिवार के लिए क़ुरबानी नहीं दी होती तो परिवार भी हमें भुला देता है। 

          ये आपकी मर्जी है आप  अपने अहम के साथ अकेला जीवन जिए या सबकी खुशियों में शामिल होकर हँसते हुए , खुद को भुला कर हँसते हुए जिए। कहते है। आप एक बार नकली हंसी हंस कर देखे थोड़ी देर में वही असली हंसी में बदल जाएगी। हमें हर रिश्ते की जरूरत होती है। जो सोचते है हम अकेले जी लेंगे बे झूठ बोल रहे होते है।    

# love and sex 5

                    love  and  sex 5 

       लड़कियों के अंदर परिवर्तन जल्दी आते है। जबकि लड़को के अंदर परिवर्तन देर से आते  है।  औरतो को अपने व्यवहार पर नियंत्रण करना सिखाया जाता है। परिवर्तन होने पर   अपने जोश पर लड़के अंकुश नहीं लगा पाते  है। तभी तो आपने बहुत बार छोटे लड़को को भी गलत हरकते करते देखा होगा। 
      यह इंसानो के अंदर ही नहीं बल्कि समस्त प्राणी जगत में देखा जा सकता है। हमेशा नर ही मादा को पाने की कोशिश करते दिखाई  देंगे। जबकि मादा ऐसा प्रयत्न करती दिखाई नहीं देती है।जबकि मादा को संस्कार देने वाला कोई नहीं होता है। ये सभी प्राणी जगत में व्याप्त है।  
     कई जानवर तो इसके लिए प्राणो की बाजी   तक लगा देते है।  हारने पर इतने घायल हो जाते है कि  उनकी जान तक चली जाती है। मतलब प्राणो का मोह भी रोक नहीं पाता  है ।
         इंसानो के लिए औरतो को पाने के लिए प्राण हथेली पर लेकर चलने की जरूरत नहीं पड़ती है। लेकिन इसके लिए सर्वस्व दाव  पर लगते देखा है। 
         आपने सरवना  रेस्टोरेंट के मालिक पी  राजगोपाल  का कारनामा सुना है या नहीं। उसने एक लड़की को पाने के लिए उसके पति को मरवा दिया। उसके बाद भी उस लड़की ने शादी करने से मना  कर दिया। बरसो तक अपने पति की मौत का बदला लेने के लिए मुकदमा लड़ती रही अंततः उसे जेल भिजवाने में कामयाब हुई। जबकि उस अमीर इंसान को अपने पैसे पर बहुत भरोसा था कि  किसी न किसी दिन ये झुक कर मुझे स्वीकार लेगी लेकिन वह ऐसा न कर सकी।
      हम कितने भी पर्दो के बीच  ढक कर रहे लेकिन वे ऊपरी सुंदरता बहुत कम  निहारते है। बल्कि जहां जिस रूप में देखना होता है  उसी रूप की कल्पना करने लगते है। आप सोच सकते है। वे औरत की कल्पना किस रूप में करते होंगे। उनसे रिश्तो के आधार पर कल्पना करने के बारे में मत सोचिये उनकी कल्पना दूरगामी होती है। 
          औरत का कोई रिश्ता नहीं होता, न कोई धर्म होता है। वह जिससे जुड़ जाती है। वही धर्म उसे अपनाना पड़ता है। आप अपने आसपास देखिये इसके बहुत सारे  उदाहरण आपको अपने आस -पास दिखाई दे जायेंगे। आपको दूर जाना नहीं पड़ेगा। 
        इसलिए मै  चाहती हूँ सपनो की दुनियां से बाहर निकल कर देखो। दुनियां तुम्हारी कल्पनाओ से बिलकुल अलग होती है।  सपनो की दुनियां में खोने वाले हमेशा धोखा खाते  है। मजबूत इंसान वही होता है जो यथार्थ के धरातल पर खड़ा होकर इंसानो को परख रहा होता है।
       सपनो की दुनियां बच्चो के लिए होती है। उनके हर सपने को सच करने के लिए बड़े हर समय तैयार रहते है  . बाकि दुनियां हर सपने को तोड़ने का कार्य कर रही होती है।   इसलिए सपनो से बाहर निकलिए। 

# love and sex 4

           love  and  sex 4 

              मेँ  बचपन से सुनती आयी थी। पति के आने का समय हो गया। अब काम छोड़ कर तैयार हो जाओ तब इसका कारण समझ नहीं आता था। बाद में देखा लड़कियां अपने साज - श्रृंगार पर बहुत पैसा खर्च करती है। उनका खाने पर जितना खर्च होता है। उससे ज्यादा उनकी सजावट पर पैसा खर्च होता है। हमेशा इसका कारण सोचती रहती थी। 
      कुछ दिन पहले मेरी सहेली से बात हो रही थी। उसने बताया   मै   बेटे से    बहू  के खर्चे पर बात कर रही  थी । मैने  उससे कहा  -तेरी बहु इतनी सूंदर है। वह इतना पैसा सुंदरता बढ़ाने पर क्यों खर्च करती है।   इसकी उम्र में भगवान  इंसान को सबसे सूंदर रखता है। अभी शादी हुई है। उसे beauti  पार्लर  वाली की इतनी जरूरत क्यों पड़ती है। उसने कहा -यदि सही से नहीं रहेगी तब मुझे अच्छी नहीं लगेगी। फिर मै  पैसे का क्या करूंगा। मुझे बहुत हैरानी हुए। उसके श्रृंगार पर खर्च होने वाला पैसा उसे जरूरी लगता है।
          आज सीधी साधारण घरेलु  मसालों  से महकी हुई  पत्नी की जगह, सुंदरता की पराकाष्ठा पर पहुंची हुई  बीबी सबकी चाहत है। हमेशा ही सुन्दर  औरते मन को लुभाती रही  थी।
   औरत की कमनीयता और कोमलता सदियों से उसके गुण  माने जाते है। आज भी सभी को ऐसी औरत की इच्छा होती है। हम कितने भी प्रगतिशील हो जाये। औरते पुलिस में जाये या फौज में घर में  उनकी कोमलता ही सबसे पहले मायने रखती है। 
    पुरुष अपना बाहुबल बढ़ाकर ,पैसे कमाकर  और औरते अपनी सुंदरता बड़ा कर  मनमाफिक जिंदगी जीती  है। सूंदर औरते अपनी सुंदरता के बल पर शक्तिशाली पुरुषो को झुकाने का माद्दा रखती है। इसलिए औरतो के लिए सुंदरता उनके हथियार के सामान है। जिसकी नोक हमेशा तेज रखने के जुगाड़ किये जाते है।
       जो औरते अपनी शादी होने के बाद लापरवाह हो जाती है। अपनी देखभाल करनी छोड़ देती है। बेडौल  होती जाती है उनके सफल  पति को भटकते देर नहीं लगती। उनका मन डगमगाता रहता है। उनसे वफ़ा की उम्मीद करना बेकार है। 
        आदमी प्यार पत्नी से कितना भी करे लेकिन एक नजर दूसरी पर मारते  देर नहीं लगती। जिनके पति सूंदर और सफल है  उनके सामने इस तरह की दिक्क़ते आती रहती है। असफल लोगो के जीवन से औरत का सुख भले ही  चला जाता है।  लेकिन सफल लोगो के आगे बहुत औरते रहती है। ऐसे में अपने परिवार को बांधे  रखने के लिए बहुत कोशिश करनी पड़ती है।   इसलिए लापरवाही सही नहीं है।  अब सामाजिक मापदंड भी बदल गए है।      

        

#LOVE AND SEX 3

       love  and  sex 3 

        आप प्राचीन ग्रंथो को  उठा कर देखिये। उसमे संसार बनाते समय भगवान  ने सबसे पहले पुरुष बनाये, जिनका नाम सनत कुमार रखा  था। उन्हे  संसार चलाने  का आदेश दिया लेकिन उन्होंने संसार में रहने को स्वीकार करने की जगह, संन्यास  धारण करके ,जंगल में जाना उचित समझा । इस तरह सात  बार सनत कुमार का निर्माण किया गया  लेकिन कोई भी संसार चलाने  के लिए तैयार नहीं हुआ। उन्हें संसार की कोई भी वस्तु  लुभा नहीं सकी.
      भगवान  परेशान हो गए तब उन्होंने आठवें  सनत कुमार के साथ एक औरत भी बनाई। तब उसने धरती पर रहकर गृहस्थ जीवन की शुरुरात की। अब आप इसके द्वारा समझ गए होंगे औरत आदिकाल से ही पुरुषो को लुभाने का काम करती आ रही है। 
      पहले जमाने में  पुरुष संन्यास  लेते थे.जब  उनकी तपस्या से इंद्रदेव का सिंहासन डगमगाने लगता था  तब वे अप्सराओ को तपस्वियों की तपस्या भंग  करने भेज देते थे। मैने  एक बार भी अप्सराओ को असफल होते नहीं सुना। वे उनकी तपस्या भंग  कर ही  देती थी। 
       आजकल आपने हनीट्रैप का नाम सुना होगा। जो काम  किसी पुरुष को किसी  भी लालच देकर नहीं करवाया जा सकता है  उसे सूंदर औरत  के माध्यम से  करवाया जा सकता है।  उसके लिए सूंदर औरतो का जाल  बिछाया जाता है।  आपने अनेक    हनीट्रैप के मामले  सुने  होगे । 
          उसमे फंसे हुए आदमी उससे निकलने में नाकामयाब होते है। उसमे फंसकर भले ही आत्महत्या कर  ले उनकी जिंदगी का मोह भले ही खत्म हो जाये लेकिन जिस मोहजाल में फंस गए होते है उसमे से निकल नहीं पाते  है  आप चाहेंगे तो जान जायेंगे, बहुत सारे  लोगो ने औरतो के कारण  सत्ता और जान दोनों ही दे दी है । 
       जितने लोगो ने औरतो के कारण जान दी है। उतनी जमीं और जायदाद के कारण भी नहीं दी है। 
           जिस औरत का कोई महत्व नहीं समझा जाता वह एक दिन लोगो के दिलोदिमाग पर हावी होकर उसका महत्व ही नगण्य बना देती है। उसकी सोचने समझने की शक्ति खत्म कर सकती है। उसके  सही गलत का निर्णय करने की क्षमता खत्म करवा देती है. धुरंधर लोग आदमियों की इस कमी का फायदा अनेक तरीके  से उठा कर सफल हो जाते है। 
     इसे इंसानी मनोविज्ञान का फायदा उठाना कहा जाता है। इंसान के मन को पढ़कर उसके अनुसार काम करवाना उचित है। उसे अपने मापदंडो के आधार पर काम करवाने वाले हमेशा असफल होते है।
        हम किसी को सही और गलत के मापदंडो के अनुसार काम नहीं करवा सकते है  .आजकल हर पढ़ाई  से ज्यादा महत्व मनोविज्ञान का हो गया है   .शिक्षा ,व्यापार  या किसी भी क्षेत्र की पढ़ाई  करते समय उसके मनोविज्ञान पर चर्चा जरूर होती है। सबसे अधिक सफल वही इंसान होता है जो मानव का दिमाग पढ़ना  जान जाता है। उसके अनुसार ही उम्मीदे लगाता  है।  

# love and sex -2

           love and sex 2

       मैने कई साल पहले जब   अफ़ग़ानिस्तान में औरतो के लिए एक आर्डर पास होते देखा तो मै  बहुत हैरान हो गई थी। जिसमे कहा गया था -"जो औरते अपने  पति की इच्छा पूरी करने  से  आनाकानी करें तो उन्हें खाना न दिया जाये।" सुनकर मुझे यकीन  नहीं आया था।
       किसी मुस्लिम देश में औरतो के पास अधिकार नहीं होते ऐसे में  कोई औरत पति को जब मना  करती होगी तो किसी  विवशता में मना  करती है तो इसका कारण जानने की भी किसी ने जरूरत नहीं समझी। सीधे वहां की संसद में बिल पास करवा दिया। उनके लिए औरत की खाने की भूख और आदमी की शारीरिक भूख एक समान है। 
      मैने  अभी 8  जनबरी को कोरिया देश में सेक्स गुलाम के बारे में सुना मुझे बहुत हैरानी हुई। वहां सन  1910  से 1946  तक कोरिया और  चीन  जैसे देशो से गरीब घरो की लड़कियों को नौकरी के बहाने  झूठ बोलकर  जापान ले जाया जाता था। वहां उनके सैनिको के हवाले कर दिया जाता था। इसे कम्फर्ट स्टेशन कहा जाता था।  ये सेनिको के लिए कम्फर्ट था तो उन लड़कियों के लिए क्या था। जब उन्हें अनगिनत सैनिको को शांत करते हुए, खुद हमेशा के लिए शांत हो जाना  पड़ता था । उनका दर्द किसी ने नहीं समझा।  वे उनका जानवरो के समान इस्तेमाल करते थे। 
        दूसरे  विश्व युद्ध के बाद  भी इनका इस्तेमाल मित्र रास्ट्रो  के सेनिको ने किया। उन्हें बंद नहीं किया गया था बल्कि एक साल बाद जब खबरों में इनकी भयानक खबरे सामने आयी तब उन लड़कियों को वहां से आजादी मिली थी।
       सं 1990  से अब तक उनके लिए आवाज उठाई जाने लगी  अब जाकर जापान सरकार    उन्हें इसके एवज में मुआवजा देने के लिए तैयार हुई  है। लेकिन इस हैवानियत के बदले जो दिया जा रहा है। वे नाकाफी है।   इस जुल्म का शिकार होने वाली 90  %  औरते  अब तक मर चुकी है। उनकी चीखे उस समय सुनकर किसी को उनसे सहानुभूति हुई होगी ?नहीं कभी नहीं। 
       सबसे पहले जब जापानी सैनिक हारे हुए देश की   आम जनता की औरतो के साथ बदसलूकी करते थे तब वहां के राजा ने कहा-" इन सेनिको को कम्फर्ट स्टेशन में भेज दिया जाये ताकि उनके हैवानियत भरे कर्म आम जनता के सामने खुलने न पाए। "  इससे  उन्हें अपमान महसूस होता था। लेकिन कम्फर्ट स्टेशन की लड़कियों पर कितना भी जुल्म होने पर  उनकी फरियाद सुनने वाला कोई नहीं था।  
        जिन भी देशो में आक्रमण होता है उन हारे  हुए  देशो  की औरतो के साथ ऐसा ही बहशियाना सलूक किया जाता है। जो आदमी अपने घरो में सभ्य होते है उनकी विपरीत परिस्थिति में व्यवहार एकदम बदल जाता है।
        जर्मनी के हिटलर को जितना बहशी समझते है।  उससे ज्यादा जब जर्मन और जापान हार गए थे तब उनके देशो की औरतो  के साथ मित्र राष्ट्रों  के सैनिको ने  ऐसे अमानवीय व्यवहार किये थे जिनसे रूह कांप  उठती है। 
     आज भी जितने हारे  हुए  देश  है उनकी औरतो के बारे में जानकारी हासिल करके देखिये  उनके अस्तित्व के मायने ही खत्म हो जाते है।
       ऐसे सम्बन्धो से पैदा हुए बच्चो  को माँ भी स्वीकार नहीं कर पाती क्योंकि उनको देखते ही उनके सूखे हुए घाव हरे हो जाते है. 
    मेँ    इंसानी फितरत को  बदलने के लिए मुहीम नहीं चला रही हूँ बल्कि आपके सामने केवल सच्चाई ला रही हूँ  आदमी  प्यार और शारीरिक सुख  दोनों में अंतर् नहीं कर पाते  है। उनके लिए ये जरूरत होती है 
     

# love and sex

              love  and  sex

       आदमियों और औरतो का मानसिक विकास अलग तरीके  से होता है। औरते हमेशा पूरे  परिवार के बारे में पहले सोचती है। जबकि आदमी अधिकतर अपने आप को महत्त्व देते है। उनकी जरूरते सर्वप्रथम पूरी होनी चाहिए। उसके बाद वो अन्य  को महत्त्व देते है.
      उनके लिए औरत से प्यार का मतलब सबसे पहले उसका शरीर आता है। उनकी पत्नी यदि उनसे दूर हो, तब भी, उनके लिए जरूरत पूरी करने के लिए किसी और से सम्बन्ध बनाते समय वे खुद को अपराधी महसूस नहीं करते। उन्हें कितना भी अहसास दिलाओ तब भी उन्हें लगता है। मेरी पत्नी मेरी जरूरत पूरी नहीं कर पाती  तो इसे कही से भी पूरी करूँगा। 
      आपने पति ,पत्नी और वो जैसे विषय पर अनेक कहानियां और फिल्मे देखी  होंगी। उनके लिए अपनी सर्वगुणसम्पन्न पत्नी का अधिक महत्व नहीं होता बल्कि दूजी होनी चाहिए कैसी भी चलेगी ।  इसका मतलब है अपनी पत्नी के आलावा कोई भी चलेगी। उससे प्यार करे या न करे। उसके शरीर से मतलब होता है। 
      मेरी एक सखी ने अपने पति से पूछा-" तुम मेरे आलावा किसी सफाई कर्मचारी से भी सम्बन्ध बना सकते हो।" उन्होंने कहा - "हाँ। उसके और तुम्हारे चेहरे में ही तो अंतर है बाकी  सब कुछ समान है।"
   उसके पति और वह दोनों विनोदी स्वभाव के थे। वे लोग बड़ी से बड़ी बात हँसते हुए कह जाते थे। उसे मन से नहीं लगाते  थे।  मै  उनकी बात सुनकर हैरान हो गई ,क्योंकि मेरे  दिल को ठेस लगी थी। मुझे सच्चाई में आज भी नहीं पता उन्होंने ऐसा किया था या नहीं। लेकिन इससे उनकी मानसिकता उजागर हो गई। 
      पति अपनी पत्नी से कितना भी प्यार करे लेकिन उनके लिए दूजी को देखकर फिसलने में देर नहीं लगती। . हम रामचंद्र जी को बहुत महत्व देते है क्योंकि उन्होंने एक पत्नीव्रत का पालन किया था। बाकि इतिहास में  हर जगह आपको एक से ज्यादा पत्नी  देखने को मिल जाएँगी  जिनके बारे में आप एक पत्नी जानते हो उनके बारे में गहराई में जाने पर उनकी भी एक से ज्यादा पत्नी मिल जाएँगी। 
    आदमियों का तनाव दूर हो जाता है उन्हें सुख और दुःख दोनों समय में औरत का साथ चाहिए होता है।  आदमियों के लिए प्यार का मतलब मन की गहराई से नहीं होता बल्कि तन की गहराई से होता है। वे भले ही जिंदगी में एक औरत से प्यार करे लेकिन उनके जीवन में   किसी न किसी रूप में अनेक औरते आयी होती है।
     मैने  ऐसे ही एक इंसान से मिली जिन्होंने साठ  साल की उम्र में पहली  शादी की थी। वे ब्रह्मचारी कहलाते थे।   उनकी पत्नी ने एक दिन उनसे पूछा -"तुम्हारे मुझसे पहले  किसी अन्य औरत से सम्बन्ध बने थे। उन्होंने हँसते हुए कहा-" इसका जबाब देना ठीक नहीं है आगे से इस तरह के सवाल पूछना भी मत। " आप इसका जबाब खुद ढूंढने की कोशिश करके देखिये। 
     इसलिए प्यार को वासना के तराजू पर तोलने का मतलब ढूंढने पर हाथ खाली  रह जायेंगे। आपको  आज के समय में अनेक उदाहरण मिल जायेगे। 
       

     





#DIFFERENCE BETWEEN EMPATHY OR SYMPATHY

          DIFFERENCE  BETWEEN     EMPATHY OR    SYMPATHY  

      हम सबसे सिम्पथी  चाहते है। सारी  जिंदगी सहानुभूति पाने की कोशिश करते रहते है। लेकिन सभी लोग हमे मन के मुताबिक प्यार दुलार नहीं कर पाते। जिसे पाने के लिए हम तरस  रहे होते है। हमें सभी के अंदर कमियां नजर आ रही होती है। हम हमेशा चाहते है सामने वाला हम जैसा चाहते है वैसा करे। यदि उसके मुताबिक नहीं हो पाता तब हम उसके द्वारा किये गए सारे अच्छे   कामो को नकारने में देर नहीं लगाते  है। उसे छोड़ने  से भी नहीं डरते।
         बहुत ज्यादा चिड़चिड़े और दुनियां को कोसने में देर नहीं लगाते। हम नहीं सोच पाते  जिनके बारे में अपशब्द बोल रहे है। उनके अंदर भी दिल है जो प्यार और दुलार पाना चाहता है। दुनियां हमारे आलावा भी है। हम भी अन्य को दुःख दे सकते है  
       जिसके साथ हम रहते है। यदि आप ताकतवर और प्रसिद्ध हो तब तुम्हे दुःख देने से पहले लोग कई बार सोचते है। लेकिन कई बार सामने वाले की भी मजबूरी होती है। जब वह हमारे मन मुताबिक नहीं कर पाता।
           हमारी और सामने वाले की हालत में बहुत अंतर् होता है। उन हालातो के बीच  में रहते हुए हम भी शायद उसके अनुसार ही निर्णय ले। लेकिन हम सामने वाले के निर्णय को अपने हालातो के मद्देनजर रखकर तय करते है। इस कारण हम सही तरीके से इंसाफ नहीं कर पाते। 
      बाद में  सामने वाले और खुद को सारी  जिंदगी कोसते रहते है। जब हमने ऐसा कदम नहीं उठाया ,तब तुमने क्यों उठाया। तुमने उठाया इसलिए  तुम सबसे बुरे  इंसान  हो। तुम्हे तुम्हारी गलती के लिए माफ़ नहीं किया जा सकता। 
       तुम्हे  भले ही  माफ़ न करने के कारण हम सारी  जिंदगी तुम्हारी और  अपनी भी दुःख में बीता दे।  लेकिन तुम्हे  माफ़ नहीं करेंगे ।
            मैं कभी भी निर्णय लेने से पहले जिस इंसान से नफरत करती हूँ पहले खुद को उसकी जगह रख कर देखती हूँ। हर इंसान में कमी होती है। हर इंसान सारी  जिंदगी सही निर्णय नहीं ले सकता। सभी से गलतियां होती है।  जब गलतियां समाज के सामने आ जाती है। सामने वाला उसके लिए माफ़ी मांग ले। तब उसे एक बार मौका जरूर देना चाहिए। 
         कुछ गलतियां चोरी -छिपे की जाती है। जिसके बारे में सभी सोचते है ये किसी को पता नहीं चलेंगी। आपने सुना होगा निषिद्ध फल खाने में बहुत मीठा होता  है। लेकिन हम अपने आप पर नियंत्रण इसलिए रखते है क्योंकि इसके उजागर होने पर जिस निंदा का सामना करना पड़ता है। उसे सहन करना हर किसी के बस का नहीं होता है।           जब तक उन्हें उजागर नहीं करो तब तक इंसान बेधड़क ऐसा करता जायेगा लेकिन समाज के सामने आने पर लोग अपने को लोगो की निगाहो से गिरते हुए देखना पसंद नहीं करते। क्योंकि सभी अच्छे काम हम समाज के सामने खुद को सही साबित करने के लिए करते है। अच्छे कामो को करने के लिए हमें अपने तन और मन  को बहुत तकलीफ देनी पड़ती है।  इसलिए लोगो की गलतियां समाज में लाने  के बाद उन्हें एक बार और मौका दिया जाना चाहिए। 

#FLOWING PAIN OF TEARS

             तलाक श्रृंखला   

         बहते हुए आंसुओ का दर्द 

जिंदगी खत्म हो जाती है। लेकिन घमंड से पनपा गुस्सा कभी खत्म नहीं होता है। हम जिस पैसे की खातिर रिश्तो को महत्व नहीं देते वही रिश्ते एक दिन खत्म हो जाते है। मै  ऐसे ही एक दम्पत्ति की दास्ताँ सुनाने जा रही हूँ। जिसका पैसा किसी काम नहीं आया। वह अपनी सरकारी नौकरी के कारण पति के साथ न रह सकी. और मरने के बाद जिनको पैसा देने का सोचा था वह पैसा उन तक भी नहीं पहुंच सका। 

        सरकारी नौकरी छोड़ने की हिम्मत बहुत कम  लोगो में होती है। ऐसा ही मेरी सखी के साथ हुआ। उसे दिल्ली में रहते हुए अलीगढ़ के एक वकील से शादी करनी पड़ी। उसने शादी के जोश में दो साल तक छुट्टी ले ली और शादीशुदा जिंदगी की खुशियों में डूब  गई।

         कुछ भाग्यवान  जिंदगी की शुरुरात में बच्चो का  सुख पा  लेते है। कुछ के नसीब में ये सुख नहीं होता। नौकरी वालो को साधारण औरतो से ज्यादा काम करने की आदत होती है। वे केवल घर की चारदीवारी तक सीमित  होकर घर का काम करते हुए  जिन्दा नहीं रहना चाहती। उनका मन घर में नहीं लगता। यदि उन्हें घर में औसत से ज्यादा काम मिले तभी उन्हें अपने जीवन का मतलब समझ आता है। वरना  चारदीवारी उन्हें काटने लगती है। उन्हें जिंदगी बुरी लगने लगती है। 

        स्मिता ने दो सालो में पति को दिल्ली आकर वकालत करवाने के लिए बहुत मनाने  की कोशिश की लेकिन वह इसके लिए तैयार नहीं हुए।  क्योंकि अलीगढ़ में उनकी वकालत अच्छी चलती थी। वे दिल्ली आकर फिर से शुरुरात करने से डरते थे। 

         उसने बच्चे न होने पर फिर से नौकरी शुरू कर दी। लेकिन स्मिता के पति पर कोई असर नहीं हुए। उसके पति कभी दिल्ली नहीं आये। काफी समय तक स्मिता अपने पति के पास हर छुट्टी में जाती थी। लेकिन उसके पति कभी उससे मिलने नहीं आये। 

        स्मिता की अच्छी आमदनी थी लेकिन पति के अभाव  में वह सही तरह से जीवन न जी सकी। एक गरीब इंसान की तरह मूल सुविधाओं के साथ जीवन जीती रही। जबकि उसके पति और उसकी बहुत अच्छी आमदनी थी उसके बाबजूद अलीगढ़ में उसके पति मजबूर जिंदगी जीते रहे। वह दिल्ली में सुविधा विहीन जिंदगी जीती रही।                 उसने कभी अपने ऊपर सही से पैसा खर्च नहीं किया। उसके मन में सदा रहा, उसके दुनियां से जाने के बाद सारा पैसा उसके नॉमिनी को मिलेगा।लेकिन सोचा हुआ हमेशा पूरा नहीं होता है ऐसा ही उसके साथ हुआ। वह समय से पहले दुनियां से चली गई।  स्मिता को दुनियां छोड़े हुए कई साल बीत चुके है। लेकिन उसके पैसो  का कोई फैसला नहीं हुआ है क्योंकि कागजो में नॉमिनेशन नहीं था।  

      मुझे आज भी उसकी मेहनत और पैसे  कमाने के मायने समझ नहीं आते। वह पूरी जिंदगी सभी सुख से महरूम रही ,इसी  पैसे की खातिर;  लेकिन पैसो  का भी सही फायदा नहीं उठा सकी. जिंदगी में यदि उसके पति दिल्ली आकर वकालत करने की कोशिश करते तो शायद अलीगढ़ जितनी शौहरत न कमा पाते।  लेकिन एक सुखी जिंदगी जी सकते थे। उन दोनों का आखिरी समय तक तलाक नहीं हुआ था लेकिन उन्होंने तलाक से बदतर जिंदगी जी। 

       उनके घमंड ने उन्हें पत्नी  के अंतिम संस्कार में आने से भी रोक दिया। जबकि दोनों ने दूसरी शादी कभी नहीं की। 

         उसकी नौकरी का पैसा दिलवाने के लिए अब वे  स्मिता की तरफ से मुकदमा लड़ रहे है.यदि उन्होंने उसके बहते हुए आंसू  पहले देख लिए होते तब दोनों सुखी होते। स्मिता जिंदगी की खुशियों का सपना लिए दुनियां से रुखसत नहीं करती। 

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...