डर की इन्तहा
करोना काल में मजदूरों के प्रवास के बारे में हर तरफ चर्चा हो रही है। लेकिन ऊँची नौकरी करने वाले भी अपने परिवार से कई महीनो से दूर है। उनकी चर्चा कोई नहीं कर रहा। वो भी अपने परिवार से मिलने के लिए तड़प रहे है।
जब कल हवाई उड़ान चालू हुई तो सरकार की तरफ से बहुत सारी पाबंदिया लगाई गई है उनमे से एक बानगी आपके सामने पेश कर रही हूँ।
मेरे सामने ऐसे लोगो ने अपना परेशानी बतायी ।
लोग कहते थे। उनके परिजन ने उनके परिवार के सदस्य के मुँह पर तकिया रख कर मार दिया। उनकी दम घुटने से मौत हो गई।
करोना के कारण लोग बहुत सावधानी वरत रहे है। एयर इंडिया जैसी एयरलाइन्स में चढ़ते समय NH 95 मास्क होना जरूरी है। इसमें हवा आर -पार नहीं होती। उसके वाबजूद लोग सावधानी वश उस पर दुप्पटे को भी प्रयोग कर रहे है। एयरलाइंस वाले एक प्लास्टिक शीट भी इस्तेमाल करवा रहे है।
इतनी अधिक सावधानी में इंसान की हालत दमघुटने जैसी हो जाती है। वह कोई और नहीं हम खुद अपना दमघोट रहे है।
इन सब का प्रयोग देख कर लगता है बचपन में मुँह खुला रखने की सीख बेकार दी गई। इसे कहते है डर की इंतहा।















जब मेने इन मंदिरो के बनने का कारण जाना था तब मुझे विश्वास नहीं हुआ था। लेकिन आज हम उस सच्चाई पर विश्वास करने की स्थिति में है।
नेतृत्व के गुण सभी में नहीं होते है। जिसमे होते है वे बचपन से दिखाई देते है। पिछले दिनों मेरी किसी से बहस हो रही थी। उन्होंने कहा - " भारत की सारी जनता काम करती है लेकिन सारा श्रेय मोदी जी ले जाते है। "
सरकार की तरफ से आम जनता को कोरोना योद्धाओ को सम्मान देने हेतु घंटी ,शंख,ताली , थाली बजाओ आदि काम सौपे गए थे। एक दिन दीप जलाने का काम दिया गया। आज मेने वायुयानों के द्वारा पुष्पवर्षा करते देखा। मुझे बहुत ख़ुशी हुई।