#HORREBAL SITUATION IN CORONA

                          डर  की इन्तहा 

   
   करोना काल  में मजदूरों के प्रवास के बारे में हर तरफ चर्चा हो रही है। लेकिन ऊँची नौकरी करने वाले भी अपने परिवार से कई महीनो से दूर है। उनकी चर्चा कोई नहीं कर रहा।  वो भी अपने परिवार से मिलने के लिए तड़प  रहे है।
         जब कल हवाई उड़ान  चालू हुई तो सरकार की तरफ से बहुत सारी  पाबंदिया लगाई गई है उनमे से एक बानगी आपके सामने पेश कर रही हूँ। 
       मेरे सामने ऐसे लोगो ने अपना परेशानी  बतायी ।
       लोग कहते थे। उनके परिजन ने उनके परिवार के सदस्य  के  मुँह पर तकिया रख कर मार  दिया। उनकी  दम  घुटने से मौत हो गई। 
        करोना  के कारण लोग बहुत सावधानी वरत  रहे है। एयर इंडिया जैसी एयरलाइन्स में चढ़ते समय NH 95  मास्क होना जरूरी है। इसमें हवा आर -पार  नहीं होती। उसके वाबजूद  लोग सावधानी वश उस पर दुप्पटे को भी प्रयोग कर रहे है।  एयरलाइंस वाले एक प्लास्टिक शीट भी इस्तेमाल करवा रहे है। 
      इतनी अधिक सावधानी में इंसान की हालत दमघुटने जैसी  हो जाती  है। वह  कोई और नहीं हम खुद अपना दमघोट रहे है। 
         इन सब का प्रयोग देख कर लगता है बचपन में मुँह खुला रखने की सीख बेकार दी गई। इसे कहते है डर  की इंतहा।  



#FOOD HABBIT

                 
                                              खाने की आदते 

 
         मैंने एक परिवार  ऐसा देखा जहां घर के प्रत्येक सदस्य को उनकी खुराक से ज्यादा खाना दिया जाता था।  पहली बार मैने  जब उनके घर के प्रत्येक  सदस्य को आधा खाना छोड़कर, उठकर जाते देखा, तब मुझे बहुत हैरानी हुई। इसका कारण जानने  पर पता चला. ये शाकाहारी खाना नहीं खाते।
      उनके घर शाकाहारी खाना हमारे कारण बनाया गया था।  इसलिए उठ गए। मुझे बहुत दुःख हुआ वे एक समय भी शाकाहारी   खाना भरपेट  नहीं खा सके।
       उस इलाके के लोग अधिकतर मांसाहारी खाना खाते  है। इसलिए मुझे अजीब लगा ये लोग एक समय भी भरपेट शाकाहारी खाना पसंद नहीं कर सकते। ये लोग अमीर थे। इसलिए उनकी खाने की आदत उनका शौक लगा।
       कुछ दिन बाद मेरा वहां के साधारण लोगो के बच्चो  से वास्ता पड़ा। उनके अंदर भी यही भावना दिखाई दी , एक समय शाकाहारी खाना खाने के बाद, दूसरे समय उन्होंने शाकाहारी खाना खाने से मना कर दिया।
      दिल्ली में रहते समय मेरा वास्ता हफ्ते में एक दिन मांसाहारी खाने वालो से पड़ा था लेकिन पहली बार ऐसे लोगो से वास्ता पड़ा जो एक समय मुश्किल से शाकाहारी खाना खा सकते थे। दूसरे वक़्त शाकाहारी  खाने को देखकर भूखे रहना पसंद करते थे। बच्चो ने शाकाहारी खाने को देखकर रोना शुरू कर दिया।  हैरानी हुई क्या ?

#HELPLESSNESS

                      बेबसी का आलम 

       मजदूरों की बेबसी पर सबको तरस  आ रहा है। वे अपने पैरो  के भरोसे ,सेंकडो मिल की दुरी भूखे -प्यासे , अपने छोटे -छोटे बच्चो और गर्भवती महिलाओ के साथ तय  कर रहे है। किसी का बच्चा बीच  रास्ते  में पैदा  हो गया। कोई अपने दस दिन के बच्चे को हाथ में उठाये पैदल सफर कर रही है। जबकि कहा जाता है। एक औरत को बच्चे के जन्म के बाद  40  दिन का आराम करना जरूरी है। उनके परिवार के सभी सदस्यों  की बेबसी  मन को दुखी कर देती  है।
        अब बस और रेलगाड़ी चलने लगी है। उनका दुःख पैदल चलने वालो की अपेक्षा कम होना चाहिए लेकिन वे कभी गाड़ी देर से चलने पर ,कभी पानी की कमी के कारण और  कभी खाना नहीं मिलने के कारण तोड़ -फोड़ करने में लगे है। उन्हें आप क्या कहेंगे।
       दुखी इंसान के ऐसे समय में सिर्फ  आंसू बहते है। वे कई दिनों से भूख बर्दास्त कर रहे थे। एकाएक ऐसा क्या हो गया ,उनकी सहनशक्ति कैसे  खत्म हो गयी।
       ये गरीब मजदूरों का दर्द नहीं, बल्कि गुंडे -बदमाश उनके बीच  आ गए है। वे हालत को बदहाल करने में लगे है।
       मैंने गरीबो की बेबसी पर आँसू  बहते देखे है। यदि वे इतने गुस्सेबाज होते तब वे दूसरे शहरों में कैसे इतने दिन भूख सहन कर रहे होते।
       मजदूरों की आड़ में गुंडे सामने आ रहे है। या वे जो भारत की शांति को बर्दाश्त  नहीं कर पा रहे हे 

#DEATH IN THE AIR

                  हवा में उड़ती मौत 

    हम अपने घर में खिड़की दरवाजे बंद कर अपने को सुरक्षित समझते है। लेकिन वक़्त किस रूप में हमे तबाह करने आ जाता है। पता नहीं चलता।
        ऐसा ही पाकिस्तान में कराची एयरपोर्ट के पास हुए हादसे से पता चलता है। वहां के लोगो ने कल्पना भी नहीं की होगी, आज का दिन उनका अंतिम दिन होगा। वे सब ईद की खुशियों में खोये हुए थे। 
        प्लेन में आने वाले भी ईद मनाने के उद्देश्य से आये थे। उन्हें क्या पता था उनकी खुशियां मातम में बदल जाएँगी। 
    दुर्घटनाग्रस्त   रिहायशी  आबादी वालो के चेहरे पर हवाइयां साफ दिखाई दे रही थी। उनके लिए इस पर यकीन करना मुश्किल हो रहा था। वे बोलने की हालत में भी नहीं थे।
        टूटे हुए मकान, जलता हुआ सामान ,लोगो की लाशे देखकर कुदरत की ताकत के सामने इंसान का बौनापन साफ दिखाई देता है। 

#BIG HEARTED OR NARROW MINDED

                  बड़े दिल का या संकुचित 

          पुराने समय में बाहर के लोगो का सामान अलग रखा जाता था। उस समान को घर के लोग इस्तेमाल नहीं करते थे। इसे में जाति  व्यवस्था से सम्बन्धित समझती थी। मुझे उस समान को इस्तेमाल होने के बाद, उसमे क्या फर्क पड़ा, ये समझ नहीं आता  था।
      मुझे बड़ो के दकियानूसी विचार अच्छे नहीं लगते थे। बाहर वालो के जाने के बाद उन बर्तनो को साफ करके उसमे खाना खाकर देखती थी। ऐसा क्यों किया जाता है। लेकिन कुछ भी समझ नहीं आता था।
       अब कोरोना काल में उसका कारण समझ आ रहा है।  बड़ो से पूछने पर वे  सही जबाब नहीं दे पाते  थे।  सौ सालो में ऐसी महामारी नहीं फैली। इसलिए इसका कारण वायरस की जगह, छुआछूत ने ले लिया था।
        इसलिए बगाबत करने का मन करता था।
        कोरोना खत्म होने के बाद बर्षो तक, लोगो में समान के इस्तेमाल को लेकर ऐसी आदत, सभी में बन जाएगी। अब सभी खुद को  बड़े दिल का दिखाने की अपेक्षा संकुचित हो जायेंगे। 

#VIRUS IN THE ENVIRONMENT

             वातावरण में विषाणु 

 वातावरण में हर समय वायरस होते है। वे कम या ज्यादा होते है लेकिन खत्म कभी नहीं होते। ये जिनकी  प्रतिरोधात्मक शक्ति कम होती है। उसे बीमार कर देते है। जिनकी विषाणुओ से लड़ने की ताकत शरीर में होती है। उनपर कोई असर नहीं कर पाती
        आने वाले समय में कोरोना का विषाणु वातावरण और शरीर से खत्म नहीं होगा बल्कि हम अपनी प्रतिरोधात्मक शक्ति से उससे लड़ने की ताकत बढ़ा  लेंगे या बढ़ जाएगी।
                उसके लिए प्लाज्मा से इलाज किया जा रहा है। जो कोरोना से ठीक हो चुके हे उनमे विषाणु  से लड़ने की ताकत पैदा हो चुकी  है। उनका प्लाज्मा लेकर अन्य  रोगियों को ठीक किया जा   सकता है।
  

#SELF -RELIANT INDIA CAMPAINGN

                                आत्मनिर्भर भारत अभियान 

 
  आत्मनिर्भर भारत बनाने का सपना हमारे नेताओ ने देखा है। सभी आत्मनिर्भर होना चाहते है। लेकिन उसके लिए हमारी  सरकारी व्यवस्था  के काम काज को करने का तरीका  बदलना होगा।
         पुराने समय में सरकारी कर्मचारी जनता का नौकर होता था। जनता के  काम में होने वाली कमियों को दूर करके उन्हें  सही अंजाम तक पहुंचाने  के लिए पूरी कोशिश करते थे।
       अब वे गरीब तबके के लोगो की सहायता करने की जगह  अपने को श्रेष्ठ साबित करने में लगे रहते है। दूसरो के दुखो को दूर करने की कोशिश नहीं करते।  बल्कि शिकारी नजरो से देखते है इसे अपने जाल में कैसे फंसाया जाये और अधिकाधिक बसूला जाये।
      पहले  कर्मचारी अनपढ़ जनता की मदद के लिए तैयार रहते थे। लेकिन अब उन्हें अनेक तरिके से लूटने वाले अधिक होते है। भारत का  माहौल ऐसा हो गया है कोई किसी पर भरोसा नहीं कर पा  रहा।
      फेरीवालों की मदद के लिए दिया जाने वाला कर्ज, किसानो की तरह उनके अकॉउंट में भेज दिया जाये उसका लाभ हो सकता है। वरना  वह जरुरतमंदो तक कभी नहीं पहुंच सकेगा। 
         ऐसे समय में भारत आत्मनिर्भर कैसे बनेगा। जब मददगार ही लूटने में लगे है। 

#REQUEST FOR POOR

                              गरीबो की फरियाद 


 रेहड़ी वालो को सरकार  की तरफ से दस हजार लोन देने के बारे में कहा गया है। लेकिन ये लोग जब लोन लेने जाते है तब बैंक वाले सही तरह से इनसे बात करना जरूरी नहीं समझते। कम पढ़े लिखे और गरीब लोगो के मन में सरकारी कर्मचारियों का खौफ होता है।
     सरकार बैंक वालो के सामने कर्ज देने से सम्बन्धित  एक लक्ष्य निर्धारित  करती  है.जिसे पूरा करना जरूरी होता है। लेकिन गारंटर के आभाव में,पैसे मिलने  की नाउम्मीदी  के कारण ,जिनका पता किराये का मकान होता है। वे  ऐसे अजनबियों को पैसे देने से डरते है। क्योंकि पैसे वसूली करना मुश्किल होता है।
      बैंक वाले ऐसे वक्त में गरीब लेकिन जान -पहचान वालो को  पैसा देकर अपना लक्ष्य पूरा करते है। इसलिए जरूरतमंद तक चाहते हुए  मदद नहीं पहुंच पाती।
        समाचारो में  पैसो  का जिक्र करते समय समाचार  वाचक ने साथ में कहा  भी था। -"यदि सरकार द्वारा दी राहत सही हाथो में पहुंचने लगे तब देश की तरक्की बहुत तेजी से होगी। "         
           लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पता।धोखेबाजी से बचने के लिए अनेक तरिके अपनाये जाते है।  नौकरी सबको  प्यारी होती है। मुश्किल से मिली नौकरी छोड़ना कोई पसंद नहीं करता ?

#work exemption

                                 चींटी और अफसर


     
  भारत में काम करने वालो के काम करने के तरीके की निगरानी रखने के लिए सरकार  की तरफ से बहुत सारे  नौकर रख दिए गए है। वह  उनके काम में मदद करने की जगह ,उनकी कार्य क्षमता को बढ़ाने की जगह ,कम  कर रहे है। उस पर अनेक प्रतिबंध लगा कर। उसी कारण भारत की जीडीपी बढ़ने की जगह कम होती जा रही है। 
        ये चींटी और अफसर वाली कहानी सही साबित हो रही है। अन्य की दखलंदाजी के कारण उन अफसरों का वेतन का खर्च बढ़  गया है। लेकिन चींटी रूपी आम जनता के काम के उत्पादन में कोई बदलाब नहीं आ रहा है।   चींटी और सरकार दोनों को कोई फायदा नहीं हो रहा। 
      अत काम करने वालो को उनके अनुसार मन लगाकर काम करने की छूट दी जाये।प्रतिबन्ध कम किये जाये।  तब उत्पादन कार्य बढ़ेगा, कम नहीं होगा। 
        करोना  काल  में काम करने की छूट देकर देश की उन्नति में सहायता मिलेगी 

#NATURE'S REVENGE

                               प्रकृति का बदला 


 कुदरत का कहर केसा होता है। लगभग सब भूल चुके थे।  2020  में हमें इस बात का अहसास दिला दिया है. कुदरत के सामने इंसान बहुत छोटा है।
      पूरा संसार इसके सामने हार  मान चूका है। हिन्दू ,मुस्लिम और अन्य धर्मो के  लोग पूजा करने में लगे है। यहां तक की अमरीका की संसद भवन में भी सभी धर्मो का शांति पाठ किया गया।
       यदि यही शांति पाठ  भारत की संसद में हो रहा होता तब आप ही सोचिए केसा शोर मचता।
      अर्थशास्त्री माल्थस का सिद्धांत था "-यदि धरती की जनसंख्या अधिक   बढ़  जाती है। तब कुदरत उसे कम करने का खुद रास्ता तलाश लेती है।"
          ये सिद्धांत मेने बर्षो पहले पढ़ा था। तब उसका मतलब महामारी ,मै  नहीं समझ सकी  थी'. क्योंकि चिकित्सा सुविधाओं के होते हुए मौत का आंकड़ा इतना बढ़ जायेगा इसका अहसास नहीं था।
          आजकल दिल्ली में भूकंप के झटके काफी आने लगे है। इसका मतलब क्या है। समझ नहीं आ रहा। भगवान लगता है इंसानो से रूठ  गया है।


#EXAMPLE OF BRAVERY SHARED FOOD

                            बहादुरी की मिसाल साझा चूल्हा 

   
  मैने  बहुत सारे  लोगो को दावत में जाकर शगन देते देखा था लेकिन वे शादी में खाना न खाने की बात करते थे। मुझे बहुत अजीब लगता था। समारोह में सज -संवर कर जाओ और बिना कुछ खाये आ जाओ। मुझे ऐसे लोगो के साथ समारोह में जाना बिलकुल अच्छा नहीं लगता था।
        लेकिन आने वाला समय दुबारा से ऐसा आ गया है। जो अपने परिवार में करोना के कारण  हादसा देख लेंगे वे बाहर के खाने से तौबा कर लेंगे।
      अब तक मुझे जब कोई समारोह में बुलाता था तो मुझे लगता था वह मुझे इज्जत दे रहा है। लेकिन आने वाले समय में हम सोचने पर मजबूर हो जायेंगे की इज्जत अफजाई के लिए जाये या जिंदगी को गले लगाए।
      मुझे लगता है काफी समय तक दावत में शानो शौकत दिखाना जरूरी नहीं रह जायेगा। बल्कि बहादुर लोग ही समारोह में शामिल हुआ करेंगे। 

#BIRDS RETURN

                                पक्षियों का लौटना 

        
  डल  झील बहुत   बड़ी जगह में फैली हुई है। कहते है पहले की अपेक्षा यह केवल चौथाई रह गई है. उसकी अभी भी विराटता मन को लुभाती है। वहां अलग -अलग परिदृश्य दिखाई देते है। तैरते हुए पार्क, नेहरू पार्क  और चारमीनार भी पार्क का नाम है।
      इस झील के पास ही एक नहर भी बह रही थी। जो गंदे नाले के समान थी। जिससे शहर का गन्दा जल झील में न जा सके। उसके बाहर रहे। इसका नमूना मुझे डल  झील के साफ पानी में दिखाई दिया। उसका पानी इतना साफ था कि  पानी की वनस्पति साफ दिखाई दे रही थी। जैसे कांच में एक बगीचा उगाया गया हो। मै  शिकारे में बैठ कर उसकी सुंदरता एकटक निहारती रही।
    डल झील में   एक तरफ बाजार था। लेकिन वहां का पानी गन्दा और बदबूदार था। क्योंकि उस तरफ मजबूत हाउसबोट और मजबूती लिए दुकाने बनी हुई थी। इस तरफ बहुत सारे लोग घूम रहे थे।  वहां तैरती हुई दुकाने भी थी।  तैरती हुई शिकारों रूपी  दुकानों  में लोग खाते  रहे थे क्योंकि मुझे उस जगह बहुत बदबू आ रही थी।  इस कारण मेरी कुछ भी खाने की इच्छा नहीं हुई।
       अब लॉकडाउन  में इंसानी पहुंच कम होने के कारण, वहां का पानी पहले से ज्यादा साफ हो गया है। पानी के पक्षी भी लौट  आये है। सच में मैने डल झील में पहले कोई पक्षी नहीं देखा था। मेरा वास्ता वहां की ठण्ड और वर्षा से हुआ था। इन हालातो को देखकर लगता है वातावरण बिगड़ने  का कारण केवल इंसान की गलत आदते है। धरती को  बचाने  का काम मानव को करना पड़ेगा वरना अनेक महामारियों से झूझने के लिए तैयार होना पड़ेगा।  

#reward to tax payers

                                      कर देने वालो को  इनाम 

   
    सरकार इस समय कर प्राप्त करने के लिए अनेक उपाय कर रही है। उसके लिए अधिक से अधिक सख्ती बरती जा रही है। लेकिन इसके कारण हमारे उद्योग धंधे बंदी के कगार पर पहुंच गए है। इसके बाबजूद  सरकार तक कर की रकम नहीं पहुँच पा रही है।
         व्यापारी वर्ग भी बिचोलियो को मुँह मांगी रिश्वत देकर कर कम  करवा  रहा है। लेकिन इन सब कारणों  से जनता और सरकार किसी को फायदा नहीं हो रहा है। बल्कि बिचोलियो यानि सरकारी कर्मचारियों की जेब में गलत रूप में पैसा जा रहा है. जिसका देश की उन्नति में योगदान नहीं है। एक की जेब से  कमाई निकल  कर दूसरे की जेब में वह  काली कमाई के रूप में पहुंच रही है।
            व्यापारी उसे बाजार में लगा कर समाज की उन्नति में योगदान दे रहा है। लेकिन  यही धन दीवारों या विदेशी बैंक में पहुंच कर किसका भला कर रहा है। सोचने की बात है। इस समय सरकार सारे उपाय बाजार में पैसे की उपलब्धता बढ़ाने के लिए कर रही है। लेकिन बाजार में पैसा होगा तभी आएगा। 
         इसके स्थान पर सरकार कर देने वालो को अपने खर्चे की सभी रसीदे दिखाने  के बदले में उन्हें इनाम स्वरूप कुछ फायदे दे, तब कोई भी अपनी कमाई छुपायेगा नहीं। बल्कि अपने खर्च की प्रत्येक रसीद ख़ुशी से सामने रखेगा। इससे  कर का सही आंकलन  करना आसान हो जायेगा। 
       छोटे बच्चे से इनाम के लालच में उसकी सभी अच्छाई-बुराई   सामने लाई  जा सकती है। 
     जानवरो से मुश्किल से मुश्किल काम उनकी प्रकृति के विरुद्ध इनाम के लालच में   करवाये  जा सकते है।                  व्यापारी अकेले व्यापार  नहीं चला सकता। उसे अपने साथ काम  करने वालो की जरूरत होती है। उसकी तरक्की से बेरोजगारी की समस्या हल होगी, साथ ही देश की तरक्की में भी योगदान होगा। 
       सरकार के सारे  संसथान घाटे में चल रहे है। उन्हें पैसा देश की अर्थव्यवस्था से ही प्राप्त होता है। यदि व्यापार ही खत्म हो गया तो देश किसके भरोसे तरक्की करेगा। व्यापारी हमेशा लाभ कमाकर  ही  आगे बढ़ता है। वह कभी घाटे में ज्यादा दिन व्यापार नहीं कर सकता है। 
      आप देख रहे है सारे  साम्यवादी देश तानाशाह बन गए है। या पूंजीवादी बन गए है। साम्यवाद के पतन के बारे में सोचने पर सच्चाई सामने आ जाएगी। 
         उन्हें व्यापारियों को चोर नहीं बल्कि   देश की उन्नति में सहायक समझ कर इनाम देकर उत्साहित करना चाहिए। करोना  के कारण हमारी अर्थव्यवस्था वैसे भी डूबने की हालत में है। उसे सहारे की जरूरत है। 

#IMMUNITY INCREASE

                          अंतिम उपाय 

           
    जब से कोरोना के ज्यादा  फैलने  के बारे में सुना है। मन में डर  समा  गया है। इससे लड़ने का हमारे पास कोई उपाय नहीं है। इससे केवल अच्छी प्रतिरोधक क्षमता वाले ही जीत  पाएंगे। क्योंकि इसका कोई इलाज नहीं है। हमारी जीवन शैली से ही हमारी जिंदगी और मौत का अंतर् बढ़ेगा। 
         अच्छी प्रतिरोधक  क्षमता वालो पर इसका कोई असर नहीं होगा। उस पर विषाणु  का आक्रमण बेअसर हो जायेगा लेकिन उसके अंदर का विषाणु  दूसरे को बीमार कर सकता है।
       एकदम हम अपनी प्रतिरोधक क्षमता बड़ा नहीं सकते।यदि नियमो के अनुसार आचरण करे तो शायद बदलाव आ जाये।  करोना का असर यदि इलाज नहीं निकला तब सितंबर तक रहेगा। इससे भारत  जैसे देश की ७० % जनता बीमार पड़  सकती है।
       मुझे ऐसे समय में 1920  में डेढ़  करोड़ लोगो  की मौत याद  आ रही है। जबकि उस समय पूरे  संसार की कुल आबादी केवल डेढ़  अरब  थी जबकि भारत की आबादी केवल 25  करोड़ रही होगी। लोगो ने कितना  अधिक  नुकसान देखा होगा। 
      ऐसे समय  में इंसान की निरीहता  याद  आती है। 

#sorcery or virus

                               जादू -टोना या वायरस 

     
     मेरे जानने वाले बहुत सारे  लोग किसी के बीमार पड़ने या किसी की मौत के समय दुसरो पर इल्जाम लगाने से नहीं चुकते  थे। वे किसी की बीमारी के समय इलाज की कमी की अपेक्षा, किसी को जादू -टोना करने वाली ,मनहूस या डायन  करार करने में लग जाते  थे । शातिर लोग ऐसा घटनाक्रम रचते थे कि दूसरा इंसान लाचार  हो जाता था।  ये ऐसा इल्जाम है, उस समय वह औरत कितना भी अपने को सही साबित करने की कोशिश करे, लेकिन इसका यकीन  दिलाना  मुश्किल हो जाता था। कोई भी उसकी बात का यकीन करना नहीं चाहता था  । इसमें किसी को नीचा  दिखाना भी एक कारण होता था।  
      मैने  ऐसे भी लोग देखे है जो अपने बच्चे की मौत का डर  दिखा कर सारे  परिवार की सहानुभूति हासिल कर लेते थे। बच्चे की  सुरक्षा को लेकर अन्य पर जादू -टोना का इल्जाम लगा देते थे।
        दूसरी  औरत का सारा आत्मविश्वास  खत्म कर देते थे और पढ़ाई  लिखाई  को नकार  देते थे। लेकिन उनके दिमाग में एक बार भी ये बात नहीं आती थी।  उनका कहा हुआ झूठ,  यदि  सच हो गया।  तो वे अपना बच्चा भी खो सकते है।
         जबकि दूसरी औरत के आने से पहले वे अपना बच्चा खो चुके होते थे। लेकिन उसके आने के बाद उनके किसी बच्चे की मौत नहीं हुई होती। लेकिन अपने को श्रेष्ट साबित करने के चककर में नीचता की सारी  सीमाएं लांघते उन्हें देर नहीं लगती थी। 
       उन्हें कितना भी समझाओ, इसका कारण वायरस होता है। जादू -टोना नहीं होता है।  लेकिन उन्हें समझ नहीं आता था। 
      पुराने समय में  लोग अनपढ़ होने के कारण , छुपी हुई मौत रूपी वायरस को समझ नहीं पाते  थे। लेकिन कोरोना के समय सरकार ने इतना अधिक प्रचार कर दिया है कि लोग वायरस और अन्धविश्वास में अंतर कर सकेंगे। 
     आज के समय में किसी कमजोर   औरत पर,  किसी अन्य  की मौत का इल्जाम न लगाया जाये , यही मेरी प्रार्थना  है। 

#STICKING LIKE POSTER

                   पोस्टर की तरह चिपकना 

   
   आज मै  आपको दो लड़कियों की लड़ाई की दास्ताँ सुनाने जा रही हूँ। जिसे सुनकर मै  हैरान रह गई।  उनके सामने से निकलते हुए मुझे सुनाई दिया।
      एक लड़की दूसरी लड़की से   कह रही थी। -"तू मुझे समझती क्या है। तुझे इतना मारूंगी की दीवार पर पोस्टर की तरह चिपक जाएगी। तेरे घरवाले तुझे आकर चम्मच से खुरच -खुरच कर  छुड़ायेंगे। "
       उसके बाद में चम्मच से छुड़ाने की कल्पना करने लगी। मेरी हंसी रोके नहीं रुक रही थी। 
      

#weaker take bold step

                            कमजोर का सख्त कदम 

 
   दूसरे विश्व युद्ध के समय तीन  हारे  हुए  देशो पर, मित्र राष्ट्रो  ने  बहुत सारी  पाबंदी लगाई थी। जिससे वो दुबारा शक्तिशाली होकर संसार को विश्व युद्ध की आग में न धकेल सके। इससे कोई और देश होता तो  वह  घुटनो पर आ जाता लेकिन जापान ने उसके बाद भी हिम्मत नहीं छोड़ी,लगातार  विकास करता रहा।
        आज वह विकसित देशो की श्रेणी में आता है। उनके दर्द की दास्ताँ जापान  से ज्यादा कौन  जान सकता है। जापान में आज भी मित्र देशो की सेना, उन के कामो पर पाबंदी लगाने के लिए रहती है। लेकिन उनका सारा खर्चा जापान को चुकाना पड़ता है। 
       हारे  हुए देश के लोगो के  लिए,  विजीत  देश के हर आदेश को मानना  मजबूरी होती है। उसके बीच  भी उन्होंने अपनी अस्मिता बचाये रखी। 
        अमरीका ने  अपने देश के संतरे जबरदस्ती जापान की सरकार को  लेने के लिए विवश किया।  उन संतरो  के जापान में आने के बाबजूद किसी जापानी ने उन्हें खरीदना जरूरी नहीं समझा। जबकि संतरे उनके देश के संतरो की अपेक्षा मीठे थे।  वे पड़े  -पड़े सड़  गए। उसके बाद अमरीका ने कभी ऐसी शर्त नहीं रखी। 
      जापान के लोग  सरकार का विरोध करते समय काम छोड़कर नहीं बैठते बल्कि दुगुना काम करते है। बस बाँह  पर काली पट्टी बांध लेते है। 
     उन्होंने अपने खानपान व्यायाम स्वास्थ्य सम्बन्धी आदतों पर किसी अन्य देश का असर नहीं होने दिया। वहां आज भी सभी  अपने प्राचीन मूल्यों के साथ जी रहे है। उनकी तरक्की देखकर सलाम  करने का मन करता है। सभी देश करोना   के आक्रमण से तबाही के कगार पर पहुँच  रहे है बस जापान के लोग उसके सामने बेबस नहीं दिखाई दे रहे।  

#who wants to die

                              मरना कौन चाहता है 

 
     बिहार की खबर सुनकर हैरानी हुई। जिन्हे  हम भगवान  का दूसरा रूप मानते है। वे अपनी जिम्मेदारी से भाग कर गायब हो गए है। उनका अता-पता नहीं मिल रहा। वे लगभग 300  के आसपास डॉक्टर है। जिनकी सबसे ज्यादा इस समय जरूरत है। वे छुप गए है। 
     कोई भी बीमारी नुकसानदायक होती है। सबसे ज्यादा संवेदनशील जगह अस्पताल होते है। जहां सबसे ज्यादा बीमारियां ठीक होती है। वहीं सबसे ज्यादा स्वस्थ लोग  बीमारियों से प्रभावित होते है। इन डॉक्टरों को डिग्री लेते वक्त किसी ने बताया नहीं था। 
       हरियाणा के दम्पत्ति ने अपना डॉक्टर इस्तीफा दिया। उसे स्वीकार नहीं किया गया। 
     जो ऐसे समय में काम कर  रहे है। उन्हें अपने आप और परिवार से प्यार नहीं हैक्या ?
     कुछ सेवानिवृत डॉक्टर अपनी जिम्मेदारी समझ कर काम करने फिर से आ गए है। 
    मिस ब्रिटेन  बर्षा जो ग्लैमरस जिंदगी जी रही थी। वह अपना कर्तव्य समझ कर चिकित्सा की डिग्री का इस्तेमाल करने के लिए लोगो की सेवा में उतर  आयी है । इसे आप क्या कहेंगे।
      मुझे लग रहा है। जो गायब हो गए है। वे लाढ -प्यार से  पले  अमीर  अभिभावकों की संतान है। जिन्होंने मेहनत  करके नहीं बल्कि पैसो से डिग्री खरीदी है। 

#out of the clutches of death

                मौत के शिकंजे से बाहर 

   
 सभी देशो ने कोरोना के डर  से लॉकडाउन और कर्फू  जैसे उपाय अपनाये है। लेकिन जापान में किसी  तरह की पाबंदी नहीं लगाई गयी है। वहां पहले जैसा ही काम, कोरोना काल  में चल रहा है। मौत का आंकड़ा भी नहीं बड़ा।  आपको हैरानी हुई या नहीं ?
      इसका कारण उनकी जीवन शैली है। वे आज भी जापानी तरीके  से कम  खाना खाते है। वह अधिकाधिक कच्चा (बिना पका ) खाना खाते  है। पारम्परिक खाने को तबज्जो देते है। बचपन से ही घर और विद्यालयों में खान -पान  का ध्यान रखा जाता है। 
      वहां के लोगो की कमर की नाप का, घर और संस्थान  में ध्यान रखा जाता है। औरतो का कमरनाप 32  इंच और पुरुषो का केवल 34  इंच होना जरूरी है। वरना कम करने के लिए कहा जाता है। 
  जापान में लोगो को विशेष रूप से व्यायाम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। जिससे मोटापे से ग्रसित न हो। 
    जापान में लोग अपने घर और बाहर सभी जगह सफाई का ध्यान रखते है।
       उनके रोजमर्रा के व्यवहार में मास्क की आदत होती है। 
       आपको मालूम है। पूरे संसार में सबसे अधिक आयु के लोग जापान में होते है। इन सब उपायों को अपनाने के कारण बहुत सारी  बीमारियों से बचे रहते है। जिनकी रोग से लड़ने की क्षमता बड़ी हुई  होती है उसपर करोना भी असर नहीं दिखा रहा। 
     इन सब कारणों  से वहां की सरकार ने विशेष तौर पर उन्हें  किसी कार्य के लिए बाध्य नहीं किया। वहां के  लोग लॉकडाउन चाहते थे। लेकिन सरकार ने इसे जरूरी नहीं समझा। 

#THE REASON FOR THE CONSTRUCTION OF KHAJURAHO TEMPLE

             खजुराहो मंदिर बनने का कारण 

The legacy of Khajuraho group of monuments - Baisakhi Chatterjee ...     जब मेने इन मंदिरो के  बनने का कारण जाना था तब मुझे विश्वास नहीं हुआ था। लेकिन आज हम उस सच्चाई पर विश्वास करने की स्थिति में है। 
    मेने अपने जीवनकाल में प्रथम बार महामारी का सामना किया है। उसके सामने कैसे सभी लाचार हो गए  है। अनगिनत संख्या में मौते हमे झकझोर रही  है। 
   अब से हजार साल पहले भारत में बहुत युद्ध होते थे । उसमे मौतों की गिनती करना असम्भव है।  मध्य एशिया की स्थिति से आप जान सकते है । 
     भारत में उस समय संन्यासियों को बहुत सम्मान दिया जाता था। जिसके कारण अधिकतर लोग गृहस्थ धर्म का पालन करने की अपेक्षा सँन्यास  लेते थे। 
         मैने  अपने जीवन काल में संन्यास लेने वाले लोगो को नहीं देखा था। जो दिखते   थे  वे ढोंगी लगते थे। लेकिन मोदी और योगी जी को देखकर लगता है। मन से योग लेने वाले भी होते है।
     
       इन सब कारनो  से जनसंख्या बहुत कम  हो गई थी। जनसंख्या होने पर ही किसी राज्य पर राजा राज कर सकते है। ऐसे में कहा जाता है। -चंदेल वंश के राजा- रानी ने इस तरह के मंदिर बनवाने का साहस किया। यहां तक कहा  जाता है। इसके लिए उन्होंने स्वयं मॉडलिंग भी की थी। 
        कुछ विशेष रातो को सामूहिक आयोजन किये जाते थे। जिससे लोग गृहस्थ धर्म में प्रेरित हो। 

#ALCOHOL ADDICTION

                   शराब की लत 

   Covid-19 lockdown turns Kerala into nightmare for tipplers - india ...    शराब पर 70 % टैक्स लगा दिया गया।  पैट्रॉल पर भी टैक्स बड़ा दिया गया है।  हमारी सरकार जितना भी गरीबो की भलाई का  काम करती है। वह इन्ही दोनों के  टैक्स के भरोसे करती है। इन पर टैक्स बढ़ने पर शोर नहीं मचता है। वरना  इनकी लागत  कीमत लगभग  आधी होती है।
       ये आवश्यक सेवाओं में भी नहीं आते है। जिनको शराब की तलब हो वही पीते  है।  तलब  के सामने घंटो लाइनों में खड़े होकर डंडे खाने के लिए भी तैयार है। इनकी लाइन  दुकान खुलने से पहले कई जगह रात  से ही लगनी शुरू हो जाती है। कल हमारे इलाके में सारी  दुकाने शाम 5  बजे पुलिसवालो ने बंद करवा दी।  
      इसका   कारण  पूछने पर बताया। -" आप की दुकानों पर इतने ग्राहक नहीं आ रहे। जबकि शराब की दुकानों की भीड़ पर नियंत्रण रखने के लिए ज्यादा पुलिस की जरूरत है। "
      कई जगह लोग पूरे  महीने के हिसाब से बोतले खरीदते दिखे। जैसे इनके आभाव में मर जायेंगे।
   कुछ देशो में वाहनों की कीमत कम  होती है। लेकिन पैट्रॉल और डीजल की कीमत ज्यादा रखी जाती है  ताकि टैक्स तो मिले  ,  साथ ही सार्वजनिक वाहनों के इस्तेमाल की लोगो में आदत पड़े। इससे  भीड़ और प्रदूषण में कमी आये।  देखते है भारत में इसका क्या रूप दिखाई देता है। 

#REASON TO BE A LEADER

                           नेता बनाने का  कारण 

 गठबंधन की सरकार को किन किन समस्याओं ...    नेतृत्व के गुण  सभी में नहीं होते है। जिसमे होते है वे बचपन से दिखाई देते है। पिछले दिनों मेरी किसी से बहस हो रही थी। उन्होंने कहा - " भारत की सारी  जनता काम  करती है लेकिन सारा श्रेय मोदी जी ले जाते है। "
    उसका गुस्सा सार्थक था। क्योंकि मोदी जी के पास अपना कहने लायक कुछ नहीं है। लेकिन हर जगह मोदी नाम आता है।
     ऐसे में   मुझे अंग्रेजो का समय याद  आया. जब आजादी की लड़ाई चल रही थी। बहुत सारे गुट अलग -अलग लड़ रहे थे।
        उनके आक्रोश को देखकर    अंग्रेजो ने कहा -"तुम अपना एक  नेता बात करने के लिए  हमारे पास भेजो; हम बात करने के लिए तैयार है। यदि   भीड़ में से सभी अपनी बात कहना चाहेंगे।  उन सबके शोर में हमें सही बात समझ नहीं आएगी।" तब कांग्रेस का गठन हुआ था।
      यदि आज सारे  राज्य और प्रत्येक व्यक्ति अपने योगदान का अलग -अलग गुणगान करेगा। तो किस्मे इतनी  सामर्थ्य है। जो इनके सामने खड़ा होकर उनकी बात सुनेगा।
       बिना नेतृत्व क्षमता के हम 1857  की लड़ाई हार  गए थे।  

#corona warrior"s honour

              कोरोना योद्धाओ का सम्मान 

   Corona Warriors Archives - Star of Mysore Coronavirus In Uttarakhand: Indian Army Helicopter Sprinkle ...   सरकार की तरफ से आम जनता को कोरोना योद्धाओ को सम्मान देने हेतु घंटी ,शंख,ताली , थाली बजाओ आदि काम सौपे  गए थे। एक दिन दीप जलाने का काम दिया गया। आज मेने वायुयानों के द्वारा पुष्पवर्षा करते देखा। मुझे बहुत ख़ुशी हुई।
       ये काम बहुत सारे लोगो को ध्यान भटकाने वाले लग सकते है। इससे बीमारों को कोई फायदा नहीं होगा।            लेकिन इस बुरी स्थिति में लोग डरे हुए है। 
वह अपना डर  गुस्से के रूप में इन्ही पर उतारते। लेकिन मोदी जी की पहल के कारण अनेक जगह उन्हें सम्मान दिया जा रहा है। ये केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशो में भी,  इन सभी योद्धाओ  को, लोग सम्मानित कर रहे है। 
       ये योद्धा अपने परिवार को बीमारी से बचाने  के लिए घर नहीं जा पा  रहे। यदि जाते है तो घर के बाहर रहते है।  परिवार से अलग एक कमरे तक खुद को सीमित  कर  रहे है। ताकि उनका प्यारा परिवार संक्रमित न हो जाये।  इनका मौत के आतंक के बीच कार्य सराहनीय है। 
      वरना  पहले डर  के कारण  इन जांबाज  योद्धाओ को लोग घर खाली करने पर विवश कर रहे थे। 

#difference between rupee and dollar

                                    डॉलर और रूपये का अंतर 

 Rupee slips past 74 per US dollar on weak equities, coronavirus ...     जब अंग्रेजो का भारत पर राज्य था तब डॉलर और रूपये की कीमत समान थी। पूरब प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के समय में डॉलर 4  रूपये का था।  लेकिन अब दोनों में 78  रूपये का अंतर आ गया है। भारतीय रूपये को इस समय डॉलर के बराबर लाया जा सकता है। लेकिन  यह असम्भव लगता है।
       असंभव भी संभव हो सकता है। यदि भारत में वेतन पर लगने वाला टैक्स हटा लिया जाये। क्योंकि इससे सरकार को केवल सरकारी कर्मचारियों से सही तरह से टैक्स मिलता है। बाकि सभी वर्गो के लोग अनेक जुगाड़ करके टैक्स बचा लेते है।
    केवल  हर चीज पर लगने वाला छिपा हुआ टैक्स बसूला जाये। तब भारतीय हर वस्तु सस्ती हो जाएगी। बाजार में पैसे का आवागमन बढ़  जायेगा। लोगो की क्रयशक्ति बढ़ने से उद्योग धंधे भी फलने -फूलने लगेंगे।
  टैक्स के रूप में पहले सरकार को केवल ढाई पर्सेंट टैक्स मिलता था। अब बहुत सख्ती और gst जैसे   तरिके अपनाने के बाबजूद 5 % पहुंचा है।
       सरकार का खजाना इतनी सख्ती के बाबजूद खाली है। इससे अच्छा भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ाने की सोचे तो ज्यादा अच्छा होगा।  

#fierce scene

                                        भयंकर मंजर 

          सभी विकसित देशो के समाचार देखने के बाद घबराहट होने  लगी  है। जिन देशो की स्वास्थ्य सुविधाओं के सभी देश कायल रहते थे। वहां मृत्यु का आंकड़ा इतना बड़ा हुआ है।
        शबो को दफनाने का इंतजाम नहीं हो पा  रहा। लाशे जगह -जगह पड़ी हुई दिखाई दे रही है। इन लाशो को  दफनाने का इंतजार करना पड़  रहा है। ये शव  अस्पताल, चर्च,गाड़ी  में रखे है। आज देखा लेटिन अमरीकी देशो में बिना कॉफिन के ,कपड़ो में लिपटी हुई लाशे  सड़क , छतो और घरो में पड़ी हुई है। लाशो के ऐसे मंजर की कल्पना करना, बहुत भयानक है। जबकि अब सच्चाई में दिखाई दे रहा है। 
       ऐसे में इन देशो को भी चीन के अनुसार नियमो में बदलाब करना  चाहिए। यानि उनके अंतिम संस्कार जला कर करने में क्या बुराई है। क्योंकि महामारी में मारे  इंसान का शब यदि इतने समय तक खुले में पड़ा रहेगा। तब उससे कितने और लोग संक्रमित होंगे। जबकि जलाने में इंसान के साथ वह वायरस भी जल कर खत्म हो जायेगा। 
      इन शहरो में ऐसी लाशो को देखकर आकाश में चील ,गिद्ध मडराने लगे है। इसे देखकर मुझे मौत से नहीं ,मरने से डर  लगने लगा है।  इन्हे बेगाने तो क्या ,अब अपने भी छूने से डरने लगे है। 

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...