#shadi

    सुमन की शादी का दिन आ  गया। सब को शादी के विचार ने रोमांचित कर दिया था। वेद अपनी बेटी की शादी के कारण बहुत व्यस्त थे। उनका साथ देने के लिए कोई नही था। एकाएक उन्हें दिन के  १२ बजे के आसपास पता चला बारात आ गयी है.वे अचंभित रह गए उनके हिसाब से बारात शाम के समय आनी  चाहिए थी। इसलिए धर्मशाला की साफ -सफाई भी सही ढंग  से नही  हो पाई थी। उन्हें समझ नही आ  रहा था। बारात के लिए वे क्या कर सकते है। भागते -दौड़ते सफाई का इंतजाम करवा कर बारातियो को बिठाने का इंतजाम करवाया गया। समय से पहले आने के कारण बारात का सही आवभगत करना मुश्किल हो रहा था।
         ये 70 के दशक का समय था। जिसमे बाराती अपने को राजा -महाराजा के सामान समझते थे। उनसे सहयोग की उम्मीद करना बेबकूफी थी । वे उनके सभी कामो में कमियाँ निकाल रहे थे। इस कारण सही काम भी गलत होने लगे थे। हर तरफ बदइंतजामी के इल्जाम लगाये जा रहे थे।
     शाम के समय बारात सज संवर के लड़की वालो के दरवाजे आ  गयी। वेद ने मोतीराम से पूछकर सारे इंतजाम किये थे। लेकिन उस समय फोन की सुविधा नही थी। इसलिए कई कमियाँ  रह गयी थी। वेद का छोटा सा घर था। सड़क पर टेंट लगा कर बारातियो के खाने -पीने  का इंतजाम किया गया था। आधे स्थान में बैठने का और आधे स्थान पर खाने का  इंतजाम था। दिल्ली जैसे शहर में उन दिनों इसी तरह से इंतजाम किये जाते थे।
     जयमाला डालने के बाद मोहन के दोस्त जब खाना -खाने पहुंचे। वो मेजो पर पत्तल और दोनों में परसा  खाना देख कर विफर गए।उन्होंने हुड़दंग मचाना शुरू कर दिया। उन दिनों कुछ शादियों में प्लेटो में खाना दिया जाता था। जबकि कुछ शादियों में अभी भी पत्तलो में खाना दिया जाता था। दोनों तरह की खाने की दावत चलन में थी।  मोहन के दोस्तों ने खाने से इंकार कर दिया। वे मेजो से उठ खड़े हुए। भरी पत्तलो पर पानी डाल  कर चल दिए।  वेद को जैसे ही इस बात का पता चला वे वहाँ  पहुंचकर अनुनय -विनय करने लगे पर उन लोगो पर कोई असर नही हुआ जो वे खाने से उठे किसी के समझाने  से खाने के लिए तैयार नही हुए। तब वे मोतीराम के पास पहुंचे।
   वेद मोतीराम से बोले -आप ने ही तो दोने -पत्तल की दावत मांगी थी। में आपसे प्लेटो में खाना परसने के बारे में कह रहा था। आप ने कहा था शादी में पुराने लोग आयेगे ,वे कांच की प्लेटो में खाना नही खाएंगे इसलिए पत्तलो का इंतजाम करवाये। मेने आपके कहे अनुसार काम किया है। ये केसा हुड़दंग मच रहा है। मेने अपनी मर्जी के मुताबिक कोई काम नही किया। हर काम आपकी सलाह से किया है.आप ही बताये ऐसे में मै क्या करू।
     मोतीराम जी ऐसे में कुछ भी बोलने में असमर्थ थे। उन्होंने बड़े -बूढो का ध्यान रख कर निर्णय लिया था। उन्होंने सोचा नही था नई पीढ़ी ऐसा हुड़दंग मचा सकती है। उन्होंने बारातियो को संभल कर खाने के लिए कहा पर उनके कहे का किसी पर कोई असर नही हुआ। उन पर शराब का नशा और बाराती होने का घमंड सिर चढ़ कर बोल रहा था।  बारातियो ने खाना खाने के स्थान पर उसे बर्बाद करने में अपनी पूरी ताकत लगा दी। सब इस नज़ारे को देखकर सदमे में आ गए थे। इस कारण खाना बहुत जयादा बर्बाद हो रहा था।
     किसी तरह ऐसे माहौल  में फेरे पड़े। लड़के वालो की तरफ से बरी का सामान आया। उस समय के हिसाब से सुमन की ससुराल वालो ने बहुत सारा सोना और कपडा  दिया था  . वेद की हैसियत के हिसाब से सामान बहुत ज्यादा था। लोगो  की आँखे इतने सोने को देखकर फेल गयी। उन्हें उम्मीद नही थी। सुमन की शादी इतने अच्छे घर में हो सकती है। क्योंकि वेद की माली हालत अच्छी नही थी।
       रिश्तेदारो को ख़ुशी कम  जलन ज्यादा हो रही थी इतने में सुमन के ताऊजी बोल उठे -में नही मानता ये सारे  सोने के जेवर  हे। इतना सोना कोई असली चढ़ा ही नही सकता। ये नकली जेवर है। हमें दिखाने के लिए नकली जेवर ले आये  है।
     उस समय अधिकतर लड़कीवालों की तरफ के लोग थे। लेकिन कुछ लोग लड़के वालो की तरफ के भी थे। उन्हें ताऊजी के शब्द बहुत बुरे लगे। उन्होंने उस समय कुछ कहना उचित नही समझा। लेकिन मोतीराम जी को सारी  बाते  बता दी। वे भी ये सब सुनकर तिलमिला गए। लेकिन उन्होंने इस बात को बढ़ने से रोकने की पूरी कोशिश की। इस रस्म के बाद विदाई होनी बाकि थी। मोतीराम जी डोली शांति के साथ विदा करवा कर ले गए। इतनी मुश्किलो के बाद विदाई शांति से हो गयी इस की सबको तसल्ली थी कहते है -अंत भला सो सब भला। 

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