सुमन को देखकर मोहन ऐसा दीवाना हुआ कि उसने सुमन के घर आने की इजाजत मांगी। वेद ने उन्हें घर पर सुमन से मिलने की इजाजत दे दी। मोहन काम से समय निकाल कर सुमन के घर आने लगा। इतने बड़े परिवार में मोहन कभी भी सुमन से अकेले नही मिल पाते थे। उन्हें सुमन से बात करने का मौका भी नही मिलता था। लेकिन मोहन सुमन को दूर से देखकर ही संतुष्ट हो जाता था। उनकी शादी एक साल के लिए रुकी थी। ये समय मोहन के लिए काटना दुश्वार हो रहा था। वे अपने अभिभावकों का विरोध नही कर पा थे। मोहन जब सुमन के घर आते उनको सुमन से कभी बात करने का मौका नही मिल पाता था । उनका मन सुमन से बात करने के लिए कसमसाता रहता था। इसका उपाय मोहन ने ढूंढ निकाला। उसने सुमन से पत्र लिखने के लिए कहा जिससे वे अपने मन के उदगार व्यक्त कर सके।सुमन ने वेद से मोहन के द्वारा पत्र लिखने के बारे में इजाजत मांगी।
वेद ने उन्हें पत्र लिखने की इजाजत दे दी। उन दिनों शादी से पहले लड़की , लड़के को देखने की इजाजत भी नही होती थी। सिर्फ बड़े लोग रिश्ता लड़की को देख कर पक्का कर देते थे। उन पर भरोसा करके लड़का विवाह मंडप में शादी करने आ जाता था। उस हिसाब से मोतीराम के कहने पर उन्होंने मोहन को लड़की को देखने का और मिलने का मौका भी दे दिया।अब वे पत्र व्यवहार करने लगे।
वेद अभी दुनिया की चालबाजीयों से अनजान था। उसके ध्यान में सब कुछ अच्छा हो जायेगा। अब मोहन के पत्र सुमन के पास लगातार आने लगे। जब मोतीराम को मोहन के सुमन के घर जाने और पत्र लिखने के बारे में पता चला। उनके परिवार में खलबली मच गयी। वे सोचने लगे। सुमन ने उस पर जादू कर दिया है। उनका सीधा -साधा बेटा सुमन के रुपजाल में फंस गया है। उनके दिमाग में सुमन एक जादूगरनी के तौर पर बैठ गयी। उनके मन में गुस्सा उफ़न के आने लगा।
मोतीराम वेद के घर आकर उनके सामने कहने लगे -ये सब क्या हो रहा है आपको बेटी मोहन से मिलने लगी है। हमें ये बिलकुल पसंद नही है।
वेद को उनके शब्द सुनकर गुस्सा आ गया। वे बोले - आप ये कैसे कह रहे है। मेरी बेटी हमेशा अपने घर में रहती है। आपका बेटा हमेशा हमारे घर आता है। पाबन्दी लगानी है तो अपने बेटे पर लगाओ जो काम छोड़कर दो घंटो का सफर तय करके हमारे घर आता है। उसे कोई बुलाने नही जाता। जब वह आ जाता है तो क्या मै उसे घर में घुसने से मना कर दू। यदि रोकना है या कोई लांछन लगाना है तो अपने बेटे पर लगाओ। सुमन मोहन से मिलने आपके घर नही जाती बल्कि मोहन हमेशा आता है। उनकी सगाई हो गयी है। में उसे क्या कहकर आने से रोकूँ। मुझे समझ नही आता। आप यदि अपने बेटे को रोक सको तो रोक लो। मेरी इजाजत के बगैर मेरी बेटी आपके बेटे से मिलने आये तब उसे गलत कहना। अभी आपको कोई हक नही है। सुमन को गलत कहने का।
वेद के शब्द सुनकर मोतीराम को एहसास हुआ गलती सुमन की इतनी ज्यादा नही है। जितना उनके बेटे की गलती है। वे सुमन को दोषी समझ रहे थे। वे पानी -पानी हो गए। उनके पास कहने के लिए शब्द नही बचे। वे अपना सा मुँह लेकर चले गए।
उनके इस बर्ताब से सबने समझ लिया ये रिश्ता टूट गया। अब इस घर में शादी नही हो सकती। वेद ने सुमन को भी सख्ती से पत्र लिखने से मना कर दिया। सुमन ने उनके आदेश को मान लिया।
सुमन को डर लगने लगा। यदि मोहन से उसकी शादी नही हुई। मोहन उसके लिए दीवानो जैसा व्यवहार कर रहा है। यदि किसी और जगह उसकी शादी हो गयी तो वह उसके लिखे पत्रो का गलत उपयोग ना करने लगे। जैसे -जैसे दिन बीतने लगे सुमन का डर बढ़ने लगा। लेकिन वह अपने डर के बारे में किसी को बता नही पा रही थी। उसके लिए केवल भगवान का भरोसा था। उसी पर उसकी श्रद्धा थी। वे ही उसकी नैया पार लगायेंगे। उसकी मुक्ति का रास्ता दिखाएंगे।
वेद के परिवार में मायूसी छायी हुई थी किसी को समझ नही आ रहा था गलती किस्से हुई सब अपने -आप को दोषी मान रहे थे। वेद को लगने लगा वे मोतीराम की बातो में क्यों आ गए। उन्हें अपने बड़ो के सामान ही व्यवहार करना चाहिए था। वे सोच रहे थे इस बारे में वे किसी से जिक्र भी नही कर सकते। अब उन्हें इसका कोई उपाय नही सूझ रहा था।
वेद ने उन्हें पत्र लिखने की इजाजत दे दी। उन दिनों शादी से पहले लड़की , लड़के को देखने की इजाजत भी नही होती थी। सिर्फ बड़े लोग रिश्ता लड़की को देख कर पक्का कर देते थे। उन पर भरोसा करके लड़का विवाह मंडप में शादी करने आ जाता था। उस हिसाब से मोतीराम के कहने पर उन्होंने मोहन को लड़की को देखने का और मिलने का मौका भी दे दिया।अब वे पत्र व्यवहार करने लगे।
वेद अभी दुनिया की चालबाजीयों से अनजान था। उसके ध्यान में सब कुछ अच्छा हो जायेगा। अब मोहन के पत्र सुमन के पास लगातार आने लगे। जब मोतीराम को मोहन के सुमन के घर जाने और पत्र लिखने के बारे में पता चला। उनके परिवार में खलबली मच गयी। वे सोचने लगे। सुमन ने उस पर जादू कर दिया है। उनका सीधा -साधा बेटा सुमन के रुपजाल में फंस गया है। उनके दिमाग में सुमन एक जादूगरनी के तौर पर बैठ गयी। उनके मन में गुस्सा उफ़न के आने लगा।
मोतीराम वेद के घर आकर उनके सामने कहने लगे -ये सब क्या हो रहा है आपको बेटी मोहन से मिलने लगी है। हमें ये बिलकुल पसंद नही है।
वेद को उनके शब्द सुनकर गुस्सा आ गया। वे बोले - आप ये कैसे कह रहे है। मेरी बेटी हमेशा अपने घर में रहती है। आपका बेटा हमेशा हमारे घर आता है। पाबन्दी लगानी है तो अपने बेटे पर लगाओ जो काम छोड़कर दो घंटो का सफर तय करके हमारे घर आता है। उसे कोई बुलाने नही जाता। जब वह आ जाता है तो क्या मै उसे घर में घुसने से मना कर दू। यदि रोकना है या कोई लांछन लगाना है तो अपने बेटे पर लगाओ। सुमन मोहन से मिलने आपके घर नही जाती बल्कि मोहन हमेशा आता है। उनकी सगाई हो गयी है। में उसे क्या कहकर आने से रोकूँ। मुझे समझ नही आता। आप यदि अपने बेटे को रोक सको तो रोक लो। मेरी इजाजत के बगैर मेरी बेटी आपके बेटे से मिलने आये तब उसे गलत कहना। अभी आपको कोई हक नही है। सुमन को गलत कहने का।
वेद के शब्द सुनकर मोतीराम को एहसास हुआ गलती सुमन की इतनी ज्यादा नही है। जितना उनके बेटे की गलती है। वे सुमन को दोषी समझ रहे थे। वे पानी -पानी हो गए। उनके पास कहने के लिए शब्द नही बचे। वे अपना सा मुँह लेकर चले गए।
उनके इस बर्ताब से सबने समझ लिया ये रिश्ता टूट गया। अब इस घर में शादी नही हो सकती। वेद ने सुमन को भी सख्ती से पत्र लिखने से मना कर दिया। सुमन ने उनके आदेश को मान लिया।
सुमन को डर लगने लगा। यदि मोहन से उसकी शादी नही हुई। मोहन उसके लिए दीवानो जैसा व्यवहार कर रहा है। यदि किसी और जगह उसकी शादी हो गयी तो वह उसके लिखे पत्रो का गलत उपयोग ना करने लगे। जैसे -जैसे दिन बीतने लगे सुमन का डर बढ़ने लगा। लेकिन वह अपने डर के बारे में किसी को बता नही पा रही थी। उसके लिए केवल भगवान का भरोसा था। उसी पर उसकी श्रद्धा थी। वे ही उसकी नैया पार लगायेंगे। उसकी मुक्ति का रास्ता दिखाएंगे।
वेद के परिवार में मायूसी छायी हुई थी किसी को समझ नही आ रहा था गलती किस्से हुई सब अपने -आप को दोषी मान रहे थे। वेद को लगने लगा वे मोतीराम की बातो में क्यों आ गए। उन्हें अपने बड़ो के सामान ही व्यवहार करना चाहिए था। वे सोच रहे थे इस बारे में वे किसी से जिक्र भी नही कर सकते। अब उन्हें इसका कोई उपाय नही सूझ रहा था।
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