meluha ka mrityunjay

                         मेलुहा का मृत्युंजय (अमिश  त्रिपाठी )
  मेने जब मेलुहा का मृत्युंजय उपन्यास पड़ा तो मुझे इसकी कई बाते  बहुत अच्छी लगी। इसमें भगवान  शिव को एक साधारण इंसान से असाधारण काम करने के कारण भगवान की पदवी तक पहुँचना बहुत पसंद आया। मेरे लिए शिव अब तक आदि देवता थे। जो अति शक्तियों के साथ धरती के लोगो के सुख और दुःख का निर्णय करते थे। इसमें शिव हमारी तरह परेशान और परिश्थितियो से जूझते दिखाए गए है।
        उनमे सबको अपने सपने साकार होने का रास्ता दिखाई दे रहा है। शिव स्वय अपने बारे में आस्वस्त नही है वे हर समय अपना मूल्यांकन दुसरो के सपनो के आधार  पर  करते है। उन्हें समझाने की कोशिश करते है। मुझमे असाधारण कुछ भी नही है।
      मेलुहा वाले उनको मनाकर जब उन्हें अपने राज्य में ले जाते है। वे उनकी उच्च तकनीक और संस्कृति को देखकर हैरान रह जाते है। उनकी चिकित्सक आर्यवती असंभव रोगियों को ठीक कर देती है। वहाँ की वास्तुकला उन्नत श्रेणी की है।  लोगो के चेहरे पर उनकी उम्र पता नही चलती। वहाँ  के लोग सौ  साल से अधिक होने पर जवानो की तरह व्यवहार करते है। उन्हें देखकर शिव को हैरानी होती है इतनी तरक्की किये हुए देश के लोग उसे अपना उद्धार कर्ता  कैसे मान रहे है।
       वे एक साधारण कबीले के साधारण इंसान रहे है। जो इतनी तरक्की नही कर पाया है। शिव और उसके पडोसी कबीले की लड़ाई में   वे अपने कबीले को बचाने के लिए सबके साथ मेलुहा आये  थे.उन्हें अपने शक्तिमान होने का बिलकुल आभास नही है। शिव के नीलकंठ के कारण मेलुहा वासी उन्हें उद्धार कर्ता के स्थान से उतारना नही चाहते। उनके शरीर में साधारण लोगो की तरह जंग में लगने वाले घाव भी मेलुहा वासी एक दिन में ठीक  कर देते है.
   मेलुहा वासियो का विश्वास शिव को असाधारण बना देता है। वे युद्ध में शिव की नीतियों के कारण जीतते है। उनके सपने को साकार करके भगवान  के रूप में प्रतिष्ठित होते है  

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