सोनी और मनोज की जोड़ी बहुत सुन्दर थी। सोनी अद्वितीय सुन्दर के साथ गुणों की खान थी। वह नाचने, गाने, खाना बनाने ,सिलाई -कड़ाई में बेजोड़ थी। हर कोई मनोज की तकदीर को सराहता था।
सभी की जबान पर यही शव्द होते - मनोज की किस्मत खुल गयी। सोनी जैसी पत्नी नसीब वालो को मिलती है। सारी रिश्तेदारी में उसके गुणों की प्रशंसा सुनाई देती थी। सब वेद को कहते थे सास और बहु दोनों बेजोड़ है। सोनी के अंदर किसी को कोई कमी दिखाई नही देती थी लेकिन मनोज का छोटा भाई शेखर सोनी के अंदर कमी ढूंढ़ता रहता था। सबको शेखर का सोनी की बुराई करने का कारण समझ में नही आता था। शेखर को सब समझा कर हार गए। लेकिन वह सबको कहता -सोनी में कोई अच्छाई नही है।
सोनी की शादी के एक साल के बाद सुकन्या की मृत्यु हो गयी वह अपने चार बच्चो की शादी कर पाई थी। उसके अभी दो बच्चे क्वारे थे। उसकी उम्र अभी केवल 53 साल थी। उसे इतनी सी उम्र में रक्तचाप, मधुमेह की बीमारी हो गयी थी। वह अपने खान -पान का ध्यान नही रखती थी। उसके कारण वेद ने मीठा और नमक खाना बंद कर दिया था। वह वसा का प्रयोग भी कम से कम करता था। लेकिन सुकन्या वेद के त्याग का मजाक उड़ाती थी और उससे भी बदपरहेजी करने के लिए प्रोत्साहित करती थी। वेद के शव्दो का सुकन्या पर कोई असर नही होता था। बल्कि उसे बुढ़ापे में परेशान होने का ताना मारा करती थी।
अपने बच्चो को भी कहती -अपने बाप को ढंग का खाना दिया करो। अभी से रुखा -सुखा भोजन करेंगे तो बुढ़ापे में शरीर साथ नही देगा। अब का खाया ही बुढ़ापे का सहारा बनेगा।
वह अपने स्वाद पर नियंत्रण नही रख पाती थी। उसके गुस्से और खाने की बदपरहेजी के कारण सुकन्या को कई बार अस्पताल में रखना पड़ा लेकिन वह अपने उपर नियंत्रण नही रखना चाहती थी।
जबकि उसको खाने के लिए रोको तो उसका जबाब होता -में बेस्वाद खाना खा के भूखी रहने की जगह भर पेट खा के मरना पसंद करूंगी।
उसकी इसी आदत ने उसे समय से पहले इस दुनियाँ से उठा लिया। वेद को सुकन्या की कमी बहुत खलती थी। लेकिन सुकन्या ने उसका ऐसे समय में साथ छोड़ा था। जब वह दूसरी शादी भी नही कर सकता था। उसकी दुनियाँ उजड़ गयी थी। वह अपना दुःख किससे साझा करे।
वेद ने अपने मन को काम में लगा लिया। धीरे -धीरे काम के कारण वह सुकन्या के गम को भूलने लगा। उसके काम के कारण उसका काम तरक्की करने लगा। वेद की हमेशा से सुबह 5 बजे उठने की आदत थी। जो उसने कभी नही छोड़ी। ऐसा समय बहुत कम आया था। जब वेद 5 बजे के बाद उठा हो। जबकि सुकन्या कभी जल्दी नही उठी। उसको जल्दी उठने से चिड़ थी।
वह वेद को हमेशा कहती -इतनी जल्दी उठने की क्या जरूरत है। यदि कुछ देर और सो लोगो तो कोन सा काम रुक जायेगा।
वेद पर सुकन्या के शब्दों का कभी असर नही हुआ। वह सुबह जल्दी उठ कर अपने नित्य के काम करके तैयार हो जाते थे। जबकि उसके परिवार में कोई सुबह नही उठता था। वेद को उनके सोने से कोई फर्क नही पड़ता था। उसने कभी किसी के कहने पर अपना नियम नही छोड़ा।
उन्होंने जिंदगी भर बहुत कम और परहेजी खाना खाया। वे कभी भी मोटे नही हुए। उनका बजन हमेशा कम रहा जबकि सुकन्या और उसके सभी बच्चे हमेशा मोटे रहे। उन्होंने हमेशा आराम -दायक जिंदगी को मह्त्व दिया।वेद को सुकन्या का विछोह बहुत खलता था। उसने सुकन्या को जिन्दा रखने के लिए हर तरह से प्रोत्साहित किया लेकिन उसने अपने जीवन का महत्व नही समझा। वेद के लिए सुकन्या का जो महत्व था। उसकी कमी कभी भर नही पायेगी। यदि सुकन्या इस बात को समझती तो शायद परहेज करके लम्बी जिंदगी का वरदान पा लेती। वेद को उसका बिछोह ना सहना पड़ता।
सभी की जबान पर यही शव्द होते - मनोज की किस्मत खुल गयी। सोनी जैसी पत्नी नसीब वालो को मिलती है। सारी रिश्तेदारी में उसके गुणों की प्रशंसा सुनाई देती थी। सब वेद को कहते थे सास और बहु दोनों बेजोड़ है। सोनी के अंदर किसी को कोई कमी दिखाई नही देती थी लेकिन मनोज का छोटा भाई शेखर सोनी के अंदर कमी ढूंढ़ता रहता था। सबको शेखर का सोनी की बुराई करने का कारण समझ में नही आता था। शेखर को सब समझा कर हार गए। लेकिन वह सबको कहता -सोनी में कोई अच्छाई नही है।
सोनी की शादी के एक साल के बाद सुकन्या की मृत्यु हो गयी वह अपने चार बच्चो की शादी कर पाई थी। उसके अभी दो बच्चे क्वारे थे। उसकी उम्र अभी केवल 53 साल थी। उसे इतनी सी उम्र में रक्तचाप, मधुमेह की बीमारी हो गयी थी। वह अपने खान -पान का ध्यान नही रखती थी। उसके कारण वेद ने मीठा और नमक खाना बंद कर दिया था। वह वसा का प्रयोग भी कम से कम करता था। लेकिन सुकन्या वेद के त्याग का मजाक उड़ाती थी और उससे भी बदपरहेजी करने के लिए प्रोत्साहित करती थी। वेद के शव्दो का सुकन्या पर कोई असर नही होता था। बल्कि उसे बुढ़ापे में परेशान होने का ताना मारा करती थी।
अपने बच्चो को भी कहती -अपने बाप को ढंग का खाना दिया करो। अभी से रुखा -सुखा भोजन करेंगे तो बुढ़ापे में शरीर साथ नही देगा। अब का खाया ही बुढ़ापे का सहारा बनेगा।
वह अपने स्वाद पर नियंत्रण नही रख पाती थी। उसके गुस्से और खाने की बदपरहेजी के कारण सुकन्या को कई बार अस्पताल में रखना पड़ा लेकिन वह अपने उपर नियंत्रण नही रखना चाहती थी।
जबकि उसको खाने के लिए रोको तो उसका जबाब होता -में बेस्वाद खाना खा के भूखी रहने की जगह भर पेट खा के मरना पसंद करूंगी।
उसकी इसी आदत ने उसे समय से पहले इस दुनियाँ से उठा लिया। वेद को सुकन्या की कमी बहुत खलती थी। लेकिन सुकन्या ने उसका ऐसे समय में साथ छोड़ा था। जब वह दूसरी शादी भी नही कर सकता था। उसकी दुनियाँ उजड़ गयी थी। वह अपना दुःख किससे साझा करे।
वेद ने अपने मन को काम में लगा लिया। धीरे -धीरे काम के कारण वह सुकन्या के गम को भूलने लगा। उसके काम के कारण उसका काम तरक्की करने लगा। वेद की हमेशा से सुबह 5 बजे उठने की आदत थी। जो उसने कभी नही छोड़ी। ऐसा समय बहुत कम आया था। जब वेद 5 बजे के बाद उठा हो। जबकि सुकन्या कभी जल्दी नही उठी। उसको जल्दी उठने से चिड़ थी।
वह वेद को हमेशा कहती -इतनी जल्दी उठने की क्या जरूरत है। यदि कुछ देर और सो लोगो तो कोन सा काम रुक जायेगा।
वेद पर सुकन्या के शब्दों का कभी असर नही हुआ। वह सुबह जल्दी उठ कर अपने नित्य के काम करके तैयार हो जाते थे। जबकि उसके परिवार में कोई सुबह नही उठता था। वेद को उनके सोने से कोई फर्क नही पड़ता था। उसने कभी किसी के कहने पर अपना नियम नही छोड़ा।
उन्होंने जिंदगी भर बहुत कम और परहेजी खाना खाया। वे कभी भी मोटे नही हुए। उनका बजन हमेशा कम रहा जबकि सुकन्या और उसके सभी बच्चे हमेशा मोटे रहे। उन्होंने हमेशा आराम -दायक जिंदगी को मह्त्व दिया।वेद को सुकन्या का विछोह बहुत खलता था। उसने सुकन्या को जिन्दा रखने के लिए हर तरह से प्रोत्साहित किया लेकिन उसने अपने जीवन का महत्व नही समझा। वेद के लिए सुकन्या का जो महत्व था। उसकी कमी कभी भर नही पायेगी। यदि सुकन्या इस बात को समझती तो शायद परहेज करके लम्बी जिंदगी का वरदान पा लेती। वेद को उसका बिछोह ना सहना पड़ता।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें