#rishta

     सुमन की शादी की बात चले अब दो साल बीत  गए थे। उस रिश्ते के बारे में किसी को याद भी नही था। सब काम बढ़ाने के लिए मेहनत कर रहे थे। वेद का मन अभी सुमन की शादी करने का नही था। सुकन्या वेद को बार -बार सुमन के लिए लड़का देखने के लिए मनाया करती पर वेद पर इसका कोई असर नही होता। सुकन्या रो  झींक के रह जाती उसे इस काम के लिए वेद पर ही निर्भर रहना था। वह खुद सुमन के लिए लड़के वालो के घर नही जा सकती थी। उसका बस चलता वह खुद ही चली जाती पर उस ज़माने के मुताबिक औरतो  को बाहर निकलने का अधिकार नही था। उसके लिए लड़कियों की बढ़ती हुई  उम्र परेशानी का कारण थी।
      दो साल बाद मोतीराम एक दिन उनके दरवाजे पर दिखाई दिए। उन्हें देखकर सबको बहुत हैरानी हुई। सब आपस में विचार करने लगे। इनके आने का कारण किसी को समझ में नही आ  रहा था। उनके हिसाब से उनके इंजीनियर बेटे की अब तक शादी हो जानी  चाहिए थी। अमीर  घराने के पढ़े -लिखे बेटे की शादी होना कोई मुश्किल काम नही था।
     वेद के सामने मोतीराम ने अपने मन का भेद खोला -उनका बेटा किसी लड़की को पसंद नही करता। उसके हिसाब से  मुझे जैसी लड़की चाहिए वैसी लड़की मेरे लिए   बनी  नही है। में ऐरी -गेरी  किसी भी  लड़की से शादी नही कर सकता। अब आप ही बताइये यदि एक लड़का शादी ना  करे तो उसके पिता के मन पर क्या गुजरती है। में निराश होकर दुबारा से आपके दरवाजे पर आया हूँ। मेरी समस्या का हल केवल आपके पास है। मुझे पूरी उम्मीद है। आपकी सुमन को देखकर वह किसी हालत में ना  नही कर सकेगा। एक बार आप अपनी बेटी का सामना मेरे बेटे से करवा दीजिये आपकी बहुत मेहरबानी होगी।
    वेद के मन में आक्रोश था। उनके परिवार के द्वारा सुनाये गए शब्द वे अभी तक नही भूले थे। वही आक्रोश शब्दों के रूप में बाहर निकला -देखीये  आपके शब्दों में नम्रता मुझे इस रिश्ते के बारे में सोचने पर विवश कर रही है। मै  एक लड़की का बाप हूँ। सुमन मेरी आँख का तारा है। आपके घर में कुछ समय के लिए गया तब मुझे अच्छी तरह से सुना दिया गया। उन शब्दों को मै आज भी भूल नही पाया हूँ   मेरी आर्थिक हालत आज भी कोई खास नही बदली है। में आपके मुताबिक दहेज़ नही दे सकूँगा।  में कैसे विश्वास करू  कि जब मेरी   बेटी आपके घर जाएगी उस को सुनाया नही जायेगा। वह मेरे कलेजे का टुकड़ा है। उसके आंसू मुझे तड़पाएंगे।
    मोतीराम की विनम्रता और भी बढ़  गयी. वे बोले  -आप आदमी होकर औरतो की बातो को मन से लगाते  है। औरतो का  बोलना  क्या मायने रखता है। वो हमारी दूर की रिश्तेदार थी। वे नही चाहती थी कि ये रिश्ता तय हो  । लेकिन  बच्चे हमारे हे उनका भला -बुरा हमें सोचना पड़ता है। में इसकी जिम्मेदारी लेता हूँ कि  मेरे परिवार का कोई इंसान आपसे इस बारे में कुछ नही बोलेगा। इस बात का मै  आपको भरोसा देता हूँ।
     मोतीराम की भलमनसाहत वेद को भा  गयी वे बोले -में अपने परिवार की  सलाह लेकर आपको जबाब देता हूँ।
   वेद ने सुकन्या से शादी के बारे में बात की. तो सुकन्या इस रिश्ते के लिए बिलकुल तैयार थी। उसको मनमांगी मुराद मिल गयी थी। उसे इससे अच्छे रिश्ते की उम्मीद नही थी। एक पड़ा -लिखा,खाते -पीते घर का रिश्ता उन्हें बिना किसी मेहनत के घर बैठे मिल रहा था वह इस रिश्ते के लिए ना  नही कर सकी। वेद भी मोतीराम के सामने रिश्ते के लिए तैयार हो गया।
     मोतीराम बोले -आप अपनी बेटी को हमारे घर ले आइये या में अपने परिवार के साथ आप की बेटी को देखने आ जाता हूँ। सभी आपस में मिल लेंगे।
     वेद बोले -हम सुमन को किसी घर में नही दिखाएंगे। आप कोई और जगह निश्चित कीजिये। यदि बात नही बनी तो हमारी बदनामी तो नही होगी। वरना बिना कारण हमारी बेटी बदनाम हो जाएगी। मै  चाहता हूँ  जब तक रिश्ता तय ना हो जाये इस बात की किसी को खबरनही  लगे।
      मोतीराम को वेद की बात समझ में आ  गयी। उन दिनों फोन नही होते थे। हर बात का निर्णय आमने सामने ही होता था। बहुत दूर का सफर करके मोतीराम आये थे दुबारा समय निकाल के आना बहुत कठिन था इसलिए . उन्होंने बिरला मंदिर में परिवार को लाने  की सहमती  दे दी। इतवार के दिन दोनों परिवार निश्चित समय पर बिरला मंदिर पर मिलने के लिए राजी हो गए। 

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