सुमन शादी के बाद अपने ससुराल चली गयी। उसकी विदाई 6 दिन बाद निकली थी वेद और रिश्तेदार सुमन को उसकी ससुराल से लेने गए तो मोतीराम ने उसे भेजने से मना कर दिया। उन्होंने बहुत खुशामद की। सुकन्या के मन के हाल बताये। पर उनका दिल नही पसीजा। वे सुमन को भेजने के लिए तैयार नही हुए। आखिर खाली हाथ वेद घर वापस आ गए। सारा परिवार बहुत दुखी हो गया। सबको सुमन से मिलने की ख़ुशी हो रही थी। लेकिन उनके चेहरे पर निराशा छा गयी।
उस समय लड़की वालो को ज्यादा अधिकार प्राप्त नही थे। वे हर दस दिन बाद सुमन को लेने जाते लेकिन वे बहाना बना कर मना कर देते। वेद निराशा के सागर में डूबते जा रहे थे। 6 महीने बाद सुमन को मायके आने की आज्ञा मिली। उसे लाने पर सारे घर में मंगल छा गया। उसकी बहने और भाई ख़ुशी से झूम उठे। वेद और सुकन्या के चेहरे से निराशा के भाव कम हो गए। सुकन्या एक सप्ताह के लिए आई थी। उससे सुकन्या ने ढेर सारी बाते की। हर कोई सुकन्या के आगे -पीछे घूम रहा था। वे उससे ससुराल के हाल पूछने के लिए बेताब थे।
सुकन्या ने सुमन से इतने दीन तक ना भेजने का कारण पूछा। तो सुमन ने बताया - माँ शादी के समय ताउजी ने उनके जेवरों को नकली कहा था। ये बात उनको बहुत बुरी लगी। उन्हें इस बात का अफ़सोस था। ऐसा बोलने बाले कोई बाहरी इंसान नही आपके परिवार के खास इंसान थे। इसका मतलब वे समझ रहे थे कि हमने ही उनसे ऐसा बोलने के लिए कहा है। मैने उनसे कई बार कहा कि हमारे कारण ऐसा नही हुआ है। वे खुद इस शादी को बिगाड़ना चाहते थे। हमारे पिताजी ऐसे लोगो में नही है जो दूसरे का अपमान करे। वे अपनी बेटी का घर क्यों तोडना चाहेंगे। आप को गलतफहमी हुई है। उनका गुस्सा शांत होने में 6 महीने लग गए। इसलिए मुझे अब उन्होंने आने की आज्ञा दी है।
सुकन्या बोली -इन 6 महीने में तुझे किसी तरह की तकलीफ तो नही दी।
सुमन बोली - वहाँ बहुत बड़ा परिवार है। सब अपने आप में मगन रहते है। वहाँ खाने- पीने की कोई परेशानी नही है। मुझे घर के काम करने पड़ते है। मै खाना बनाने सुबह 7 बजे लगती हूँ। तो 12 बज जाते है। उस घर में 10 लोग परिवार के है उसके आलावा कोई ना कोई रिश्तेदार आये रहते है।
सुकन्या के मन का दुःख अब कम हुआ। उन्हें अब लगा। मोतीराम जी का गुस्सा उन तक सीमित था। उन्होंने उस गुस्से को सुमन पर नही उतारा था। एक हफ्ते बाद मोतीराम का परिवार सुमन को विदा करवा कर ले गया।
उस समय लड़की वालो को ज्यादा अधिकार प्राप्त नही थे। वे हर दस दिन बाद सुमन को लेने जाते लेकिन वे बहाना बना कर मना कर देते। वेद निराशा के सागर में डूबते जा रहे थे। 6 महीने बाद सुमन को मायके आने की आज्ञा मिली। उसे लाने पर सारे घर में मंगल छा गया। उसकी बहने और भाई ख़ुशी से झूम उठे। वेद और सुकन्या के चेहरे से निराशा के भाव कम हो गए। सुकन्या एक सप्ताह के लिए आई थी। उससे सुकन्या ने ढेर सारी बाते की। हर कोई सुकन्या के आगे -पीछे घूम रहा था। वे उससे ससुराल के हाल पूछने के लिए बेताब थे।
सुकन्या ने सुमन से इतने दीन तक ना भेजने का कारण पूछा। तो सुमन ने बताया - माँ शादी के समय ताउजी ने उनके जेवरों को नकली कहा था। ये बात उनको बहुत बुरी लगी। उन्हें इस बात का अफ़सोस था। ऐसा बोलने बाले कोई बाहरी इंसान नही आपके परिवार के खास इंसान थे। इसका मतलब वे समझ रहे थे कि हमने ही उनसे ऐसा बोलने के लिए कहा है। मैने उनसे कई बार कहा कि हमारे कारण ऐसा नही हुआ है। वे खुद इस शादी को बिगाड़ना चाहते थे। हमारे पिताजी ऐसे लोगो में नही है जो दूसरे का अपमान करे। वे अपनी बेटी का घर क्यों तोडना चाहेंगे। आप को गलतफहमी हुई है। उनका गुस्सा शांत होने में 6 महीने लग गए। इसलिए मुझे अब उन्होंने आने की आज्ञा दी है।
सुकन्या बोली -इन 6 महीने में तुझे किसी तरह की तकलीफ तो नही दी।
सुमन बोली - वहाँ बहुत बड़ा परिवार है। सब अपने आप में मगन रहते है। वहाँ खाने- पीने की कोई परेशानी नही है। मुझे घर के काम करने पड़ते है। मै खाना बनाने सुबह 7 बजे लगती हूँ। तो 12 बज जाते है। उस घर में 10 लोग परिवार के है उसके आलावा कोई ना कोई रिश्तेदार आये रहते है।
सुकन्या के मन का दुःख अब कम हुआ। उन्हें अब लगा। मोतीराम जी का गुस्सा उन तक सीमित था। उन्होंने उस गुस्से को सुमन पर नही उतारा था। एक हफ्ते बाद मोतीराम का परिवार सुमन को विदा करवा कर ले गया।
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