वेद और मनोज में ज्यादा बनती नही थी। वह आरामदायक जिंदगी जीना चाहता था। मनोज के मन में जब काम करने की इच्छा होती थी वह तभी काम करना पसंद करता था। उसे जरूरत के मुताबिक काम करना पसंद नही था। काम करवाने वाले काम के लिए जोर डालते तब वह काम के बारे में सोचता वरना काम को टालने की कोशिश करता जब तक मज़बूरी न बन जाये। वेद हमेशा मनोज से अपनी आदत सुधारने पर जोर देता। इस कारण बाप -बेटे में बनती नही थी। एक समय पर मनोज और वेद किसी बात पर सामान निर्णय नही कर पाते थे।
वेद मनोज की आदतो से दुखी रहता। पर इतने बड़े बेटे को अपने अनुसार चलाना उसके लिए संभव नही था। मनोज के लिए जीवन का मतलब केवल आराम था। वह जहाँ भी रहता उसकी अव्यवस्था दिखाई देती थी। उसे अपने आप को मालिक समझने में घमंड महसूस होता था। मनोज का छोटा सा काम था उसका काम मेहनत मांगता था जबकि वह अपने को मालिक समझ कर काम नही करता था।वह समझता था मालिक का मतलब दुसरो से काम करवाना है न कि खुद काम करना। उसने काम को करने का तरीका भी नही सीखा था। उसे लगता था दुसरो पर रोब जमा कर काम करवा लिया जायेगा। उसके द्वारा किया गया काम कभी अंजाम तक नही पहुंच पाता था उसे अपने काम को अधूरे में ही छोड़ना पड़ता था। उसे अपने काम को पूरा करने की इच्छा भी नही होती थी। उसे काम को सही ढंग से करना नही आता था वह हर काम को बिखेर के रख देता था। इस कारण वेद और मनोज के बीच में मनमुटाव रहता था।
वेद के कारोबार के कारण लेनदार और देनदार दोनों का आना जाना लगा रहता था। वेद जब भी पैसा आता वह सबसे पहले देनदारों को पैसा चुकाता। उसके बाद उसे घर के खर्चे याद आते। जबकि मनोज के लिए पहले अपने परिवार की जरूरत मायने रखती बाद में वह देनदारों के पैसे चुकाने के बारे में सोचता।
एक बार ऐसे वक्त पर वेद सामने खड़ा था। उसके सामने जब लेनदार ने मनोज को गुस्से में सुनाना शुरू किया। वेद को बहुत बुरा लगा । उसने वेद को उसके गैर जिम्मेदाराना बर्ताव के लिए समझाना चाहा । मनोज ने अपनी गलती मानने की जगह सारा दोष दूसरे व्यक्ति पर डाल दिया। वेद ने सब कुछ अपने सामने सुना था। इसलिए मनोज का झूठ उससे सहन नही हुआ। वह आपे से बाहर हो गया। उसने मनोज को अपनी गलती स्वीकारने के लिए कहा। लेकिन मनोज को इसमें कुछ भी गलत नही लग रहा था। इसलिए वह वेद के सामने झुकने या गलती मानने के लिए तैयार नही हुआ।
वेद ने कहा -मुझे पसंद नही है कोई लेनदार मेरे दरवाजे पर ऊँची आवाज में बोले।
इस कारण बात काफी आगे बड़ गयी वेद और मनोज दोनों झुकने के लिए तैयार नही हुए। मनोज अपनी बीबी और बच्चे के साथ अलग घर में रहने चला गया। लेकिन उसे वेद की बात सही नही लगी। मनोज ने रिहायश अलग कर ली लेकिन कारखाना वही रहा।
वह काम करने उसी कारखाने में आता शाम के समय अपने घर चला जाता। उसने अपने छोटे से बच्चे को भी कारखाने के पास प्ले स्कूल में डलवा दिया। बेटा सुबह मनोज के साथ आकर शाम को अपने घर वापस जाता था। उसकी पढ़ाई वही पास के स्कूल में भी करवाई जा सकती थी। लेकिन मनोज को लगता था पोते को देखकर दादा का मन पिघल जायेगा। इस कारण उसने पोते के कारण सबसे जुड़ने की कोशिश की।
सबका मन इस कांड से उनसे विमुख हो गया था। मिलने वाले भी मनोज और सोनी के अलग रहने पर व्यंग करते थे। जिसे सम्भालना मुश्किल हो जाता था क्योंकि सुकन्या की मौत को अधिक दिन नही हुए थे। उनके व्यवहार को परिवार के लोग बाहर वालो के सामने गलत नही ठहराना चाहते थे। वे सोनी का पक्ष लेते लेकिन दूसरे लोग सारा दोष सोनी का समझ रहे थे। जबकि वह इन सबके बीच में कही नही थी। बाप बेटे और पोते तीनो रोज मिल लेते थे। सोनी दूसरे घर में अकेले बाप -बेटे का पुरे दिनी इंतजार करती रहती थी उसका चार साल का बेटा पुरे दिन स्कूल से आकर कारखाने में खेलता रहता। उधर सोनी का दिल अपने बेटे के लिए तड़पता रहता। इस झगडे की सजा केवल सोनी को मिली बाकि सब इकट्ठे रहे।
मनोज को अपनी गलती का अहसास था लेकिन उसने अपने व्यवहार में कोई परिवर्तन लाने की कोशिश नही की।
वेद मनोज की आदतो से दुखी रहता। पर इतने बड़े बेटे को अपने अनुसार चलाना उसके लिए संभव नही था। मनोज के लिए जीवन का मतलब केवल आराम था। वह जहाँ भी रहता उसकी अव्यवस्था दिखाई देती थी। उसे अपने आप को मालिक समझने में घमंड महसूस होता था। मनोज का छोटा सा काम था उसका काम मेहनत मांगता था जबकि वह अपने को मालिक समझ कर काम नही करता था।वह समझता था मालिक का मतलब दुसरो से काम करवाना है न कि खुद काम करना। उसने काम को करने का तरीका भी नही सीखा था। उसे लगता था दुसरो पर रोब जमा कर काम करवा लिया जायेगा। उसके द्वारा किया गया काम कभी अंजाम तक नही पहुंच पाता था उसे अपने काम को अधूरे में ही छोड़ना पड़ता था। उसे अपने काम को पूरा करने की इच्छा भी नही होती थी। उसे काम को सही ढंग से करना नही आता था वह हर काम को बिखेर के रख देता था। इस कारण वेद और मनोज के बीच में मनमुटाव रहता था।
वेद के कारोबार के कारण लेनदार और देनदार दोनों का आना जाना लगा रहता था। वेद जब भी पैसा आता वह सबसे पहले देनदारों को पैसा चुकाता। उसके बाद उसे घर के खर्चे याद आते। जबकि मनोज के लिए पहले अपने परिवार की जरूरत मायने रखती बाद में वह देनदारों के पैसे चुकाने के बारे में सोचता।
एक बार ऐसे वक्त पर वेद सामने खड़ा था। उसके सामने जब लेनदार ने मनोज को गुस्से में सुनाना शुरू किया। वेद को बहुत बुरा लगा । उसने वेद को उसके गैर जिम्मेदाराना बर्ताव के लिए समझाना चाहा । मनोज ने अपनी गलती मानने की जगह सारा दोष दूसरे व्यक्ति पर डाल दिया। वेद ने सब कुछ अपने सामने सुना था। इसलिए मनोज का झूठ उससे सहन नही हुआ। वह आपे से बाहर हो गया। उसने मनोज को अपनी गलती स्वीकारने के लिए कहा। लेकिन मनोज को इसमें कुछ भी गलत नही लग रहा था। इसलिए वह वेद के सामने झुकने या गलती मानने के लिए तैयार नही हुआ।
वेद ने कहा -मुझे पसंद नही है कोई लेनदार मेरे दरवाजे पर ऊँची आवाज में बोले।
इस कारण बात काफी आगे बड़ गयी वेद और मनोज दोनों झुकने के लिए तैयार नही हुए। मनोज अपनी बीबी और बच्चे के साथ अलग घर में रहने चला गया। लेकिन उसे वेद की बात सही नही लगी। मनोज ने रिहायश अलग कर ली लेकिन कारखाना वही रहा।
वह काम करने उसी कारखाने में आता शाम के समय अपने घर चला जाता। उसने अपने छोटे से बच्चे को भी कारखाने के पास प्ले स्कूल में डलवा दिया। बेटा सुबह मनोज के साथ आकर शाम को अपने घर वापस जाता था। उसकी पढ़ाई वही पास के स्कूल में भी करवाई जा सकती थी। लेकिन मनोज को लगता था पोते को देखकर दादा का मन पिघल जायेगा। इस कारण उसने पोते के कारण सबसे जुड़ने की कोशिश की।
सबका मन इस कांड से उनसे विमुख हो गया था। मिलने वाले भी मनोज और सोनी के अलग रहने पर व्यंग करते थे। जिसे सम्भालना मुश्किल हो जाता था क्योंकि सुकन्या की मौत को अधिक दिन नही हुए थे। उनके व्यवहार को परिवार के लोग बाहर वालो के सामने गलत नही ठहराना चाहते थे। वे सोनी का पक्ष लेते लेकिन दूसरे लोग सारा दोष सोनी का समझ रहे थे। जबकि वह इन सबके बीच में कही नही थी। बाप बेटे और पोते तीनो रोज मिल लेते थे। सोनी दूसरे घर में अकेले बाप -बेटे का पुरे दिनी इंतजार करती रहती थी उसका चार साल का बेटा पुरे दिन स्कूल से आकर कारखाने में खेलता रहता। उधर सोनी का दिल अपने बेटे के लिए तड़पता रहता। इस झगडे की सजा केवल सोनी को मिली बाकि सब इकट्ठे रहे।
मनोज को अपनी गलती का अहसास था लेकिन उसने अपने व्यवहार में कोई परिवर्तन लाने की कोशिश नही की।