#jhagda

     वेद और मनोज में ज्यादा बनती नही थी। वह आरामदायक जिंदगी जीना चाहता था। मनोज  के मन में जब काम करने की इच्छा होती थी वह तभी  काम करना पसंद करता था। उसे जरूरत के मुताबिक काम करना पसंद नही था। काम करवाने वाले काम के लिए जोर डालते तब वह काम के बारे में सोचता वरना काम को टालने  की कोशिश करता जब तक मज़बूरी न  बन जाये। वेद हमेशा मनोज से अपनी आदत सुधारने  पर जोर देता। इस कारण बाप -बेटे में बनती नही थी। एक समय पर मनोज और वेद किसी बात पर सामान निर्णय नही कर पाते थे।
    वेद मनोज की आदतो से दुखी रहता। पर इतने बड़े बेटे को अपने अनुसार चलाना उसके लिए संभव नही था। मनोज के लिए जीवन का मतलब केवल आराम था। वह जहाँ भी रहता उसकी अव्यवस्था दिखाई देती थी। उसे अपने आप को मालिक समझने में घमंड महसूस होता था। मनोज का  छोटा सा काम था उसका काम मेहनत मांगता था जबकि वह अपने को मालिक समझ कर काम नही करता था।वह समझता था मालिक का मतलब दुसरो से काम करवाना है न कि खुद काम करना।  उसने  काम को करने का तरीका भी नही सीखा था। उसे लगता था दुसरो पर रोब जमा कर काम करवा लिया जायेगा। उसके द्वारा किया गया काम कभी अंजाम तक नही पहुंच पाता  था उसे अपने काम को अधूरे में ही छोड़ना पड़ता था। उसे अपने काम को पूरा करने की इच्छा भी नही होती थी।   उसे काम को सही ढंग से करना नही आता  था वह हर काम को बिखेर के रख देता था। इस कारण वेद और मनोज के बीच में मनमुटाव रहता था।
       वेद के कारोबार के कारण लेनदार  और देनदार दोनों का आना जाना लगा रहता था। वेद जब भी पैसा आता वह  सबसे पहले देनदारों को पैसा चुकाता। उसके बाद उसे घर के खर्चे याद आते। जबकि मनोज के लिए पहले अपने परिवार की जरूरत मायने रखती बाद में वह देनदारों के पैसे चुकाने के बारे में सोचता।
     एक बार ऐसे वक्त पर वेद सामने खड़ा था। उसके सामने जब लेनदार ने मनोज को  गुस्से में सुनाना शुरू किया।  वेद को बहुत बुरा लगा । उसने वेद को उसके गैर जिम्मेदाराना बर्ताव के लिए समझाना चाहा । मनोज ने अपनी गलती मानने की जगह सारा दोष दूसरे व्यक्ति पर डाल  दिया। वेद ने सब कुछ अपने सामने सुना था। इसलिए मनोज का झूठ उससे सहन नही हुआ। वह आपे से बाहर हो गया। उसने मनोज को अपनी गलती स्वीकारने के लिए कहा। लेकिन मनोज को इसमें कुछ भी गलत नही लग रहा था। इसलिए  वह वेद के सामने झुकने या गलती मानने  के लिए तैयार नही हुआ।
    वेद ने कहा -मुझे पसंद नही है कोई लेनदार मेरे दरवाजे पर ऊँची आवाज में बोले।
    इस कारण बात काफी आगे बड़  गयी वेद और मनोज दोनों झुकने के लिए तैयार नही हुए। मनोज अपनी बीबी और बच्चे के साथ अलग घर में रहने  चला गया। लेकिन उसे वेद की बात सही नही लगी। मनोज ने रिहायश अलग कर ली लेकिन कारखाना वही  रहा।
     वह काम करने उसी कारखाने में आता शाम के समय अपने घर चला जाता। उसने अपने छोटे से बच्चे को भी कारखाने के पास   प्ले स्कूल में डलवा दिया।  बेटा  सुबह मनोज के साथ आकर शाम को अपने घर वापस जाता था। उसकी पढ़ाई वही पास के स्कूल में भी करवाई जा सकती थी। लेकिन मनोज को लगता था पोते को देखकर दादा का मन पिघल जायेगा। इस कारण उसने पोते के कारण सबसे जुड़ने की कोशिश की।
       सबका मन इस कांड से उनसे विमुख  हो गया था। मिलने वाले भी मनोज और सोनी के अलग रहने पर व्यंग करते थे। जिसे सम्भालना मुश्किल हो जाता था क्योंकि सुकन्या की मौत  को अधिक दिन नही हुए थे। उनके व्यवहार को परिवार के लोग बाहर वालो के सामने गलत नही ठहराना चाहते थे। वे सोनी का पक्ष लेते लेकिन दूसरे लोग सारा दोष सोनी का समझ रहे थे। जबकि वह इन सबके बीच में कही नही थी। बाप बेटे और पोते तीनो रोज मिल लेते थे।  सोनी दूसरे घर में अकेले बाप -बेटे का पुरे दिनी इंतजार करती रहती थी उसका चार साल का बेटा पुरे दिन स्कूल से आकर कारखाने में खेलता रहता। उधर सोनी का दिल अपने बेटे के लिए तड़पता रहता। इस झगडे की सजा केवल सोनी को मिली बाकि सब इकट्ठे रहे।
    मनोज को अपनी गलती का अहसास था लेकिन उसने अपने व्यवहार में कोई परिवर्तन लाने की कोशिश नही की।
  

#bichhoh

  सोनी और मनोज की जोड़ी बहुत सुन्दर थी। सोनी अद्वितीय सुन्दर के साथ गुणों की खान थी। वह नाचने, गाने, खाना बनाने ,सिलाई -कड़ाई में बेजोड़ थी। हर कोई मनोज की तकदीर को सराहता था।
      सभी की जबान पर यही शव्द होते - मनोज की किस्मत खुल गयी। सोनी जैसी पत्नी नसीब वालो को मिलती है। सारी  रिश्तेदारी में उसके गुणों की प्रशंसा सुनाई देती थी। सब वेद को कहते थे सास और बहु दोनों बेजोड़ है। सोनी के अंदर किसी को कोई कमी दिखाई नही देती थी लेकिन मनोज का छोटा भाई शेखर सोनी के अंदर कमी ढूंढ़ता रहता था। सबको शेखर का सोनी की बुराई करने का कारण समझ में नही आता  था। शेखर को सब समझा कर हार गए। लेकिन वह सबको कहता -सोनी में कोई अच्छाई नही है।
     सोनी की शादी के एक साल के बाद सुकन्या की मृत्यु हो गयी वह अपने चार बच्चो की शादी कर पाई थी। उसके अभी दो बच्चे क्वारे  थे। उसकी उम्र अभी केवल 53  साल थी। उसे इतनी सी उम्र में रक्तचाप, मधुमेह की बीमारी हो गयी थी। वह अपने खान -पान का ध्यान नही रखती थी। उसके कारण वेद ने मीठा और नमक खाना बंद कर दिया था। वह वसा का प्रयोग भी कम से कम करता था। लेकिन सुकन्या  वेद के त्याग का मजाक उड़ाती थी और उससे भी बदपरहेजी करने के लिए प्रोत्साहित करती थी। वेद के शव्दो का सुकन्या पर कोई असर नही होता था। बल्कि उसे बुढ़ापे में परेशान होने का ताना  मारा करती थी।
       अपने बच्चो को भी कहती -अपने बाप को ढंग का खाना दिया करो। अभी से रुखा -सुखा भोजन करेंगे तो बुढ़ापे में शरीर साथ नही देगा। अब का खाया ही बुढ़ापे का सहारा बनेगा।
    वह  अपने स्वाद पर नियंत्रण नही रख पाती थी। उसके गुस्से और खाने की बदपरहेजी के कारण सुकन्या को कई बार अस्पताल में रखना पड़ा लेकिन वह अपने उपर  नियंत्रण नही रखना चाहती थी।
     जबकि उसको खाने के लिए रोको तो उसका जबाब होता -में बेस्वाद खाना खा के भूखी रहने की जगह भर पेट खा के मरना  पसंद करूंगी।
  उसकी इसी आदत ने   उसे समय से पहले इस दुनियाँ  से उठा लिया। वेद को सुकन्या की कमी बहुत खलती थी। लेकिन सुकन्या ने उसका ऐसे समय में साथ छोड़ा था। जब वह दूसरी शादी भी नही कर सकता था। उसकी दुनियाँ उजड़ गयी थी। वह अपना दुःख किससे  साझा करे।
    वेद ने अपने मन  को काम में लगा  लिया। धीरे -धीरे काम के कारण वह सुकन्या के गम को भूलने लगा। उसके काम के कारण उसका काम तरक्की करने लगा। वेद की हमेशा से सुबह 5  बजे उठने की आदत थी। जो उसने कभी नही छोड़ी। ऐसा समय बहुत कम आया था। जब वेद 5  बजे के बाद उठा हो। जबकि सुकन्या कभी जल्दी नही उठी। उसको जल्दी उठने से चिड़  थी।
     वह वेद को हमेशा कहती -इतनी जल्दी उठने की क्या जरूरत है। यदि कुछ देर और सो लोगो तो कोन  सा काम रुक जायेगा।
     वेद पर सुकन्या के शब्दों का कभी असर नही हुआ। वह सुबह जल्दी उठ कर अपने नित्य के काम करके तैयार हो जाते थे। जबकि उसके परिवार में कोई सुबह नही उठता था। वेद को उनके सोने से कोई फर्क नही पड़ता था। उसने कभी किसी के कहने पर अपना नियम नही छोड़ा।
      उन्होंने जिंदगी भर बहुत कम और परहेजी खाना खाया। वे कभी भी मोटे नही हुए। उनका बजन हमेशा कम रहा जबकि सुकन्या और उसके सभी बच्चे हमेशा मोटे रहे। उन्होंने हमेशा आराम -दायक जिंदगी को मह्त्व  दिया।वेद को सुकन्या का विछोह बहुत खलता था। उसने सुकन्या को जिन्दा रखने के लिए हर तरह से प्रोत्साहित किया लेकिन उसने अपने जीवन का महत्व नही समझा। वेद के लिए सुकन्या का जो महत्व था। उसकी कमी कभी भर नही पायेगी। यदि सुकन्या इस बात को समझती तो शायद परहेज करके लम्बी जिंदगी का वरदान पा  लेती। वेद को उसका बिछोह ना  सहना पड़ता।    

#dulhan

        वेद के  बेटे   मनोज के लिए माला की शादी से पहले ही कई रिश्ते आ  रहे थे। लेकिन माला के बड़े होने के कारण उन्होंने किसी रिश्ते के लिए हामी नही भरी थी। अब उन्होंने मनोज की शादी के बारे में सोचना शुरू किया।
     उनके करीबी रिस्तेदार ने कहा -मेरी नजर में एक बहुत सुन्दर लड़की है। वह तुम्हारे परिवार से मेल खाती  है। में चाहता हूँ उससे मनोज की शादी हो जाये।
    वेद ने कहा -आपके लिहाज से वह हमारे परिवार के लायक है तो आगे बात चलाओ। तुमने जो मनोज के बारे में सोचा है वह गलत तो हो ही नही सकता। मुझे तुम पर पूरा भरोसा है।
    उन्होंने कहा -अभी मै उसकी बड़ी  बहन की शादी  होने का इंतजार कर रहा हूँ। उसकी शादी होने के बाद में उनपर दबाब बनाऊँगा।
   वेद उनके शब्दों पर यकीं करके बैठ  गए। उन्हें मनोज के लिए एक सुन्दर लड़की की जरूरत थी। मनोज के लिए कई रिश्ते आ  रहे थे। लेकिन उनकी लड़कियाँ सुंदर नही थी। इसलिए वेद उन्हें  कोई बहाना बना कर टाल देते थे।
  कुछ समय बाद करनाल से उनके यहाँ उसी सुन्दर लड़की की बड़ी बहन का रिश्ता आया। वेद समझ नही पाये। उन्हें क्या जबाब दे। वे उनकी छोटी बेटी से मनोज की शादी के लिए मन बना बैठे थे। उन्होंने मना करने की जगह उस लड़की को देखने का मन बना लिया।जब छोटी बेटी की इतनी तारीफ सुनी है।  तो बड़ी बेटी भी उससे मिलती -जुलती हुई तो हम उसे पसंद कर लेंगे। 
    उस लड़की को उनके मामा के घर दिखाया गया। उस लड़की को देखकर सुकन्या नाखुश हो गयी यह लड़की उन्हें मनोज के लायक नही लगी। उसका रंग दबता हुआ था। उसके नाक नक्श भी उन्हें पसंद नही आये।
       वेद भी कहते थे -जब मेरी शादी हुई उस समय लड़की को देखे बिना शादी होती थी। उस समय मुझे सुकन्या जैसी सुन्दर लड़की मिल गयी  अब  मेरे खुद के हाथ में सुंदर लड़की लाना है  मै सुंदरता से समझोता क्यों करू। मेरे बेटे के लिए भी सुकन्या से मिलती लड़की लाऊँगा।
     उन्होंने उस लड़की के लिए ना  कहलवा दिया। उस समय तक मनोज के विचार किसी ने पूछना जरूरी नही समझा था। कुछ समय  बाद उस लड़की की शादी हो गयी। उस शादी में जो लोग  गए वे सब उसकी छोटी बहन की सुंदरता के झंडे गाड़  रहे थे। अब सुकन्या  का मन उसकी छोटी बहन को देखने के लिए मचलने लगा।            उन्होंने अपने रिश्तेदार से कहा -अब उसकी बड़ी बहन की शादी हो चुकी हे तुम छोटी लड़की से शादी की बात चलाओ। उन्होंने अगले दिन लड़की वालो के घर जाने की हाँ  कर दी।
    जब कांतिलाल ने उस परिवार से शादी के बारे में बात चलायी तो उन्होंने इसके लिए तारीख पक्की कर दी। निश्चित दिन वेद ,सुकन्या अपने दामाद और बेटी के साथ आकर रोकना कर गए। उन्हें वह लड़की बहुत पसंद आई थी। उन्होंने मनोज के लिए ऐसी लड़की की कल्पना की थी लड़के वालो के मन में मनोज पहले से ही बैठा हुआ था। उन्होंने बड़ी नही तो छोटी से शादी होने पर तसल्ली का अनुभव किया।  बड़ी बहन की शादी के सात महीने बाद सोनी की शादी मनोज से हो गयी। सोनी वेद के घर दुल्हन बन कर आ  गयी

#kad

      वेद ने माला की शादी के लिए एक साल का समय माँगा । लड़केवालों ने इसके लिए हामी भर दी। वेद माला की शादी के लिए पैसा जोड़ने लगा। लोकेश अभी तक प्रायवेट नौकरी कर रहा था।  अध्यापक की प्रायवेट नौकरी में कम पैसे मिलते है।  लोग अध्यापक की प्रायवेट नौकरी करने वालो को इज्जत की निगाह से भी नही देखते। लेकिन माला की किस्मत से  एक साल के अंदर लोकेश की सरकारी नौकरी लग गयी। लोकेश की किस्मत माला  के साथ बंधते ही उसके जीवन में खुशियाँ आनी  शुरू हो गयी। लोकेश की नौकरी लगते ही लोकेश के घर उसकी शादी  के लिए रिश्ते आने शुरू हो गए।
         लोकेश के पिताजी के कहते ही -   पहले से ही रिश्ता  तय हो चूका हे।  लड़कीवालों के मुह उत्तर जाते थे।
   लोकेश का  कद लम्बा था।  इस तरफ किसी का ध्यान नही गया। वेद खुद 6  फुट लम्बे थे। वह अपने परिवार में सबसे लम्बे थे जबकि सुकन्या का कद   केवल 5  फीट  था वेद के बेटे भी वेद जितने लम्बे नही हुए लेकिन वे पौने छः फीट के लगभग  थे।  लड़कियाँ उनकी पांच फीट के आस -पास थी। लेकिन माला का कद पांच फीट  से भी कम  था। कद की तरफ  किसी ने ध्यान नही दिया।
        लोकेश की सरकारी नौकरी लगते ही  उनके पड़ोस में रहने वाले एक रिश्तेदार सुकन्या से  बोली  - आपकी माला का कद तो बहुत कम है। दोनों की जोड़ी अच्छी नही लगेगी। इसके साथ हमारी नेहा ज्यादा अच्छी लगेगी।
   सुकन्या उसके शब्द सुनकर तिलमिला गयी। उसने कहा -अब तक आपका ध्यान क्यों नही गया। मेरे हाँ कहते ही आपको लोकेश अपनी बेटी के लिए उचित लग रहा है। यदि आप पहले रिश्ता तय कर देती तो मै इस तरफ ध्यान ना देती। अब शादी पक्की हो चुकी हे आपके चाहने से  ये रिश्ता मै नही तोड़ूँगी। आप अपनी बेटी के लिए कोई और रिश्ता देख लो।
   जिन लोगो की निगाहो में अब तक उसके गुण  ओझल थे। वे अब अपनी सोच पर अफसोस मनाने लगे।किसी का ध्यान अब तक उसके किसी गुण की तरफ नही गया था। सिर्फ सबको  उसकी अच्छी पढ़ाई का ध्यान था। इसके आलावा उस के बारे में सोचना किसी ने जरूरी नही समझा था।
    माला की सगाई की रस्म के बाद हिना के पति मदन  ने लोकेश की तारीफों के पुल बांध दिए।
       मदन के मुह से जब निकला -लोकेश कद में उनसे ऊँचा है।
      किसी को यकीन नही आया। मदन  अपनी बात पर अड़े रहे कि लोकेश उनसे लम्बे कद का है। कोई भी इसे सच मानने के लिए तैयार नही था। उन लोगो में लोकेश के कद को लेकर शर्त लग गयी। तब सबने निर्णय लिया की चार दिन बाद शादी है तब पक्का सबुत मिल जायेगा। तब बहस ख़त्म हुई।
    शादी वाले दिन जब सबने लोकेश को देखा तब सब हैरान हो गए। घर की सबसे छोटे कद की लड़की को सबसे लम्बा पति मिला है।
      इसे कहते है भगवान जिसकी जोड़ी जिससे बनाता हे वह होकर रहता हे। वेद कभी भी माला के लिए रिश्ता देखने इतनी दूर नही जाता। लड़का खुद घर चलकर आया। अपने से काफी छोटे कद की लड़की के लिए हाँ कर दी। उस समय में लड़की या लड़का केवल एक बार ही एक दूसरे को देख सकते थे। दूसरी बार उन्हें देखने का मौका भी नही मिला। पहली बार में  उन्हें एक दूसरे की कमी देख कर निर्णय लेने का मौका भी नही मिला।  इसे कहते है रिश्ते स्वर्ग में बनते है। 

meluha ka mrityunjay

                         मेलुहा का मृत्युंजय (अमिश  त्रिपाठी )
  मेने जब मेलुहा का मृत्युंजय उपन्यास पड़ा तो मुझे इसकी कई बाते  बहुत अच्छी लगी। इसमें भगवान  शिव को एक साधारण इंसान से असाधारण काम करने के कारण भगवान की पदवी तक पहुँचना बहुत पसंद आया। मेरे लिए शिव अब तक आदि देवता थे। जो अति शक्तियों के साथ धरती के लोगो के सुख और दुःख का निर्णय करते थे। इसमें शिव हमारी तरह परेशान और परिश्थितियो से जूझते दिखाए गए है।
        उनमे सबको अपने सपने साकार होने का रास्ता दिखाई दे रहा है। शिव स्वय अपने बारे में आस्वस्त नही है वे हर समय अपना मूल्यांकन दुसरो के सपनो के आधार  पर  करते है। उन्हें समझाने की कोशिश करते है। मुझमे असाधारण कुछ भी नही है।
      मेलुहा वाले उनको मनाकर जब उन्हें अपने राज्य में ले जाते है। वे उनकी उच्च तकनीक और संस्कृति को देखकर हैरान रह जाते है। उनकी चिकित्सक आर्यवती असंभव रोगियों को ठीक कर देती है। वहाँ की वास्तुकला उन्नत श्रेणी की है।  लोगो के चेहरे पर उनकी उम्र पता नही चलती। वहाँ  के लोग सौ  साल से अधिक होने पर जवानो की तरह व्यवहार करते है। उन्हें देखकर शिव को हैरानी होती है इतनी तरक्की किये हुए देश के लोग उसे अपना उद्धार कर्ता  कैसे मान रहे है।
       वे एक साधारण कबीले के साधारण इंसान रहे है। जो इतनी तरक्की नही कर पाया है। शिव और उसके पडोसी कबीले की लड़ाई में   वे अपने कबीले को बचाने के लिए सबके साथ मेलुहा आये  थे.उन्हें अपने शक्तिमान होने का बिलकुल आभास नही है। शिव के नीलकंठ के कारण मेलुहा वासी उन्हें उद्धार कर्ता के स्थान से उतारना नही चाहते। उनके शरीर में साधारण लोगो की तरह जंग में लगने वाले घाव भी मेलुहा वासी एक दिन में ठीक  कर देते है.
   मेलुहा वासियो का विश्वास शिव को असाधारण बना देता है। वे युद्ध में शिव की नीतियों के कारण जीतते है। उनके सपने को साकार करके भगवान  के रूप में प्रतिष्ठित होते है  

#dengu

      डेंगू के बारे में आजकल काफी खबरे आ  रही  है। उन्हें सुनकर लगता हे ये विपदा ऊपर  से आई है। लेकिन ऐसा नही है.इसका कारण  लापरवाही है। आपको सुनकर हैरानी होगी   सरकार डेंगू को रोकने के लिए अनेक उपाय कर रही  है। लेकिन मै  उपायो की  पोल खोल रही हूँ।
      में एक  अपने साथी के साथ रोहिणी के फ्लैट देखने गयी। वहाँ  पर नीचे हर तरफ सफाई दिखाई दे रही थी। हमें घूमने और आसपास का माहौल देखने में बहुत मजा आ  रहा था। हमने सब जगह अच्छी तरह देखी उसके बाद हम डी डी  ए  के फ्लैटों की छत पर चले गए। उस जगह को देखकर हमें बहुत हैरानी हुई वहाँ तकरीबन १४०० फ्लैटों की टंकी रखी हुई थी। लेकिन सभी टंकियों के ढककन  गायब थे। हमने  अंदर झांक कर देखा तो उसमे बारिश का पानी भरा हुआ था।
      हमने सरकार के दावों और उपचारो के बारे में अनेक तरह से सुना था। लोगो को उनके गलत कामो के लिए दोष भी दिया था कि  आप जैसे लोगो के कारण यह बीमारी फैल  रही है। हमारी कोशिश के कारण आसपास के लोगो ने अपने व्यवहार को बदल भी लिया था।
 जहा सरकारी कर्मचारियों ने टंकियों के दक्क्न कबाड़िये को थोड़े से लाभ के लिए बेच दिए हो वहाँ हम जैसे लोग क्या कर सकते है। उन 20 हजार बिना दक्क्न वाली टंकी के कारण भरे हुए पानी में  लाखो मच्छर पनप रहे है। आप इसकी कल्पना करके देख सकते है।  लोगो को छत पर जाने की आदत नही होती अगर वो मेरी तरह रोहिणी के फ्लैटों की छत पर जाकर देखेंगे तो आपको सच्चाई पता चलेगी।
        लोग उन इलाको के गाँव  में रहने वालो को दोष दे रहे है। गाँव के सीधे- साधे  लोग जमीं से जुड़े ईमानदार होते है। वे अपने आस -पास के लाखो लोगो की जिंदगी से कभी खिलवाड़ नही करेंगे। उन गरीब लोगो की डेंगू के कारण मोत  हो रही  हे।     डेंगू के प्रकोप के कारण  अस्पताल में उनकी भर्ती नही हो रही हे आज भी डेंगू के मरीज  सबसे ज्यादा रोहिणी के इलाके में है।        

#sujhav

      वेद ने हिना की शादी के बाद राहत की साँस ली। उनकी तीसरी बेटी माला और हिना में चार साल का अंतर था। इसलिए उन्होंने सोचा कुछ समय बाद हम माला की शादी करेंगे। अभी उनका मन अपने काम को ऊँचा उठाने की तरफ था। उन्होंने दिन रात लग कर कारोबार बढ़ाने में समय बिताना शुरू कर दिया। उनकी कोशिशो ने रंग दिखाना शुरू कर दिया। दो सालो में काम में बढ़ोतरी दिखाई देने लगी।
       माला की पढ़ाई  पूरी हो गयी थी। सुकन्या को उसकी शादी के विचार ने परेशान करना शुरू कर दिया। वह जब भी वेद से माला की शादी के बारे में बात करती।
       वह हमेशा कहता - वह अभी छोटी है। व्यापार से दो शादियों में काफी पैसा निकल चूका है। यदि इस समय शादी के लिए पैसा निकाला तो बहुत मुश्किल हो जाएगी। मुझे थोड़ा समय दो। समय आने पर इसकी भी शादी हो जाएगी।
     सुकन्या माँ की तरह सोचती थी। उसके मन में अपनी जिम्मेदारी से आजाद होने का विचार था। उसके अभी अविवाहित चार बच्चे और थे। उसे उनकी शादी का विचार हमेशा परेशान करता रहता था। एक साल और निकल गया।
      वेद ने माला के लिए लड़के देखने शुरू कर दिए। अब तक उनके घर एक दामाद इंजीनियर, दूसरा दामाद l.l.b आ  चूका था। माला इतने समय में बी ऍ.  कर चुकी थी जबकि सुमन और हिना हायर सेकेण्डरी पास थी। माला के लिए जो भी लड़का देखा जा रहा था। वे सब केवल बी. ए  पास थे। माला को इस बारे में सुनकर बहुत गुस्सा आता।
     वह उनके बारे में सुनकर कह उठती -जो कम पढ़ी -लिखी थी। उनके लिए आपने इंजीनियर और वकील ढूंढे और मेरे लिए केवल बी ए  पास। मै अपने से ज्यादा पढ़े हुए इंसान से शादी करूंगी।  इनसे में बिलकुल शादी नही करूंगी।
  वेद सुकन्या के द्वारा माला के कहे हुए शव्द सुनकर तिलमिला जाता। वह गुस्से में कहता-उससे कहो उसे इनसे शादी नही करनी तो अपने लिए खुद लड़का ढूंढ लाये।  उनके लिए मेने विशेष रूप से लड़के नही देखे थे। जो उनकी किस्मत में थे। वे खुद चलकर आए थे।
    सुमन और हिना बहुत  सुंदर थी। उनकी अपेक्षा माला इतनी सुंदर नही थी। लेकिन उसे अपनी ज्यादा पढ़ाई का घमंड था। इसलिए वह कम पढ़े  लड़के से शादी के लिए तैयार नही हो रही थी। सुकन्या को भी लगता इसके लिए भी ज्यादा काबिल लड़का मिल जाता तो अच्छा रहता। वह केवल सोच सकती थी। लड़के देखने का काम तो वेद को करना था। वह वेद को सुझाव देने की कोशिश करती।
      वेद के दूर के रिश्ते दार के द्वारा एक लड़का दिल्ली में नौकरी के साक्षात्कार के लिए आया। वेद के पड़ोस में एक बड़े  अफसर रहते थे। वेद उस लड़के को लेकर उनके घर पहुंचे। उन्होंने उसके पेपर देखे। उन्होंने वेद को सांत्वना दी। ये लड़का काबिल हे इसका चयन हो सकता है।
    उस दिन अफसर की बीबी सुकन्या से मिल कर बोली -तुम इधर -उधर लड़का देख रही हो। ये लड़का पढ़ाई में अच्छा हे। प्रायवेट नौकरी भी कर रहा है। इसकी सनद  के हिसाब से इसकी तरक्की के योग है। हाथ आया रिश्ता है। इस पर विचार करके देखो।
     सुकन्या को उसकी बात अच्छी लगी। उसने वेद से इस बारे में बात की उसे भी सुकन्या की बात उचित लगी। लड़का एम ऐसी बी एड था। माला की ज्यादा  पढ़ाई   की शर्त भी पूरी हो रही थी।
    सुकन्या ने माला से लोकेश के बारे में बात की तो माला ने हामी  भर दी। अब वेद ने लोकेश से  विवाह के बारे में बात चलायी।
     लोकेश बोला -आप इस बारे में मेरे पिताजी से  बात कीजिये। वही आपको जबाब देंगे।
    वेद ने कहा -आपके पिताजी से जरूर  बात करेंगे  यदि तुम्हे माला पसंद होगी। हम अभी सिर्फ तुमसे तुम्हारी पसंद के बारे में पूछ रहे है।
    लोकेश बोला -मुझे कोई एतराज नही है।
  वेद को तीसरा रिश्ता भी घर बैठे मिल गया। उसने लोकेश के पिता से शादी की बात की तो बात बनती चली गयी। उसमे किसी तरह की परेशानी नही आई। उसने एक साल बाद के लिए समय माँगा जिसके लिए लड़के वाले तैयार हो गए।
     वह कई बार सोचता -लोग कहते है। लड़कियों के बाप की जूतियाँ लड़के ढूंढने में घिस जाती है। मुझे तो लड़कियों के मामले में कोई परेशानी नही हुई। मुझे तीनो रिश्ते घर बैठे मिल गए।
    

#bijli ka asar

       वेद को हिना की शादी का पता ही नही चला इस शादी में  उसे किसी तरह की परेशानी का सामना नही करना पड़ा। हिना शादी के बाद ससुराल चली गयी उसकी शादी में कोई विघ्न नही आया।
        उसको ससुराल में शाम के समय तारो की छाँव में लिया गया। सुबह की विदाई के बाद शाम तक वह पड़ोस में अपनी नन्द के घर में रही। उसकी शादी के बाद के समारोह एक दिन बाद होने थे। उस दिन कोई रस्म नही की गयी। वह दिन ख़ुशी से कट गया।
     अगले दिन कंगना खुलने की रस्म के समय यकायक बिजली चली गयी। किसी को कुछ समझ नही आ रहा था.क्या किया जाये।
    इतने में मदन ने कहा -चलो। में चल कर देखता हूँ क्या खराबी है।
     मदन अभी बिजली ठीक करने की कोशिश कर ही रहा था। उसे बिजली का करन्ट  लग गया। वह बेहोश होकर दूर जा गिरा। सबको समझ नही आया ये कैसे हो गया। एकदम चारो तरफ शोर मच गया कि  मदन को बिजली ने पकड़ लिया। कंगना  खुलवाई की रस्म सब भूल गए। ड़ॉ  को बुलवाया गया। उसकी कोशिश से मदन को होश आया। इन सब में काफी समय बीत  गया।
   इस बीच बूढ़ी ओरते खुसर -फुसर करने लगी  - बहु कैसे पैरो की आई है। मदन मरते -मरते बचा।
  इतने में मदन की माँ बोली -मेरी बहु को गलत मत कहो। क्या पता मदन बहु के भाग से बचा है। उसे आये हुए समय कितना हुआ है। जो तुम उसे दोष दे रही हो।
  उनके शब्द सुनकर खुसफुसाहट बंद हो गयी। यदि वे भी ओरो की हाँ में हाँ मिलाती तो हिना की जिंदगी बहुत मुश्किल हो जाती।
     डर  के साये में रस्मे होने लगी। सभी को सूबा हो रहा था। कुछ गलत ना  हो जाये। लेकिन इसके बाद कुछ परेशानी का सामना नही हुआ। सारे काम राजी -ख़ुशी निबट गए।
     हिना को उसकी सास और ससुराल का बहुत प्यार मिला। उसके जेठ और जिठानी  दूसरे घर में रहती थी। वे शादी के कुछ समय बाद अपने घर में लोट गई।
  पांच दिन बाद हिना की मायके विदाई का समय आया। तो वह सुकन्या से मिली।  हिना ने सुकन्या को ससुराल की बाते  बताई तो वह हैरान हो गयी। उसकी कुंडली की भविष्वाणी पहले दिन ही अपना असर दिखा गयी।  इस बारे में उन्होंने हिना को भी कुछ नही बताया था आज सुकन्या ने हिना के सामने कुंडली का भेद खोला।
    शादी के समय मदन केवल २१ साल का था उसकी पढ़ाई  जारी थी। पढ़ाई के साथ वह नौकरी भी कर रहा था। हिना अभी २० साल की थी। उसकी शादी करने की इच्छा नही थी 
     हिना मदन से शादी नही करना चाहती थी लेकिन घर वालो ने उसकी शादी जबरदस्ती उस घर में की थी उसकी बड़ी बहन सुमन की शादी जैसे घर में हुई  थी वह भी वेसे घर का सपना देख रही थी। जबकि इस घर में सब कुछ सुमन के घर से विपरीत था  इसलिए उसने शादी का विरोध किया। लेकिन उसकी शादी के मामले में एक ना  चली वह उदास और बेमन से अपने ससुराल गयी थी लेकिन आज अपनी कुंडली का सच जानकर उसे बड़ो का निर्णय सही लगा।
     जब सुकन्या और वेद के पास खबर पहुंची। तो वे सकते में रह गए। हिना की भविष्वाणी ने पहले दिन ही अपना असर दिखा दिया। हिना के भविष्य का राज केवल वेद और सुकन्या तक ही सीमित  था। उन्होंने इसे अब तक किसी से साझा नही किया था। 

#sahyog

     हिना  के विवाह के लिए इंतजाम होने लगे। वेद ने होतीलाल जी से बारातियो के बारे में पूछा।
      उन्होंने कहा-अब तक जिंदगी भर मेने दुसरो की दाबत में खाया है। बहुत दिनों बाद मुझे लोगो को बुलाने का मौका मिला है ,पास की बारात है। मेरे जानने वाले सभी इस विवाह में आएंगे। उन्होंने पहले से मुझे बुलाने के लिए कह रखा है। मै उनका दिल तोडना नही चाहता।
   वेद बोला -आपको पता है।  सरकार ने शादी में एक सीमा से अधिक बारातियो  पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। यदि आप ज्यादा बाराती लाओगे तो हम परेशानी में फंस जायेंगे।
   वेद के कहने पर होतीलाल जी कम बाराती लाने  के लिए राजी हो गए।  उन्होंने अपनी तरफ से कम लोगो को बुलाया था। लेकिन समाज में उनको लोग सम्मान बहुत देते थे। उनका अच्छा व्यवहार लोगो को शादी में आने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था। उस समय में लोग मिलन सार हुआ करते थे। हर घर से  पूरा  परिवार ही शादी में शामिल हुआ। जिसके कारण बारात बहुत ज्यादा हो गयी। सुकन्या ने इतनी बड़ी बारात देखी तो वह घबरा गयी। कही क़ानूनी दायरे में आने का खामियाजा उन्हें ना उठाना पड़े।जितने लोगो के लिए उन्होंने इंतजाम किये है। वह कम पड  गए  तो कितनी फजीहत होगी उसके बारे में सोच कर वह घबरा गयी।
      उसने मन ही मन भगवान को याद करना शुरू कर दिया। सब कुछ भगवान  के भरोसे छोड़ दिया। में जितना कर सकती थी मेंने सारे प्रयत्न कर लिए है। अब भगवन आपका ही सहारा है। आप ही मेरी बिगड़ी बनाने वाले हो आप के सिवा मुझे किसी और पर भरोसा नही है।
       वेद भी इतने बारातियो को देखकर हतोत्साहित हो गया।   वेद ने धीरे से होतीलाल जी के कानो में इसका जिक्र किया तो वे बोले -मेने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की लेकिन मै भी इतने लोगो को देखकर हैरान हूँ। मुझे इतने ज्यादा लोगो के आने की उम्मीद नही थी। इसके लिए मै  आपसे माफ़ी मांगता हूँ।
    उनके नम्र व्यवहार से  वेद  पसीज गया और बोला -इसमें आप को माफ़ी मांगने की जरूरत नही है। हमे मिलजुलकर इससे बाहर आना है। इसमें मुझे आपका सहयोग चाहिए। आप केवल हर रूप में मेरा सहयोग कीजिये मै आपका आभारी रहूंगा।
    होतीलालजी बोले -आप बेहिचक परेशानी में मेरे पास आ सकते है। मै हमेशा तुम्हारे साथ हूँ।
   उनका आश्वासन पाकर वेद कामो में लग गए। इस बार वेद ने क्रॉकरी में खाने का इंतजाम करवाया था। होतीलालजी के कहने पर उन्होंने 15 लोगो के पीतल की  थालियों में खाने का इंतजाम करवा दिए थे। लेकिन सबके लिए क्रॉकरी के इंतजाम होने के कारण पहले की तरह परेशानी का सामना नही करना पड़ा।
     इस विवाह में कोई परेशानी नही उठानी पड़ी सब कुछ सही तरह से निबट गया। सबने राहत की साँस ली। कहावत हे -सहयोग करने से मुश्किलें आसान हो जाती है। असहयोग में इंसान की छोटी सी भूल भी पहाड़ के सामान बड़ी हो जाती है। वेद के लिए पहली शादी और दूसरी शादी के अनुभव में जमीं आसमान का अंतर था। 
    

#ladkiya

        आप सोचते होंगे लड़कियाँ सीधी -सादी और भोली भाली होती है। लेकिन आज का माहौल बदल गया है। लड़कियों के अंदर लड़को के सामान गुस्सा भर गया है। जब उन्हें गुस्सा आता है। वे अच्छा -बुरा सब बिसरा देती है। उन्हें अपने मान -सम्मान का ख्याल नही रहता है। उनका आक्रोश भयंकर रूप में प्रकट होता है। उनके अंदर की कोमलता ख़त्म हो जाती है। वे खुद मिट जाने या दुसरो को मिटा देने में कोई गुरेज नही करती है। उनके सामान खतरनाक दूसरा नही होता हे। छोटी -छोटी लड़कियाँ भी तोड़ -फोड़ करने में  किसी से पीछे नही रहती। मेरा अनुभव भी ऐसा रहा है। जिसके उदाहरण में आपके सामने पेश कर रही हूँ।
    मेने एक बार अपनी स्कूटी पर कुछ लड़कियों को बैठा देखा तो उन्हें वहाँ  से हटा दिया। जब मेने जाने  के समय अपनी गाड़ी देखी  तो उसकी पीछे की लाइट  टूटी हुई  थी।
    दूसरी बार का अनुभव और भी ज्यादा दुखदाई रहा। लड़कियों ने मेरी स्कूटी का हेंडल ही तोड़ दिया था। रेस देने वाला हिस्सा पूरी तरह से तोड़ दिया था। उसमे से तार झांक रहे थे।
    तीसरी बार मेरी गाड़ी की चाबी जहॉ लगती है। उस जगह पर बहुत सारे छोटे -छोटे तिनके घुसा दिए थे जिसके कारण चावी  अंदर जा ही नही सकती थी।उन तिनको को निकालने में बहुत मेहनत  करनी पड़ी।  
      मेरा वास्ता केवल लड़कियों से पड़ता है। में इसका इल्जाम किसी लड़के पर नही लगा सकती आप सोचेंगी कि में बेकार में लड़कियों से खार खाती हूँ इसलिए उन्हें नाहक बढ़नाम कर रही हूँ मेरे जीवन में अधिकतर अच्छी लड़कियाँ  आई है। उनकी यादें हमेशा मेरे साथ रहेंगी।  बुरी लड़कियों से वास्ता मेरा अभी पड़  रहा है। इन बुरी लड़कियों के कारण मेरी सोच बदलती जा रही है।
      बुरी लड़कियों के कारनामे मुझे झकझोर जाते है। बचपन से अब तक मेने ऐसी लड़कियाँ नही देखी  थी। जैसी मुझे अब देखने के लिए मिल रही है। उन्हें सही -गलत का अंतर बताने की कोशिश करो तो वे अपनी गलती मानने के स्थान पर  हमें ही गलत समझने लगती है। हमें सबक सिखाने की फ़िराक में रहती है। वे उस समय सही गलत का निर्णय लेने के स्थान पर सिर्फ अपना गुस्सा उतारने के सारे उपाय अंजाम दे डालती है। उनके गुस्से का अंजाम मेने खुद कई बार भुगता है। वे ऐसी लड़कियाँ होती है। जो पढ़ने -लिखने में जीरो और अपने आप को सर्वश्रेष्ठ समझती है।
      मै उनसे कहना चाहती हूँ।  आज भी समाज में अच्छे लोगो की पूछ होती है बुरे लोग केवल छुप कर ही दुसरो को परेशान करते है। समाज का सामना सीना ठोक कर हमेशा अच्छे लोग ही कर पाते  है। बुरे लोग अपना पूरा समय दुसरो को नुकसान पहुँचाने में लगा देते है। वे भूल जाते है। यदि भगवान ने उन्हें दो हाथ बुरे कामो के लिए दिए है तो दूसरे को भी भगवान ने दो हाथ दिए है।   यदि वे सोचते है कि   उन  के  द्वारा  किया काम  दुसरो की जिंदगी रोक देंगा। तो वे नासमझ है।उनकी करनी कुछ समय के लिए परेशानी में अवश्य डाल देगी।  लेकिन ये परेशानी हमेशा नही रहेंगी। 
      यदि वे सामर्थ्यवान हुए तो वे अपनी जिंदगी को कभी नही रुकने देंगे बल्कि उस मुश्किल में से निकलने का रास्ता ढूंढ लेंगे।
       हाँ तुम दूसरे का बुरा करने के कारण अपनी उन्नति के पथ से भटक जाओगे। तुम्हारा काम जब दुसरो पर प्रकट होगा लोग तुमसे दूर भागने लगेंगे। उन्हें सदा डर बना रहेगा तुम दुसरो की जिंदगी में इतनी परेशानी ला सकती हो तो गुस्सा आने पर उसका विनाश करने में पीछे नही रहोगी। तुम्हे कभी सच्चा हमदर्द प्राप्त नही होगा। हम सामाजिक प्राणी है। हम साथियो के बिना नही रह सकते। हमें हमेशा सुख -दुःख में अपनी बाते बताने के लिए सच्चे साथी की जरूरत होती है। कोई भी सुख इंसान अकेले भोगना नही चाहता उसे अपने हर काम के लिए एक साझीदार की जरूरत होती है। ख़ुशी अकेले सुख नही दे सकती और दुःख में भी एक  साथी चाहिए होता है।
     दोस्त हमेशा अच्छे और सच्चे लोगो के बनते है। बुरे और कड़वा बोलने बाले हमेशा अपनी बात साझा करने के लिए लोगो को ढूंढ़ते रहते है। इसलिए मै चाहूंगी बुरा करने से पहले एक बार अवश्य सोचना की आप किसका बुरा कर रहे हो कही परोक्ष रूप में अपने रास्ते बंद तो नही कर रहे हो।
        एक बार की गलती माफ़ की जा सकती है। बार -बार गलती माफ़ी योग्य नही होती है। बल्कि लड़कियों को माफ़ करने वाले लोग विरले होते है। उनकी माफ़ी का गलत इस्तेमाल आपको जिंदगी जीने लायक ही ना  छोड़े उससे पहले ही संभलने  में भलाई है।   

#mangli

       होतीलाल जी के बेटे मदन की कुंडली लाने के बाद, वेद पंडितजी के पास हिना और उसकी   कुंडली मिलवाने चले गए। दोनों की कुंडली मिलने पर उन्होंने खुश होते हुए सुकन्या को बता दिया। सुकन्या उनकी ख़ुशी देखकर हैरान हो गयी।
    उसने पूछा -कल तक आप इस बारे में सोचकर परेशान थे आज इतना खुश क्यों हो रहे हो। कुंडली मिलने के कारण इतना खुश होते मैने किसी को नही देखा।
     वेद बोला -तुम जानती हो हमारे पिताजी ज्योतिष जानते थे। उन्होंने हिना की कुंडली बनायीं थी। उन्होंने कहा था।  लड़के वालो को कभी शादी से पहले इसकी कुंडली मत  देना बल्कि लड़के की कुंडली मांगना।  इस लड़की की कुंडली बहुत सख्त है। इसके ग्रहो के हिसाब से इसका पति शादी की रात को ही मर जायेगा। इसलिए उन्होंने कहा था जब भी इसकी शादी की बात चले तुम सबसे पहले लड़के की कुंडली मांगना उसे मिलाना यदि मिल जाये तब आगे बात चलाना। इसकी किस्मत में पति का मरण योग है। यदि लड़के के ग्रह इससे ज्यादा सख्त हुए तब ही वह जिन्दा बच  पायेगा। ऐसे में यदि में पहले किसी को इसकी कुंडली दे देता तो नाहक यह बदनाम हो जाती। में अपनी बेटी का अशुभ कैसे देख सकता था। ये बात मेने किसी को नही बताई थी। में तुम्हे भी दुखी नही करना चाहता था।
     सुकन्या बोली -हिना की कुंडली में मंगल का योग है।
    वेद बोला  - हिना मंगली तो नही है। लेकिन इसकी शादी किसी मंगली लड़के से होती तभी हमारी बेटी सुहागिन रह पायेगी। मदन की कुंडली के हिसाब से वह महामंगली है। इससे शादी करने से हिना का ख़राब योग खत्म हो जाता है। तुम ही बताओ मेरा खुश होना बाजीब हे कि  नही। हमें घर बैठे ऐसा लड़का मिल गया। और हमें क्या चाहिए।
     सुकन्या बोली -आप शादी के लिए तैयार हो। हमारे पास पैसे का इंतजाम नही है। ऐसे में हम क्या करेंगे।
     वेद बोला -होतीलाल जी आएंगे तब हम उनके सामने  अपनी समस्या रखेंगे । देखता हूँ वे क्या जबाब देते है।
      वेद ने होतीलाल जी के सामने अपनी समस्या रखी तो वे बोले -मै तुम्हारे हालत के बारे में अच्छी तरह से जानता हूँ। मेरा बड़ा बेटा  सुमन की शादी में आया था।  उसने शादी में हिना को देखा था उसने  हिना की बहुत तारीफ की तभी से हम सबका मन उससे मदन की शादी करने के लिए लालायित था। लेकिन हम तेरी हालत जानते थे। इसलिए एक साल रुक कर तुम्हारे पास आये है। हमें थोड़ा और रुकने में कोई परेशानी नही है। तू जानता है हम तेरे शुभ चिंतक है। तेरा कभी बुरा नही सोचेंगे।
    वेद उनके शब्द सुनकर आश्वस्त होकर बोला -हम पंडितजी से पूछकर आपको सगाई और शादी का शुभ दिन बता देंगे।
     वेद सुकन्या के पास जाकर बोला -अब तुम ही बताओ हमें क्या करना चाहिए। वे हर तरह से राजी है।
     सुकन्या बोली -हमें इस रिश्ते को छोड़ना नही चाहिए। ऐसे भले मानस हमें कहाँ मिलेंगे। हम  अभी रोके की रस्म कर देते है , कुछ समय  बाद  में इसकी गोद  भराई की रस्म करवा लेते है। उनको भी लगेगा कोई रस्म पूरी हुए। उसके  6  महीने बाद सगाई की रस्म हो जाएगी। उसके एक साल बाद शादी कर देंगे। हमारे उपर  ज्यांदा भार एक साथ नही पड़ेगा। लड़के वालो को भी सही लगेगा।
    सुकन्या की सलाह  सभी को अच्छी लगी। उसके अनुसार शादी की तेयारिया शुरू हो गयी।  

#khyal

      सुमन की शादी को एक साल बीत  गया। अब उसे लेकर सबको लगने लगा कि वह ससुराल के माहौल में रम गयी है। उसके लिए सबने चिंतित होना भी बंद कर दिया था।
     एक दिन वेद की दूसरी बेटी हिना की शादी के लिए रिश्ता आया। वे हैरान रह गए उनके दिमाग में अभी सुमन की विदाई ही घूम रही थी। उन्होंने इतनी जल्दी हिना की शादी के बारे में सोचा ही नही था। हिना के होने बाले ससुर  उनके घर अपने छोटे बेटे  के लिए रिश्ता लेकर आये  थे।
   वेद हतप्रभ होकर बोले -मेने अपनी बड़ी बेटी की शादी की है। इस समय मेरे हाथ खाली है।  में इतनी जल्दी दूसरी बेटी की शादी का इंतजाम नही कर पाउँगा। मेरी माली हालत अच्छी नही है.
      होतीलाल जी बोले -हम आपसे अभी शादी करने के बारे में नही कह रहे। हम चाहते है आप हमारे बेटे को आकर देख लो। उसके बाद जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करना।
   उनकी विनम्रता देखकर वेद ने कहा -ठीक है। मै परिवार में विचार -विमर्श करके आपको जबाब दूँगा।
    होतीलाल जी के जाने के बाद वेद लाहोर  के  ख्यालो में खो गए। होतीलाल जी का घर वेद के घर के पास था। होतीलाल जी के  कोई बच्चे नही थे। वेद को अपने अभिभावकों का प्यार नही मिला था। उनको होतीलाल जी के घर जाकर बहुत प्यार मिलता था इसलिए वेद अपने खाली समय में उनके घर चले जाते थे। दोनों की जरूरत पूरी हो जाती थी। वे बचपन में होतीलाल जी के शुक्रगुजार थे। उनके कारण ही उन्हें पूर्णता का अहसास हुआ था। इसलिए वे होतीलाल जी के कारण सोचने के लिए मजबूर हो  गए।
          होतीलाल जी के बच्चे  बहुत बाद में हुए जब उन्होंने बच्चे होने की उम्मीद छोड़ दी थी। उनके घर  पहला बेटा हुआ। पहला बेटा  होने के 14  साल बाद दूसरा बेटा  हुआ। उनके घर बच्चे बहुत देर से तरसा-तरसा कर भगवान ने दिए ।  जब लोग दादा बनते है। उस उम्र में उन्हें औलाद का सुख मिला था उन्हें उन बच्चो का कुछ भी देख पाने की उम्मीद नही थी।
     वेद को हमेशा अहसास रहता था मै खुद होतीलाल जी की गोद में खेल कर बड़ा हुआ हूँ। अब मै उनका समधी बनूँगा।
         वेद ने सुकन्या के सामने बात चलायी तो उन्होंने कहा-आप रिश्ते के लिए मना मत करो। बल्कि कुंडली बगैरह ले आयो। उनका लड़का देख आयो जरूरी नही हमारे जाते ही सभी कुछ सही होता जायेगा। यदि सब कुछ सही रहा तो हम शादी के लिए कुछ समय माँग लेंगे।
    वेद को सुकन्या की बात उचित लगी। उन्होंने एक दिन जाकर उनका बेटा देखा। उन्हें लड़का पसंद आया। उसके बाद उन्होंने उसकी कुंडली मांगी। होतीलाल जी ने कुंडली दे दी। 

#jigyasa

सुमन शादी के बाद अपने ससुराल चली गयी। उसकी विदाई 6  दिन बाद निकली थी वेद और रिश्तेदार सुमन को उसकी ससुराल से लेने गए तो मोतीराम ने उसे भेजने से मना  कर दिया। उन्होंने बहुत खुशामद की। सुकन्या के मन के  हाल बताये। पर उनका दिल नही पसीजा। वे सुमन को भेजने के लिए तैयार नही हुए। आखिर खाली हाथ वेद घर वापस आ  गए। सारा परिवार बहुत दुखी हो गया। सबको सुमन से मिलने की ख़ुशी हो रही थी। लेकिन उनके चेहरे पर निराशा छा  गयी।
   उस समय लड़की वालो को ज्यादा अधिकार प्राप्त नही थे। वे हर दस दिन बाद सुमन को लेने जाते लेकिन वे बहाना  बना कर मना कर देते। वेद निराशा के सागर में डूबते जा रहे थे। 6  महीने बाद सुमन को मायके आने की आज्ञा मिली। उसे लाने पर सारे  घर में मंगल छा  गया। उसकी बहने और भाई ख़ुशी से झूम उठे। वेद और सुकन्या के चेहरे से निराशा के भाव कम हो गए। सुकन्या एक सप्ताह के लिए आई थी। उससे सुकन्या ने ढेर सारी बाते की। हर कोई सुकन्या के आगे -पीछे घूम रहा था। वे उससे ससुराल के हाल पूछने के लिए बेताब थे।
       सुकन्या ने सुमन से इतने दीन तक ना भेजने का कारण पूछा। तो सुमन ने बताया - माँ शादी के समय ताउजी ने उनके जेवरों को नकली कहा था। ये बात उनको बहुत बुरी लगी। उन्हें इस बात का अफ़सोस था। ऐसा बोलने बाले कोई बाहरी  इंसान नही आपके परिवार के खास इंसान थे। इसका मतलब वे समझ रहे थे कि  हमने ही उनसे ऐसा बोलने के लिए कहा है। मैने उनसे कई बार कहा कि हमारे कारण ऐसा नही हुआ है। वे खुद इस शादी को बिगाड़ना  चाहते थे। हमारे पिताजी ऐसे लोगो में नही है जो दूसरे का अपमान करे। वे अपनी बेटी का घर क्यों तोडना चाहेंगे। आप को गलतफहमी हुई है। उनका गुस्सा शांत होने में 6 महीने लग गए। इसलिए मुझे अब उन्होंने आने की आज्ञा दी है।
         सुकन्या बोली -इन 6  महीने में तुझे किसी तरह की तकलीफ तो नही दी।
      सुमन बोली - वहाँ  बहुत बड़ा परिवार है। सब अपने आप में मगन  रहते है। वहाँ खाने- पीने  की कोई परेशानी नही है। मुझे घर के काम करने पड़ते है। मै खाना बनाने सुबह 7 बजे लगती हूँ। तो 12 बज जाते है। उस घर में 10  लोग परिवार के है उसके आलावा कोई ना कोई रिश्तेदार आये  रहते है।
    सुकन्या के मन का दुःख अब कम हुआ। उन्हें अब लगा। मोतीराम जी का गुस्सा उन तक सीमित था। उन्होंने उस गुस्से को सुमन पर नही उतारा था। एक हफ्ते बाद मोतीराम का परिवार सुमन को विदा करवा कर ले गया। 

#shadi

    सुमन की शादी का दिन आ  गया। सब को शादी के विचार ने रोमांचित कर दिया था। वेद अपनी बेटी की शादी के कारण बहुत व्यस्त थे। उनका साथ देने के लिए कोई नही था। एकाएक उन्हें दिन के  १२ बजे के आसपास पता चला बारात आ गयी है.वे अचंभित रह गए उनके हिसाब से बारात शाम के समय आनी  चाहिए थी। इसलिए धर्मशाला की साफ -सफाई भी सही ढंग  से नही  हो पाई थी। उन्हें समझ नही आ  रहा था। बारात के लिए वे क्या कर सकते है। भागते -दौड़ते सफाई का इंतजाम करवा कर बारातियो को बिठाने का इंतजाम करवाया गया। समय से पहले आने के कारण बारात का सही आवभगत करना मुश्किल हो रहा था।
         ये 70 के दशक का समय था। जिसमे बाराती अपने को राजा -महाराजा के सामान समझते थे। उनसे सहयोग की उम्मीद करना बेबकूफी थी । वे उनके सभी कामो में कमियाँ निकाल रहे थे। इस कारण सही काम भी गलत होने लगे थे। हर तरफ बदइंतजामी के इल्जाम लगाये जा रहे थे।
     शाम के समय बारात सज संवर के लड़की वालो के दरवाजे आ  गयी। वेद ने मोतीराम से पूछकर सारे इंतजाम किये थे। लेकिन उस समय फोन की सुविधा नही थी। इसलिए कई कमियाँ  रह गयी थी। वेद का छोटा सा घर था। सड़क पर टेंट लगा कर बारातियो के खाने -पीने  का इंतजाम किया गया था। आधे स्थान में बैठने का और आधे स्थान पर खाने का  इंतजाम था। दिल्ली जैसे शहर में उन दिनों इसी तरह से इंतजाम किये जाते थे।
     जयमाला डालने के बाद मोहन के दोस्त जब खाना -खाने पहुंचे। वो मेजो पर पत्तल और दोनों में परसा  खाना देख कर विफर गए।उन्होंने हुड़दंग मचाना शुरू कर दिया। उन दिनों कुछ शादियों में प्लेटो में खाना दिया जाता था। जबकि कुछ शादियों में अभी भी पत्तलो में खाना दिया जाता था। दोनों तरह की खाने की दावत चलन में थी।  मोहन के दोस्तों ने खाने से इंकार कर दिया। वे मेजो से उठ खड़े हुए। भरी पत्तलो पर पानी डाल  कर चल दिए।  वेद को जैसे ही इस बात का पता चला वे वहाँ  पहुंचकर अनुनय -विनय करने लगे पर उन लोगो पर कोई असर नही हुआ जो वे खाने से उठे किसी के समझाने  से खाने के लिए तैयार नही हुए। तब वे मोतीराम के पास पहुंचे।
   वेद मोतीराम से बोले -आप ने ही तो दोने -पत्तल की दावत मांगी थी। में आपसे प्लेटो में खाना परसने के बारे में कह रहा था। आप ने कहा था शादी में पुराने लोग आयेगे ,वे कांच की प्लेटो में खाना नही खाएंगे इसलिए पत्तलो का इंतजाम करवाये। मेने आपके कहे अनुसार काम किया है। ये केसा हुड़दंग मच रहा है। मेने अपनी मर्जी के मुताबिक कोई काम नही किया। हर काम आपकी सलाह से किया है.आप ही बताये ऐसे में मै क्या करू।
     मोतीराम जी ऐसे में कुछ भी बोलने में असमर्थ थे। उन्होंने बड़े -बूढो का ध्यान रख कर निर्णय लिया था। उन्होंने सोचा नही था नई पीढ़ी ऐसा हुड़दंग मचा सकती है। उन्होंने बारातियो को संभल कर खाने के लिए कहा पर उनके कहे का किसी पर कोई असर नही हुआ। उन पर शराब का नशा और बाराती होने का घमंड सिर चढ़ कर बोल रहा था।  बारातियो ने खाना खाने के स्थान पर उसे बर्बाद करने में अपनी पूरी ताकत लगा दी। सब इस नज़ारे को देखकर सदमे में आ गए थे। इस कारण खाना बहुत जयादा बर्बाद हो रहा था।
     किसी तरह ऐसे माहौल  में फेरे पड़े। लड़के वालो की तरफ से बरी का सामान आया। उस समय के हिसाब से सुमन की ससुराल वालो ने बहुत सारा सोना और कपडा  दिया था  . वेद की हैसियत के हिसाब से सामान बहुत ज्यादा था। लोगो  की आँखे इतने सोने को देखकर फेल गयी। उन्हें उम्मीद नही थी। सुमन की शादी इतने अच्छे घर में हो सकती है। क्योंकि वेद की माली हालत अच्छी नही थी।
       रिश्तेदारो को ख़ुशी कम  जलन ज्यादा हो रही थी इतने में सुमन के ताऊजी बोल उठे -में नही मानता ये सारे  सोने के जेवर  हे। इतना सोना कोई असली चढ़ा ही नही सकता। ये नकली जेवर है। हमें दिखाने के लिए नकली जेवर ले आये  है।
     उस समय अधिकतर लड़कीवालों की तरफ के लोग थे। लेकिन कुछ लोग लड़के वालो की तरफ के भी थे। उन्हें ताऊजी के शब्द बहुत बुरे लगे। उन्होंने उस समय कुछ कहना उचित नही समझा। लेकिन मोतीराम जी को सारी  बाते  बता दी। वे भी ये सब सुनकर तिलमिला गए। लेकिन उन्होंने इस बात को बढ़ने से रोकने की पूरी कोशिश की। इस रस्म के बाद विदाई होनी बाकि थी। मोतीराम जी डोली शांति के साथ विदा करवा कर ले गए। इतनी मुश्किलो के बाद विदाई शांति से हो गयी इस की सबको तसल्ली थी कहते है -अंत भला सो सब भला। 

#ashvasan

   वेद के मन में मोतीराम के व्यवहार को लेकर आक्रोश था। कभी एकदम उनके सामने विवश दिखाई देते है तो कभी सारा गुस्सा उनपर उतारकर चले जाते हे. ये देखकर वेद ने सोच लिया था। ऐसे इंसान से रिश्ता नही जोडूगा जिसकी बात में दम  नही है। ऐसे इंसान की बातो का क्या भरोसा जो सुनी -सुनाई बात पर आग -बबूला हो जाये।उन्होंने सारे तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया। सिर्फ लोगो की बातो में आकर उनके सामने अपना गुबार निकाल गए ।
        इस बात को बीते हुए एक महीना  बीत  गया था। सबको इस रिश्ते के टूटने का दुःख अवश्य था लेकिन इस रिश्ते को फिर से जोड़ने की  किसी तरह की कोशिश नही की गयी थी। सभी सोच रहे थे। किसी तरह कोई चमत्कार हो जाये और टुटा हुआ रिश्ता फिर से जुड़ जाये।
    अंतत चमत्कार हो गया एक दिन मोतीराम उनके दरवाजे पर फिर से दिखाई दिए। उनके  आने का  कारण समझ नही आ  रहा था। लेकिन सभ्यता के लिए उनके सामने उनका स्वागत किया। उनके बोलने का इंतजार करने लगे। इस बार वेद ने आगे बढ़कर कुछ शुरुरात नही की। उनको समझ नही आ रहा था। ऐसे इंसान के लिए वे किन शब्दों का इस्तेमाल करे।
        वेद को  बेटी की शादी का पहला अनुभव था।वेद के मन में बेटी का पिता होने का मलाल नही था। उन्हें सुमन का पिता होने पर  गर्व था। वे हमेशा कहते थे जब तक बेटी बाप के घर में है में लड़के वालो के सामने क्यों झुकू। मुझे बेटी का बाप होने का कोई गिला नही है। भगवान मेरी जैसी बेटियाँ कितनो को देता है। उनकी ये कामना अंत तक बनी रही। उनकी बेटियो ने उनका सर नीचा करने लायक कभी कोई काम नही किया। वे उनकी आज्ञाकारी बेटी बनी   रही।
      मोतीराम जी बोले -मुझे माफ़ कर दीजिये मेने आपके सामने गलत शव्दो का प्रयोग किया। में लोगो की बातो में आ  गया था।  शादी की तारीख वही  रहेगी।
  वेद बोले -अपने इतने सारे इल्जाम मेरी बेटी पर लगाये थे। उसके बाद भी आप मेरी बेटी को बहु बना सकेंगे। सोच लो जब मन में एक बार खटका पैदा हो जाये इंसान को उसमें  कमियाँ  ही दिखाई देती है। शादी के बाद आप मेरी बेटी से न्याय कर पायेंगे इसकी मुझे उम्मीद नही है। आपको हमेशा लगेगा आपके बेटे को सुमन ने आपसे छीन लिया। आप किसी और रूप में उस पर अपना गुस्सा उतारने की कोशिश करेंगे। यह हमसे सहन नही होगा हम ये चाहते है। यह रिश्ता यही खत्म हो जाये। हमें भी सुमन के लिए कोई और लड़का मिल जायेगा। आप भी कोई और बहु तलाश कर ले.
      मोतीराम बोले -आप ऐसा मत कहिये मै आपसे अपने कहे के लिए पहले ही माफ़ी मांग चूका हूँ। मै किस रूप में आपसे क्षमा मांगू जिससे आप बीती बाते भूल जाये। मेरा बेटा सुमन के आलावा किसी और लड़की से शादी करने के लिए तैयार ही नही है।  इस बीच कई  और जगह बात चलाने की कोशिश की लेकिन उसने किसी भी लड़की को देखने से मना कर दिया। उसके चेहरे से सारी रौनक खत्म हो गयी है। वह किसी से कुछ कहता नही है। लेकिन उसके चेहरे से उसका दुःख स्पष्ट दिखाई देता है। मुझसे बेटे का दुःख देखा नही गया। इसलिए में लड़के वाला होने के बाबजूद आपके पास आया हूँ। इस रिश्ते के टूटने से सबको दुःख होगा। बच्चे के लिए अभिभावकों को अपना अहम छोड़ देना चाहिए।
     वेद भी सुमन को देखकर सोचते थे उसकी हंसी गायव गई गयी है। सुमन का चेहरा भी बुझा -बुझा सा हो गया था। सुमन वेद के सामने अपने को सामान्य रखने की कोशिश करती  थी लेकिन वेद की पारखी आँखे उसके अंदर का दुःख महसूस कर रही  थी ।  वेद और मोतीराम दोनों का दुःख सामान था। इसलिए वेद  मोतीराम से समझोता करने के लिए तैयार हो गए।
       वे मोतीराम से बोले -में इस बारे में अपनी पत्नी से पूछकर आपको जबाब दे सकूँगा।
    वेद ने घर में जाकर सुकन्या से विचार -विमर्श किया। सुकन्या ने कहा-सबको इस रिश्ते के बारे में पता है। रिश्ता हम तोड़े या लड़केवाले, दोनों तरफ से हमारी बेटी की बदनामी होगी। हम किस-किसको समझायेंगे की रिश्ता हमने तोडा है। सब मेरे मुँह पर मेरी सी और दूसरे के सामने दूसरे के मन की बात करेंगे। दोनों हालत में हमें दुःख का सामना करना पड़ेगा। जब मोतीराम जी खुद चलकर आये  है। आपसे अपने कहे की माफ़ी माँग  रहे है। हमें और क्या चाहिए। आप उनसे आश्वासन ले लीजिये। आगे से ऐसा कुछ नही होना चाहिए। यदि वे ऐसा आश्वासन देते है। तो शादी करने से मुझे कोई गुरेज नही है।
     वेद के मन में मोतीराम और सुकन्या के शब्दों का असर हो चूका था। वे शादी का निर्णय कर चुके थे। उन्होंने मोतीराम से आकर कहा -मेरी पत्नी की सहमति है। लेकिन वह आश्वासन चाहती है। बाद में सुमन को इस स्थिति का सामना नही करना पड़ेगा।
     मोतीराम अपने घर से ही निर्णय करके आये थे। हर हालत में इस टूटे हुए रिश्ते को जोड़ना है। उन्होंने आश्वासन दिया। आपकी बेटी को हमारे घर में किसी तरह की परेशानी का सामना नही करना पड़ेगा। इस बात से आप निश्चिन्त रहे।
    उनके इस आश्वासन से वेद  और सुकन्या सुमन के भविष्य के प्रति आश्वस्त हो गए। उन्होंने सुमन  की शादी की तैयारी करनी शुरू कर दी।  

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     सुमन को देखकर मोहन ऐसा दीवाना हुआ कि  उसने सुमन के घर आने की इजाजत मांगी। वेद ने उन्हें घर पर सुमन से मिलने की इजाजत दे दी। मोहन  काम से समय निकाल कर सुमन के घर आने लगा। इतने बड़े परिवार में मोहन कभी भी सुमन से अकेले नही मिल पाते  थे। उन्हें सुमन से बात करने का मौका भी नही मिलता था। लेकिन मोहन  सुमन को दूर से देखकर ही संतुष्ट हो  जाता था।  उनकी शादी एक साल के लिए रुकी थी। ये समय मोहन के लिए काटना दुश्वार हो रहा था। वे अपने अभिभावकों का विरोध नही कर पा  थे। मोहन जब सुमन के घर आते  उनको सुमन से कभी बात करने का मौका नही मिल पाता था । उनका मन सुमन से बात करने के लिए कसमसाता रहता था।  इसका उपाय मोहन ने ढूंढ  निकाला। उसने सुमन से पत्र लिखने के लिए कहा जिससे वे अपने मन के उदगार  व्यक्त कर सके।सुमन ने वेद से मोहन के द्वारा पत्र लिखने के बारे में इजाजत मांगी।
       वेद ने उन्हें पत्र लिखने की इजाजत दे दी। उन दिनों शादी से पहले लड़की , लड़के को देखने की इजाजत भी नही होती थी। सिर्फ बड़े लोग रिश्ता लड़की को देख कर पक्का कर देते थे। उन पर भरोसा करके लड़का विवाह मंडप में शादी करने आ जाता था।  उस हिसाब से मोतीराम के कहने पर उन्होंने मोहन को लड़की को देखने का और मिलने का मौका भी दे दिया।अब वे पत्र व्यवहार करने लगे। 
     वेद अभी दुनिया की चालबाजीयों से अनजान था। उसके ध्यान में सब कुछ अच्छा हो जायेगा। अब मोहन के पत्र सुमन के पास लगातार आने लगे। जब मोतीराम को मोहन के सुमन के घर जाने  और पत्र लिखने के बारे में पता चला। उनके परिवार में खलबली मच गयी। वे सोचने लगे। सुमन ने उस पर जादू कर दिया है। उनका सीधा -साधा बेटा सुमन के रुपजाल  में फंस गया है। उनके दिमाग में सुमन एक जादूगरनी के तौर  पर बैठ गयी। उनके मन में गुस्सा उफ़न के आने लगा।
        मोतीराम वेद के घर आकर उनके सामने कहने लगे -ये सब क्या हो रहा है  आपको बेटी मोहन से मिलने लगी है। हमें ये बिलकुल पसंद नही है।
     वेद को उनके शब्द सुनकर गुस्सा आ गया। वे बोले - आप ये कैसे कह रहे है। मेरी बेटी हमेशा अपने घर में रहती है। आपका बेटा हमेशा हमारे घर आता  है। पाबन्दी लगानी है तो अपने बेटे पर लगाओ जो काम छोड़कर दो घंटो का सफर तय करके हमारे घर आता  है। उसे कोई बुलाने नही जाता। जब वह आ जाता है तो क्या मै उसे घर में घुसने से मना कर दू। यदि रोकना है या कोई लांछन लगाना है तो अपने बेटे पर लगाओ।  सुमन  मोहन से मिलने आपके घर नही जाती बल्कि मोहन हमेशा आता है। उनकी सगाई हो गयी है। में उसे क्या कहकर आने से रोकूँ। मुझे समझ नही आता। आप यदि अपने बेटे को रोक सको तो रोक लो। मेरी इजाजत के बगैर मेरी बेटी आपके  बेटे से  मिलने आये तब उसे गलत कहना। अभी आपको कोई हक नही है। सुमन को गलत कहने का।
      वेद के शब्द सुनकर मोतीराम को एहसास हुआ गलती सुमन की इतनी ज्यादा नही है।  जितना उनके बेटे की गलती है।  वे सुमन को दोषी  समझ रहे थे। वे पानी -पानी हो गए। उनके पास कहने  के लिए शब्द नही बचे। वे अपना सा मुँह  लेकर चले गए।
     उनके इस बर्ताब से सबने समझ लिया ये रिश्ता टूट गया। अब इस घर में शादी नही हो सकती। वेद ने सुमन को भी सख्ती से पत्र लिखने से मना कर दिया। सुमन ने उनके आदेश को मान लिया।
      सुमन को डर  लगने लगा।  यदि मोहन से उसकी शादी नही हुई। मोहन उसके लिए दीवानो जैसा व्यवहार कर रहा है। यदि किसी और जगह उसकी शादी हो गयी तो  वह उसके लिखे पत्रो का गलत उपयोग ना करने लगे। जैसे -जैसे दिन बीतने लगे सुमन का डर बढ़ने लगा। लेकिन वह अपने डर के बारे में किसी को बता नही पा रही थी। उसके लिए केवल भगवान का भरोसा था। उसी पर उसकी श्रद्धा थी। वे ही उसकी नैया पार लगायेंगे। उसकी मुक्ति का रास्ता दिखाएंगे।
       वेद के परिवार में मायूसी छायी हुई थी किसी को समझ नही आ  रहा था गलती किस्से हुई सब अपने -आप को दोषी मान रहे थे। वेद को लगने लगा वे मोतीराम की बातो में क्यों आ  गए। उन्हें अपने बड़ो के सामान ही व्यवहार करना चाहिए था। वे सोच रहे थे इस बारे में वे किसी से जिक्र भी नही कर सकते। अब उन्हें इसका कोई उपाय नही सूझ रहा था।  

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      सुमन को देखते ही मोतीराम का बेटा  मोहन  हैरान रह गया। उसने इतनी अधिक सुंदरता की कल्पना नही की थी। सुमन के चारो और बहाने बना कर आने की कोशिश करने लगा। उसे देखकर सब पशोपेश में पड़  गए। इसी लड़के की शादी को लेकर मोतीराम जी परेशान थे। मोहन से ऐसे व्यव्हार की उम्मीद किसी को नही थी। सुमन की शक्ल और रंगरूप ही बहुत सुन्दर नही था बल्कि उसके  बाल भी काले ,भारी और घुटनो तक लम्बे थे जबकि मोहन के परिवार में सबके बाल बहुत कम थे। वे अपने बालो को लम्बा करने के ढेरो यत्न करती थी पर उनके बालो में कोई खास अंतर नही आता था। सुमन के बालो को लेकर मोहन की बहनो के बीच में बहस छिड़ गयी।  उनके लिए सुमन के बालो की सुंदरता को लेकर बहम था।इतने लम्बे बल असली नही हो सकते।
        वे आपस में बहस कर रही  थी  -ये बाल असली हो ही नही सकते इसने जरूर नकली बाल लगा रखे है।
     वे सब इस मौक़े की तलाश में थे किसी तरह सुमन के बाल  खुलवाये जाये।सब अपने कारणों से सुमन को अपने घर ले जाना चाहते थे। उन सबको सुमन की सुंदरता को लेकर भरम था। उन्हें लग रहा था। इसने सुंदर बनने के लिए मेकअप का सहारा लिया है। जबकि सुमन प्राकृतिक रूप से इतनी सुंदर थी की उसने और परिवार के लोगो ने उसकी सुंदरता बढ़ाने के लिए कभी कोशिश करने के बारे में सोचा नही था। उनके घर में इतने साधन नही थे। उन सब के लिए जीवन जीना  एक संघर्ष था।
      सुंदरता उनके लिए महत्व नही रखती थी। उस घर में सुकन्या और उसकी चारो बेटियाँ  सुंदर थी। उन्हें उनको और सुन्दर बनाने का ख्याल ही नही आता था। सुमन जैसी घर में तैयार होती थी वैसी ही तैयार होकर यहाँ आ  गयी थी। सुमन का रंग इतना गोरा था कि  उसके गाल और होठ अपने आप गुलाबी दिखाई देते थे। उसे किसी मेकअप की जरूरत नही थी। ये बात मोतीराम के परिवार बाले समझ नही सके।
        मोतीराम जी चाहते थे। वेद उनके साथ उनके घर चले ताकि वे लोग इस विषय पर खुल कर बात कर सके। ये सब सुबह दस बजे के करीब वहाँ  पहुँच गए थे। उन सबने वेद के परिवार को घर चलने के लिए जोर देना शुरू कर दिया। उन्होंने कई सारे  कारण उन्हें अपने घर चलने के लिए गिना दिए। जिनके कारण वेद उनके घर चलने के लिए विवश हो गए।
      वेद जब मोतीराम के घर पहुंचे तब उनकी लड़कियाँ सुमन को  अपने साथ दूसरे कमरे में ले गयी। उससे मुँह हाथ धो कर ताजा होने के लिए कहा। सुमन सुबह से निकली हुई थी इस कारण उसे भी गर्मी लग रही थी। उसके मुँह पर उसे गंदगी का अहसास भी हो रहा था। उसने ज्यादा नानुकर  करते हुए हाथ -मुँह धो लिए।                       उसके बाद मोहन की बहनो ने उसे अपने बाल ठीक ढंग से बनाने के लिए जोर देना शुरू कर दिया।  सुमन को अपने बाल  दिन में एक बार बनाने की  आदत थी। इसलिए उसने मना कर दिया। तब उन सबको लगने लगा इसने जरूर नकली बाल  लगाये है। उनका इसरार और बढ़ गया।
       तब परेशान होकर उसने कहा ठीक है - कंघा दे दो यदि आप कह रही है तो मै अपने बाल  बना लेती हूँ।
    मोहन की बहन मेघा ने कंघा लेकर सुमन से कहा -आपके जितने सुंदर बाल इससे पहले मैने कभी नही बनाये। में इसे बनाना चाहती हूँ।
      सुमन ने कहा-ठीक है जैसी आपकी इच्छा।
     सुमन के मन में उनके इस व्यवहार से उनका प्यार प्रकट हो रहा था। उसे बहुत ख़ुशी हो रही थी। जिनसे वह पहले दिन मिल रही है। वे उसका इतना ध्यान रख रही है। इससे ज्यादा किसी को और क्या चाहिए। मोहन का व्यवहार भी उसके मन में गुदगुदी पैदा कर रहा था।
       बहनो को अब उसकी सुंदरता को लेकर जो बहम थे सब  खत्म हो गए। उन्होंने  माँ को बता दिया सब कुछ सही है। तब मोतीराम जी को उन्होंने अपनी सहमति दे दी। मोतीराम  वेद से शादी  के लिए दबाब बनाने लगे।        तब वेद ने कहा -मुझे शादी से कोई एतराज नही है। लेकिन पेसो की तंगी के कारण आप एक साल बाद शादी का महूर्त निकलवा लीजिये। हमें शादी करने में सहूलियत रहेगी। 

#rishta

     सुमन की शादी की बात चले अब दो साल बीत  गए थे। उस रिश्ते के बारे में किसी को याद भी नही था। सब काम बढ़ाने के लिए मेहनत कर रहे थे। वेद का मन अभी सुमन की शादी करने का नही था। सुकन्या वेद को बार -बार सुमन के लिए लड़का देखने के लिए मनाया करती पर वेद पर इसका कोई असर नही होता। सुकन्या रो  झींक के रह जाती उसे इस काम के लिए वेद पर ही निर्भर रहना था। वह खुद सुमन के लिए लड़के वालो के घर नही जा सकती थी। उसका बस चलता वह खुद ही चली जाती पर उस ज़माने के मुताबिक औरतो  को बाहर निकलने का अधिकार नही था। उसके लिए लड़कियों की बढ़ती हुई  उम्र परेशानी का कारण थी।
      दो साल बाद मोतीराम एक दिन उनके दरवाजे पर दिखाई दिए। उन्हें देखकर सबको बहुत हैरानी हुई। सब आपस में विचार करने लगे। इनके आने का कारण किसी को समझ में नही आ  रहा था। उनके हिसाब से उनके इंजीनियर बेटे की अब तक शादी हो जानी  चाहिए थी। अमीर  घराने के पढ़े -लिखे बेटे की शादी होना कोई मुश्किल काम नही था।
     वेद के सामने मोतीराम ने अपने मन का भेद खोला -उनका बेटा किसी लड़की को पसंद नही करता। उसके हिसाब से  मुझे जैसी लड़की चाहिए वैसी लड़की मेरे लिए   बनी  नही है। में ऐरी -गेरी  किसी भी  लड़की से शादी नही कर सकता। अब आप ही बताइये यदि एक लड़का शादी ना  करे तो उसके पिता के मन पर क्या गुजरती है। में निराश होकर दुबारा से आपके दरवाजे पर आया हूँ। मेरी समस्या का हल केवल आपके पास है। मुझे पूरी उम्मीद है। आपकी सुमन को देखकर वह किसी हालत में ना  नही कर सकेगा। एक बार आप अपनी बेटी का सामना मेरे बेटे से करवा दीजिये आपकी बहुत मेहरबानी होगी।
    वेद के मन में आक्रोश था। उनके परिवार के द्वारा सुनाये गए शब्द वे अभी तक नही भूले थे। वही आक्रोश शब्दों के रूप में बाहर निकला -देखीये  आपके शब्दों में नम्रता मुझे इस रिश्ते के बारे में सोचने पर विवश कर रही है। मै  एक लड़की का बाप हूँ। सुमन मेरी आँख का तारा है। आपके घर में कुछ समय के लिए गया तब मुझे अच्छी तरह से सुना दिया गया। उन शब्दों को मै आज भी भूल नही पाया हूँ   मेरी आर्थिक हालत आज भी कोई खास नही बदली है। में आपके मुताबिक दहेज़ नही दे सकूँगा।  में कैसे विश्वास करू  कि जब मेरी   बेटी आपके घर जाएगी उस को सुनाया नही जायेगा। वह मेरे कलेजे का टुकड़ा है। उसके आंसू मुझे तड़पाएंगे।
    मोतीराम की विनम्रता और भी बढ़  गयी. वे बोले  -आप आदमी होकर औरतो की बातो को मन से लगाते  है। औरतो का  बोलना  क्या मायने रखता है। वो हमारी दूर की रिश्तेदार थी। वे नही चाहती थी कि ये रिश्ता तय हो  । लेकिन  बच्चे हमारे हे उनका भला -बुरा हमें सोचना पड़ता है। में इसकी जिम्मेदारी लेता हूँ कि  मेरे परिवार का कोई इंसान आपसे इस बारे में कुछ नही बोलेगा। इस बात का मै  आपको भरोसा देता हूँ।
     मोतीराम की भलमनसाहत वेद को भा  गयी वे बोले -में अपने परिवार की  सलाह लेकर आपको जबाब देता हूँ।
   वेद ने सुकन्या से शादी के बारे में बात की. तो सुकन्या इस रिश्ते के लिए बिलकुल तैयार थी। उसको मनमांगी मुराद मिल गयी थी। उसे इससे अच्छे रिश्ते की उम्मीद नही थी। एक पड़ा -लिखा,खाते -पीते घर का रिश्ता उन्हें बिना किसी मेहनत के घर बैठे मिल रहा था वह इस रिश्ते के लिए ना  नही कर सकी। वेद भी मोतीराम के सामने रिश्ते के लिए तैयार हो गया।
     मोतीराम बोले -आप अपनी बेटी को हमारे घर ले आइये या में अपने परिवार के साथ आप की बेटी को देखने आ जाता हूँ। सभी आपस में मिल लेंगे।
     वेद बोले -हम सुमन को किसी घर में नही दिखाएंगे। आप कोई और जगह निश्चित कीजिये। यदि बात नही बनी तो हमारी बदनामी तो नही होगी। वरना बिना कारण हमारी बेटी बदनाम हो जाएगी। मै  चाहता हूँ  जब तक रिश्ता तय ना हो जाये इस बात की किसी को खबरनही  लगे।
      मोतीराम को वेद की बात समझ में आ  गयी। उन दिनों फोन नही होते थे। हर बात का निर्णय आमने सामने ही होता था। बहुत दूर का सफर करके मोतीराम आये थे दुबारा समय निकाल के आना बहुत कठिन था इसलिए . उन्होंने बिरला मंदिर में परिवार को लाने  की सहमती  दे दी। इतवार के दिन दोनों परिवार निश्चित समय पर बिरला मंदिर पर मिलने के लिए राजी हो गए। 

#charche

     वेद के पुरे परिवार की मेहनत  के कारण  घर के हालत बदलने लगे थे। घर में खुशहाली दिखाई देने लगी थी।  सुमन 17  साल की हो गयी थी। उसकी मेहनत और सुंदरता के चर्चे दूर तक फेल गए थे। सब उसे अपनी  बेटी के और बहू  के रूप में देखने के लिए लालायित दिखने लगे थे। सुकन्या की खुद की शादी १६ साल की उम्र में हो गयी थी। इसलिए सुकन्या वेद पर सुमन की शादी के लिए जोर देने लगी। सुमन के लिए लड़का देखने के लिए वेद को विवश करने लगी।
        वेद उसे समझाने की कोशिश करता -अभी हमारे घर के हालत बदले है। ये हालत सुमन की मेहनत का फल है। यदि ऐसे  उसे अभी रुखसत कर दिया तो हमें परेशानी का सामना करना पड़ेगा। अभी उसकी उम्र खेलने -खाने लायक है। तुम अभी से उसे शादी के बंधनो में बांध दोगी। तो सहज रूप से जी नही पायेगी।
   सुकन्या जबाब देती - तुम्हे केवल सुमन दिखाई देती है। उसके पीछे उसकी तीन बहने और खड़ी है. हिना  तो सुमन से भी बड़ी लगती है।  उसके बाद माला भी जवानी की दहलीज पर खड़ी   है। ये दिनों दो -दो साल के अंतर पर व्याहने लायक हो जाएँगी। हम इन्हे ज्यादा दिन घर पर नही रख पाएंगे।
      वेद का मन अपनी प्यारी सुमन से इतनी जल्दी बिछड़ने के लिए तैयार नही था। वह इस मसले पर सुकन्या से झगड़ भी पड़ता था। मेरी सुमन अभी शादी लायक नही है। सुकन्या के जोर देने पर भी वह लड़का देखने नही जाते थे। इस कारण सुकन्या और वेद के बीच में कई बार अबोला भी हो जाता। पर वेद सुकन्या की बात मानने के लिए  तैयार नही होता।
     सुमन की सुंदरता के चर्चे दूर तक फेल गए थे। एक बार मोतीराम एक लड़की को अपने बेटे के लिए देखने गए। उन्हें वह लड़की पसंद नही आई।
      उन्होंने अपने साथी से कहा -मुझे लगता है। अपनी कौम  में कोई सुंदर लड़की नही है। में तो लड़कियाँ  देख कर परेशान हो गया हूँ।
       उनके साथी  भगत राम एकदम बोल पड़े -आप ऐसे कैसे कह सकते हो सुंदर लडकिया भी आपको मिल सकती है। एक मेरी जानकारी में भी है। लेकिन आपको उस घर से दहेज़ ज्यादा नही मिल सकेगा।
    मोतीराम की निराशा एकदम आशा में बदल गयी।
       उन्होंने कहा -यदि कोई इतनी सुंदर लड़की है तो दहेज मांग ही कौन रहा है।
   भगत राम बोले -एक बार विचार कर लो। बाद में मत कहना मुझे लुटवा दिया। लड़की की सुंदरता में कोई कमी नही है। ये बात में डंके की चोट पर कहता हूँ। उसके पिताजी बहुत बड़ी बीमारी से निकले है। इस कारण उनका पैसा ख़त्म हो गया है। वह तुम्हारी शान के मुताबिक शादी नही कर पाएंगे
   मोतीराम के बहुत कहने पर भगत राम उन्हें सुमन के घर ले आये।  सुमन मोतीराम की आँखों को भा  गयी।         उन्होंने वेद से कहा -मुझे अपने बेटे के लिए आपकी बेटी पसंद है। आप भी हमारे घर आकर हमारे बेटे को एक बार देख लो।
       सुकन्या  घर आये रिश्ते को पाकर खुश हो गयी। अब वेद के पास ना  कहने का कोई कारण नही था। उसे लड़के वाले के घर जाना  पड़ा। वह उनके घर पहुंचे उनके परिवार में पुराना पन  था। उन्हें एक कमरे में बिठा दिया गया। कोई भी उनके पास आकर नही बैठा। वेद से बात करने के लिए कोई नही था। उन्हें मोतीराम का इंतजार करना पड़  रहा था। सुकन्या के कहने पर वेद बेमन से आये  थे. उन्हें यहाँ का माहौल अजीब सा लग रहा था।
    इतने में वेद को घर के अंदर से आवाज आई - लखपति के घर आये हो। उसके जैसा व्याह भी कर पाओगे।
   इतनी बात सुनते ही वेद ने किसी से बात नही की। वे उलटे पैर वापस लौट  आये।
    वेद ने घर आकर सुकन्या से कहा -में ऐसे घर में अपनी बेटी की शादी नही करूँगा। जहाँ मै लड़का देखने गया था। कोई रिश्ता तय नही किया था। लड़के वाले खुद मेरे दरवाजे पर लड़की का हाथ मांगने आये थे। उस पर उन्होंने मेरी हैसियत का ताना सबसे पहले मार  दिया। अभी रिश्ता हुआ नही है। उसपर ऐसे तेवर। ये मेरी लड़की को सुना -सुना कर पागल बना देंगे। में ऐसे परिवार में अपनी बेटी की शादी हरगिज नही करूंगा।
    सुकन्या भी चुप हो गयी।  ये सुनकर सारा घर शांत हो गया। जब शुभ दिन आयेगा ,तभी सुमन की शादी होगी।  

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...