sukh ki paribhasha

            सविता अपनी  बेटी शगुन के  पालन -पोषण करते हुए अपने पढ़ाई  को   भूल गयी । उसकी किलकारियों में उसे  जन्नत नजर आने लगी । शगुन की लोरियों में उसके सपने कहाँ  खो गए उसे पता ही नहीं चला । शगुन अब धीरे - धीरे बोलने लगी थी । उसके मुह से मम्मा सुनना सविता को भाने लगा था । सविता की दुनियाँ उसके परिवार तक सीमित होकर रह गयी थी ।
         शगुन चलने लगी थी उसके कारण सविता हर समय उसका ख्याल रखने के चककर में अपना ख्याल रखना भूल गयी थी ।हर समय काम ही काम करने के कारण उसे इतनी थकावट हो जाती थी । रात के   समय जब वह सोती थी उसे पता ही नहीं चलता था कब सुबह हो गयी । उसकी आँख मुश्किल से खुल पाती  थी ।गाँव में बहुओ को सुबह पांच बजे उठना जरूरी होता है । सविता कितनी भी जल्दी उठने की कोशिश करती उसे थोड़ी देर हो ही जाती तब उसकी सास उसे सुनाते हुए कहती -"जवानी हमें भी  आयी थी । बच्चे हमने भी पैदा किये थे । पर ऐसे देर तक हमने कभी  भी सोने की नही सोची थी ।"
     सविता की हमेशा जल्दी उठने की कोशिश होती पर शगुन सुबह रोने लगती उसे चुप कराने उसकी जरूरत पूरी करने के कारण उसे कमरे में से निकलने में   देर   हो जाती । परिवार में कोई उसकी मुश्किल नहीं समझ रहा था । मनोहर शहर में होने के कारण उसकी कोई मदद नही कर सकता था इतनी छोटी उम्र में इतनी  सारी जिम्मेदारी उसे अकेले सम्भालनी पड  रही थी सविता भरसक सारे काम सही करने की कोशिश करती थी । पर इतना सारा काम वह सही समय पर पूरा नहीं कर पाती थी । तब उसकी सास उलाहना देते हुए कहती - " कितने धीरे से काम करती है । एक हम थे हाथ लगाते ही सारा काम पूरा कर देते थे ।"
     सविता खून के घूंट पी  कर रह जाती । वह  मुह से एक शब्द ना  कहती । तब भी घर की औरते उसकी भलमनसाहत को उसका घुन्ना होने की संज्ञा देती । " घुन्नी हे मन ही मन बुरा सोचती हे ।"
     उसके पास इतना अधिक काम था की वह किसी के बारे में सोच ही नही पाती  थी उसके दिमाग में हर समय जल्दी से जल्दी काम पूरा करके अपनी रोती  हुई बेटी के पास जाने के लिए ललचाता रहता था । उसके दिमाग  में किसी के  बारे  में सोचने का समय ही नही होता था । अपनी बेटी के रोने पर वह उसको चुप कराने  के लिए भी उसके पास समय नहीं बीता  पाती  थी । अब उसे लगने लगा था ।
      वह मन ही मन में कहती -" इसी को ससुराल कहते है । इसी ससुराल में पहुँचाने की मेरे घर बालो ने इतनी जल्दी मचायी  ।अपनी सारी जिंदगी की जमा -पूंजी खर्च दी । क्या यही सुख है ।"
     

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