सविता मनोहर से अपनी अधूरी पढ़ाई के बारे में चर्चा करने लगी । अब मनोहर को लगने लगा इसकी लग्न सच्ची है ।
मनोहर बोला -तुम शगुन के साथ पढ़ाई कर पाओगी । मुझसे मत उम्मीद करना मै तुम्हारी पढ़ने में मदद करूँगा । क्योंकि हमारे समाज में कोई औरत शादी के बाद पढ़ने के बारे में नही सोचती है । लोग जितना तेरा मजाक उड़ाएंगे उतना मेरा भी मजाक उड़ेगा । इसलिए मेरे ख्याल से पढ़ने का विचार मन से निकाल दे इसमें दोनों का भला है ।
सविता बोली -आप एक बार मेरा प्रवेश दिला दो मै आपको किसी भी तरह की शिकायत का मौका नही दूंगी । मनोहर बोला -बेटी की परवरिश के लिए मुझसे कोई उम्मीद मत करना । मुझे तेरी पढ़ाई करना बिलकुल पसंद नही है । में घर के खर्चे लायक कमा रहा हूँ । कौन से तेरे खर्चे पुरे नही हो रहे है । जिसके लिए पड लिख कर नौकरी करने की जरूरत पड़ेगी ।
सविता बोली -मै पैसे के लिए नही मेरे अंदर पढ़ाई के लिए बेचैनी है । वह बेचैनी मुझे हर समय तड़पाती है । में शान्त रहना चाहू तो मुझे शांत नही रहने देती । मेरी इच्छा मुझे दिन -रात बैचेन करती रहती है ।
मनोहर उसके जज्बात नही समझ पा रहा था । उसने ऐसे विचार इससे पहले कभी किसी के मुँह से नही सुने थे । एक कुलवधू पढ़ाई को लेकर इतनी जज्बाती क्यों हो रही है ।
उसने हार मानते हुए कहा -अब जब नये दाखिले शुरू होंगे तब में तेरा दाखिला करवा दूंगा ।
सविता मनोहर के शव्द सुनकर फूली ना समायी । उसे लगने लगा अब उसका पढ़ाई का सपना अवश्य पूरा होकर रहेगा । क्योंकि मनोहर की सहमति है । उसके कान भरने के लिए भी कोई नही है । सविता नए सत्र का इंतजार करने लगी । उसका इंतजार रंग लाया नए दाखिले का समय भी आ गया ।
सविता ने फिर से मनोहर को उसका बचन याद दिलाया । मनोहर उसे टालने के विचार से ऐसे वादे करता रहा था । उसे बिलकुल उम्मीद नही थी । बच्चे और परिवार के साथ सारी जिम्मेदारी पूरी करते हुए भी वह पढ़ाई कर पायेगी।
मनोहर ने कहा - में तुम्हारा दाखिला कॉरेस्पोंडेंस विद्यालय में करवा दूंगा । क्योंकि छोटी शगुन के साथ तुम रोज विद्यालय नही जा सकोगी । तुम्हारे पीछे शगुन को कौन संभालेगा ।
सविता ने इससे पहले ऐसे विद्यालय का नाम नहीं सुना था । वह मनोहर को हैरानी से देखती रह गयी । उसने पूछा - आपका मतलब मुझे समझ नही आया ।
मनोहर ने कहा - मै ऐसे विद्यालय की बात कर रहा हूँ । जहाँ पढ़ने के लिये रोज नही जाना पड़ता । उसके लिए कोई अध्यापक आपको पढ़ाने नही आता ।मै उसकी किताबे ला दूंगा । तुम्हे घर में रहकर खुद उन किताबो से पढ़ना पड़ेगा । तुम्हारी कोई भी पढ़ाई से संबंधित मुश्किल हल नही करेगा । बताओ ऐसे पढ़ाई कर सकोगी ।
सविता मनोहर के शब्द सुनकर सकपका गयी उसने दसवी तक की पढ़ाई विद्यालय से की थी । इससे पहले उसने ऐसे विद्यालय के बारे में नही सुना था ।
सविता बोली -पेपर कैसे होंगे ।
मनोहर ने जबाब दिया -पेपर के लिए एक जगह निश्चित होती है । वहाँ जाकर पेपर देने होते है ।
सविता को ये सब सुनकर घबराहट हो रही थी । फिर भी उसने दाखिले के लिए मनोहर को सहमति दे दी उसके पास पढ़ाई करने के लिए और कोई रास्ता नहीं था।
अगले दिन मनोहर सविता को ले जाकर उसका ग्यारहवीं कक्षा में दाखिला करवा आया । सविता की मुंहमांगी मुराद पूरी हो गयी । उसके विद्यालय से आते हुए कदम जमीन पर नही पड़ रहे थे ।
मनोहर बोला -तुम शगुन के साथ पढ़ाई कर पाओगी । मुझसे मत उम्मीद करना मै तुम्हारी पढ़ने में मदद करूँगा । क्योंकि हमारे समाज में कोई औरत शादी के बाद पढ़ने के बारे में नही सोचती है । लोग जितना तेरा मजाक उड़ाएंगे उतना मेरा भी मजाक उड़ेगा । इसलिए मेरे ख्याल से पढ़ने का विचार मन से निकाल दे इसमें दोनों का भला है ।
सविता बोली -आप एक बार मेरा प्रवेश दिला दो मै आपको किसी भी तरह की शिकायत का मौका नही दूंगी । मनोहर बोला -बेटी की परवरिश के लिए मुझसे कोई उम्मीद मत करना । मुझे तेरी पढ़ाई करना बिलकुल पसंद नही है । में घर के खर्चे लायक कमा रहा हूँ । कौन से तेरे खर्चे पुरे नही हो रहे है । जिसके लिए पड लिख कर नौकरी करने की जरूरत पड़ेगी ।
सविता बोली -मै पैसे के लिए नही मेरे अंदर पढ़ाई के लिए बेचैनी है । वह बेचैनी मुझे हर समय तड़पाती है । में शान्त रहना चाहू तो मुझे शांत नही रहने देती । मेरी इच्छा मुझे दिन -रात बैचेन करती रहती है ।
मनोहर उसके जज्बात नही समझ पा रहा था । उसने ऐसे विचार इससे पहले कभी किसी के मुँह से नही सुने थे । एक कुलवधू पढ़ाई को लेकर इतनी जज्बाती क्यों हो रही है ।
उसने हार मानते हुए कहा -अब जब नये दाखिले शुरू होंगे तब में तेरा दाखिला करवा दूंगा ।
सविता मनोहर के शव्द सुनकर फूली ना समायी । उसे लगने लगा अब उसका पढ़ाई का सपना अवश्य पूरा होकर रहेगा । क्योंकि मनोहर की सहमति है । उसके कान भरने के लिए भी कोई नही है । सविता नए सत्र का इंतजार करने लगी । उसका इंतजार रंग लाया नए दाखिले का समय भी आ गया ।
सविता ने फिर से मनोहर को उसका बचन याद दिलाया । मनोहर उसे टालने के विचार से ऐसे वादे करता रहा था । उसे बिलकुल उम्मीद नही थी । बच्चे और परिवार के साथ सारी जिम्मेदारी पूरी करते हुए भी वह पढ़ाई कर पायेगी।
मनोहर ने कहा - में तुम्हारा दाखिला कॉरेस्पोंडेंस विद्यालय में करवा दूंगा । क्योंकि छोटी शगुन के साथ तुम रोज विद्यालय नही जा सकोगी । तुम्हारे पीछे शगुन को कौन संभालेगा ।
सविता ने इससे पहले ऐसे विद्यालय का नाम नहीं सुना था । वह मनोहर को हैरानी से देखती रह गयी । उसने पूछा - आपका मतलब मुझे समझ नही आया ।
मनोहर ने कहा - मै ऐसे विद्यालय की बात कर रहा हूँ । जहाँ पढ़ने के लिये रोज नही जाना पड़ता । उसके लिए कोई अध्यापक आपको पढ़ाने नही आता ।मै उसकी किताबे ला दूंगा । तुम्हे घर में रहकर खुद उन किताबो से पढ़ना पड़ेगा । तुम्हारी कोई भी पढ़ाई से संबंधित मुश्किल हल नही करेगा । बताओ ऐसे पढ़ाई कर सकोगी ।
सविता मनोहर के शब्द सुनकर सकपका गयी उसने दसवी तक की पढ़ाई विद्यालय से की थी । इससे पहले उसने ऐसे विद्यालय के बारे में नही सुना था ।
सविता बोली -पेपर कैसे होंगे ।
मनोहर ने जबाब दिया -पेपर के लिए एक जगह निश्चित होती है । वहाँ जाकर पेपर देने होते है ।
सविता को ये सब सुनकर घबराहट हो रही थी । फिर भी उसने दाखिले के लिए मनोहर को सहमति दे दी उसके पास पढ़ाई करने के लिए और कोई रास्ता नहीं था।
अगले दिन मनोहर सविता को ले जाकर उसका ग्यारहवीं कक्षा में दाखिला करवा आया । सविता की मुंहमांगी मुराद पूरी हो गयी । उसके विद्यालय से आते हुए कदम जमीन पर नही पड़ रहे थे ।
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