saharnpur

        सविता की   बेटी शगुन  अब दो साल की हो रही थी । उसकी हँसी  और किलकारियों में सविता की दुनिया बसी हुई  थी । अब सविता के सास -ससुर उसे सहारनपुर भेजने के  लिए तैयार हो गए।  सविता की ख़ुशी का ठिकाना ना  रहा  था।  उसे अब  आजादी की साँस लेने का   मौका मिलेगा । उसकी शादी को तीन साल हो रहे थे ।  तीन सालो में सविता को सहारनंपुर  जाने का मौका एक बार भी नही मिला था ।उसका  जीवन सिर्फ सिर्फ  गाँव तक सीमित  रहा था।  उसने गाँव से बाहर निकलकर कोई शहर नहीं देखा था । उसे  लगने लगा उसके जीवन में खुशियो की बाहर आ  जाएगी। वह अपने मन मुताविक जीवन जीयेगी ।
          उसने अब  शहर जाने की तैयारी करनी शुरू कर दी । उसके  सब सामान की तैयारी में घर के लोग उसकी मदद करने लगे । एक दिन ऐसा भी आया जब उसकी प्रतीक्षा ख़त्म  हो गयी । वह सहारनपुर आ  गयी थी ।           उसे सहारनपुर आने पर सब कुछ नया लगने लगा । यहाँ के जीवन का खुलापन  उसे भाने लगा । उसे लग रहा था उसे पंख मिल  गए है । वह हवाओ में उड़ रही है ।  उसे लग रहा था अब उसकी पढ़ाई में कोई बाधा नहीं आएगी । वह मनोहर को अपनी पढ़ाई  के लिए मना  लेगी । एक दिन मनोहर के सामने उसने अपनी इच्छा जाहिर की । मनोहर को हैरानी हुई उसे लग रहा था।  बच्चे के कारण उसका पढ़ाई का मन अब नहीं रहेगा । 
         

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