आप सरकार के द्वारा अधिकतर कहा जा रहा है यदि कोई आपसे रिश्वत मांगे तो उसे रिश्वत न दो । आपको में एक सच्चा किस्सा सुना रही हुँ । जिसे सुनकर आप भी दहल जाओगे । मै एक दिन दिल्ली सरकार के दफ्तर अपनी सहेली के साथ गयी । उसे वहाँ अपना काम था उसने अपने साथ के लिए मुझे ले लिया । मै भी खाली होने के कारण उसके साथ चल पड़ी । ।
वहाँ साधना नामक एक औरत हमसे मिली उसके बेटे को कैंसर हो गया था । उसका जवान बेटा अस्पताल में कैंसर का इलाज करवा रहा था । आपको पता होगा केसर के इलाज में बहुत खर्च आता है । साधना की सारी जमा -पूंजी उसके इलाज में खर्च हो चुकी थी । वह असहाय थी । इस समय उसका बेटा इलाज के लिए छटपटा रहा था । उसने अपने पुराने बिल डिपार्टमेंट में लगा रखे थे । साधना अपना बिल क्लियर करने के लिए गिड़गिड़ा रही थी । उस जगह काफी लोग खड़े थे । उसकी हालत देखकर हमें उसपर तरस आ रहा था । लेकिन हमारे हाथ में कुछ नही था । हम उसकी हालत समझ कर भी उसकी मदद नही कर पा रहे थे । तभी वहाँ के एक क्लर्क ने उससे बाहर चलने के लिए कहा कुछ समय बाद साधना वहाँ से चली गयी । आप समझ सकते है । बाहर जाकर उन दोनों में क्या बात हुई होगी ।
हमारा सामाजिक ढॉचा अभी भी नही बदला है । सरकार भ्रस्टाचार मिटाने की जितनी कोशिश करती है बाबू लोग उसके लिए दूसरा रास्ता निकाल लेते है । पहले मेडिक्लेम के लिए दूसरा दफ्तर था । उसके काम में धांधली के कारण अन्य विभाग में भेजा गया उसमे इससे भी ज्यादा धांधली शुरू हो गयी । पहले बीमारियो के बिल पर रिश्वत नही देनी पड़ती थी । अब उन्होंने उस पर भी रिश्वत लेनी शुरू कर दी । पहले कुछ महीने में बिल क्लियर हो जाते थे । अब एक साल से अधिक समय लग रहा है । ये सब पड़े लिखे लोगो के साथ हो रहा है । आप सोच सकते है । जिसके घर में बीमारी आ चुकी होती है वह मानसिक और आर्थिक रूप से टूट जाता है । ऐसे में जब लोग इस तरह व्यवहार करे तो इंसान कहाँ फरियाद करेगा ।
वहाँ साधना नामक एक औरत हमसे मिली उसके बेटे को कैंसर हो गया था । उसका जवान बेटा अस्पताल में कैंसर का इलाज करवा रहा था । आपको पता होगा केसर के इलाज में बहुत खर्च आता है । साधना की सारी जमा -पूंजी उसके इलाज में खर्च हो चुकी थी । वह असहाय थी । इस समय उसका बेटा इलाज के लिए छटपटा रहा था । उसने अपने पुराने बिल डिपार्टमेंट में लगा रखे थे । साधना अपना बिल क्लियर करने के लिए गिड़गिड़ा रही थी । उस जगह काफी लोग खड़े थे । उसकी हालत देखकर हमें उसपर तरस आ रहा था । लेकिन हमारे हाथ में कुछ नही था । हम उसकी हालत समझ कर भी उसकी मदद नही कर पा रहे थे । तभी वहाँ के एक क्लर्क ने उससे बाहर चलने के लिए कहा कुछ समय बाद साधना वहाँ से चली गयी । आप समझ सकते है । बाहर जाकर उन दोनों में क्या बात हुई होगी ।
हमारा सामाजिक ढॉचा अभी भी नही बदला है । सरकार भ्रस्टाचार मिटाने की जितनी कोशिश करती है बाबू लोग उसके लिए दूसरा रास्ता निकाल लेते है । पहले मेडिक्लेम के लिए दूसरा दफ्तर था । उसके काम में धांधली के कारण अन्य विभाग में भेजा गया उसमे इससे भी ज्यादा धांधली शुरू हो गयी । पहले बीमारियो के बिल पर रिश्वत नही देनी पड़ती थी । अब उन्होंने उस पर भी रिश्वत लेनी शुरू कर दी । पहले कुछ महीने में बिल क्लियर हो जाते थे । अब एक साल से अधिक समय लग रहा है । ये सब पड़े लिखे लोगो के साथ हो रहा है । आप सोच सकते है । जिसके घर में बीमारी आ चुकी होती है वह मानसिक और आर्थिक रूप से टूट जाता है । ऐसे में जब लोग इस तरह व्यवहार करे तो इंसान कहाँ फरियाद करेगा ।
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