मै जब दफ़्तर पहुंची एक बाबू ;रेनू से कह रहा था - ये जो फाइल तुम्हारे सामने रखी है | ये कभी क्लियर नहीं होंगी ।
आपको इसके इतने ज्यादा आत्मविश्वास से भरे शव्द सुनकर अचम्भा हो रहा होगा । लेकिन हमारी दफ्तरी सभ्यता ही ऐसी बन गयी है । आप कितना भी भ्रषटाचार के खिलाफ झंडा फेहराओ या बगावत करो ये बाबू लोग उसमे से भी पैसे बसूलने का रास्ता निकाल लेते है उन्होंने जो सोच लिया उन्हें उससे हिलाना हंसी खेल नही होता है
आप समझ गए होंगे की उस फाइल वालो ने रिश्वत के पैसे उसके ऊपर नही रखे होंगे इसलिए कितनी भी सही फाइल हो उसमे कोई कमी नही हो तब भी एक बार में उसे क्लियर नही किया जाता है मान लो एक बार दफ़्तर जाने पर समय का हिसाब मत लगाओ । केवल पैसे के हिसाब से ही सोचो तो एक बार दफ्तर जाने पर आपके १०० रू खर्च होते है । बाबू ने आपको १० बार बुलवा लिया या उस दफ़्तर में आपके 10 चककर लग गए । आपके १००० रू खर्च हो जाते है । आप ही बताओ ऐसे में लोग क्या करेंगे या क्या करना चाहेंगे । मै आप से ही पूछती हूँ आप रिश्वत देकर काम करवाना पसंद करेंगे या दिमागी ,शारीरिक और आर्थिक परेशानी झेलकर ईमानदारी के रास्ते पर चलने की कसम खाएँगे ।
रम्या की रिटायरमेंट हो चुकी हे उसका ३० लाख का चेक अभी तक क्लियर नही हुआ है उसे पैसो की बहुत जरूरत है । उसकी फाइल में कोई कमी नही है पर काम नहीं हो पा रहा हे वह मानसिक रूप से परेशान है साथ ही इस पैसे पर मिलने वाला ब्याज भी उसे प्राप्त नही हो रहा है । हमारा सामाजिक ढांचा ही ऐसा बन गया है । लोग सिर्फ अपना भला सोचते है" दुनिया जाये भाड़ में । "
आप कभी रिश्वत लेने वालो से किसी और अवसर पर जाकर मिलो आपको उनके शव्दो पर यकीन नही आएगा वे सबसे ज्यादा धर्म -कर्म की बाते करते है । उनके सामने हम जैसे लोग नास्तिक दिखाई देंगे
आपको इसके इतने ज्यादा आत्मविश्वास से भरे शव्द सुनकर अचम्भा हो रहा होगा । लेकिन हमारी दफ्तरी सभ्यता ही ऐसी बन गयी है । आप कितना भी भ्रषटाचार के खिलाफ झंडा फेहराओ या बगावत करो ये बाबू लोग उसमे से भी पैसे बसूलने का रास्ता निकाल लेते है उन्होंने जो सोच लिया उन्हें उससे हिलाना हंसी खेल नही होता है
आप समझ गए होंगे की उस फाइल वालो ने रिश्वत के पैसे उसके ऊपर नही रखे होंगे इसलिए कितनी भी सही फाइल हो उसमे कोई कमी नही हो तब भी एक बार में उसे क्लियर नही किया जाता है मान लो एक बार दफ़्तर जाने पर समय का हिसाब मत लगाओ । केवल पैसे के हिसाब से ही सोचो तो एक बार दफ्तर जाने पर आपके १०० रू खर्च होते है । बाबू ने आपको १० बार बुलवा लिया या उस दफ़्तर में आपके 10 चककर लग गए । आपके १००० रू खर्च हो जाते है । आप ही बताओ ऐसे में लोग क्या करेंगे या क्या करना चाहेंगे । मै आप से ही पूछती हूँ आप रिश्वत देकर काम करवाना पसंद करेंगे या दिमागी ,शारीरिक और आर्थिक परेशानी झेलकर ईमानदारी के रास्ते पर चलने की कसम खाएँगे ।
रम्या की रिटायरमेंट हो चुकी हे उसका ३० लाख का चेक अभी तक क्लियर नही हुआ है उसे पैसो की बहुत जरूरत है । उसकी फाइल में कोई कमी नही है पर काम नहीं हो पा रहा हे वह मानसिक रूप से परेशान है साथ ही इस पैसे पर मिलने वाला ब्याज भी उसे प्राप्त नही हो रहा है । हमारा सामाजिक ढांचा ही ऐसा बन गया है । लोग सिर्फ अपना भला सोचते है" दुनिया जाये भाड़ में । "
आप कभी रिश्वत लेने वालो से किसी और अवसर पर जाकर मिलो आपको उनके शव्दो पर यकीन नही आएगा वे सबसे ज्यादा धर्म -कर्म की बाते करते है । उनके सामने हम जैसे लोग नास्तिक दिखाई देंगे
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