lagan

           सविता अब बहुत खुश थी क्योंकि मनोहर ने उसका ११वी  क्लास में प्रवेश दिलवा दिया था । उसे लगने लगा जैसे उसे चाँद मिल गया है । उसके कई बर्षो की कामना पूरी हुई  थी उसे इस बात की परेशानी नही थी की वह शगुन और पति के साथ सारे  परिवार की जिम्मेदारी उठाते हुए पढ़ाई  कैसे करेगी । उसे लगने लगा पढ़ना  उसके लिए कोई मुश्किल काम नही है ।
    अब मनोहर ने उसे किताबे ला  दी थी । सविता घर का सारा काम ख़त्म करने के बाद  जैसे ही  पढ़ने  बैठती तभी शगुन के उठने का समय हो जाता । उसे भी मम्मी की किताबे चाहिए होती सविता उसे कितने ही उसके पसंद के खिलौने  उसके सामने रखती वह घूम फिर के माँ की किताबो  के पास आ  जाती । किताबो के सामने उसे कोई खिलौना अच्छा नही लगता ।
       तब सविता हँसते हुए शगुन से कहती - "जब तेरा पढ़ने  का समय आये  तब पढ़ना  अभी मुझे पढ़ने  दे ।"
  शगुन अभी केबल २ साल की थी उसे किताबे भी खिलौने  लगती या खाने की कोई चीज जिसे उसे मुँह  में डालना था । उसके लिए माँ के शब्दों का कोई मतलब नही था ।  वह अपनी सोच के अनुसार किताबो को खोलने की कोशिश करती तो उसका पन्ना फट  जाता । शगुन  एकदम समझ जाती उससे कुछ गलत हुआ है वह माँ के मुख की तरफ देखने लगती । थोड़े से अपने छोटे -छोटे दांत  दिखला देती या मुस्कुरा देती । गुस्सा होते हुए भी शगुन की हरकत पर सविता मुस्कुरा देती ।
     सविता की पढ़ने  की इच्छा जबरदस्त थी । सविता थकने पर भी एक बाँह  पर शगुन का सिरहाना बना कर कर उसे सुला रही होती  दूसरे हाथ में उसकी पढने  की किताब होती  । वह कभी भी शगुन पर गुस्सा नही होती उसका और घर का काम ख़त्म होने पर जब तक थक कर निढाल न हो जाये पढती रहती । ऐसे ही रात  के समय वह घर का सारा काम ख़त्म करके किताबे ले कर बैठ  जाती । उसे कोई नही कहता था पढ़ने  के लिए उसके लिए थकान का कोई मतलब नही था । वह चुपचाप पढती रहती ।
      मनोहर की जब रात  को आँख खुलती वह सविता को पढ़ते  देखता उसे बड़ी हैरानी होती वह उससे कहता - तुम्हे पता हे कितना समय हुआ है ।
  सविता एकदम चौंक  कर घडी को देखती और हंसती हुई  कहती - अरे । इतना समय हो गया । पता ही नही चला । अभी थोड़ी देर में सो जाती हूँ । थोड़ा सा रह गया हे इसे ख़त्म कर लूँ ।
     थका हारा  मनोहर उसका जबाब सुनकर सो जाता । कुछ समय बाद जब  फिर से मनोहर की आँख खुलती । वह सविता से कहता - तुमने सोने के लिए कहा था मालूम है । आधी  रात  बीत  चुकी है । कब सोएगी ।
  सविता जबाब देती - अभी पांच मिनट में सो जाती हूँ ।
मनोहर कहता - सुबह जल्दी उठ कर काम भी करना है । सुबह कैसे उठोगी जब सोयेगी ही नही ।
सविता कहती - उसकी आप चिंता मत करो में आपका सारा काम कर दूंगी ऐसा कभी नही होगा । कि  आपको काम से छूट्टी  करनी पड़े ।
    सविता अपने शव्दो की पक्की थी उसके कारण मनोहर का कोई काम देर से नही होता था सविता रात  को कितनी भी देर से सोये वह सुबह जल्दी उठकर सारे  काम निबटा देती थी । उसकी पढ़ाई  के कारण उसके घर के कामो में कभी  भी कोई व्यवधान नही आया । 

dharmik sthal

      पिछले साल आपने  up की आई  एस   अफसर दुर्गा शक्ति नागपाल का नाम और उसका निलंबन की खबरे देखी और सुनी होंगी  । आपने  ध्यान दिया होगा उनके सामने  एक धार्मिक स्थल का निर्माण हो रहा था । उन्होंने उस स्थल को रुकवाने की कोशिश की थी ।  उस स्थल का निर्माण कार्य ( दीवार )भी गिरवा  दी थी । उस विशेष समुदाय के लोगो के दवाव में आकर हमारे नेताओ ने उसे तानाशाह करार दे दिया था ।  जिसके कारण हमारे आकाओ ने उनका निलंबन कर दिया था । उनपर कई और भी इल्जाम   लगाये गए थे ।
     यदि आपको उस जगह जाने का मौका मिले तो आप उस स्थान को देखने जरूर जाना।  आपको उस जगह पर एक मस्जिद बनी  दिखाई देगी । श्री मती  नागपाल के ट्रांसफर के बाद जो अफसर आये  उन्होंने वहाँ  मस्जिद बनने से रोकने की कोशिश नही की ।
       भारत को एक हिन्दू देश समझा  जाता है । पर आपको कई जगहों पर हिन्दुओ के साथ ही भेदभाव देखने को मिल जायेगा । 

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      मै  जब दफ़्तर पहुंची एक बाबू  ;रेनू से कह रहा था - ये  जो फाइल तुम्हारे  सामने रखी है | ये  कभी क्लियर नहीं होंगी ।
   आपको इसके इतने ज्यादा आत्मविश्वास से भरे शव्द  सुनकर   अचम्भा हो रहा होगा ।   लेकिन हमारी दफ्तरी सभ्यता ही ऐसी बन गयी है । आप कितना भी भ्रषटाचार के खिलाफ झंडा फेहराओ या बगावत करो ये बाबू लोग उसमे से भी पैसे  बसूलने का रास्ता निकाल  लेते है  उन्होंने जो सोच लिया  उन्हें  उससे हिलाना  हंसी खेल नही होता है
      आप समझ गए होंगे की उस फाइल  वालो ने रिश्वत के पैसे उसके   ऊपर  नही रखे होंगे इसलिए कितनी  भी सही फाइल  हो उसमे कोई कमी नही हो तब भी एक बार में उसे क्लियर नही किया जाता  है  मान लो एक बार दफ़्तर जाने पर समय का  हिसाब  मत लगाओ । केवल पैसे के हिसाब से ही सोचो तो एक बार दफ्तर   जाने पर आपके १०० रू  खर्च होते है । बाबू ने आपको १० बार बुलवा लिया या उस दफ़्तर में आपके 10  चककर  लग गए । आपके १००० रू खर्च हो जाते है  ।  आप ही बताओ ऐसे में लोग क्या करेंगे या क्या करना चाहेंगे । मै  आप से ही पूछती हूँ  आप रिश्वत देकर काम करवाना पसंद करेंगे या दिमागी ,शारीरिक  और आर्थिक परेशानी झेलकर ईमानदारी के रास्ते  पर चलने की कसम खाएँगे ।
      रम्या  की रिटायरमेंट हो चुकी हे उसका ३० लाख का चेक अभी तक क्लियर नही हुआ है  उसे पैसो  की बहुत जरूरत है  । उसकी  फाइल    में कोई कमी नही है  पर काम नहीं हो पा  रहा हे वह मानसिक रूप से परेशान है  साथ ही इस पैसे पर मिलने वाला ब्याज भी उसे प्राप्त नही हो रहा है  ।  हमारा सामाजिक ढांचा ही ऐसा बन गया है  । लोग सिर्फ अपना भला सोचते है"  दुनिया जाये भाड़ में । " 
    आप कभी रिश्वत लेने वालो से किसी और अवसर पर जाकर मिलो आपको उनके शव्दो पर यकीन  नही आएगा वे सबसे ज्यादा धर्म -कर्म की बाते  करते है ।  उनके सामने हम जैसे लोग नास्तिक दिखाई देंगे   

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     आप  सरकार के द्वारा अधिकतर कहा  जा रहा  है  यदि कोई आपसे रिश्वत मांगे तो उसे रिश्वत न दो । आपको में एक सच्चा किस्सा सुना रही हुँ । जिसे सुनकर आप भी दहल जाओगे । मै  एक दिन दिल्ली सरकार के दफ्तर अपनी सहेली के साथ गयी । उसे वहाँ  अपना काम था उसने अपने साथ के लिए मुझे ले लिया । मै  भी खाली  होने के कारण उसके साथ चल पड़ी । ।
      वहाँ  साधना नामक  एक औरत  हमसे मिली उसके बेटे  को  कैंसर  हो गया था । उसका जवान बेटा  अस्पताल में कैंसर  का इलाज करवा रहा था । आपको पता  होगा केसर के इलाज में बहुत खर्च आता है । साधना की सारी  जमा -पूंजी उसके इलाज में खर्च हो चुकी थी । वह असहाय  थी । इस समय उसका बेटा  इलाज के लिए छटपटा रहा था । उसने अपने पुराने बिल डिपार्टमेंट में लगा रखे थे ।    साधना अपना बिल क्लियर करने  के लिए गिड़गिड़ा रही थी । उस जगह काफी लोग खड़े थे । उसकी हालत देखकर हमें उसपर तरस आ  रहा था । लेकिन हमारे हाथ में कुछ नही था । हम उसकी हालत समझ कर भी उसकी मदद नही कर पा  रहे थे । तभी  वहाँ  के एक क्लर्क ने उससे बाहर चलने के  लिए कहा कुछ समय बाद साधना वहाँ  से चली गयी । आप समझ सकते है । बाहर जाकर उन दोनों में क्या बात हुई  होगी ।
      हमारा सामाजिक ढॉचा अभी भी नही बदला है । सरकार भ्रस्टाचार मिटाने  की जितनी कोशिश करती है  बाबू लोग उसके लिए दूसरा रास्ता निकाल  लेते है । पहले मेडिक्लेम के लिए दूसरा दफ्तर था । उसके काम में धांधली के कारण अन्य विभाग में भेजा गया उसमे इससे भी ज्यादा धांधली शुरू हो गयी । पहले बीमारियो के बिल पर रिश्वत नही देनी पड़ती थी । अब उन्होंने उस पर भी रिश्वत लेनी शुरू कर दी । पहले कुछ महीने में बिल क्लियर हो जाते थे । अब एक साल से अधिक समय लग रहा है । ये सब पड़े लिखे लोगो के साथ हो रहा है । आप सोच सकते है । जिसके घर में बीमारी आ  चुकी होती है वह मानसिक और आर्थिक रूप से टूट जाता है । ऐसे में जब लोग इस तरह व्यवहार करे तो इंसान कहाँ  फरियाद करेगा । 

manohar

       सविता  मनोहर से अपनी   अधूरी पढ़ाई के बारे में चर्चा करने लगी । अब मनोहर को लगने लगा इसकी लग्न सच्ची है ।
     मनोहर बोला -तुम शगुन के साथ पढ़ाई कर पाओगी । मुझसे मत उम्मीद करना मै तुम्हारी पढ़ने  में मदद करूँगा । क्योंकि हमारे समाज में कोई औरत शादी के बाद   पढ़ने  के बारे में नही सोचती है । लोग जितना तेरा मजाक उड़ाएंगे उतना मेरा भी मजाक उड़ेगा । इसलिए मेरे ख्याल से पढ़ने का विचार मन से निकाल दे इसमें  दोनों का भला है ।
    सविता बोली -आप एक बार मेरा प्रवेश दिला  दो मै आपको किसी भी तरह की शिकायत का मौका नही दूंगी ।  मनोहर बोला -बेटी की परवरिश के लिए मुझसे कोई उम्मीद मत करना । मुझे तेरी पढ़ाई करना बिलकुल पसंद नही है । में घर के खर्चे लायक   कमा रहा हूँ । कौन  से तेरे खर्चे पुरे नही हो रहे है । जिसके लिए पड लिख कर नौकरी करने की जरूरत पड़ेगी । 
   सविता बोली -मै पैसे के लिए नही मेरे अंदर पढ़ाई  के लिए बेचैनी है । वह बेचैनी मुझे हर समय तड़पाती है  । में शान्त रहना चाहू  तो मुझे शांत नही रहने देती । मेरी इच्छा मुझे दिन -रात बैचेन करती रहती है ।
    मनोहर उसके जज्बात नही समझ पा  रहा था । उसने ऐसे विचार इससे पहले कभी किसी के मुँह  से नही सुने थे । एक कुलवधू पढ़ाई को लेकर इतनी जज्बाती क्यों हो रही है ।
   उसने हार  मानते हुए कहा -अब जब नये दाखिले शुरू होंगे तब में तेरा दाखिला करवा दूंगा ।
  सविता मनोहर के शव्द सुनकर फूली ना  समायी । उसे लगने लगा अब उसका पढ़ाई  का सपना अवश्य पूरा होकर रहेगा । क्योंकि मनोहर की सहमति है । उसके कान भरने के लिए भी कोई नही है । सविता नए सत्र का इंतजार करने लगी । उसका इंतजार रंग लाया नए दाखिले का समय भी आ गया ।
    सविता ने फिर से मनोहर को उसका बचन याद दिलाया । मनोहर उसे टालने के विचार से ऐसे वादे करता रहा था । उसे बिलकुल उम्मीद नही थी । बच्चे और परिवार के साथ सारी जिम्मेदारी पूरी करते हुए भी वह पढ़ाई कर पायेगी।
  मनोहर ने कहा - में तुम्हारा दाखिला कॉरेस्पोंडेंस विद्यालय में करवा दूंगा । क्योंकि छोटी शगुन के साथ तुम रोज विद्यालय नही जा सकोगी । तुम्हारे पीछे शगुन को  कौन संभालेगा ।
    सविता ने इससे पहले ऐसे विद्यालय का नाम नहीं सुना था । वह मनोहर को हैरानी से देखती रह गयी । उसने पूछा - आपका मतलब मुझे समझ नही आया ।
  मनोहर ने कहा - मै ऐसे विद्यालय की बात कर रहा हूँ । जहाँ पढ़ने के लिये रोज नही जाना पड़ता । उसके लिए कोई अध्यापक आपको पढ़ाने नही आता ।मै उसकी किताबे  ला  दूंगा । तुम्हे घर में रहकर खुद उन किताबो से पढ़ना पड़ेगा । तुम्हारी कोई भी पढ़ाई  से संबंधित मुश्किल हल नही करेगा । बताओ ऐसे पढ़ाई कर सकोगी ।
    सविता मनोहर के शब्द सुनकर सकपका गयी उसने दसवी तक की पढ़ाई विद्यालय से की थी । इससे पहले उसने ऐसे विद्यालय के बारे में नही सुना था ।
    सविता बोली -पेपर कैसे होंगे ।
  मनोहर ने जबाब दिया -पेपर के लिए एक जगह निश्चित होती है । वहाँ जाकर पेपर देने होते है ।
 सविता को ये सब सुनकर घबराहट हो रही  थी । फिर भी उसने दाखिले के लिए मनोहर को सहमति दे दी उसके पास पढ़ाई  करने के लिए और कोई रास्ता नहीं था।
   अगले दिन मनोहर सविता को ले जाकर उसका ग्यारहवीं कक्षा में दाखिला करवा आया । सविता की मुंहमांगी मुराद पूरी हो गयी । उसके विद्यालय से आते हुए कदम जमीन पर नही पड़  रहे थे ।  

saharnpur

        सविता की   बेटी शगुन  अब दो साल की हो रही थी । उसकी हँसी  और किलकारियों में सविता की दुनिया बसी हुई  थी । अब सविता के सास -ससुर उसे सहारनपुर भेजने के  लिए तैयार हो गए।  सविता की ख़ुशी का ठिकाना ना  रहा  था।  उसे अब  आजादी की साँस लेने का   मौका मिलेगा । उसकी शादी को तीन साल हो रहे थे ।  तीन सालो में सविता को सहारनंपुर  जाने का मौका एक बार भी नही मिला था ।उसका  जीवन सिर्फ सिर्फ  गाँव तक सीमित  रहा था।  उसने गाँव से बाहर निकलकर कोई शहर नहीं देखा था । उसे  लगने लगा उसके जीवन में खुशियो की बाहर आ  जाएगी। वह अपने मन मुताविक जीवन जीयेगी ।
          उसने अब  शहर जाने की तैयारी करनी शुरू कर दी । उसके  सब सामान की तैयारी में घर के लोग उसकी मदद करने लगे । एक दिन ऐसा भी आया जब उसकी प्रतीक्षा ख़त्म  हो गयी । वह सहारनपुर आ  गयी थी ।           उसे सहारनपुर आने पर सब कुछ नया लगने लगा । यहाँ के जीवन का खुलापन  उसे भाने लगा । उसे लग रहा था उसे पंख मिल  गए है । वह हवाओ में उड़ रही है ।  उसे लग रहा था अब उसकी पढ़ाई में कोई बाधा नहीं आएगी । वह मनोहर को अपनी पढ़ाई  के लिए मना  लेगी । एक दिन मनोहर के सामने उसने अपनी इच्छा जाहिर की । मनोहर को हैरानी हुई उसे लग रहा था।  बच्चे के कारण उसका पढ़ाई का मन अब नहीं रहेगा । 
         

sukh ki paribhasha

            सविता अपनी  बेटी शगुन के  पालन -पोषण करते हुए अपने पढ़ाई  को   भूल गयी । उसकी किलकारियों में उसे  जन्नत नजर आने लगी । शगुन की लोरियों में उसके सपने कहाँ  खो गए उसे पता ही नहीं चला । शगुन अब धीरे - धीरे बोलने लगी थी । उसके मुह से मम्मा सुनना सविता को भाने लगा था । सविता की दुनियाँ उसके परिवार तक सीमित होकर रह गयी थी ।
         शगुन चलने लगी थी उसके कारण सविता हर समय उसका ख्याल रखने के चककर में अपना ख्याल रखना भूल गयी थी ।हर समय काम ही काम करने के कारण उसे इतनी थकावट हो जाती थी । रात के   समय जब वह सोती थी उसे पता ही नहीं चलता था कब सुबह हो गयी । उसकी आँख मुश्किल से खुल पाती  थी ।गाँव में बहुओ को सुबह पांच बजे उठना जरूरी होता है । सविता कितनी भी जल्दी उठने की कोशिश करती उसे थोड़ी देर हो ही जाती तब उसकी सास उसे सुनाते हुए कहती -"जवानी हमें भी  आयी थी । बच्चे हमने भी पैदा किये थे । पर ऐसे देर तक हमने कभी  भी सोने की नही सोची थी ।"
     सविता की हमेशा जल्दी उठने की कोशिश होती पर शगुन सुबह रोने लगती उसे चुप कराने उसकी जरूरत पूरी करने के कारण उसे कमरे में से निकलने में   देर   हो जाती । परिवार में कोई उसकी मुश्किल नहीं समझ रहा था । मनोहर शहर में होने के कारण उसकी कोई मदद नही कर सकता था इतनी छोटी उम्र में इतनी  सारी जिम्मेदारी उसे अकेले सम्भालनी पड  रही थी सविता भरसक सारे काम सही करने की कोशिश करती थी । पर इतना सारा काम वह सही समय पर पूरा नहीं कर पाती थी । तब उसकी सास उलाहना देते हुए कहती - " कितने धीरे से काम करती है । एक हम थे हाथ लगाते ही सारा काम पूरा कर देते थे ।"
     सविता खून के घूंट पी  कर रह जाती । वह  मुह से एक शब्द ना  कहती । तब भी घर की औरते उसकी भलमनसाहत को उसका घुन्ना होने की संज्ञा देती । " घुन्नी हे मन ही मन बुरा सोचती हे ।"
     उसके पास इतना अधिक काम था की वह किसी के बारे में सोच ही नही पाती  थी उसके दिमाग में हर समय जल्दी से जल्दी काम पूरा करके अपनी रोती  हुई बेटी के पास जाने के लिए ललचाता रहता था । उसके दिमाग  में किसी के  बारे  में सोचने का समय ही नही होता था । अपनी बेटी के रोने पर वह उसको चुप कराने  के लिए भी उसके पास समय नहीं बीता  पाती  थी । अब उसे लगने लगा था ।
      वह मन ही मन में कहती -" इसी को ससुराल कहते है । इसी ससुराल में पहुँचाने की मेरे घर बालो ने इतनी जल्दी मचायी  ।अपनी सारी जिंदगी की जमा -पूंजी खर्च दी । क्या यही सुख है ।"
     

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       जब मनोहर घर आये सविता ने एक दिन मनोहर से कहा -में आगे पढ़ना  चाहती हूँ ।
 मनोहर बोला - इस घर में रहकर पड़ना बहुत मुश्किल है । सारे  दिन घर के काम करती हो । उसके बाद तुझे जानवरो के काम करने पड़ते है  । तू कैसे पड  सकेगी ।
   सविता बोली -इसकी तुम चिंता मत करो । मै  किसी काम में कमी नहीं रहने दूंगी । तुम्हे मेरी पढ़ाई और काम को लेकर कोई परेशानी नहीं होगी । यदि तुम किसी भी तरह की कमी देखो तो मेरी पढ़ाई  छुड़वा देंना ।
    मनोहर को उसके तर्क पसंद नहीं आये वह  बोले -तुम अभी गर्भवती हो । उस पर तुम्हे इतना काम करना
पड़ता है  । तुम इतना सारा काम नही कर पाओगी । तुम एक इंसान हो मशीन नहीं ।
      सविता के अंदर पड़ने की ललक थी । वह हर स्थिति से समझोता करने के लिए तैयार थी । उसके अंदर पढ़ाई  की इच्छा उसे बेचैन करती थी । उसकी बेचैनी कोई समझ नहीं पा  रहा था ।
      सविता ने मनोहर की बहुत खुशामद की पर वह उसको पढ़ाने के लिए राजी नहीं हो रहा था ।
  तब सविता बोली - एक बार आप मुझ पर भरोसा करके तो देखो में तुम्हे परेशान नही करूंगी किसी को बोलने का मौका नही दूंगी ।
  मनोहर उसके इस इसरार पर पसीज गया । या उसको टालने  के लिए कहा - अभी तुम गर्भवती हो ।  इस बच्चे के जन्म के बाद तुम्हारा दाखिला  करवा दूंगा ।
     मनोहर ने दुनिया देखी  थी वह सविता का दिल दुखाना नही चाहता था । उसके हिसाब से जब बच्चा हो जायेगा उसके इतने सारे काम करने पड़ेंगे सविता के मन से सारा पढ़ाई का जूनून ख़त्म हो जायेगा ।
      सविता उसके इस आश्वासन से प्रसन्न हो गयी उसमे नया जोश आ  गया । वह ख़ुशी से बच्चे के आने का इंतजार करने लगी । उसे उम्मीद थी उसका पति उसकी इच्छा जरूर पूरी करेगा । उसे कहा मालूम था उसका पति उसकी बचकानी उम्मीद को टालना  चाहता है । जिस इलाके में पिता अपनी बेटी की पढ़ाई को गैर जरूरी समझ सकता है । वहाँ  के माहौल में पति के लिए उसकी इच्छा क्या मायने रखती है ।
       समय उपरांत सविता ने एक प्यारी सी बच्ची को जन्म दिया । अब उसे राहत महसूस होने लगी । उसे कुछ दिन आराम के मिलेंगे । सविता इस समय केबल सोलह साल की थी । एक बच्ची की माँ बन चुकी थी । वह दिन रात बेटी के काम में लगी रहती थी । उसके जीवन में एक नया मोड़ आ  चूका था । आज भी भारत में ऐसे कई  राज्य है । जहाँ बच्चियाँ ही बच्ची को जन्म देती है । 

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       सविता शादी के बाद ससुराल में आयी  । उसके ससुराल का माहौल  भी मायके जैसा था । वहाँ  भी सब कुछ ठेठ गाँव का माहौल  था । अब सविता का मन घुटने लगा । उसे लगा इस घर में भी उसका जीवन बंधा -बंधा सा होगा वह यहाँ खुल कर साँस नही ले पायेगी । सविता के पति मनोहर की नौकरी सहारनपुर में थी वे सिर्फ छुट्टी के दिन ही घर पर आते थे बाकि दिन सहारनपुर में रहते थे । उन्होंने  कहा - सविता  को अपने साथ शहर ले जाना   चाहता हूँ । उनकी बात पर  तो घर में बबाल  मच गया ।
   सास ने कहा - अभी से अपने साथ रखने की बात करता है । साऱी  जिंदगी तेरे साथ रहेगी कुछ समय इसे बड़ो की सेवा कर लेने दे ।
 मनोहर बोला -वहाँ  मुझे खाने की दिक्क़त  आती है । उलटी सीधी ,कच्ची -पक्की रोटी कब तक खाऊ ।
माँ बोली - अब तक भी तो खा रहा था । बहू  के आते ही वो खाना बेस्वाद हो गया । तेरे में कुछ शर्म -लिहाज है  की नहीं । एक तू ही बहु बाला  हुआ है किसी और की तो अब तक शादी हुई  नही है । जो बड़ो से जुबान लडाता है ।
मनोहर बोला - आप आकर तो देखो वहाँ  कितनी परेशानी का मुझे सामना करना पड़ता है । सुबह जल्दी उठकर सारा घर का काम करता हूँ । उसके बाद तैयार होकर नौकरी पर जाऊ । पूरे  दिन वहाँ काम करू । थका हारा घर आउ तो कोई दो  रोटी पूछने के लिए भी नही होता । फिर पेट भरने के लिए खाने की  जुगाड़ में लगना  पड़ता है ।
     माँ बोली -अब तक भी तो जिंदगी जी रहा था । कुछ दिन बहु को हमारे साथ रहने दे इसे घर के संस्कार और रीति -रिवाज सीखा दू तब इसे अपने साथ ले जाना  ।


 ये सुनकर मनोहर चुप हो गए गाव के माहौल  में शादी के बाद भी पति के पास  पत्नी को अपने साथ रखने का अधिकार नही होता । इसलिए मनोहर ज्यादा देर तक परिवार बालो से बहस नही कर पाये ।
         मनोहर सहारनपुर और सविता गाँव  में सास ससुर की सेवा में दिन -रात  लगी रहती । गाँव में उसकी मदद करने के लिए कोई भी नहीं होता था । कब सुबह शाम में बदल जाती उसे पता ही नही चलता । कोई नौकर -चाकर उसकी मदद के लिए नही था । परिवार का कोई सदस्य उसकी मदद करने नही आता  था । सविता सिर्फ पंद्रह साल की थी अब वह पूरी गृहस्थी अकेले सँभालने लगी थी । उससे यदि कोई काम गलत हो जाता उससे कोई हमदर्दी नहीं दिखाता था । बल्कि उसके काम में कमी निकाल कर सारा घर उसका मजाक बना देता । शाम को दो बात करने के लिए पति का साथ भी नही होता ।
 सविता मन ही मन सोचती रहती -क्या ऐसी ससुराल होती है । इन्हे बहु की नही नौकरानी की जरूरत थी ।
    आज भी गाँव में बहु को  घर के काम- काज सीखाने के नाम पर नौकरानी की जरूरत पूरी की जाती है ।
    

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         सविता छोटे से गाँव  में रहती थी । अभी वह विद्यालय में पड़  रही थी उसमे बालसुलभ चंचलता थी । हर नई चीज को जानने की जिज्ञासा थी । उसके गाँव  में लड़कियों के लिए बहुत पावंदिया थी । उसका मन इन पावंदियो के विरुद्ध विरोध करता था । पुरुषो का वर्चस्व होने के कारण उसको  मन के अनुसार चलने की इजाजत नही थी । उसे घर के अंदर डरी सहमी   जिंदगी जीनी  पसंद नही थी । उसका मन मसोसता रहता था । वह भाई की तरह जीवन क्यों नही जी सकती । उसका साथ देने वाला उस घर में कोई नही था । हर समय उसे सिखाया जाता लड़किया ये नही करती ,लडकिया ऐसे नही करती या लडकिया ये नही कर सकती । वह अपने बड़ो से बहस करना चाहती तो उसे चुप करा दिया जाता । लडकिया ज्यादा नही बोलती । ज्यादा बोलने  बाली  लडकिया बिगड़ी होती है । उसे लगता लड़की बनना एक अपराध है । काश वह लड़की  के रूप में पैदा ही नही हुई  होती । उसका विद्रोही मन ये पावंदिया स्वीकार नही पाता ।
       सविता ने दसवी के पेपर दिये  थे उसके घर में उसकी शादी की बात चलने लगी । उसे अभी पड़ना था । उसने पिताजी के पास जाकर अपने मन की बात रखनी  चाही तो पहले माँ ने कहा -"बाप के सामने बहस करेगी । जो वे सोच रहे है तेरे भले की सोच रहे है । क्या बुड़ी होकर शादी करेगी  । "
      माँ ने सविता की एक नही सुनी । पर सविता हिम्मत वाली लड़की थी । उसने अपनी   शादी की बात को लेकर जिससे भी बात की उसने उसे ही चुप करा दिया । उसने आज तक अपने पिताजी के सामने कभी मुँह नही खोला था । आज उसने खुद अपने पिताजी से बात करने की सोची । उस गाँव  में औरतो  को पुरुषो के सामने बोलने का हक़ नही था । सविता की जिंदगी का मामला था पर उससे पूछा भी नही जा रहा था पंद्रह साल की सविता का मन इसे गवारा नही कर पा  रहा था   ।
      शाम के समय जब पिताजी घर आये । उसने पिताजी से कहा -" मुझे अभी शादी नही करनी है । मुझे आगे पढ़ना है । "उसके पिता हैरानी से उसका मुँह देखते रह गये । इससे पहले उनके सामने कभी कोई इस तरह से नही बोला था । वे समझ ही नही पा रहे थे उनकी बेटी सामने बैठ  कर ये सब कह रही है । जब उन्हें ये बात समझ आई तो वे आपे  से बाहर हो गये । और गुस्से से उसकी माँ को सुना कर बोले -" में पहले ही इसकी पढ़ाई  के खिलाफ था । तेरे कहने पर स्कूल में दाखिला कराया । उसका ही ये परिणाम है ।"
     सविता की माँ ने कहा ="मुझे कहाँ पता था । पढ़ने वाली लडकिया शादी के मामले  मै बड़ो के मुँह लगती है ।"
सविता बोली -" में शादी के खिलाफ नही हूँ । मै सिर्फ आगे पढ़ना  चाहती हूँ ।"
पिताजी बोले -" ज्यादा पड़ लिख जाएगी तब तेरे लिए पड़ा लिखा लड़का कहाँ  से लाएंगे ।"
सविता बोली -" मेंने  सिर्फ दसवी की है । "
पिताजी बोले -"ज्यादा पड़ने के लिए शहर जाना पड़ेगा । गाँव में इसके बाद कोई बड़ा स्कूल नही है ।मेँ  दूर के स्कूल में तुझे भेजूँगा नहीं । जमाना ख़राब है कुछ ऊँच -नीच हो गयी तो मुँह दिखाने लायक ना रहूँगा ।"
सविता ने कहा "-में ऐसा कोई गलत काम नही करूंगी जिससे आपको शर्मिंदा होना पड़े । में आपका सम्मान बढ़ाने का ही काम करूंगी।"
     सविता के पिताजी को उसका बोलना खलने लगा । वे उसकी माँ से बोले -इसे संभाल इसके तेवर अच्छे नहीं है  । ये एक दिन मुझे  मुँह दिखाने लायक ना  छोड़ेगी । "   ये सुनकर सविता की माँ अपना माथा पीटने लगी । उस घडी को कोसने लगी जब वो पैदा हुई  थी । सविता के आंसू और    विरोध करने का किसी  पर कोई असर नहीं हुआ ।
      सविता की शादी उससे 12 साल बड़े इंसान से कर दी गयी । सविता अभी सिर्फ पंद्रह साल की थी । अभी भी भारत में ऐसे बहुत से गाँव हे जहाँ लड़कियों की जायज मांग जैसे पढ़ाई की इच्छा को बगावत मान लिया जाता है ।
      

narm pakodi

          खाना बनाते समय कुछ चीजे अच्छी नही बनती ऐसे ही खाने में पकोड़ी  का स्थान है  कई बार पकौड़िया बहुत सख्त बन जाती है  उनके बारे में सुनना  पड़ता है । इसे बनाने के लिए बहुत ज्यादा मेहनत की  जरूरत नहीं होती है ।
      जब भी पकोड़ी बनाये उसे काफी देर तक फेंटना चाहिए । जितनी ज्यादा देर तक फेंटोगे उतनी ज्यादा हवा बेसन में जाएगी ।पकोड़े उतने ज्यादा नर्म  बनेंगे । यदि फेंटते समय कम मेहनत करोगे उतना नुकसान आपकी पकौड़ियों को उठाना पड़ेगा । आप संतुष्ट नही हो पाओगे ।
         दही -बड़े बनाते समय भी दाल को काफी समय तक फेंटना चाहिए तभी वे नरम बनेंगे ।
    दाल की बड़ी बनाते समय भी दाल को एक दिन पहले पानी में भिगो देना चाहिए । कुछ समय के अंतर पर दाल को फेंटते रहने से दाल की बढ़िया बहुत नरम और हलकी खटास लिए बनेंगी । एक दिन पहले इसलिए कहा है क्योंकि दाल को बहुत देर तक बडियो के लिए फेंटना पड़ता है । हमारा हाथ ज्यादा देर तक काम नही कर पाता थक जाता है । इसलिए थोड़ी -थोड़ी  देर बाद जाकर दाल फेंटने से दाल में ज्यादा बब्बल बनेंगे । बे बाजार की बड़ी की अपेक्षा ताजी बड़ी जैसी बनेगी । वे सब्जी बनाने पर ताजी  बडियो की तरह उपर तैरती हुए दिखाई देंगी ।
    आप सबकी तारीफ की हक़दार बनेंगी । 

bhidant

    मै    और मेरा दोस्त रास्ते में  कार से जा रहे थे । में काफी देर से एक बस के पीछे चल रहा था बस बहुत धीरे -धीरे आगे बढ़  रही थी । में काफी देर से उसके पीछे होने के कारण खीज रहा था ।   हॉर्न बजाने का चालक पर कोई असर नही हो रहा था । मुझे लगने लगा । ये जानबूझकर गाड़ी धीरे चला रहा है । मे अपनी कार  को बस से आगे निकालने की कोशिश करने   लगा । 
        बस से जब मेने अपनी कार आगे निकालनी चाही तो एकदम मेरे सामने सांड  आ  गया । सांड को देखते ही मेने अपनी कार  के ब्रेक लगा दिए । जब तक ब्रेक लगी हम काफी आगे आ  चुके थे । उस सांड के दोनों पैर    आगे के जमींन पर टीके  थे । पीछे के दोनों पैर मेरी कार के बोनट पर थे । इस हालत की हमने कल्पना ही नही की थी । ऐसा भी हो सकता है  ।
       अब हमे बस के धीरे चलने का राज मालूम हुआ । वह सांड  सड़क के बिलकुल बीच में मस्ती में चल रहा था । उसको आस-पास  के यातायात से कोई मतलब नही था । उसके कारण सड़क पर जाम लग गया था । अब हमे अपनी नासमझी और बेसब्री  पर दुःख हुआ ।
        हमारी हालत सांड को बोनट पर देखकर खस्ता हो गयी । आँखों के सामने अँधेरा  छा  गया अब क्या करे समझ ही नही आ  रहा था । हमने धीरे से अपनी कार  को पीछे किया । सांड अपने आप कार  से नीचे उतर  गया । हमने अपनी कार जल्दी से पीछे की उस सांड से काफी दूर हो गए । हमें लगा सांड  गुस्से में आकर हमे नुकसान पहुंचा सकता है  । सांड को कोई फर्क नही पड़ा वह अपनी धुन में जुगाली करता हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा । जब सांड काफी आगे चला गया तब हमने अपनी कार  का टुटा हुआ बोनट उठाया उसे लेकर वापस आ  गये । घर आकर जब कार को देखा उसमे सांड  से टकराने के कारण काफी नुकसान हुआ था । कार  को ठीक करवाने  में काफी समय और पैसे खर्च हुए पर हमें कोई नुकसान नही हुआ । ये अचंभित करता  है ।
       सांड से  ऐसी भिड़ंत की हमने  कभी कल्पना भी नही की थी । उस समय जो  हमारी हालत हुइ होगी आप उस  की कल्पना भी नही कर पाएंगे । 

sand ki savari

          एक बार मै  और मेरे पति सब्जी मंडी में सब्जी खरीदने गए । हम बाजार में सब्जी खरीद रहे थे । अचानक हमे अजीब लगने लगा पर उस तरफ हमारा ध्यान नही गया । हम सब्जी खरीदते रहे । कुछ देर बाद मेने अपने पति को अपने करीब नही देखा । उन्हें देखने के लिए निगाह घुमायी तो वे सब्जी खरीदते हुए थोड़ी दूर चले गए थे ।
        मेरे पति मोहन बाजार में दूर एक दुकान के पास  सामान खरीदते हुए दिखाई दिए । मेने उनके पास एक सांड  को खड़े देखा । में सांड  के बारे में उन्हें बताना चाहती थी । पर वो मेरी  तरफ देख  ही नहीं रहे थे ।  सब्जी मंडी में शोर बहुत ज्यादा था । मोहन मेरी आवाज नही सुन रहे थे । में उन्हें सांड  के बारे में सचेत नही कर पा  रही थी  । साड खाने का सामान खाते  हुए उनके बिलकुल करीब आ  गया  था  ।  मोहन सांड के बिलकुल नजदीक आ  गये  पर उनका ध्यान साड और मेरी तरफ विल्कुल नही था । सांड ने खाना खाने के बाद अपना सर ऊपर  किया तो मोहन उसके सींगो के साथ उपर  उठ गए । वो हैरानी में समझ ही नही पाए ऐसा कैसे हो गया । वो सकते में आ  गए । उनकी हालत खराब हो गयी ।पहले तो उनकी घिग्गी बध  गयी । फिर  उनके मुंह  से आवाज निकली -"बचाओ"। उस मंडी में वो सांड अधिकतर आता  था । तब काफी लोगो का ध्यान मोहन की तरफ चला गया । लोग उन्हें शांत रहने का इशारा करने लगे ।पर  उनके इशारो का असर मोहन पर नही  हो रहा था ।
       बहुत मुश्किल से मोहन को उनके इशारो का मतलब समझ आया । वो लोगो को और अपनी हालत समझ गए । इतने भारीभरकम सांड का सामना करने की   हालत उनमे नही है । न ही उस भीड़ में कोई इंसान उनकी मदद कर पायेगा । तब उन्होंने अपने आपको भाग्य और सांड  के भरोसे छोड़ दिया । क्योंकि अभी तो सांड  शांति से जुगाली कर रहा था यदि भड़क गया तो उन्हें बहुत ज्यादा नुकसान पंहुचा सकता था
       मोहन सांड  के सिर पर सींगो के बीच बैठ कर उसे जुगाली करते हुए देखते रहे ।  कुछ समय बाद सांड  ने दूबारा खाने के लिए  सर नीचे  किया तब मोहन उसके सिर  से नीचे उत्तर कर एक तरफ भागे । उस सांड  को कुछ फर्क ही नही पड़ा । सांड  के सर पर एक आदमी काफी देर तक बैठा रहा और कब उसके सर से उत्तर कर चला गया । साड को अहसास  ही नही हुआ ।
         उन्हें सही सलामत देखकर मेरी साँस में साँस आई । सांड की सवारी करने के बाद पहली बार किसी इंसान को वापस सही हालत में देखने का मौका पहली बार मिला था । साड अपने आकर में मृत्यु का दूत ही  दिख रहा था ।
       इसके बाद हम सब्जी लेना भूल गए कांपते कदमो से घर की तरफ भागे । उसके बाद कसम खायी । आगे से कभी बड़ी सब्जी  मंडी से सब्जी नही लाएंगे । अब भी हम अपनी कसम पर कायम है । आस -पास का सब्जी बाजार ही ठीक है । 
       अब उस वाकये को बीते हुए कफी  साल  बीत  गए हे  उन पलो को सोच कर हंसी भी आने लगी है  । 

lipstic

          औरतो  को मेकअप सम्बन्धी कई  दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता है । उनका मेकअप बहुत जल्दी गायब हो जाता है । उसमे लिपस्टिक गायब होने की दिक्क़त का सामना सबसे ज्यादा होता है । इससे निजाद पाने का तरीका आज में आपको बताने जा रही हूँ । कोई भी चीज खाते या पीते  समय लिपस्टिक भी साथ में गायब हो जाती है । हम मेकअप पुरे समय सुन्दर बने रहने के लिए करते है ।
         जहाँ  भी जाय  और जाते ही सारी  लिपस्टिक गायब हो जाए ऐसा कोई नही चाहता । जब भी खाने का सामान आपके सामने आये आप खाने को   होठो से खीचने की जगह दांतो से खीचने की कौशिश करे । आप देखेंगी आप की लिपस्टिक काफी समय तक टिकी रहेगी । शुरू में आपको काफी मुश्किल लगेगा । बाद में आदत पड  जाएगी ।
           दूसरा उपाय आपको जब भी लिपस्टिक खरीदनी पड़े आप ग्लॉसी न ख़रीदे । यह जब भी लगाओगी और कुछ भी खाने के बाद या कुछ भी लग जाने से ये गायब हो जाएगी । जितनी सुखी  होगी वह उतनी ज्यादा देर तक रुकी रहेगी ।
            आपको कही  ज्यादा देर के लिए जाना हे टचअप करने का मौका न मिले तो आप लूज़  पॉउडर उसके ऊपर प्रयोग कर ले । ये भी काफी देर तक रुकी रहेगी । दफ्तर में काम करने बालियों  के साथ हमेशा होता हे सुबह के समय अप्सरा बनी होती है और शाम के समय सारा मेकअप गायब होता हे  यदि इस का प्रयोग करेंगी तो आप भी पूरे दिन तरो -ताजा और  सुन्दर दिखाई  देंगी । यदि आपको इस उपाय से कुछ फायदा हो तो आप जरूर मुझे बताना । 

bajrang garh

        राजस्थान में अधिकतर दर्शनीय स्थान पहाड़ो के ऊपर  बने है  । जिन्हे देखने के लिए शारीरिक और मानसिक तैयारी की जरूरत होती है । वहाँ  के मंदिर बहुत ऊंचाई पर बने होते है  । बजरंग गढ़ का मंदिर बहुत ऊंचाई पर पहाड़ो के बीच बना है । यहाँ लोग श्रद्धा भाव से जाते है । यहाँ  लोगो की सभी मनोकामनाये पूरी होती है । ये चढाई भी काफी है।  बजरंग  गढ़ के लिए सीडियो का रास्ता बना है । ये सीढ़ियाँ काफी सारी  है । साधारण लोग उनपर चढ़ने में हांफने लगते है । ऊपर पहुंचकर सारी  थकान भूल जाते है । पहाड़ी पर चढ़ने के बाद मंदिर के दर्शन करके आत्मिक शान्ति मिलती है । मेने भी वहाँ मनोकामना मांगी । मन में कुछ अधूरी अकांक्षाए होती है । जो मंदिर में पहुंचते ही बलबती होने लगती है । बाहर का दृश्य मनोहारी है । चारो तरफ उँचे पहाड़ के बीच में बसी हुए आबादी अलग सा सकूँन  दे रही थी । वहाँ से सब चीजे छोटी दिखाई दे रही थी । बजरंग  गढ़  मंदिर के लिए रास्ता आना सागर के पास से जाता है । बजरंगगढ़ के ऊपर  से आना सागर को निहारना बहुत अच्छा लग रहा था । इतनी उचाई से नीला पानी और पानी की लहरे ,उस पर सूर्य की रौशनी जब पानी से टकराती हे तो लगता है  सूर्य ने अपना स्वर्णिम भंडार चारो और फैला दिया है । उस स्वर्णिम आभा से निगाहे हटाने का मन नही कर रहा था ।
         आप   लोगो ने बम्बई की चौपाटी के बारे में सुना होगा । यहाँ भी आना सागर के पास चौपाटी जैसा माहौल बनाया गया है । जो दूर ना जा सके वे लोग यहाँ की चौपाटी पर अपने मन को बहला सकते  है । लोगो के अंदर की रचनात्मकता के दर्शन यहाँ देखने को मिलती  है । ऐसी जगह मन को आनंद से भर देती है । 

pahadi mandir

        आना सागर में एक कृत्रिम टापू बनाया गया है । नाविक ने हमे वहाँ  उतार  दिया वहाँ  पहले से ही  बहुत लोग सैर  कर रहे थे । उन्हें टापू पर देखकर नया अनुभव हो रहा था ।  टापू बहुत छोटा सा था । उसपर लोग घूम रहे थे । वहाँ लोगो की जरूरत  पूरी करने के लिए छोटी सी केन्टीन बनी हुई  थी । लोग उसमे अपनी जरूरत की चीजे ले रहे थे । वो टापू बहुत छोटा था । उसमे केन्टीन की ज्यादा जरूरत नही थी । लेकिन कहते है -"व्यापारी हर जगह पहुंच जाते है । " केन्टीन यही बात चरितार्थ कर रही थी ।
             अँधेरा छाने लगा हमने वापस लौटने की तैयारी की । लौटने वालो की लम्बी पंक्ति में हम भी अपना नंबर आने का इंतजार करने लगे । जब हम वापस आनासागर आये । दौलतबाग वीरान हो गया था । हमें बहुत हैरानी हुई क्योंकि दिल्ली जैसी जगह पर रहने वाले लोगो को इतनी जल्दी वीराने की आदत नही होती । बाग के  बाहर दुकाने अब भी गुलजार थी । हमने बाहर निकल कर अपनी पसंद की चीजे खाई ।
       शाश्त्री नगर का इलाका मुख्य शहर से थोड़ा हटकर है । वहाँ पर चारो और शांति का साम्राज्य था । जो अद्भुत महसूस हो रहा था । शहरी आवाजे नही सुनाई दे रही थी ऐसा लग रहा था हम प्रकृति की गोद  में खेल रहे है। हर पक्षी की आवाज सुनाई दे रही थी ।
        सुबह हमने वहाँ का प्रसिद्ध मंदिर" मेहँदी खोला" देखने का मन बनाया । यह मंदिर पहाड़ो के बीच  में बना हुआ है । चारो तरफ शांति छाई हुई थी । उस शांति में सिर्फ पक्षियों की आवाज ही सुनाई दे रही थी ।  हमें बहुत सारे  मोर दिखाई दिए प्रकृति के बीच इतने सारे मोर मेने पहली बार देखे थे । उनकी आवाज मन को मोह रही थी । पहाड़ो पर ट्रैकिंग का मजा आ रहा था । चारो और जंगल में छोटा सा मंदिर जिसमे शहरी शोर गुल बिलकुल नही था । हम वहाँ सुबह पुजारी से पहले ही पहुंच गए थे । पुजारी ने हमारे सामने मंदिर के कपट खोले थे ।
      ऊपर  जाते हुए हमें थकन का अनुभव हुआ था । पर लौटते हुए  हमने बातो -बातो में कब  रास्ता तय कर लिया पता नहीं चला । शोरोगुल से दूर प्रकृति की गोद में बीताये ये दिन मुझे  रोमांच से भर रहे है । 

aana-sagar

        हम पिछले दिनों राजस्थान के अजमेर  शहर गए थे । आपको हैरानी हो रही होगी गर्मियों में गर्म इलाके में क्यों गए । आपको जानकर आश्चर्य  होगा  राजस्थान दिल्ली की अपेक्षा ठंडा होता है । वहाँ केबल दोपहर में ही गर्मी होती है । सुबह -शाम का मौसम सुहाना होता है । पिछले दिनों वहाँ बारिश होकर हटी थी इस कारण मौसम सुहाना था । हमें वहाँ आना सागर पर घूमना बहुत अच्छा लगा । आना सागर एक पिकनिक स्पॉट की तरह बनाया गया है । जब दरवाजे से अंदर गए वहाँ चारो और हरियाली फैली हुई थी । राजस्थान के बारे में सबको भ्रम है वहाँ हरियाली की कमी होगी पर वहाँ के लोग जागरूक हो रहे है । उनकी कोशिश होती है । जहाँ थोड़ी सी भी जगह दिखाई देती है । वे लोग हरियाली लाने  की कोशिश करते है । कई तरह के पेड़-पोधो की बहार चारो और दिखाई दे रही थी । उस हरियाली ने मेरा मन मोह लिया । बीच -बीच में चलने की जगह बनी हुई  थी । लोग हरियाली पर चलकर घास को खराब नही कर रहे थे । दिल्ली में इस समय अधिकतर जगह घास मुरझाई हुई दिखाई दे जाएगी । वहाँ चारो तरफ खिली हुइ  हरियाली दिखाई दे रही थी ।
         वहाँ हरियाली को पारकर आगे बढ़ने पर संगमर्मर की बनी हुई राहदारी दिखाई दी । उसे बनाने में काफी संगमर्मर का प्रयोग हुआ है । किवदंती है उसका निर्माण मुगलो ने  किया था । उसके निर्माण में मुगल कला प्रतिबिम्बित होती है । वहाँ संगमर्मर  की छतरियों के नीचे बैठकर  आनासागर देखना बहुत अच्छा लग रहा था । आना सागर बनाई हुए झील है । उस झील का पानी चारो तरफ फैला हुआ था । उसकी ठंडी हवा मन को तरो ताजा कर रही थी । उस झील को निहारना मन को सुखद लग रहा था । हम काफी देर तक झील को देखते रहे । उसे देखते हुए मन ही नहीं भर रहा था ।वहाँ अनेक तरह की वेश -भूषा में लोग घूम रहे थे । उनके बात -चीत  के तरीके से वे विदेशी जान पड़ते थे । वहाँ लोगो की बहुतायत थी । सभी जोश से भरे हुए थे । उनका जोश मेरे अंदर भी भरने लगा ।
        लोग नावो में सैर  कर रहे थे । नावों में बैठे लोगो को देखकर हमारा भी मन नाव की सैर करने के लिए मचलने लगा । हम भी नावों के पास पहुंच गए । काफी समय बाद हमें नावो में सवार  होने का मौका मिला । हमारा मन नाव में बैठते ही ख़ुशी से भर गया । नाव बालो ने सुरक्षा के लिए लाइफ -जैकेट का इंतजाम कर रखा था । आना सागर में उन्होंने कई सारे मन को भाने वाले इंतजाम कर रखे थे । जगह -जगह सुन्दर दृश्य बनाये गए थे । जिन्हे देखकर यकींन नही आ रहा था । पानी में चमत्कार कैसे किया है । कुछ साल पहले अजमेर में सुखा  पड़ा था । उस समय उन चीजो के द्वारा सुंदरता बढ़ाई  गयी । जो आज हमे आश्चर्य चकित कर रहे है । लोग मछलियो को खिलाने के लिए चारा डाल रहे थे । जिसके कारण हमारे चारो और मछलिया तैर रही थी । इतनी सारी मछलियो को देखकर मन आनंदित हो उठा था । वहाँ  बैठकर मन का तनाव कहा गायब हो गया पता ही नही चला ।
         

charitre

         चरित्र हम विपरीत लिंग के साथ इंसान के किये गए व्यवहार से नापते हे सही मायने में चरित्र सिर्फ इतने को मानना काफी नही है । वही इंसान सत्चरित्र कहला सकता है ।  जिसकी अपनी सभी इन्द्रियों पर वश  हो । पांचो इन्द्रिया  जिसके वश  में होती है । वही  इंसान सफलता की सीडिया चढ़ता जाता है । अधिकतर लोगो में कमी होती है । वह आगे बढ़ना तो चाहते है । पर जितने संयम की जरूरत होती है । उसके आभाव में पूरे  मन से काम नही कर पाते उनका प्रयास असफल हो जाता है । उनमे निराशा भर जाती है । समाज में मनवांशित जगह नही मिल पाती जिसके कारण गलत रास्ते  पर चल पड़ते है ।
            कुछ समय पहले में राशिद  नामक एक युवक से  एक केम्प  में  मिली ।  यह केम्प युवाओ को चतुर्मुखी विकास की और अग्रसर करने के लिए था । वह मुश्किल से 17  साल का था । अभी जवानी के सफर पर उसने कदम बढ़ाये थे ।
          सभी वहाँ  करवाये जा रहे कार्यक्रम का पालन कर रहे थे । पर राशीद का पूरा ध्यान सिर्फ लड़कियों पर था । जो उस केम्प में आयी  हुई  थी । वह लड़का हर समय किसी लड़की को अकेले मिलने की कोशिश में लगा रहता पर बहुत सारे  लोगो के बीच उसकी इच्छा पूरी नही हो पा  रही थी । एक समय उसे अकेले एक लड़की मिल गयी । उस लड़की के साथ राशीद  ने गलत व्यवहार किया । उसकी शिकायत करने पर उसे केम्प से निकाल दिया । उसकी गलत हरकत के कारण लड़कियाँ डर  गयी । ये केम्प सिर्फ दिन का था । रात में सभी अपने घर चले जाते थे ।  एक साथ लगभग सौ लोगो के बीच केम्प की व्यवस्था थी पर रशीद ऐसे में भी अपनी गलत हरकत से बाज नहीं आया ।
           कुछ सालो बाद मुझे खबर मिली की राशिद  जेल में बंद है  में हैरान रह गयी । अभी वह मुश्किल से २५ साल का हे । गहराई से जाने पर पता चला वह जिस जगह नौकरी करता था वहाँ  चोरी करते हुए रंगे हाथो पकड़ा गया ।
          राशीद सभ्य परिवार से सम्बन्ध रखता है । घर में आर्थिक तंगी नहीं है । ऐसे में आप उसके इस व्यवहार का क्या कारण मानेंगे । शायद आप मेरे विचारो से इतेफाक रखेंगे । 

dhokla

        कुछ खाने ऐसे होते है । जो हम बाजार जैसे बनाना चाहते है । उनका  बाजार जैसा  बनाना कठिन होता है । ऐसे ही गुजराती खाना ढोकला हे बाजार और घर के ढोकले में बहुत अंतर होता है । आप अलग -अलग दुकानो के ढोकले में भी अंतर पाओगे । पर कई चीजे ऐसी होती है जो उन्हें स्वादिस्ट बना देती है ।में आपको ढोकला बनाना तो नही पर उसकी कमिया जो अधिकतर घर में बनाते वक्त रह जाती हे उसके बारे में आपको बताना चाहती हूँ ।
        ढोकला बनाते समय उसमे सोड़े के इस्तेमाल  की जगह" इनो" को प्रयोग करना चाहिए । इनो विल्कुल आखिर में डालना चाहिए क्योंकि उसके बब्बल ज्यादा बनेगे उतना ही ढोकला स्पंजी बनेगा । इनो का पहले प्रयोग करने से वह इतना स्पंजी नही बनेगा । ढोकले के पेस्ट में  ही दो चम्मच चीनी भी डाल देनी चाहिए ।
           ढोकला जब तैयार हो जाए तब उसमे तड़का लगाया जाता हे । तड़के में सरसो  हींग डालने के   बाद इसमें  एक कटोरी पानी डाल देना चाहिए ।    पानी में ही कुछ चीनी स्वादानुसार डाल देनी चाहिए । वह बाजार जैसा बन जाता है। एक बार इस तरह से बना के देखो ।"  फिर मुझे बताओ कैसा  बना ढोकला । आया बाजार जैसा स्वाद ।"

gutkha

       कल  (तम्बाकू  दिवस )तम्बाकू पर बहुत सारे कार्यक्रम हुए जिसमे बताया गया था तम्बाकू खाने से क्या नुकसान हो सकते है या हुए है।   ऐसे में मुझे अपना अनुभव आपसे साझा करने का मौका मिला है । मेरे जानने वाले सुशील जी गुटखा  खाते थे उनकी पत्नी उन्हें मना  करती थी । उन्हें उनका गुटखा खाना बिलकुल पसंद नही था । पर पत्नी के समझाने का उनपर कोई असर नही होता था । रीना को पति का गुटखा खाना बिलकुल नही सुहाता था । उनकी अनुनय -विनय का सुशील पर कोई असर नही होता था । रीना उनके कपड़ो पर गुटखे के धब्बे देखती उनपर लाल -पीली हो जाती पर सुशील एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकल देते ।
         सुशील  की कमीज बहुत गन्दी हो रही थी । उसने कमीज को धोना शुरू किया । उसे कमीज की जेब में कुछ रखा हुआ दिखाई दिया । रीना ने जेब का सामान बाहर निकला । जेब में गुटखे का पाउच खुला हुआ रखा था । रीना ने इससे पहले पाउच में क्या होता है । कभी देखा नही था । जिज्ञासा वस गौर  से देखने लगी । उन्हें उसमे चलता हुआ  कुछ  दिखाई दिया । उसे उन्होंने और भी गौर  से देखा । रीना हैरान रह गई वह  एक  गिरार (छोटा कीड़ा ) थी  । रीना का हाथ चलते चलते रुक गया । वह सोचने लगी । इस कीड़े वाली चीज को खाने के लिए उसके पति उससे हमेशा झगड़ने के लिए तैयार रहते है । वह कमीज धोना भुल गयी । उसके हाथ वही  रुक गए । रीना ने उस गीली कमीज को वैसे ही समेट दिया ।
         सुशील जब शाम के समय घर आये  रीना ने वो गीली गन्दी कमीज उनके सामने खोल के रख दी । रीना ने पूछा -" देखो ये क्या है ।"
   सुशील को पहले कुछ समझ नही आया । वह हतप्रभ सा रीना का मुख देखता रह गया । फिर कहा -" मेँ समझा नही । तुम क्या कहना चाहती हो ।"
     रीना ने कहा - "ये सामान तुम्हारी जेब से निकला है । ये वही गुटखा है । जो आप रोज खाते हो ।"
     सुशील बोला -" इसमें नई  बात क्या है ।"
     रीना ने कहा -"जरा गौर से देखो बहुत कुछ दिखाई देगा । इसमें गिरार भी है । यदि यही गिरार खाने में दिख जाती है । तो खाना उठा के फेंक देते हो । जबकि इस अमृत को खाने के लिए मुझसे लड़ने के लिए तैयार रहते हो ।" जैसे ही सुशील ने गिरार को देखा । उसके बाद उसने रीना से माफ़ी मांगी । उसका सुशील पर इतना असर हुआ । इसके बाद उन्होंने कभी जिंदगी में गुटखा नही खाया । 

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...