बहता पानी निर्मला
भारत में बर्षो से नदियों की स्वच्छता का अभियान चलाया जा रहा था। लेकिन नदियां साफ नहीं दिखाई देती थी। सरकार ने करोड़ो रूपये सफाई पर खर्च कर दिए। लेकिन सुफल नहीं निकला।
दिल्ली में रहते हुए मै एक साफ नदी के लिए तरस गई थी। जहां जाओ वही गन्दा नाला मन को दुखी कर देता था। वजीराबाद के बाद दिल्ली में यमुना नदी काली और बदबूदार हो जाती थी।
किसी ने कहा था -"नदी को साफ करने की जरूरत नहीं है। वह खुद साफ हो जाएगी; उसमे गन्दा पानी मत जाने दो। . उसके समांनातर गंदे नाले का रास्ता बना दो। ." लेकिन तब ये बात समझ नहीं आयी थी .
करोना के लोकडाउन ने इस बात को सिद्ध कर दिया। फैक्टरी का गन्दा पानी नदियों में न जाने के कारण बिना प्रयास के सभी नदिया साफ हो गयी है।
पहले समय में आबादी की कमी के कारण खाने -पीने का सामान ही फालतू होता था ये जानवरो और पानी के जीव जंतु के काम आ जाता था। लेकिन अब बड़ी हुई आबादी और दुनियां जहां ( आधुनिकता के कारण निर्मित )की गंदगी का बोझ जीव जंतु साफ करने में लाचार हो गए थे।
इसलिए सार्थक प्रयासों की कमी के कारण नदिया अपना रूप बदल कर बह रही थी.यानि" गंदे नाले के रूप में "
वरना हमेशा से सत्य है "बहता पानी निर्मला "
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