भारत और विदेशो की व्यापारिक नीतियां
टैक्स और पेनल्टी लगाने वाले कर्मचारी हर काम में कमियाँ निकालते है। यदि उनकी मुंहमांगी मुराद(रिश्वत ) पूरी न की जाये। वे केवल अपना भला सोचते है। उन्हें किसी अन्य मजदूर या फैक्टरी के चलने से कोई मतलब नहीं होता। जब ये बैंक एकाउंट और फैक्टरी सील करते है। उन्हें इस बात का अहसास नहीं होता। वे कितनो के मुँह से निवाला छीन रहे है।उनके इस कदम से मालिक की बर्बादी के आलावा मजदूरों की नौकरी भी छिनती है। जब भारतीय हर राज्य में यही हाल है। तो उन बेरोजगारों को कहाँ नौकरी मिलेगी। उनके घर का चूल्हा कैसे जलेगा।
इसका भारत की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा। जहां पहले हमारी ग्रोथ रेट 7 को छू रही थी। वही अब 3 तक रह जाये तो बड़ी बात नहीं होगी।
जब ये कर्मचारी तालाबंदी या एकाउंट सील करते है। तब मिन्नत करने पर बहुत बड़ा पैसा कोर्ट में जमा करवाने के लिए कहते है। मालिक के लिए इतना पैसा जमा करवाना मुश्किल होता है।
ये कर्मचारी मिन्नत करने पर कहते है, कोर्ट चले जाओ यदि जीत जाओगे तब तुम्हे अपना पैसा मिल जायेगा। अब आप ही सोचो यदि नेक बंदा कोर्ट चला जाये,केस लड़ता रहे तब भी उसका फैसला कितने सालो बाद मिलेगा।दसियो सालो तक कोर्ट के फैसले नहीं होते। तब किस भरोसे पैसा जमा करवाए। इससे बेहतर फैक्टरी बंद करने में ही भलाई समझते है।
सभी समझते है अमीर लोग अपने लिए कमाते है। आप खुद सोचिये 50 साल के आसपास के इंसान की जरूरत कितनी होती है। बीमारियों के कारण बाहर का खाना खा नहीं सकता। सेहत के लिए अधिक से अधिक व्यायाम करना जरूरी हो जाता है।कपड़ा , मकान ,गाड़ी आदि की इच्छाएं कम हो चुकी होती है।
उसके दिमाग में केवल अपनी फैक्टरी और मजदूरों की आवशयकताये ही घूम रही होती है। वे उन्हें अपने बच्चो के सामान ही लग रहे होते है।
व्यापार नकदी के भरोसे चलता है। जब नकदी हाथ में नहीं होगी सारे अकाउंट सील होंगे। उन्हें काम चलाने के लिए पैसा कौन देगा।
उच्च मध्यम वर्ग के हाथ में थोड़ा सा आया पैसा कैसे छिना जाये सभी इसी जुगाड़ में लगे है। अब इन्हे करोड़ो रूपये की पेनल्टी चुकाने के लिए पैसा कौन देगा। इसी कारण एक के बाद एक व्यापार बंद होते जा रहे है।
सरकार को कर प्रणाली को बदलना होगा। कर से उगाही के चककर में मेहनतकशो को मेहनत करने से रोकना भर रह गया है।व्यापारी अपने लिए नहीं बल्कि अपने कामगारों के लिए कमा रहे होते है। उन्हें दिन रात उनकी जरूरते पूरी करने के विचार सोने नहीं देते।
विदेशो में यदि एक इंसान कोई व्यापार खोलकर दो लोगो को काम देने की योजना सरकार के सामने रखता है तो उस देश में रहने के लिए आसानी से परमिट और वीसा मिल जाता है।
जबकि भारत में ऐसे लोगो का काम बंद करवाया जा रहा है हमारे व्यापारियों की तरफ ध्यान नहीं दिया गया तो काला धन वापिस तो नहीं आ पायेगा लेकिन बेरोजगारों की फौज खड़ी हो जाएगी।
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