रम्या की बेटी एक साल की हो गयी थी। उसे सब बहुत प्यार करते थे। वह बड़े परिवार के प्यार के बीच रम्या के पास कम समय के लिए ही आ पाती थी। उसका अधिकतर समय दादी -बाबा के पास बीत जाता था। रम्या उसे खाने -पीने ,या सोने के लिए बुलाने जाती तो वह आने से साफ मना कर देती थी।
रम्या को कई बार उसकी हरकतों पर गुस्सा आता, वह झुंझला कर कहती -रात को भी मेरे पास मत आना।
इसी तरह माँ -बेटी का मान -मनुहार चलता रहता।
रम्या काफी पढ़ी -लिखी थी। उसके मन में इच्छा थी जब उसने इतनी मेहनत से पढ़ाई की है तो उसे नौकरी करनी चाहिए। बहुत समय से नौकरी नही निकल रही थी। जैसे ही सरकार ने अथिति अद्यापको की नौकरी निकाली उसने उसके फार्म भर दिए। उसका चयन नौकरी के लिए हो गया। शुरू में घर के पास ही नौकरी की। मन माफिक काम करने से उसे ख़ुशी मिल रही थी. एक साल की नौकरी में उसे समय का अहसास नही हो पाया। उसको परिवार का भरपूर सहयोग मिला।
अगले साल के लिए उसे दूर जाना पड़ा। किस्मत से जहाँ रम्या को नौकरी करनी थी। महेश को भी उसके पास ही काम करने की सहूलियत हो गयी। लेकिन दादा -दादी ने बेटी को उसके साथ भेजने से मना कर दिया था।
उन्होंने कहा -नौकरी और बेटी सम्भालना तेरे बस का नही है। इसे यही छोड़ दे हम पाल लेंगे।
रम्या के लिए इसका निर्णय करना बहुत कठिन था।अनन्या उसके कलेजे का टुकड़ा थी। उसे छोड़ कर उसके बिना रहना उसके लिए असम्भव था लेकिन उसे उनके शब्दों की सच्चाई का अहसास था। उसके लिए किसी अन्य के सहयोग के बिना बच्चा सम्भालना बहुत कठिन था। इसलिए उन्होने बच्ची को दादी के पास छोड़ दिया।
कुछ समय तक अनन्या की याद उसे विह्वल कर देती। बहुत समय बाद वह अपने मन को मजबूत कर सकी। वह छुट्टी वाले दिन अपनी बेटी से मिलने जाती तो उसकी बेटी उसे माँ कम मेहमान अधिक समझती। रम्या का छलकता हुआ वात्स्ल्य उसे माँ के पास ज्यादा समय तक रख नही पाता। संयुक्त परिवार की बहू होने के कारण वह अनन्या को डांट भी नही पाती थी। माँ के अनुशासन में रहने की अपेक्षा बड़ो का लाड़प्यार उसे भाता था।

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