#grahsthin


  रम्या  को अहसास होने लगा। उसके जीवन में प्यार के अलावा  काम सीखना भी बहुत जरूरी है। अब वह अपनी पड़ोसन से काम के बारे में जानकारी हासिल करने लगी। अब वह मन लगा कर काम सीख  रही थी। धीरे -धीरे वह काम में चतुर होने लगी। सही मायने में अब वह एक गृहस्थिन की तरह घर सँभालने लगी थी। उसकी दिनचर्या सिर्फ किताबो तक सीमित नही रह गयी थी। अब उसे महेश के प्रति जिम्मेदारी का अहसास बना रहता था। 
       इस बीच मानो समय पंख लगा कर उड़ रहा था। कब एक साल का समय बीत  गया उन्हें पता नही चला। इस बीच उनके जीवन में नई ख़ुशी ने पंख फैला दिए थे। रम्या की तबियत कुछ नासाज रहने लगी। वह आलस के कारण काम पूरी तरह नही कर पा रही थी लेकिन ऐसे वक्त में काम करने में महेश उसे पूरा सहयोग देता था। वह उसकी सभी मनपसंद चीजे लाकर देता।
      डॉकटर ने उन्हें सुबह शाम सैर करने के लिए कहा। तब महेश उसे अपने साथ घुमाने ले जाता जहाँ  उसका व्यायाम के साथ मन भी बहल जाता था। उसे नई चीजे भी पसंद आ जाती तो महेश उन्हें खरीदने में बिलकुल गुरेज नही करता। दोनों की जिंदगी हॅसते -मुस्कुराते बीत  रही थी।
    नौ महीने बाद उनके घर एक नन्ही कली ने जन्म लिया। उनको जैसे एक खिलौना मिल गया था। रम्या इस समय मायके में जाकर रही। अब महेश और रम्या के बीच दूरी  आ  गयी। लेकिन रम्या की भलाई के लिए महेश उससे कुछ समय दूर रहा। लेकिन ये दुरी मन के अंदर नही थी। क्योंकि उसे अपनी ससुराल में ज्यादा दिन रहना अच्छा नही लगता था। 
     रम्या जब मायके से ससुराल आई तो बिटिया के साथ उसे एक नई खुशखबरी सुनाई दी उसके पति का स्थानांतरण दिल्ली हो गया है। दो साल वह महेश के साथ अकेली रह चुकी थी।उसने प्यार भरे पल बिताये थे। उसका ये समय एक   लम्बा हनीमून समय था। जिसे दोनों ने बहुत अच्छी तरह व्यतीत किया था। इतना अच्छा समय बहुत कम लोगो के नसीब में होता है.
       बच्चे की परवरिश के लिए बड़ो की जरूरत होती है।  यही सोच कर भगवान ने उन्हें फिर से दिल्ली भेज दिया था।  रम्या की बेटी हाथो -हाथ पलने लगी उसे पता नही चला बच्चे को पालना  केसा होता है। 

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