देश के प्रधानमंत्री ने स्वच्छ भारत का आह्वान जबसे किया है तब से अनेक तरह की दिक्क़ते सामने आ रही है। लोगो के मन में सफाई की भावना पैदा हो गयी है। जनता को स्वच्छ्ता का अहसास हो गया है। सभी अपने चारो तरफ सफाई रखने की कोशिश कर रहे है। सफाई से संबंधित बातो का कोई मजाक नही बना रहा। उनका ये जज्बा देखकर मन खुश हो जाता है।
सफाई कर्मचारियों को कई महीने से वेतन नही मिलता तो वे बेमन से कामो को अंजाम दे रहे है।तीन -चार महीनो तक तनखाह के आभाव में घर के खर्च कैसे चलते है। इस बारे में सोच के देखो आप खुद समझ जाओगे। उनके लिए बिना वेतन के घर और बाहर सम्मान पाना कितना त्रासद होता है। परचूनी वाले से लेकर हर दुकान वाले के उधार पर उन्हें कितना अपमान सहना पड़ता होगा। उनकी स्थिति कितनी हास्यास्पद बन गयी है। कहने के लिए स्थिर सरकार के पक्के नौकर होने के बाद भी हाथ में सरकार के कारण कटोरा पकड़ने की नौबत आ गयी है।
दिल्ली सरकार ने अपना वेतन राष्ट्रपति के वेतन से दुगुना कर लिया है। मंत्री को बहुत सारे भत्ते भी मिलते है। उनकी तनखाह पर किसी तरह का कर नही देना होता है।उनके चारो तरफ चापलूसों की फौज खड़ी होती है। एक आवाज पर हर कोई उनकी जरूरते पूरी करने के लिए तैयार रहता है। उनका आदर -सम्मान इतना ज्यादा होता है कि कोई दुकानदार उनसे पैसो का उलाहना नही करता ऐसे में मुख्यमंत्री के शब्द हास्यास्पद लग रहे है।
मुख्यमंत्री का कहना कि -इससे मंत्रियो के अंदर भ्रस्टाचार खत्म किया जा रहा है.
यही हालात रहे तो एक दिन नगर निगम के कर्मचारी हर और भृष्ट दिखाई देंगे। जब उनके छोटे बच्चे विद्यालय की फ़ीस और दूसरी जरुरतो के लिए उनको लांछित करते दिखाई देंगे। उनके लिए कौन सा कदम सही है या गलत। उसका अंतर कर पाना उनके लिए मुश्किल हो जायेगा।
मै नत्थू कॉलोनी शाहदरा में रहती हूँ वहाँ गंदगी का अम्बार लग गया है। नालियो से गन्दा पानी सड़को पर बह रहा है। जिसकी कई बार शिकायत की है लेकिन संतोषजनक जबाब नही आया। उनसे परस्पर बात करने पर उनकी दास्तान सुनकर मन द्रवित हो गया।
उनके शब्दों पर विचार करने पर उनका दर्द समझ में आ रहा है। आजाद भारत में रहते हुए आज सरकारी कर्मचारी का परिवार भूखे पेट सोने के लिए मजबूर है। जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था उन्नत देशो की श्रेणी में आती है।

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