#mandiro me orto ka pravesh nishedh

       
 हमारे धार्मिक स्थल आज भी बहुत सारे  है जहाँ औरतो का आना निषेध है। जबकि पुरुष अकेले प्रवेश कर सकते है।  जिस देश में औरतो को देवी माना जाता है उन्हें अर्धांगिनी का दर्जा दिया जाता है। ऐसे देश में औरते मंदिरो में प्रवेश नही कर सकती जबकि सारे समुदायों के लिए सभी राजनेता एकजुट होकर उन्हें प्रवेश दिलाने में लगे है औरतो की तरफ आज भी नेताओ का ध्यान नही जा रहा। 
        दक्षिण का सबरीमाला मंदिर, हाजी अली की दरगाह और शिंगणापुर का शनि मंदिर इसी श्रेणी में आता है। शिंगणापुर ऐसा इलाका है जहॉ घरो में आज भी लोग ताले नही लगाते। किसी दुकान यहाँ तक बैंक में भी ताले लगाने की आदत नही है। आपको सुनकर हैरानी हुई।
       बड़े शहरो में आप कुछ समय के लिए बाहर जाने पर बिना ताला लगाये जाने की कल्पना नही कर सकते। वहाँ शिंगणापुर में ताले बाजार में मिलते ही नही है। लोगो के अंदर शनि भगवान के प्रति अटूट आस्था के कारण ऐसा सम्भव हो पा रहा है। 
      शनि देव के प्रति अटूट विश्वाश के कारण तृप्ति  देसाई ने सैंकड़ो ओरतो के साथ 26 जनवरी 2016  को इस मंदिर में प्रवेश की कोशिश की लेकिन पुलिस वालो ने उन्हें मंदिर में घुसने नही दिया। सेंकडो औरतो  का समूह बल भी मंदिर में प्रवेश नही कर सका। आप इस प्रथा को क्या नाम देंगे। हमारी आधी  आबादी  औरते  की होने के बाबजूद ,भारत को आजाद हुए 70 साल 
 हो चुके है। आज भी नारी को सभी मंदिरो में प्रवेश का हक कब तक मिल सकेगा। 
      ये औरते मंदिर में प्रवेश के लिए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से भी मिल चुकी है। उन्होंने इसका संतोषजनक जबाब नही दिया है। 
       अभी तक सेंकडो की तदाद अपना हक़ नही ले सकी है। इस संख्या को ओर अधिक बन कर अपने अधिकारों की लड़ाई तेज करनी पड़ेगी। तभी इन मंदिरो में प्रवेश का अधिकार मिल सकेगा। 

#airlift

     
आप एयरलिफ्ट फिल्म को देखकर जिंदगी के सच  के बारे में जानकर परेशान हो जायेंगे। जिंदगी कुछ ही समय में कहाँ  से कहाँ ले जा सकती हे। इसमें रंजीत कत्याल का चरित्र ऊंचाइयों और अच्छाइयों का मिश्रण है। उसमे अमीरी के साथ लोगो की भलाई करने और जिम्मेदारी उठाने का जज्बा दिखाया गया है। जब इंसान छोटे स्वार्थो से ऊपर उठकर लोगो के लिए कुछ करना चाहता है। तब उसके जीवन में कितनी ज्यादा रुकावटे आती  है। जिंदगी का हर लम्हा मौत और जिंदगी का रास्ता तय करता है। जिंदगी में आये हुए सही निर्णय उसे दूसरो की निगाहो में उठाने का कार्य करते है। 
     सफल लोग अपने कठिन समय में घबराते नही बल्कि उनका डट कर सामना करते है। एक नेता के गुण  हर इंसान में नही होते बल्कि नेतृत्व के गुण  भगवान  विशेष लोगो में देता है। नेता वह इंसान होता है जो जिंदगी में लोगो की जिम्मेदारी लेकर उन्हें सही रास्ता दिखाता है।  रणजीत  का चरित्र लोगो को कठिन समय में सहायता करने की हिम्मत देता है।वह अपने परिवार और अपने सुखो की तिलांजलि देकर लोगो के बीच एक मसीहा बन के उभरता है। उन्हें मझधार में से निकालने की कोशिश करता है।  वह अकेला इंसान बहुत सारे लोगो के लिए उम्मीद का  कारण बन जाता है। उनकी निराश परेशान जिंदगी में रौशनी बन जाता है। 
      आज के समय कुवैत जैसा हादसा कही भी किसी के साथ हो सकता है। अरबो के मालिको के लिए किसी अन्य देश के आक्रमण के कारण एक पल में जिंदगी हादसे में परिवर्तित हो जाती है।इसका उदाहरण आप इराक और सीरिया जैसे देशो के बारे में जानकर महसूस कर सकते हो। 
        इस फिल्म को देखने पर मुझे मध्य कालीन भारत याद आता है। तब सत्ता में स्थिरता नही थी। समय -समय पर आक्रमणकारी भारत की सम्पदा लूटने के लिए आ जाते थे। लेकिन स्थिर सत्ता  के आभाव में  आक्रमणकारियों से लड़ने वाले नही होते थे जिसके कारण  लोगो को जान -माल की रक्षा के लिए जंगलो में भागना पड़ता था।आज हम सुदृढ़ भारत में रहते हुए उन पलो की कल्पना करने में असमर्थ है। यदि आप इस फिल्म को देखेंगे तो उस हालत का सही अंदाजा लगाना बहुत आसान हो जायेगा। जब देश की रक्षा करने वाले ही सबसे पहले देश छोड़ कर भाग जाये तो निरीह जनता की दशा कितनी दुखदायी हो जाती है। 
       इस फिल्म को देखने के बाद एहसास होता है हमारे सुरक्षाकर्मियों के योगदान के कारण ही हम अस्मिता के साथ जीवन- यापन कर पाते है  .वरना जिंदगी के कोई मायने ही नही रह जाते है। मै इतिहास की ज्ञाता रही हूँ इसलिए मेरे मन में सारे  सेनिको के प्रति सम्मान कभी कम नही होता है। उनके रात भर सीमाओ की रक्षा में जागने के कारण हम गहरी नीद सो पाते  है वरना अराजकता के माहौल में हम अपने परिवार की जिंदगी की सुरक्षा करने में भी असमर्थ हो जायेंगे। में अपने सुरक्षा कर्मियों के योगदान के लिए प्रधान मंत्री जी से निवेदन करना चाहूंगी की प्रधानमंत्री फंड की तरह सुरक्षा कर्मी फंड भी बनाया जाये जिससे सभी यथायोग्य अनुदान दे सके।
       उत्तरप्रदेश  सरकार ने इस फिल्म को टैक्स फ्री कर दिया है। सही मायने में यह फिल्म सभी के देखने योग्य है। मै चाहूंगी सभी सरकारें इससे टैक्स हटा दे। इसे देखकर लोगो के अंदर अपने देश के प्रति सम्मान और कुछ करने का जज्बा पैदा होगा।  

#rohit vemula or ajadi ki pribhasha

                                               रोहित वेमुला  और आजादी 
भारत की आजादी के बाद संविधान को लागु हुए आज ६७ साल पुरे हो गए है।  संसार में भारत ही सबसे बड़ा लोकतंत्र है इसमें अब तक सही तरह से चुनाव करवाये जाते है। लोगो के अंदर आज भी प्रजातंत्र  की भावना  दिखाई देती  है।
      भारत एक ऐसा देश है। जहाँ सभी हर दूसरे इंसान को असहिष्णु समझते है। लेकिन जितनी आजादी भारत में दिखाई देती है। उतनी आजादी किसी अन्य देश में दिखाई नही देती। भारत ऐसा देश है जिसमे प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई भी बोल सकता है। कोई भी अल्पसंख्यक संस्थान प्रधान मंत्री को अपने संस्थान में  आने से मना कर सकता है लेकिन एक प्रधानमंत्री ही निरीह प्राणी होता है जो उनकी आज्ञा को सर- माथे लेता है। विरोध में कुछ बोल नही सकता बिना बोले ही समाचार चैनल उसके खिलाफ अनर्गल बकबास करने लगते  हे। 
        भारत में इतने बरसो से आतंकवाद दिखाई दे रहा है। आतंक फैलाने वाले देश के बारे में सभी अच्छी तरह जानते है लेकिन उसके बाद भी उस देश के खिलाफ केवल शव्दिक कार्यवाही करने के आलावा भारतीय नेताओ ने कोई सख्त कदम नही उठाये।
       कुछ समय पहले अपने देखा होगा फ्रांस, रूस ,अमरीका जैसे देशो में एक आतंकवादी घटना होते ही उन देशो ने आतंकवादी देश को मिटा डालने की कसम खा ली। लगभग 60 %जनता जान माल को बचाने के लिए दूसरे देशो में शरण की तलाश में भाग रही है। लेकिन वहाँ की जनता अपने नेताओ के साथ है। 
        भारत में कोई भी सख्त कदम उठाने वाला नेता आज तक नही आया लेकिन बिना सख्त कदम उठाये ही मोदी के खिलाफ बयान बाजी करने से लोग रुक नही रहे। कहा जाता है -एक समय ऐसा आएगा जब भारत में ढेर सारे हथियार होने के बाबजूद, भारत को आतंकवादियों से बचाने के लिए दूसरे देशो से गुहार लगानी पड़ेगी। 
        भारत में रहने वाले रोहित वेमुला का उदाहरण हमारे सामने है। उसने मुंबई में 186 लोगो को मौत के घाट उतारने वाले याकूब को फांसी देने के खिलाफ एक संगठन बना डाला। उसके आंदोलन कारी गतिविधियों के खिलाफ जब अखवारों में उछाला गया और पुलिस वालो ने  उनके कार्यो को देश के  खिलाफ बताया तो उन्हें तीन बार चेतावनी दी गयी। उन प्रतिबंधों का भी  उन लोगो पर कोई असर नही हुआ। 
      उसने अपने हॉस्टल के कमरे को याकूब मेमोरियल हाल बना डाला। लोगो को वहाँ आकर याकूब को श्रद्धांजलि देने के लिए प्रोत्साहित करता था। 
     रोहित के अनुसार एक याकूब की फांसी से हजारो याकूब पैदा होंगे। उसके अनुसार "मुज्जफरनगर बाकी है " एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बना डाली। जिसमे मुस्लिमो को हिन्दुओ पर हमले करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। इसे देखकर आप  रोहित वेमुला को  क्या कहेंगे। 
     भारत में गाय के मांस पर प्रतिबन्ध है। लेकिन रोहित के दिमाग में ऐसा खलल पैदा हो गया था। वह हैदराबाद विश्वविद्यालय में गौ -मांस की दावत का आयोजन करता था। आप किसी हिन्दू से इस तरह की उम्मीद कर सकते है। 
  उसके इन सब कार्यो को देखते हुए   उसके साथ उसके साथियो को निलंबित कर दिया गया। रोहित को निलंबन के बाद भी अपने कार्यो के लिए ग्लानि पैदा नही हुई बल्कि उसने हॉस्टल के बाहर रहकर आंदोलन जारी रखा। उसकी फांसी लगा लेने के बाद सारी  राजनीतिक पार्टियाँ एक स्वर में उसे  देशप्रेमी साबित करने में लगी है। 
    रोहित की फांसी लगा लेने का मुझे दुःख है। उसकी जिंदगी यदि सही रास्ते पर चलती तो देश को एक और अम्बेडकर जैसा नेता मिल सकता था लेकिन आप खुद सोच कर देखिये उसका कृत्य कितना सही था। 
       यदि आने वाले समय में भारत के ऊपर आतंकवादी आक्रमण होने पर आप सोच कर देखिये इन सबका जिम्मेदार कौन होगा। वो नेता जो वोटबैंक की राजनीति करते है। जिनके चारो तरफ खूब सारी पुलिस केवल उन्हें बचाने के काम में लगी रहती है। जिनके ऊपर जो खर्च हो रहे है वे हमारे दिए हुए कर का नतीजा ही है। उनके द्वारा हमारी सुरक्षा में ही घात लगाई जा रही है।
      हमारे लिए अपने देश की और अपनी रक्षा कितनी मायने रखती है। एक बार रोहित वेमुला जैसे लोगो के साथ सहानुभूति रखने से पहले एक बार जरूर सोचने की कोशिश करना आपके लिए क्या सही है। सारे देश के छात्र  उसके साथ एकजुटता दिखाने में लगे है लेकिन आने वाले समय में यदि कोई आतंकवादी घटना में आपका अपना प्रिय दुनिया से चला जाये तो आप इसके लिए किसे दोष देंगे ?जरूर सोचना।  

#startup-standup

                                                    स्टार्टअप -स्टैंडअप 
   
 अब तक सभी सरकार नोजवानो को सरकारी  नौकरी के सपने दिखाती रही है।  सरकारी नौकरी लोगो के लिए सपना बन के रह जाती है। हमेशा बेरोजगारी की समस्या को सभी पार्टिया भुनाती रही है। लेकिन ये धोखा बन कर रह जाती है। लोगो के सपने कभी सच नही हो पाते। 
        एक साथ 10 लोगो को सरकारी नौकरी देने के लिए सरकार को बहुत सारे काम पुरे करने पड़ेंगे जब तक वह 10 लोगो को नौकरी पर लगा सकने में समर्थ होती है तब तक भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण 10 हजार बेरोजगार उठ खड़े होते है। इसलिए बेरोजगारी कम करने के अभियान में सारी  सरकार विफल हो जाती है। 
      मोदी सरकार ने स्टार्टअप की नई नीति बनाई है। इसमें सरकार का दावा है।सभी समर्थवान लोग अपने विचार हमारे सामने लाये ,यदि उनके विचार सही सोच और भविष्य को देख कर लिए गए   होंगे उन्हें उनकी जरूरत के अनुसार ऋण की सुविधा दी जाएगी। उनके स्किल को उन्नत करने में भी सहयोग दिया जायेगा। उन्हें तीन साल तक किसी तरह के कर देने से मुक्त रक्खा जायेगा। कोई भी नया व्यापार शुरू करना आसान हो जायेगा। विपरीत माहौल में असफल होने पर काम बंद करना भी उतना ही  आसान होगा।
       इससे पहले ऐसी योजना अमरीका की" सिलिकॉन वेली  "में रही है अमेरिका देश के नोजवानो को नए व्यापारों के द्वारा बेरोजगारी की समस्या से निबटने में सफल  रहा है। अमेरिका में नया व्यापार खोलना और बंद करना सबसे आसान रहा है। 
      भारत में हमेशा से लाइसेंस राज के कारण नया काम खोलना बहुत कठिन रहा है। मोदी जी के शब्दों के अनुसार आपको सारी सुविधाये एक ही खिड़की से मिल सकेगी। एक नया स्टार्टअप कई लोगो को रोजगार देने में समर्थ होगा। पुराने कामो में बहुत सारे लोगो को खपाया नही जा सकता लेकिन नए स्टार्टअप के कारण बहुत सारे लोगो की जरूरत पड़ेगी। लोगो की मेहनत सही रास्ते पर चलकर देश को उन्नति के रास्ते पर ले जाएगी। 
       जितनी सरकारे अब तक भारत में आई उन्होंने अपनी हार का ठीकरा बड़ी जनसँख्या पर फोड़ा लेकिन मोदी सरकार पहली बार जबान हाथो को अपनी ताकत के रूप में ले रही है। हमारे बीच में बहुत सारे सामर्थ्यवान ,मेहनती और जागरूक लोगो को इसका फायदा उठा कर अपने और दूसरो के सपनो को साकार करने की कोशिश करनी चाहिए। 
     स्टार्टअप के तहत कुछ उद्यमियो ने कई ऐसे उत्पाद बनाये है जिनकी कीमत केवल 50 रूपये है वही चीजे दूसरी कम्पनिया कई हजार रूपये में बेच रही है। इसका सारा फायदा विदेशो में पहुंच रहा है। यदि हमारे श्रम का फायदा भारतीयों को मिले इससे अच्छी बात कोई और क्या होगी। 
     अच्छा वक्त हमेशा नही रहता जब आपको मौका मिला है तो पूरा फायदा उठाना चाहिए हमेशा दूसरे देशो की चीजो को सरहाने की जगह कुछ ऐसा काम करे जिससे दूसरे हमारी सराहना करे। हमसे प्रेरणा ले। 

#malda hinsa

                                                    मालदा हिंसा  
         
            गोधरा कांड और दादरी कांड को खबरों में बहुत उछाला गया था। उसमे एक इंसान की मौत के बाद मोदी को और अखिलेश सरकार को इस्तीफा देने के लिए जोर दिया जा रहा था। मोदी को विदेशो में भी जाने के लिए वीजा नहीं दिया गया। इस तरह का व्यवहार उनके साथ लगभग 10  साल तक किया गया।
      दादरी कांड पर बहुत सारे बुद्धिजीवियों ने अपने पुरुस्कार लौटा  दिए। उनकी  गिनती 75 के आसपास थी। उनके अनुसार देश में असहिष्णुता का माहौल पैदा हो गया है। ऐसे माहौल का वे लोग विरोध कर रहे थे।सभी अख़बार इस घटना से भरे हुए थे। 
       आज मालदा में 2 लाख मुस्लिमो ने कैसे थाने का घेराव कर लिया। पुलिस वालो को  दौड़ा -दौड़ा कर पीटा। थाने को जला दिया। थाने से सारे हथियार लूट लिए गए।  पूरे इलाके में हिन्दुओ के घरो को जला दिया गया। हिन्दुओ पर  हिंसात्मक कार्यवाही की।  इस बारे में सच्ची खबर कही सुनाई नही दे रही। ममता सरकार बिलकुल चुप्पी लगा चुकी है।कोई भी राजनितिक दल इस मसले पर आवाज नही उठा रहा। अब उनके अंदर की  सहिष्णुता की भावना कहाँ खो गयी है। क्यों नही आज वे अपने पुरुस्कार वापिस कर रहे।
      भारत में मुस्लमान एक आवाज पर कई  लाख   एकदम इकठे हो जाते है। आपने कभी हिन्दुओ को इतनी अधिक संख्या में इकट्ठे होते देखा है।
        एक  अख़लाक़ के लिए सारी राजनितिक पार्टियाँ लामबंद हो गए थी.क्योंकि वे मोदी सरकार को नीचा दिखाकर मुसलमानो का वोट बैंक अपने हक में करना चाहती थी। हमारी वोट बैंक की नीति कब तक इस तरह असुरक्षा का माहौल पैदा करती रहेगी।
        हमारे देश में कोई पुलिसवाला या ट्रैफिक पुलिसवाला किसी मुसलमान पर आरोप लगाने से डरता है क्योंकि उसका चलान काटते ही  मुसलमानों  की भीड़ इकट्ठी होकर उन्हें पीटने लगती है.कोई हिन्दू उन्हें बचाने के लिए नही आता क्योंकि हिदुओ के द्वारा उस पुलिस वाले को बचाते ही हर तरफ हिन्दू मुस्लिम दंगे का नाम दे दिया जायेगा। .यदि यही माहौल रहा तो भारत में मुसलमानो की समांनातर सरकार चलने लगेगी जिसपर कोई कानून लागू नही किया जा सकेगा।   
     कानून की रक्षा करने वालो के अंदर यदि डर बैठ जायेगा तो वे कानून को किस तरह लागू करवा सकेंगे। हमें यदि सुरक्षा के माहौल में रहना है तो इस वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठना होगा। वरना हम खुद अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मार लेंगे। 1947 में पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान का उदय हुआ था लेकिन ऐसा माहौल  रहा तो आने वाले समय में भारत में से ही  5 ,6 ,   मुश्लिम देश बन के उभरेंगे। 

#kisano ke liye bima yojna

                                       भारतीय  सरकार की किसानो के लिए बीमा योजना 
         
 भारत में सभी का पेट भरने वाले किसान आज अपना पेट भरने के भी काबिल नही रहे है। उनका आत्महत्या करने का आंकड़ा दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। एक किसान की मौत  सिर्फ एक इंसान की मौत नही होती बल्कि पूरे  परिवार के खात्मे की शुरुरात हो जाती है। जो इंसान मौत की चादर ओढ़ने के लिए विवश हो रहा होता है। वह अपने अंतिम समय में रौशनी की नन्ही सी  किरण तलाश रहा होता है। जीवन से निराश ब्यक्ति भी मरना नही चाहता। उसके चारो और घना अंधकार होता है। उससे मुक्ति के लिए ही वह मौत का वरन करता है।
          वह जानता है उसकी मौत के बाद उसका परिवार बर्बादी के कगार पर पहुंच जायेगा। उसकी कर्मठता उसकी लाचारी और बेबसी के सामने दम तोड़ देती है। उसे मालूम होता है जो उसे जीने नही दे रहे वे उसके परिवार का किस तरह शोषण करेंगे। उनके मोह के बंधन भी उसके अंदर जीवन की लालसा पैदा नही कर पाते। 
        उसके लेनदार कर्ज के लिए उससे जीने और मेहनत करने का अधिकार तक छीन लेते है। भारतीय किसान मेहनत से कभी नही डरता लेकिन उसके सामने कोई रास्ता नही बचता इसलिए वह मजबूर होकर मौत की गोद  में सो जाता है। 
       हमारे समाज में मर्द को ताकत का प्रतिक और औरत कमजोर कहलाती है। एक ताकतवर इंसान जब मौत को गले लगाने के लिए मजबूर हो जाता है तब आप खुद सोचिये उस परिवार के बाकि छोटे और नाजुक  सदस्य किस हालत में जिंदगी जीते होंगे। उनकी जिंदगी बहुत दयनीय   होती  है। जिसमे आंसू अधिक और रोटी कम होती है।  
        किसान की दयनीय हालत को बदलने के लिए सरकार ने पहले भी बीमा योजना बनाई थी लेकिन उसकी क़िस्त आम किसान की हैसियत से कही ज्यादा होती थी जिसका फायदा केवल बड़े किसानो को मिल पाता था गरीब किसान बीमा की किस्तें चुकाने से भी अपने आप को लाचार महसूस करता था। इसलिए दुखो के समय गरीब किसान को कभी बीमा का फायदा नही मिल  पाया।
        हमारी एक दिन की मेहनत का नुकसान होता है तो हम कई दिन तक परेशान रहते है। आप किसान की हालत सोच के देखिये उसके पुरे साल की मेहनत खुले में पड़ी होती है। जिसपर मौसम की मार, लोगो की  दुश्मनीऔर कर्ज की मार  उसकी बरस भर की मेहनत को मिट्टी में मिला देती है। 
         सरकार की नई बीमा योजना में किस्तें कम रखी गयी है। शायद इसका फायदा गरीब किसान को मिल सके। अब  फसलो के आलावा अन्य चीजो का भी बीमा होगा।  
     हमारे किसानो की हालत सुधारने के लिए उन्हें नई तकनीको और नई चीजो की जानकारी भी अधिक से अधिक दी जानी चाहिए। उन्हें कम जमीन पर अधिक फसले उगाने के तरीके ,पशु -पालन ,मुर्गी -पालन और मछली पालन के बारे में भी बताना  चाहिए। उनकी खेती  में से इतना कुछ बच जाता है जो मुर्गियों,पशुओ और मछलियो के भोजन का भी इंतजाम हो जाये।    जब उसकी आमदनी बढ़ेगी उसका जीवन स्तर उन्नत होगा तभी वह नई जानकारी हासिल कर सकेगा। 
        सरकार को ऐसे कर्मठ और भावुक लोगो का सहयोग लेना चाहिए जो सही मायने में किसानो के हमदर्द हो। उनका दोहन करने वाले ना हो अन्यथा ये योजना भी कागजो तक सीमित रह जाएगी। 

#tanav or rishte

                                                                 तनाव और इंसानी रिश्ते 
       
तनाव के कारण रिश्तो का रूप बदल रहा है। पहले समय में आक्रामक केवल आदमी माने जाते थे लेकिन आजकल ओरतो को लेकर भी ऐसी खबरे समाचार चैनल पर दिखाई जा रही है जिन पर आसानी से यकीन नही हो पाता। ये विदेशी नही भारतीय महिलाओ की कहानियाँ  है। 
     इसका कारण उनका परिवरिश ऐसे माहौल में हो रहा है या उन्हें इतने समय तक प्रताड़ित किया गया है कि  वे अब नियंत्रण से बाहर हो रही है।   
       कल समाचारो में एक औरत अकेले में  अपनी बीमार और बूढ़ी  सास को बहुत बुरी तरह से मार  रही थी। जिसके कारण उसे अस्पताल में भर्ती किया गया। 
       उस सास ने इससे पहले भी अपने बेटे से इस बारे में शिकायत की होगी जिस पर उसके बेटे को यकीन नही आया होगा। कई बार की शिकायत का उस पर असर हुआ कि  उसने पत्नी की  अनुपस्थिति में cctv चुपचाप लगवा दिया। 
      वह खुद इस वीडियो को देखकर हैरान हो गया होगा। इसपर संदेह करने का कोई कारण नही था। ये विडिओ उसने पुलिस को दिखाया तो उसकी पत्नी को पुलिस पकड़ कर ले गयी। 
     आज समाचारो में पत्नी का बयान आया - ये लोग मुझे बहुत सताते थे। इसलिए में अकेले में सास से बदला लेती थी।
      लेकिन बदला उसने एक बूढ़ी और बीमार औरत  से ही लेने के बारे में क्यों सोचा। वह  बूढ़ी औरत अपना बचाव करने में भी असमर्थ थी। जैसे- आदमी अपना सारा गुस्सा कमजोर आदमी पर उतार कर अपनी मर्दानगी समझते है।क्या  यही मानसिकता उस औरत की थी। 
      अभी सिंगापुर की सर्वे रिपोर्ट पड़ी जिसमे कहा गया है। तनाव का कारण हमारे आसपास के लोग होते है। बीमारो का इलाज करने वाले और सेवा करने वाले दोनों को तनाव झेलना पड़  रहा होता है। उनका तनावग्रस्त होना भी तनाव के बीमारो की संख्या  बड़ा रहा  है। 
    विदेशो में तनाव के शिकार नर्स और डॉ को रिलेक्सेशन सेंटर में भेज दिया जाता है। जहाँ जाकर वे तनावरहित हो जाते है। लेकिन भारत में ऐसी व्यवस्था नही है। उनको तनावग्रस्त होते हुए ही अपने काम को अंजाम देना पड़ता है। मरीजों की अधिक संख्या भी तनाव का कारण बन जाती है। 
       जिस घर में मरीज होते है। उस घर की गृहिणियों को भी तनाव  से गुजरना पड़ता है। उनकी मानसिक हालत कोई समझने की कोशिश नही करता बल्कि काम का दबाब बढ़ाते जाते है। जिस का विस्फोट इस रूप में होने लगा है।
      औरत पुरे परिवार की धूरी होती है। उसका बचपन से ही इस तरह पालन -पोषण किया जाना चाहिए कि उसके अंदर कोमलता बनी  रहे। उसके अंदर सेवाभाव की भावना होनी चाहिए यदि वह तनावग्रस्त हो तो पूरे परिवार को उसके साथ मिलकर काम करना चाहिए वरना अकेले में उसका ऐसा आक्रामक रूप देखने को अक्सर मिलने लगेगा।     

#rksha mantri

                              रक्षामंत्री के खिलाफ आरोप 
 
   हमारे रक्षामंत्री वी. के ,सिंह कई बार आरोपों में घिरे है। इससे पहले इतने अधिक आरोप किसी अन्य जनरल पर कभी नही लगे। लेकिन उन आरोपों ने उन्हें उनके कार्यकाल में ही नही घेरा बल्कि वे आरोप आज भी उनका पीछा नही छोड़ रहे है। 
     उनके गलत  उम्र लिखा होने का विवाद कोर्ट तक पंहुचा उस समय लगता था। उन्हें समय से पहले रिटायर होना पड़ेगा। 
     उनके राज में कई घोटालो का पर्दाफाश हुआ। जबकि इससे पहले आम जनता के सामने इस तरह के घोटाले लाये ही नही गए। 
     उनके राज में सबसे भयानक खबर सुनाई दी कि सेना ने दिल्ली की तरफ कुच  किया है। सेना हरियाणा से दिल्ली पर कब्जा करने निकल पड़ी है। ये खबर उस समय सुर्ख़ियो में थी। आज भी इसका जिन्न गाहे -वगाहे उठ खड़ा होता है।  कांग्रेसी मंत्री " मनीष तिवारी जी "ने अपनी किताब में फिर से इस घटना को सच्ची खबर के रूप में स्थान दिया है।
     इस खबर की सच्चाई पर मुझे यकीन नही  है। हमारे सामने दूसरे देशो के उदाहरण है। जिसमे सेना किसी भी चुनी हुई सरकार को हटा कर खुद शासन चलाने लगती है। सारी जनता पर तानाशाही लागू कर दी जाती है। मानवाधिकारों का कोई मतलब नही रहता। सारे बड़े नेता जेल में ढूंस  दिए जाते है। लेकिन भारत को आजाद हुए 68 साल हो गए है। इतने सालो में एक बार भी सेना का शासन नही रहा इसका मुख्य कारण हमारे संविधान निर्माताओ ने सारी शक्तियाँ किसी एक इंसान के हाथो में सौंपी नही है। 
      हमारी तीनो सेनाओ(जल, थल, नभ ) के पास अलग -अलग मुख्य सेनाधिकारी है। उनके बाद तीनो सेनापतियों की  सारी रिपोर्ट राष्ट्रपति के पास जाती है। प्रधानमंत्री  और राष्ट्रपति   एकमत होकर सेना के मामले में निर्णय  लेते है। तीनो सेनाध्यक्ष अपनी -अपनी सेना को आदेश दे सकते है। लेकिन तीनो सेनाओ को एकसाथ निर्देश देने वाला कोई एक सेनाध्यक्ष नही होता। वे अपनी सेना के मुख्य जरूर होते है लेकिन तीनो सेनाओ पर अधिकार ज़माने के लिए कोई एक सेनाध्यक्ष कभी बनाया ही नही गया। इसके फायदे अब दिखाई देते है। 
      हमारे देश में यदि तीनो सेनाओ के उपर  एक और मुख्य सेनाध्यक्ष होता तो इतने समय तक  भारत में प्रजातंत्र लागू नही रह  पाता। हमारे यहाँ भी पाकिस्तान की तरह नाममात्र के नेता होते। जिनके खिलाफ होने पर सेना शासन संभाल कर उन्हें सीखचों के पीछे डाल देती। 
       हम पाकिस्तान के मुख्यमंत्री नवाज शरीफ के खिलाफ कितनी भी बयान बाजी कर ले। लेकिन वे पाकिस्तान के नाममात्र के शासक है। उनके सदभाव का हाथ बढ़ाते ही वहाँ की सेना ऐसा कदम उठा लेती है कि  भारत की भावनाए आहत हो जाती है। 
     भारत की सेना  पर इस तरह के आरोप कभी नही लगाये गए। संसार के सभी देशो की सेनाओ से यदि तुलना की जाये तो हर जगह उन्होंने अपने अच्छे कामो के द्वारा भारत का नाम रोशन किया है। संयुक्त राष्ट  के द्वारा यदि  किसी देश में  सेना की तैनाती होती है। तो सबसे पहले भारतीय सेना के लिए गुहार लगाई जाती है। उसके बाद ही किसी दूसरे देश को अपनी सेना भेजने के लिए कहा जाता है। हमारे देश के संस्कारी सैनिक दूसरो की भलाई के लिए अपनी जान की परवाह भी नही करते। 
      मै वी के सिंह जी की ईमानदारी पर यकीन करती हूँ। वे  सैनिको के समान बेबाक बोलते है। उन्हें नेताओ के सामान लाग- लपेट के बोलना नही आता इसका खामियाजा उन्हें अक्सर उठाना पड़ता है। उनके इरादो पर संदेह करना गलत है। उनकी ईमानदार   छवि के कारण ही वे केबिनेट मंत्री बने है। 

#sarkar ki od -even number policy

                                                   सरकार की ओड -इवन नंबर नीति
सरकार की इस नीति के कारण कुछ दिनों में प्रदुषण कम हो रहा  है। हमारे देश की जनसँख्या बढ़ जाने के कारण सरकार के सारे काम बेकार साबित हो रहे है.  लेकिन इस नीति के  कारण सड़को की भीड़ कम हो गयी है। हवा में प्रदूषक   तत्व भी कम होने लगे है।
     ये सरकार का ऐसा काम है। जिसका लोग विरोध नही कर रहे क्योंकि इससे जनता को परेशानी कम बल्कि फायदे ज्यादा दिखाई दे रहे है। मैने ऐसे बहुत घर देखे है। जिसमे कार चलाने वाले दो और गाड़ियां 6  या इससे अधिक होती है। उनके लिए ज्यादा गाड़िया रखना सम्मान का प्रतीक बन गया था। इससे घर के अंदर और बाहर  गाड़ी खड़ी करने की जगह नही होती थी। 
     गाड़ियों के कारण लोगो में भयंकर झगड़े होते थे। जिसके कारण लोगो को जिंदगी का भी नुकसान उठाना पड़ता था। हमारे लिए गाड़ी खरीदना आसान हो गया था लेकिन सड़को पर गाड़ियों की अधिक संख्या के कारण अधिकतर जाम की स्थिति बनी रहती थी। जब से ये योजना चालू हुई है। सड़को पर जाम कम हो गया है। 
    सरकार की इस नीति की काट करने के लिए इस बीच कुछ परिवार दूसरी कार खरीदने गए तो उन्हें पता चला इन दिनों गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन नही हो रहा साथ ही लोग अब अपने मन मुताबिक नम्बर नही ले सकते। इस कारण कुछ लोग ने नई गाड़ी खरीदने का विचार ही त्याग दिया। 
     इस जाम से बचने के लिए मैने  कुछ व्यवसायियों  को अपने काम का समय बदलते देखा है। वे पिक आवर में  निकलने की जगह  दूसरे समय पर घर से निकलते थे ताकि कम समय में अधिक काम कर सके।
      ऐसे जाम में फसने से तनाव बढ़ने के कारण लोग शारीरिक बीमारियो के साथ मानसिक बीमारियो के    शिकार हो रहे थे।  दिनोदिन लोगो का गुस्सा सड़को पर आपने रोड -रेज़ के  रूप में  देखा होगा। इसके कारण कितने घर बर्बाद हो गए है।
      जाम  की कमी के कारण पेट्रोल की बर्बादी में भी कमी आई है। हमारे दिए हुए कर का अधिकांश हिस्सा पेट्रोलियम उत्पादों को दूसरे देशो से खरीदने पर व्यय हो रहा था।  अब वह जरूरी चीजो पर खर्च होगा। 
    सड़क पर जाम के कारण वाहन चालक हॉर्न बजाते थे। जिसके कारण कई बार ऐसा लगता था हमारे कान के परदे फटने लगे है। अब ध्वनि प्रदूषण से भी राहत मिलेगी। जिनके घर सड़क के किनारे होते थे वे सड़क की तरफ की खिड़कियाँ और दरवाजे अधिकांशतया बंद ही रखते थे। क्योंकि तेल के कारण उनके घर के अंदर की सफाई करना बहुत कठिन हो जाता था। हॉर्न की आवाज के कारण वे परस्पर बाते भी सही ढंग से नही कर पाते  थे।
      हम लोग चाहते है सरकार इस नीति को १५ तारीख के बाद भी जारी रखे।  

       

#pathankot ki atankvadi ghatna

                            पठानकोट की आतंकवादी घटना 

  पठानकोट की आतंकवादी घटना से सब मर्माहत हुए है। हम पाकिस्तान की तरफ जितना दोस्ती का हाथ बढ़ाते है। उसके आतंकवादी उतना ही उस दोस्ती को ख़त्म करने में अपनी पूरी ताकत झोंक देते है। हमारी विश्वबंधुत्व की भावना का कोई और देश  इस तरह  से मजाक  नही उड़ा सकता जितना पाकिस्तानी आतंकवादी उड़ाते है।  वे  हमारे दुश्मन नही है लेकिन उनके अंदर शुरू से इस तरह से नफरत की भावना भरी गयी है कि वे धर्म के अंतर को सब   कुछ समझ बैठे है। 
      अब से 500 साल पहले ये लोग हिन्दू से मुस्लिम बने थे कितनी विपरीत परिस्थिति में इनके पूर्वजो ने धर्म बदला होगा । उन्हें इसका एहसास नही है। वे कटटर मुस्लिम बन गए है। बादशाह ओरंगजेब ने जिस उद्देश्य  से भारत में मुस्लिम कौम खड़ी की  थी। आज उसका उद्देश्य पूरा हो गया है।  यदि ओरंगजेब आज इस कत्लेआम को  देखता तो खुश हो जाता। 
        भारत पर जब आतंकवादी घटना होती थी। उसका एहसास पश्चिम देशो को नही होता था। लेकिन जब से वहाँ आतंकवादी घटना होने लगी है। तब जाकर वे हमारे दर्द को समझ सके है। आज         अमेरिका ने नवाज शरीफ को इस घटना के लिए सख्त कदम उठाने की ताकीद की है। अमेरिका के आदेश के कारण नवाज शरीफ इस मामले में कोशिश करते दिखाई दे रहे है। यदि पश्चिमी देश पहले सख्ती बरतते तो जिस आतंक  से भारत सिसक रहा है। उसकी आंच पश्चिमी देशो तक ना पहुचती वह पहले ही बुझ चुकी होती। 
      आपने कहाबत सुनी होगी -जाके पैर न फटी बिबाई वो क्या जाने पीर पराई। 
      हम बर्षो से आतकवाद से आहत है। इस घटना के बाद मुंबई आतंकवाद का मुख्य अभियुक्त डेविड  उस समय में दोषी लोगो के बारे में बताने के लिए अमरीकन जेल से तैयार हुआ है। इस घटना को 7 साल बीत  गए है। 
     इसे कहते है -देर आये दुरुस्त आये। 
     हमारे नेताओ की डरने की आदत भी इसके लिए जिम्मेदार है। यदि हम भी सख्ती से इसके खिलाफ खड़े होते तो दूसरे देश भी हमारी पीड़ा को समझते। हमारे सेनिको की म्यांमार की कार्यवाही,मोदी के ईट का जबाब पत्थर से देने की नीति ने उन्हें सोचने पर मजबूर किया है। 
     हमें सामने वाले के सामने हमेशा रोने गिड़गिड़ाने की नीति नही अपनानी चाहिए बल्कि अपनी ताकत का स्वाद भी चखाते रहना चाहिए। वर्ना हमारी हालत भिखारी जैसी होगी। 
      कई बार दूसरे देशो में जाकर जब हमारे नेता अपनी फरियाद सुनाते थे तो उनके नेता सदा हमारा मजाक उड़ाते हुए कहते थे -जो परेशानी आपके देश की है। उसके विरुद्ध आप खुद कोई कार्यवाही करने के स्थान पर हमसे मदद की उम्मीद क्यों करते हो। सभी आपके देश की लाचारी समझते है। कि आप गिड़गिड़ाने के आलावा कोई सख्त कार्यवाही नही कर सकते इसलिए कोई देश आपके लिए नही सोचता। हम अपने देश के बारे में सोचे या आपके लाचार देश के लिए कोई काम करे। जब तक आप खुद उठ खड़े नही होंगे तब तक किसी से उम्मीद मत रखो। 
      आज हमें एक होकर आतंकवाद से लड़ना चाहिए। तभी इससे मुक्ति मिल सकेगी। 

#yog or kala matiyabind

     
  योग से  कई बीमारियो का इलाज किया जा सकता है। इसका ज्वलंत उदाहरण में हूँ। बचपन से मै कई बीमारियो का शिकार रही लेकिन मेरे अंदर हमेशा आगे बढ़ने की इच्छा रही। जिसके कारण मैने अपनी बीमारियो की कभी परवाह नही की बल्कि जिस काम को करने के बारे में ठान  लिया उसे अंजाम तक हमेशा पहुँचाया। 
    बचपन से  मेरे सिर में बहुत दर्द रहता था लेकिन उसके साथ ही मैने अपनी पढ़ाई  पूरी की। पढ़ाई में व्यवधान ना  आये इसलिए हमेशा दर्दनाशक दवाइयाँ  अपने साथ रखती थी। कई बार महीने में 15  दिन तक दवाइयाँ खानी  पड़ती थी। मैने कभी अपने आप को आम इंसान की तरह स्वस्थ महसूस नही किया था। मुझे दवाइयाँ खाते हुए डर भी लगता था लेकिन बीमारो की तरह बिस्तर पर पड़े रहना मुझे कभी मंजूर नही था।
      बड़े होने के बाद मुझे जुकाम बहुत ज्यादा होता था। एक बार मुझे किसी ने राय दी तुम्हारी नाक की हड्डी बढ़ गयी है। इसका  इलाज करवा कर देखो ।  में डॉ के पास  गयी।  
      उन्होंने मेरे एक्सरे वगेरह किये और परिणामस्वरूप कहा -तुम्हारी नाक की हड्डी बड़ी हुई है। इसका ऑपरेशन करवाना होगा।
     मैने जैसे ही ऑपरेशन का नाम सुना मै डर  गयी दुवारा फिर उस डॉ के पास नही गयी। 
      कुछ समय बाद मुझे त्वचा की बीमारी हुई। इसे भी सबने लाइलाज मान लिया था। मेने बिलकुल हिम्मत हार बैठी थी। इतनी सारी बीमारियो के साथ एक सामान्य जिंदगी जीना बहुत तकलीफ देह होता है। मै इतनी तकलीफो के साथ जिंदगी जीने की जगह मौत मांगने लगी थी। 
     एक दिन मेरी सहेली ने मुझे योग की कक्षा में चलने के लिए कहा। मैने उसके साथ रवि शंकर जी की पांच दिन की "जीने की कला " कक्षा में भाग लिया। मुझे आरम्भ में कुछ खास असर नही दिखाई दिया। मै हिम्मत हारने लगी थी। लेकिन इसे मैने लगातार करती रही। शुरू में प्राणायाम करने का मुझे कोई खास कारण समझ में नही आया। लेकिन इसे चालू रखा। 
     काफी समय बाद मैने गौर किया। अब मुझे जुकाम होने का पता ही नही चलता। जुकाम के कारण नाक बंद,सिर दर्द ,साँस लेने में परेशानी ,आँखों से पानी आना बंद हो गया है। अब सिर का दर्द भी इतना भयंकर नही होता की दवाई कहानी पड़े। अब मै घर में सिर  दर्द की दवाई भी नही रखती। 
      किसी ने मुझे पंचकर्मा करवाने की सलाह दी। यह आयुर्वेद का एक रूप है। मेने पंचकर्मा कई बार करवाया जिससे मेरे अंदर की शुद्धि हो गयी जिससे त्वचा की परेशानी कम हो गयी। 
     उन्होंने मुझे ध्यान लगाने  आसान तरीका बताया जिसके कारण मेरी एकाग्रता बढ़ गयी। मुझे अंदर से भय का अहसास भी नही रहा। मै आज बचपन की अपेक्षा ज्यादा स्वस्थ महसूस हूँ। 
      अभी विदेशो में हुए शोध से मालूम चला है कुछ योग काले मोतियाबिंद के लिए हानिकारक है। लेकिन आजकल काला मोतियाबिंद हर उम्र के इंसानो को अपने पंजे में दबोच रहा है। इसका कोई सही इलाज नही ढूंढा जा सका है। मेने इसके कारण छोटी उम्र के बच्चो  को भी अँधा होता देखा है। मुझे लगता है। यदि प्राणायाम और ध्यान जैसी योग की कसरते की जाये तो मन शांत रहने से काला मोतियाबिंद का असर कम होगा। डॉ कुछ आँखों से संबंधित कसरते करवाते है। जिससे आँखों की रौशनी पर अच्छा असर पड़ता है। आँखों की बंद हुई नसे भी खुलने लगती है। मैने अपने सामने ऐसे बच्चो को देखा है यदि उनपर सही समय पर ध्यान नही दिया जाता तो वे अंधे होते। इसलिए मै खान -पान और योग की कुछ खास कसरतों के  महत्व पर जोर देती हूँ। 

#murder

   
रम्या और महेश  की सुखद जिंदगी में  ग्रहण लग गया था। महेश अब खामोश रहने लगा था। वह रम्या के सामने सहज रहने की कोशिश भरसक कर रहा था। लेकिन उसके चेहरे से उसका तनाव स्पष्ट दिखाई दे जाता था। लेकिन रम्या  महेश को खुश रखने के अलावा कुछ नही कर पा रही थी। 
      एक दिन उसने सुबह आगरा जाने के बारे में रम्या को बताया। रम्या ने उसका कारण जानना चाहा तो महेश ने चुप्पी साध ली.
    रम्या के बहुत पूछने पर सिर्फ इतना बताया- उसे फाइल से सम्बंधित सुराग मिले है। शायद मुझे खोई हुई फाइल आज मिल जाये। 
  रम्या ने इससे ज्यादा पूछताछ करना जरूरी नही समझा। महेश को बुलाने के लिए एक आदमी आया था। जिसे रम्या नही जानती थी। 
       रम्या ने पूछा -यह कौन है। इसे मैने पहले कभी नही देखा। 
                महेश ने बताया -इसके द्वारा हमें उस इंसान तक पहुँचने में मदद मिलेगी। जिसके पास फाइल है।  इस लिए मै इसके साथ सुबह निकल रहा हूँ। ताकि हम उस इंसान तक पहुँच  सके।जल्दी निकलने पर वह आदमी हमें घर पर ही मिल जायेगा वरना हमें काफी समय उसका इंतजार करना पड़ेगा। 
     उसे लगा दोनों का जाना अनिवार्य होगा इसलिए उनका जाना उचित है। वह दोनों सुबह  कार  से चले गए। रम्या उनके जाने के बाद घर के काम सँभालने लगी। अभी काम पूरा भी नही हुआ था। उसके घर फोन आया की महेश को गोली मार  दी गयी है। 
      उस फाइल के कारण महेश को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा। उन निर्दयी लोगो के बारे में क्या कहा जाये जिनके लिए इंसान की कीमत धन के सामने कुछ नही है। उन्होंने एक पल के लिए नही सोचा उनके इस कदम से कितने लोगो की जिंदगी अंधकार में डूब जाएगी। उनके होठो की हंसी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। उस नन्ही सी बच्ची का ख्याल भी नही आया जिसने सही मायने में पिता का प्यार अनुभव नही किया। रम्या का क्या कसूर था। जिसे इतना बड़ा गम अकेले सहना पड़ेगा। उसकी दुनियाँ उजड़ गयी। यदि इंसान बीमारी में खत्म होता है। तो इंसान मन से तैयार होता है। उसे इस सदमे को सहने की ताकत आ जाती है। लेकिन इस आघात का सामना करने की ताकत कहाँ  से आये। रम्या  सकते की हालत में इस समय को देख रही है। 

#gandgi or sarkar

     
 देश के प्रधानमंत्री ने स्वच्छ भारत का आह्वान जबसे किया है तब से अनेक तरह की दिक्क़ते सामने आ  रही है।  लोगो के मन में सफाई की भावना पैदा हो गयी है। जनता को स्वच्छ्ता का अहसास हो गया है। सभी अपने चारो तरफ सफाई रखने की कोशिश कर रहे है। सफाई से संबंधित बातो का कोई मजाक नही बना रहा। उनका ये जज्बा देखकर मन खुश हो जाता है। 
     सफाई कर्मचारियों को कई महीने से वेतन नही मिलता तो वे बेमन से कामो को अंजाम दे रहे है।तीन -चार महीनो तक  तनखाह के आभाव में घर के खर्च कैसे चलते है। इस बारे में सोच के देखो आप खुद समझ जाओगे। उनके लिए बिना वेतन के घर और बाहर सम्मान पाना कितना त्रासद होता है। परचूनी वाले  से लेकर हर दुकान वाले के  उधार पर उन्हें कितना अपमान सहना पड़ता होगा। उनकी स्थिति कितनी हास्यास्पद बन गयी है। कहने के लिए स्थिर सरकार के पक्के नौकर होने के बाद भी हाथ में सरकार के कारण कटोरा पकड़ने की नौबत आ  गयी है।
                दिल्ली सरकार ने अपना वेतन राष्ट्रपति के वेतन से दुगुना कर लिया है।  मंत्री को बहुत सारे भत्ते भी मिलते है। उनकी तनखाह पर किसी तरह का कर नही देना होता है।उनके चारो तरफ चापलूसों की फौज खड़ी होती है। एक आवाज पर हर कोई उनकी जरूरते पूरी करने के लिए तैयार रहता है। उनका आदर -सम्मान इतना ज्यादा होता है कि कोई दुकानदार उनसे पैसो का उलाहना नही करता ऐसे में मुख्यमंत्री के शब्द हास्यास्पद लग रहे है।  
          मुख्यमंत्री का कहना कि -इससे मंत्रियो के अंदर भ्रस्टाचार खत्म किया जा रहा है.
       यही हालात रहे तो एक दिन नगर निगम के कर्मचारी हर और भृष्ट दिखाई देंगे। जब उनके छोटे बच्चे विद्यालय की फ़ीस और दूसरी जरुरतो के लिए उनको लांछित करते दिखाई देंगे। उनके लिए कौन सा कदम सही है या गलत। उसका अंतर कर पाना उनके लिए मुश्किल हो जायेगा। 
    मै नत्थू कॉलोनी शाहदरा में रहती हूँ वहाँ  गंदगी का अम्बार लग गया है। नालियो से गन्दा पानी सड़को पर बह  रहा है। जिसकी कई बार शिकायत की है लेकिन संतोषजनक जबाब नही आया। उनसे परस्पर बात करने पर उनकी दास्तान  सुनकर मन द्रवित हो गया। 
    उनके शब्दों पर विचार करने पर उनका दर्द समझ में आ  रहा है। आजाद भारत में रहते हुए आज सरकारी कर्मचारी का परिवार भूखे पेट सोने के लिए मजबूर है। जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था उन्नत देशो की श्रेणी में आती है। 

#file

   
  रम्या  की जिंदगी के हसीन  पल थे वे  सारी  दुनियाँ  से लड़ कर एक हुए थे। अब सभी बंधनो से मुक्त होकर वे सुख पूर्वक दिन गुजार  रहे थे।
      महेश को अपने दफ्तर से   उस बिभाग मे  भेज  दिया। जहाँ घोटाले से संबंधित कार्य  पर नजर रखी जाती है। सेना के अंदर घोटाले भी काफी हो रहे थे। कोई भी उन घोटालो में फंसना नही चाहता। इसलिए सारे  घोटालो के जांचकर्ताओं पर बहुत अधिक दबाब बनाया जाता है। ताकि उनका परदाफाश  न हो जाये ,उनकी ऊपर  आंच न आए। उन्हें धमकियाँ  भी मिल रही थी लेकिन उन सब का उनके कार्य पर कोई असर नही पड़  रहा था। 
     महेश ने इन सब के बारे में रम्या को पता नही चलने दिया था। महेश को लगता था ये सब उसके काम का एक हिस्सा है। रम्या को बताकर   परेशान करने से क्या फायदा। रम्या उसे परेशानी में देखकर कई बार इसका कारण पूछती तो वह उसे झूठ बोल कर बहला देता। उसने अपनी परेशानी रम्या पर जाहिर न करने की जैसे कसम खा ली थी। 
     एक दिन महेश  परेशान हो उठा। उसकी बेचैनी छिपाए छिप नही रही थी। वह इधर से उधर चककर लगा रहा था। तब रम्या ने महेश से पूछा -ऐसा क्या हो गया है। जो आप इतने परेशान हो रहे हो। 
     महेश अभी भी इस बारे में रम्या  से चर्चा करना नही चाहता था। लेकिन उसके लिए इस दबाब को बर्दास्त करना बहुत मुश्किल हो रहा था। रम्या ने काफी मनाया तब जाकर महेश मुह खोलने पर मजबूर हुआ। 
     महेश बोला -जिस घोटाले पर हम काम कर रहे थे। हमारी जाँच लगभग पूरी हो गयी थी। लेकिन वो फाइल किसी ने चुरा ली है। सभी पर शक की सुई घूम गयी है। इतने बड़े मिशन को किसी ने एक झटके में नाकामयाब कर दिया है। हमारी बर्षो की मेहनत का फल उस फाइल में संकलित था। उसके कारण देश का काफी नुकसान हुआ था। बहुत सारे लोगो का नकाब उत्तर जाता वे सलाखों के अंदर होते। उनमे से ही किसी ने उस फाइल को गायब करवा दिया है। 
    रम्या बोली -इसमें तुम्हारा क्या कसूर है। तुमने तो कुछ गलत नही किया है। 
     महेश बोला -जिनका नकाब उतरता, वे बहुत बड़े पदो पर बैठे हुए लोग  हे.वे बहुत दिनों से धमकियाँ दे रहे थे। जब उन धमकियों का असर नही हुआ। तो उन्होंने हममे  से ही किसी के द्वारा वह फाइल गायब करवा दी। वह फाइल बहुत कड़े पहरे में रखी हुई थी। उस तक किसी बाहर वाले के लिए पहुँचना कठिन था। ये फाईल किसी अंदर के इंसान   ने गायब की है। जिसने ये कारनामा किया है। उसके साथ शक की सुई हमारी तरफ भी घूम रही है।मै बेकसूर होते हुए भी गुनहगार समझा जा रहा हू। ये बात मुझे बर्दास्त नही हो रही है। 
     रम्या  बोली -आप परेशान मत हो हमने जब कुछ बुरा नही किया। तो हम पर कोई आंच भी नही आएगी आप बेकसूर हो। आपको फंसाना इतना आसान नही है। 
   रम्या के सामने अपने मन का गुबार निकाल  देने के बाद महेश की बेचैनी कुछ कम  हो गयी। 

      

#ma-beti


  रम्या  की बेटी एक साल की हो गयी थी। उसे सब बहुत प्यार करते थे। वह बड़े परिवार के प्यार के बीच रम्या  के पास कम समय के लिए ही आ पाती थी। उसका अधिकतर समय दादी -बाबा के पास बीत  जाता था। रम्या उसे खाने -पीने ,या सोने के लिए  बुलाने जाती तो वह आने से साफ मना  कर देती थी।
       रम्या को कई बार उसकी हरकतों पर गुस्सा  आता, वह झुंझला कर कहती -रात को भी मेरे पास मत आना। 
   इसी तरह माँ -बेटी का मान -मनुहार चलता रहता। 
   रम्या काफी पढ़ी -लिखी थी। उसके मन में इच्छा थी जब उसने इतनी मेहनत से पढ़ाई की है तो उसे  नौकरी करनी चाहिए। बहुत समय से नौकरी नही निकल रही थी। जैसे ही सरकार ने अथिति अद्यापको की नौकरी निकाली उसने  उसके फार्म भर दिए। उसका चयन नौकरी के लिए हो गया। शुरू में घर के पास ही नौकरी की। मन माफिक काम करने से उसे  ख़ुशी मिल रही थी. एक साल की नौकरी में उसे समय का अहसास नही हो पाया। उसको परिवार का भरपूर सहयोग मिला। 
    अगले साल के लिए उसे दूर जाना पड़ा। किस्मत से जहाँ रम्या को नौकरी करनी थी। महेश को भी उसके पास ही काम करने की सहूलियत हो गयी। लेकिन दादा -दादी ने बेटी को उसके साथ भेजने से मना कर दिया था। 
    उन्होंने कहा -नौकरी और बेटी सम्भालना तेरे बस का नही है। इसे यही छोड़ दे हम पाल लेंगे। 
    रम्या के लिए इसका निर्णय करना बहुत कठिन था।अनन्या उसके कलेजे का टुकड़ा थी। उसे छोड़ कर उसके बिना रहना उसके लिए असम्भव था लेकिन  उसे उनके शब्दों की सच्चाई का अहसास था। उसके लिए किसी अन्य के सहयोग के बिना बच्चा सम्भालना बहुत कठिन था। इसलिए उन्होने  बच्ची को दादी के पास छोड़ दिया। 
       कुछ समय तक अनन्या की याद उसे विह्वल कर देती। बहुत समय बाद वह अपने मन को मजबूत कर सकी। वह छुट्टी वाले दिन अपनी बेटी से मिलने जाती तो उसकी बेटी उसे माँ कम मेहमान अधिक समझती। रम्या का छलकता हुआ वात्स्ल्य उसे माँ के पास ज्यादा समय तक रख नही पाता। संयुक्त परिवार की बहू होने के कारण वह अनन्या को डांट भी नही पाती  थी। माँ के अनुशासन में रहने की अपेक्षा बड़ो का लाड़प्यार उसे भाता था। 

#grahsthin


  रम्या  को अहसास होने लगा। उसके जीवन में प्यार के अलावा  काम सीखना भी बहुत जरूरी है। अब वह अपनी पड़ोसन से काम के बारे में जानकारी हासिल करने लगी। अब वह मन लगा कर काम सीख  रही थी। धीरे -धीरे वह काम में चतुर होने लगी। सही मायने में अब वह एक गृहस्थिन की तरह घर सँभालने लगी थी। उसकी दिनचर्या सिर्फ किताबो तक सीमित नही रह गयी थी। अब उसे महेश के प्रति जिम्मेदारी का अहसास बना रहता था। 
       इस बीच मानो समय पंख लगा कर उड़ रहा था। कब एक साल का समय बीत  गया उन्हें पता नही चला। इस बीच उनके जीवन में नई ख़ुशी ने पंख फैला दिए थे। रम्या की तबियत कुछ नासाज रहने लगी। वह आलस के कारण काम पूरी तरह नही कर पा रही थी लेकिन ऐसे वक्त में काम करने में महेश उसे पूरा सहयोग देता था। वह उसकी सभी मनपसंद चीजे लाकर देता।
      डॉकटर ने उन्हें सुबह शाम सैर करने के लिए कहा। तब महेश उसे अपने साथ घुमाने ले जाता जहाँ  उसका व्यायाम के साथ मन भी बहल जाता था। उसे नई चीजे भी पसंद आ जाती तो महेश उन्हें खरीदने में बिलकुल गुरेज नही करता। दोनों की जिंदगी हॅसते -मुस्कुराते बीत  रही थी।
    नौ महीने बाद उनके घर एक नन्ही कली ने जन्म लिया। उनको जैसे एक खिलौना मिल गया था। रम्या इस समय मायके में जाकर रही। अब महेश और रम्या के बीच दूरी  आ  गयी। लेकिन रम्या की भलाई के लिए महेश उससे कुछ समय दूर रहा। लेकिन ये दुरी मन के अंदर नही थी। क्योंकि उसे अपनी ससुराल में ज्यादा दिन रहना अच्छा नही लगता था। 
     रम्या जब मायके से ससुराल आई तो बिटिया के साथ उसे एक नई खुशखबरी सुनाई दी उसके पति का स्थानांतरण दिल्ली हो गया है। दो साल वह महेश के साथ अकेली रह चुकी थी।उसने प्यार भरे पल बिताये थे। उसका ये समय एक   लम्बा हनीमून समय था। जिसे दोनों ने बहुत अच्छी तरह व्यतीत किया था। इतना अच्छा समय बहुत कम लोगो के नसीब में होता है.
       बच्चे की परवरिश के लिए बड़ो की जरूरत होती है।  यही सोच कर भगवान ने उन्हें फिर से दिल्ली भेज दिया था।  रम्या की बेटी हाथो -हाथ पलने लगी उसे पता नही चला बच्चे को पालना  केसा होता है। 

#shadi

     
   रम्या और महेश के घर के लोग इस शादी के लिए  तैयार नही हो रहे थे। उन्हें मनाने  में कई साल लग गए लेकिन उनका प्यार किसी तरह कम नही हो रहा था। उनके घर  के लोगो को उनके इस तरह दृढ़ रहने की उम्मीद नही थी। उन्हें लग रहा था वे टूट जायेंगे कही  और शादी करने के लिए  तैयार हो जायेंगे।  इस बीच उनके सामने कई बार अच्छे शादी के प्रस्ताव आये लेकिन उन्होंने सभी रिश्तो को मना कर दिया।
     इस तरह चार साल बीत गए।इतने समय में रम्या ने पढ़ाई पूरी कर ली।  उनके  प्यार के सामने उनके अभिभावकों को  ही झुकना पड़ा। अंतत उन्हें उन दोनों की शादी करनी पड़ी। उनके घर वालो ने विरोधस्वरूप शादी में बहुत कम  धन लगाया। उन्होंने इसका विरोध इस रूप में किया। रम्या के घर के  लोगो के विरोध के आलावा ससुराल के लोगो का विरोध भी झेलना पड़ा। 
    ससुराल  के लोगो को लगता -उन्होंने उसके बेटे पर जादू कर दिया था। जिसके कारण वे ठगे गए है। वे अपना गुस्सा अनेक तरह से रम्या पर निकालते थे। रम्या अपने प्यार  को पाने के बाद एकदम शांत भाव से सबकुछ सहन कर रही थी। कई बार महेश उसकी सहनशक्ति देखकर हैरान रह जाता।              वह अपने बड़ो के सामने विरोध करने के लिए तैयार होता तो रम्या उनसे विनती करते हुए कहती -आप उनका दुःख समझो उनके हिसाब से उनका सोने जैसा बेटा कोड़ियो के मोल बिक गया है। इसका गुस्सा वह निकाल रहे है। मुझे उनकी बाते बुरी नही लगती क्योंकि मैने तुम्हे पा लिया है। उनके सारे कड़वे शब्द दिल तक पहुंच  ही नही पाते। मेरी ख़ुशी उनके कड़वे  शब्दों से ज्यादा है। मै तुम्हारे प्यार में गहराई तक डूबी हुई हूँ। 
     महेश उनके मधुर शब्दों को सुन कर जबाब देने की स्थिति में नही रह जाता लेकिन उसने मन ही मन प्रण कर लिया -वह अपना स्थानांतरण किसी और जगह करवा लेगा जिससे रम्या को इस माहौल से दूर ले जाया जा सके। 
      महेश की कोशिशो से उसका स्थानांतरण जबलपुर हो गया। वहाँ  वे दोनों सुख पूर्वक रहने लगे। रम्या ने शादी से पहले घर के काम नही किये थे। उससे घर के कामो में गलती हो जाती थी लेकिन उसके कामो में महेश कभी कोई कमी नही निकालता था।  कई बार उसकी सब्जी जल जाती कभी नमक कम हो जाता या ज्यादा पड़ जाता लेकिन महेश कभी कोई शिकायत नही करता जब रम्या खुद खाना खाती तब उसे पता चलता खाना तो बड़ा बेस्वाद बना है। 
     वह महेश से पूछती -इसमें नमक नही था तुमने माँगा क्यों नही.
   महेश कहता -तुम जो खाना बनाती हो मुझे उसमे कभी कोई कमी पता ही नही चलती। मै तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। उस प्यार के सामने मुझे खाना कब खा लेता हूँ वह मेरे लिए ज्यादा मायने नही रखता। तुम्हे सामने देखकर वक्त कब बीत जाता है समय का अहसास ही नही होता। मै हर पल तुम्हे अपनी आँखों के सामने बिठाए रखना चाहता हूँ। तू मुझे बहुत सालो की तपस्या के बाद मिली हो।             रम्या उनके प्यार भरे शब्दों को सुन कर अभिभूत हो जाती थी।  जिसके लिए रम्या हमेशा उसकी एहसानमंद रही। 

#vachan

    रम्या  पर उसके पिताजी के शब्दों का सिर्फ इतना असर हुआ कि  उसके महेश के छूट जाने के भय  से आंसू नही रुक रहे थे। उसके मन में महेश से मिलने की इच्छा और भी ज्यादा भड़क उठी थी।                  रम्या ने महेश को  अपनी विपदा सुनाई तो वह एकदम खीझ उठा -हम देश की रक्षा के लिए अपने जीवन की क़ुरबानी देने से भी नही झिझकते है। उनके लिए हमारे त्याग का कोई मोल नही है। हमारे नौकरी के कारण  रात को जो लोग  गहरी नीद सो पाते है। हमारी नौकरी के कारण उन्हें ये शादी पसंद नही। मुझे उनका यह निर्णय मंजूर नही। उन्हें मेरे अंदर कोई कमी दिखाई नही दी तो फौजी का बहाना बना दिया। यदि तुम मेरा साथ दो तो मै तुमसे उनकी इच्छा के विरुद्ध शादी करने के लिए तैयार हूँ। 
     रम्या  एकदम लाचारी के साथ बोली -आप ऐसा क्यों समझते हो। उनके अंदर बेटी के भविष्य को लेकर डर  है। वे मुझे बहुत प्यार करते है। उनके अंदर का डर उन्हें ऐसा सोचने के लिए मजबूर कर रहा है। उन्होंने सारी जिंदगी हमारे लिए त्याग किया है। इसमें उनका कोई स्वार्थ नही है। वे एकदिन हमारे प्यार के सामने झुक जायेंगे। 
    महेश बोला -तुम्हे उनके झुक जाने की उम्मीद है। 
     रम्या बोली -वे मेरे पिताजी है में उनकी नस -नस से बाक़िफ़ हूँ। उनके अंदर की कोमल भावनाए मेने देखी  है। वे मेरे छोटे से छोटे दर्द में भी रात भर जागते रहते थे। यदि मेरा प्यार सच्चा है तो वे जरूर शादी के लिए मान जायेंगे। 
     महेश बोला -तुम्हे कब तक लगता है तुम्हारे पिताजी शादी के लिए मान जायेंगे। 
    रम्या बोली -समय का अंदाजा तो लगाना मुश्किल है लेकिन मुझे उम्मीद है कुछ समय में पिताजी को शादी के लिए मनाने  में कामयाब हो जाऊँगी। 
     महेश बोला -यदि तुम्हारे पिताजी शादी के लिए राजी नही हुए। 
   रम्या ने कहा -में पिताजी का दिल दुखा  कर तुमसे शादी नही करूंगी। यदि वे शादी के लिए तैयार नही हुए तो मै तुमसे शादी नही करूंगी। मै आपको यह भी वचन देती हूँ। आपके आलावा मै किसी और से शादी नही करूंगी। 
    महेश उसके इस निर्णय के सामने कुछ और बोल नही सका। उसके सामने केवल रम्या  का इंतजार लिखा था। उसे ये नही समझ आ  रहा था। इस इंतजार की मियाद कब खत्म होगी। मै इसका इंतजार करू या कही और शादी के लिए अपनी रजामंदी दे दू क्योंकि अच्छी नौकरी होने के कारण घर पर रिश्ते के लिए लोग आते रहते थे। 

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...