शैलजा छोटी उम्र मे ही परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझने लगी थी । उसके पिताजी परिवार के प्रति काफी लापरवाह थे । उसकी माँ ने अपना परिवार बहुत मुश्किल से चलाया अब बच्चे बड़े हो रहे थे उनकी शादी की चिंता उन्हें दिन रात सताती रहती थी दो बेटियो की शादी कैसे होगी । पर उसके पिताजी पर कोई असर नहीं हो रहा था । वह इस गम में घुलती जा रही थी । राधा से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती थी क्योंकि वह बहुत सीधी थी ।
शैलजा ने अपनी माँ के दुःख को समझा और नौकरी करने लगी । धीरे -धीरे पैसा जुड़ने लगा । कुछ सालो लगातार मेहनत करके उन्होने पैसे इकट्ठे किये । बहन की शादी कर दी गयी । बहन ससुराल में खुशहाल जीवन जी रही थी । सभी खुश थे । लेकिन भगवान से उसका सुख देखा न गया । उसे बुखार आ गया उसका इलाज चल रहा था डॉक्टर अभी उसकी बीमारी को समझने की कौशिश ही कर रहे थे कि मृत्यु ने उसे आ घेरा । वह सभी को रुलाती हुई इस दुनिया से चली गयी ।
जिस परिवार में दो बच्चे हो उन में से एक इस तरह छोटी उम्र में ही चला जाए उस माँ को कैसे सब्र आ सकता हे । वह दुःख के अथाह सागर में डूब गयी । उन्हें किसी चीज की सुध नहीं रहती थी । सुनी आँखों से रास्ते को निहारती रहती थी कि शायद राधा अभी आ जाएगी ।
धीरे -धीरे हालत बदलने लगे । उन्होंने जिंदगी से समझोता कर लिया वो शैलजा के प्रति जिम्मेदारी समझने लगी । शैलजा फिर से घर और बाहर की जिम्मेदारी उठाने लगी । उसे फिर से पैसे जोड़ने थे । उसकी सारी मेहनत काल के मुख में चली गयी थी । जब तक पैसे जुड़े काफी साल गुजर गए । अब शादी की तैयारिया शुरू हुई । इन सबके बीच शैलजा की उम्र ३४ साल हो गयी थी । उस समय लड़कियों की शादी २० से २४ साल के बीच हो जाया करती थी । इस ;लिहाज से उसको काफी समय लग गया था ।
कई बार में सोचती हु की राधा का कोई कर्ज शैलजा पर था जो उसने इस तरह से चुकाया । नहीं तो शादी के २ सालो के अंदर ही उसकी मौत क्यों हो जाती । इस बीच राधा का कोई बच्चा भी नही हुआ । उसके जीजाजी ने कुछ समय बाद किसी और से शादी कर ली । अब वो लोग उस दूसरी औरत को अपने घर बुला कर राधा की तरह ही ब्यवहार करते है ।
मेने एक बार शैलजा से पूछा । कुछ अजीब नहीं लगता इन्हे इस तरह हर जगह सम्मान देना । उसका जबाब सुनकर में हैरान रह गयी जब उसने कहा -"हमारा परिवार हे ही कितना जो हम इन्हे नकार दे । " उसके शब्दों की गहराई मुझे आज भी झकझोर जाती है ।
शैलजा ने अपनी माँ के दुःख को समझा और नौकरी करने लगी । धीरे -धीरे पैसा जुड़ने लगा । कुछ सालो लगातार मेहनत करके उन्होने पैसे इकट्ठे किये । बहन की शादी कर दी गयी । बहन ससुराल में खुशहाल जीवन जी रही थी । सभी खुश थे । लेकिन भगवान से उसका सुख देखा न गया । उसे बुखार आ गया उसका इलाज चल रहा था डॉक्टर अभी उसकी बीमारी को समझने की कौशिश ही कर रहे थे कि मृत्यु ने उसे आ घेरा । वह सभी को रुलाती हुई इस दुनिया से चली गयी ।
जिस परिवार में दो बच्चे हो उन में से एक इस तरह छोटी उम्र में ही चला जाए उस माँ को कैसे सब्र आ सकता हे । वह दुःख के अथाह सागर में डूब गयी । उन्हें किसी चीज की सुध नहीं रहती थी । सुनी आँखों से रास्ते को निहारती रहती थी कि शायद राधा अभी आ जाएगी ।
धीरे -धीरे हालत बदलने लगे । उन्होंने जिंदगी से समझोता कर लिया वो शैलजा के प्रति जिम्मेदारी समझने लगी । शैलजा फिर से घर और बाहर की जिम्मेदारी उठाने लगी । उसे फिर से पैसे जोड़ने थे । उसकी सारी मेहनत काल के मुख में चली गयी थी । जब तक पैसे जुड़े काफी साल गुजर गए । अब शादी की तैयारिया शुरू हुई । इन सबके बीच शैलजा की उम्र ३४ साल हो गयी थी । उस समय लड़कियों की शादी २० से २४ साल के बीच हो जाया करती थी । इस ;लिहाज से उसको काफी समय लग गया था ।
कई बार में सोचती हु की राधा का कोई कर्ज शैलजा पर था जो उसने इस तरह से चुकाया । नहीं तो शादी के २ सालो के अंदर ही उसकी मौत क्यों हो जाती । इस बीच राधा का कोई बच्चा भी नही हुआ । उसके जीजाजी ने कुछ समय बाद किसी और से शादी कर ली । अब वो लोग उस दूसरी औरत को अपने घर बुला कर राधा की तरह ही ब्यवहार करते है ।
मेने एक बार शैलजा से पूछा । कुछ अजीब नहीं लगता इन्हे इस तरह हर जगह सम्मान देना । उसका जबाब सुनकर में हैरान रह गयी जब उसने कहा -"हमारा परिवार हे ही कितना जो हम इन्हे नकार दे । " उसके शब्दों की गहराई मुझे आज भी झकझोर जाती है ।
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