#ajmer (rajsthan) me desert safari

      राजस्थान में  डेजर्ट सफारी कई स्थानों पर होती है। लेकिन मुझे पहली बार अजमेर के पास पुष्कर में इसका मौका मिला। जिसके द्वारा मुझे महसूस हुआ ये कैसी दुनियां है जहां के तापमान में बहुत अंतर है।
       में  दिल्ली से जिस समय अजमेर गई थी। उस समय दिल्ली में रिकॉर्ड तोड़ सर्दी पड़  रही थी। हम डेज़र्ड सफारी के नाम से डर  रहे थे। इतनी सर्दी में  साऱी  रात खुले आसमान के नीचे कैसे बिताएंगे। यहाँ हम दिल्ली में कमरे बंद करके रजाई में दुबक के कंपकंपा रहे है। कंपकंपी दूर करने के लिए कुछ जलाना पड़  रहा है। मैने  अपनी शंका दुसरो को बताई उन्होंने मुझे बताया अजमेर में खुशनुमा मौसम है। लेकिन मुझे यकीन  नहीं हो रहा था।
        जिस दिन मुझे   शताब्दी ट्रैन  से जाना था उस सुबह मेने अपने सबसे गर्म कपड़े निकाले जिससे इस सर्दी का मुकाबला कर सकूं। ट्रैन में बैठने के बहुत देर तक हमें ठण्ड लगती रही। जब हम अजमेर के पास पहुंचने लगे ,तब हमें गर्मी का अहसास होने लगा लेकिन मेने अपनी जैकेट नहीं उतारी। अन्य लोगो ने अपने गर्म कपड़े कम करने शुरू कर  दिये  थे।
       अजमेर में जिनसे मिलने गए थे। उस घर में सबने सूती कपड़े पहन रखे थे। गर्म कपड़ो का नामोनिशान नहीं था। हमें देखकर उन्हें बहुत हैरानी हो रही थी। यहां इतनी गर्मी होगी हमारी सोच से बाहर  था। .यहाँ घर में खूब धूप  आ रही थी। मुझे गर्म स्वेटर छोडो अपना गर्म सूट  भी फालतू लग रहा था।
       हम दूसरे दिन दोपहर के समय पुष्कर के लिए रवाना हुए। हमें गाड़ी में बहुत गर्मी लग रही थी।
         दिन बीतते ठण्ड का अहसास होने लगा। हमारा सफारी का इंतजाम एडवेंचर रिसोर्ट में था। वहां पहुंचते ही चाय का इंतजाम था। जब हम वहां की केंटीन में पहुंचे तब सभी को बहुत गर्मी लग रही थी। हमारे कपड़े एक एक करके कम   होते गए। दिल्ली के सभी लोगो का गर्मी के कारण बुरा हाल  था। बच्चे गर्मी के कारण रो रहे थे। जबकि हम सूती कपड़े ले कर नहीं गए थे।  चाय पीने के   बाद हमने अपने कमरों में आराम किया। आप लोगो से अनुरोध है आप अपने साथ साधारण गर्मी के कपड़े लेकर जरूर जाना।
              फिर शाम के समय चाय के साथ पकोड़ो का इंतजाम था। इतने सारे  लोगो के लिए टेंटनुमा केंटीन में समय लग रहा था। धीरे -धीरे सब को ठण्ड सताने लगी। सभी अपने कमरों में जाकर गर्म कपड़े पहन कर आये। यहाँ के पकोड़े अलग तरह के होते है। यहां सब्जियों को बहुत बारीक़ काट कर बनाया जाता है। देखकर पहचानना मुश्किल होता है। हम किसके पकोड़े खा रहे है।
       इसके बाद बोनफायर के पास पार्टी का इंतजाम था। सभी   रात  के हिसाब से कपड़े पहन कर तैयार हुए। वहां पर  राजस्थानी नृत्य का इंतजाम  था।उनका नृत्य लाजबाब था।  उनके नृत्य  ने हमे भी राजस्थानी रंग में रंग डाला हम उन्हें देखते -देखते कब उनके साथ नृत्य करने लगे पता ही नहीं चला ।  तीन घंटे तक उनका नृत्य देखते हुए खाने का समय हो गया।
        खाने में हमारे लिए राजस्थानी खाना दाल -बाटी चूरमा और दिल्ली वालो के हिसाब से रोटी सब्जी वाला खाना भी था। सभी खानो में राजस्थानी स्वाद पहचाना जा रहा था। खाने के बाद भी हम बोनफायर के पास आ गए और हंसी मजाक करते रहे  .सर्दी और गर्मी दोनों का अहसास हमें साथ -साथ हो रहा था। लगभग एक बजे  हम अपने कॉटेज में सोने आ गए।
       हमने वहां पतले कंबल देखे तो पहले ही और कंबल मंगवा लिए। जिन्होंने नहीं मंगवाए उनकी रात ठिठुरते हुए बीती।क्योंकि इतनी रात को किसे जगाकर कम्बल का इंतजाम किया जाये।  वहां पर कॉटेज और टेंट दोनों तरह के इंतजाम थे। टेंट वालो को ठण्ड ज्यादा लगी।
      सुबह बहुत ज्यादा ठण्ड लग रही थी। मानो हम फिर से दिल्ली पहुंच गए है। लेकिन जैसे ही सूरज निकला ठंडक दूर होती चली गई।
      सुबह तैयार होकर पूरी सब्जी का खाना खाकर, हम ऊंट की सवारी के लिए निकल पड़े। उन्होंने बहादुर लोगो के लिए  ऊंट के ऊपर बैठने का इंतजाम कर रखा था।  बाकी  आरामदायक जिंदगी जीने वालो के लिए गाड़ी का भी इंतजाम था। यहाँ की ऊंटगाड़ी वालो ने हमें बहुत दूर तक तसल्लीबक्श  घुमाया।
         एक स्थान पर राजस्थानी कपड़े पहन कर फोटो खिचवाने का इंतजाम था।हमारे कुछ साथियो ने राजस्थानी कपड़े पहन कर फोटो खिचवाये। यहाँ भी राजस्थानी गानो  पर नृत्य करने वालो ने दुबारा से हमारा मनोरंजन किया।
        रेगिस्तान में चलने वाली बाइक जैसी गाड़िया  थी। घोड़े का इंतजाम भी था। उस जगह पर राजस्थानी स्वाद वाली चीजे भी बिक रही थी। यहाँ आकर डेसर्ट सफारी का पूरा मजा आ गया।  

#narmada river flows between marble rocks

     संगमरमरी चट्टानों के बीच बहती नर्मदा नदी 

       

   जबलपुर में भेड़ाघाट बहुत सुंदर संगमरमरी  सौंदर्य का प्रतीक  है। मैने  भेड़ाघाट केवल तस्वीरों में देखा था। उसमे सुंदरता निखर कर आती थी। जैसे ताजमहल का सौंदर्य हमे अपनी  तरफ  आकर्षित करता है। लेकिन भेड़ाघाट की चट्टानें उतनी सुंदर नहीं दिखाई देती क्योंकि वह बिलकुल प्राकृतिक रूप में है। जिनपर पर्यावरण की गंदगी ने उसे बदरंग  कर दिया  है। जो संगमरमर हमे आसपास दिखाई देता है।  वह तराशा हुआ और घिसाई से चमकाया हुआ होता है। मेने उसी तरह के संगमरमर की कल्पना की थी। लेकिन जिस [प्रकार खदान से निकला हुआ हीरा  साधारण लोग पहचान नहीं पाते  वैसे ही यहां का संगमरमर होता है।
     जबलपुर में चट्टानों की विविधता दिखाई देती है। यहां आकर कुदरत को नमन करने का मन करता है। संगमरमर के अनेक रंग दिखाई देते है। संगमरमर अनेक रंग जैसे गुलाबी ,हरापन, स्लेटी और  अलग -अलग रंगो के मिश्रण से युक्त दिखाई देता है।
       पहले हमने ऊपर  से  कार के द्वारा इन चट्टानों का नजारा देखा। जिसे देखकर चकाचौंध  हो गए। इन चट्टानों के बीच  से बहती नर्मदा नदी का सौंदर्य मन को लुभा रहा था। कही गुलाबी संगमरमरी  चट्टानें हमें पहले साधारण लगी थी। लेकिन बाद में समझ आया ये भी संगमरमर है।
       भेड़ाघाट से नाव  के सफर के लिए हमें बहुत सारी  सीढिया  उतरनी पड़ी। सीढ़ियों के दोनों तरफ लोगो ने संगमरमर का सामान बेचने के लिए  रखा हुआ था इस तरह की चीजे पत्थर से बनाई जा सकती है। इसकी कल्पना भी नहीं की थी।
        हमने नाव  में बैठकर भेड़ाघाट की सैर की. उसका मजा बिलकुल अलग था। क्योंकि नीचे  से चट्टानों का बृहद आकर  प्राकृति  की विराटता के दर्शन करा रहा था। उसके सामने हम निमित्त मात्र है।  मुझे समझ नहीं आ रहा था इतनी बड़ी चट्टानों के बीच में बहुत सारे  छेद  कैसे हुए। ये इंसानी कारनामा नहीं हो सकता। ये छेद  नीचे से ऊपर तक दिखाई दे रहे थे।
     हमारा मल्लाह छोटी उम्र का और बातचीत में निपुण था। उसने अपनी मजेदार बातो से हमारे सफर को मनोरंजक बना दिया था। वह उन चट्टानों में कही कार ,पेड़, टैंक, बंदर, फटे   हुए कपड़ो में अभिनेत्रियों के कपड़े की कल्पना करवा रहा था। इन जगहों पर कहाँ किस फिल्म की शूटिंग हुई उसका वर्णन भी कर रहा था  उसकी मनोहारी बातो से हम हँसते -हँसते बेहाल हुए जा रहे थे। नाव  की सैर की टिकट 300  रूपये थी। लेकिन नाविक ने अपने मजाकिया लहजे के कारण सबसे 50  रूपये अलग से वसूल किये। लोगो ने उसके तरीके  से खुश होकर नानुकुर नहीं किया। फालतू पैसा वसूल करने के चककर  में उसने नाव को सही जगह से कुछ दूरी  पर उतारा।
       मेने दोपहर और शाम के समय भेड़ाघाट की सुंदरता निहारी थी। लेकिन चांदनी रात की कल्पना में डूबी रही। जब पूरा चाँद इन चट्टानों पर अपनी चांदनी बिखेरता होगा तब मन मदहोश हो जाता होगा।
       

#chattani saundary ka malik jabalpur

               चट्टानी सौंदर्य का मालिक जबलपुर 

  मध्यप्रदेश के  जबलपुर में अनेक जगह देखने लायक है। उनमे  रानी  दुर्गावती  का  किला  अपने समय में भव्य रहा होगा। लेकिन अब बहुत हद तक खंडहर में तब्दील हो गया है। यह किला पर्वत  के सबसे ऊपर बना हुआ है। यहां तक पहुंचने में साधारण इंसान बेदम हो जाता है। इसमें   मदनमहल बना हुआ है। यहाँ  पूरी चट्टान का  सदुपयोग दिखाई  देता  है। चट्टान को इमारत के रूप में प्रयोग करके आवश्यकतानुसार छोटे पत्थरो का उपयोग किया है। इस किले का अधिकांश भाग खंडहर में बदल चुका  है। केवल मदनमहल ही सुरक्षित बचा है। यहाँ से पूरा जबलपुर दिखाई देता। है।
        इस इमारत के ऊपर हमें एक सुरक्षा गार्ड दिखाई दिया। उसे देखकर हैरानी हुई इस इमारत को सुरक्षा गार्ड की जरूरत बिलकुल नहीं थी क्योंकि इस किले का 90  % भाग तबाह हो चुका  है। केवल 10  % की सुरक्षा के उपाय करना मुझे जरूरी नहीं लगा। लेकिन इसके बहाने से कुछ इंसानो को   रोजगार मिला हुआ है।
       रानी  एक जुझारू दबंग महिला थी। वह शादी के चार साल बाद विधवा हो गई। उसने अपने बेटे नारायण के नाम पर राज्य की बागडोर संभाल ली। अकबर उसे अपने हरम में लाना चाहता था। लेकिन उसने ऐशोआराम की जिंदगी अपनाने की जगह अकबर से मुकाबला करना बेहतर समझा। इन्होने  भी रानी लक्ष्मीबाई के समान युद्धभूमि में वीरगति पाई। जबलपुर में इनके नाम से विश्वविद्यालय और  स्मारक  बने हुए  है।
      किले के पास बेलेंसिंग स्टोन बना हुआ है। जिसे देखकर कुदरत की ताकत हमें चौंका देती है। एक छोटे से आधार पर एक बहुत बड़ी चट्टान खड़ी  हुई है। उसके पास जाते हुए मुझे डर  लग रहा था। ये चट्टान जो अभी तक नहीं गिरी कही मेरे ऊपर ही गिर न जाये। गनीमत रही मै  सहीसलामत वापस आ गई।
        इसके पास ही शारदा मंदिर बना हुआ है। इसे भी आप कुदरत का अचम्भा कहेंगे। क्योंकि इस मंदिर की दीवारे ईंट  -पत्थरो से कम चट्टानों से अधिक बनी  हुई है।  केवल मंदिर में मूर्तियां इंसानी हाथो से निर्मित है। इन स्थानों पर चटटनो का अधिकतम प्रयोग दिखाई देता है। मेने इससे पहले  पूरी चट्टानों को   निर्माण कला में इस्तेमाल होते नहीं  देखा था। यहाँ पूरी चट्टानों के इस्तेमाल से निवास बनाये गए है।
        यहाँ पानी के लिए बहुत बड़ी कुदरती झील बनी  हुई है। उसके पास ही एक मस्जिद दिखाई देती है। हर तरफ चट्टानों और गुफाओ का सूंदर उपयोग दिखाई देता है। इतनी सारी  चट्टानों को मेने पहली  बार देखा था। कुदरत की महिमा मेरे अंदर तक बस गई। 

#polluted delhi

             दिल्ली का प्रदूषित वातावरण 

         मणिपुर 
       दिल्ली का राष्ट्रपति भवन
दिल्ली का वातावरण असहनीय हो गया है। ऐसे माहौल में बच्चो और बुजुर्गो के लिए जीना बहुत मुश्किल हो गया है। हर तरफ स्मोग दिखाई दे रहा है। स्मोग का मतलब कोहरा और धुंआ जब मिल जाता है। सूरज भी ऐसे में चंदा जैसा दिखता  है। समझ नहीं आता हम दिन में सूरज देख रहे है या चन्द्रमा। सूरज का तेज मद्धम  हो जाता है।  मानो  बादल  छाये हो। हलकी ठण्ड भी महसूस होती है।
         जिसने साफ आकाश नहीं देखा उसके लिए आकाश  का रंग स्लेटी ही होता है। मेरा जन्म दिल्ली में हुआ था इसलिए मेने कभी स्वच्छ आसमानी आकाश नहीं देखा था। इसलिए हमे स्लेटी आकाश देखने की  आदत पड  गयी थी। पर्वतीय प्रदेशो में भी बिलकुल स्वच्छ आकाश कभी -कभार दिखाई देता है। जहां सैलानियों के कदम कम पड़े है वही आपको प्रदुषण रहित आकाश दिखाई देगा।
       मेने जिंदगी में प्रथम बार स्वच्छ आकाश मणिपुर में देखा। उसे देखकर मेरा उसपर से निगाह हटाने का मन नहीं कर रहा था। इतने सुन्दर आकाश को निहारते मेरा मन नहीं भर रहा था। दिन में आसमानी आकाश और रात के समय तारो भरा आकाश। दिल्ली में रहते हुए  हम धूल रहित हरीभरी   धरती और नीले आकाश को बिलकुल भूल चुके है।
        दिल्ली में रहते हुए धूल भरे वातावरण की आदत पड  चुकी है। जब में मणिपुर में थी तब जिस घर में रहती थी उस घर में रोज  पोछा लगाने और धूल झाड़ने  की जरूरत भी नहीं पड़ती थी। जब कई दिन बाद  पोछा लगाओ तब एक पोछे में पूरा घर साफ हो जाता था और पोछा भी गन्दा नहीं होता था।
     वहां  नीचे खड़ी  हुई गाड़ियां मेने कभी साफ होते नहीं देखी।  उनकी सफाई की कभी जरूरत नहीं पड़ती थी। हमेशा वे साफ -सुथरी रहती थी।       
       दिल्ली में रहते हुए सोने -चांदी  के जेवर मेने कभी इतने साफ नहीं देखे जितने मणिपुर में दिखाई दिए। लोगो के गले में पड़े हुए सोने के जेवर इतने अच्छे लगते थे मानो  अभी दुकान से लाकर  पहने है।  यहाँ तक छोटे बच्चो को भी वहां कन्हैया जैसे कानो , हाथ -पेरो और गले में जेवर पहनाये जाते है। मेने तीन महीने के बच्चे को  कानो और हाथ -पेरो में जेवर पहने देखे। चांदी  के जेवर देखकर मेरा मन भी ललचा गया। मेने सोचा बड़े साफ -सफाई के द्वारा जेवर चमका लेते होंगे लेकिन बच्चे इतना ध्यान नहीं रख सकते इसका मतलब यहाँ की चांदी बिना मिलावट की बहुत अच्छी है।
          उन्हें देखकर  मेने भी चांदी के गहने खरीद लिए। जब तक वहां रही चांदी  के गहने  पहन कर अपना शौक पूरा किया और  खुश होती रही  क्योंकि जेवर चमक रहे थे । जैसे ही दिल्ली आयी दस दिन में उन गहनों  की चमक खत्म हो गई। और मुझे तब समझ आया ये दिल्ली के वातावरण का असर है दिल्ली के सुनारो का दोष नहीं है।
       मैने लगभग 35  साल बाद चांदी  के गहने  पहनने का शौक पूरा किया था। जो दिल्ली में आते ही खत्म  हो गया।  चांदी की पायल भी बरसो से नहीं पहनी क्योंकि उसको पहनने के बाद पैर काले  हो जाते थे। पायल के साथ पेरो को और ज्यादा रगड़ कर साफ करना पड़ता था।
     अब से चालीस साल पहले दिल्ली की जनसंख्या 62  लाख थी। अब दिल्ली की जनसंख्या एक करोड़ साठ  लाख हो चुकी है। लगभग तीन  गुना बढ़ने का असर हर चीज पर पड  रहा है।
      हम पहले कही से भी  पानी पी  लेते थे। लेकिन अब नल का पानी भी साफ करके पीना पड़ता है। हर इंसान घर से पानी लेकर चलता है या पैकेटबंद पानी प्रयोग करता  है। पानी का व्यापार  शुरू हो गया है।
        कीटनाशकों और रासायनिक  खादों का  अधिक प्रयोग होने लगा है जिनके कारण अनेक बीमारिया  होने लगी है। अमीर  लोग खेती की जमीन  खरीद कर जैविक खाद और पारम्परिक तरीके  से  अपने खाने की चीजे पैदा करवा रहे है। पारम्परिक तरीके  से उगे खाद्य -पदार्थ का बड़ा बाजार तैयार हो गया है। इन्हे "ऑर्गेनिक  खाद्य" कहा जाता है। सम्पन्न लोग फिर से आर्गनिक खाद्यानो को महत्त्व देने लगे है इसलिए ऑर्गेनिक खाद्यान्न बड़ी दुकानों में मिलने लगे है।  ये बाजार में मिलने वाले सामानो  से ज्यादा महंगे होते है।
         आने वाले समय में वायु प्रदुषण के कारण लोग ऑक्सीजन के सिलेंडर भी घर से लेकर चलेंगे। ऐसे समय की कल्पना बहुत भयावह लग रही है। अभी केवल मास्क की जरूरत पड  रही है। जब सिलेंडर की जरूरत पड़ेगी उससे पहले हमें चेत जाना चाहिए। यदि हम सजग नहीं हुए तब हमें जीने के लिए शहर बदलने पड़ेगे। ये सब हमारी मूल आवश्यकताये   है।
         हवा के बिना कुछ पल भी बिताना मुश्किल है। ऐसी हवा में साँस लेने से हमारा जीवन और शहरो के लोगो से कमसकम 6 साल कम हो रहा है।
       हमें पराली  की समस्या से निबटने की कोशिश करनी चाहिए। पहले ज़माने में मजदूर फसल की कटाई  करते समय नीचे  तक की कटाई कर देते थे। लेकिन मजदूरी बचाने  के लिए मशीनों से कटाई  करवाई जाती है। मशीने ऊपरी सतह से खाद्यन्न काट कर खेतो में ही साफ करके रखने लायक बना देती है  जिसके कारण जल्दी और सस्ता काम हो जाता है।
        उसके बाद बची हुई पराली  का इस्तेमाल नहीं हो पाता। क्योकि पहले ज़माने में कच्ची झोपड़ियों में छते   बनाने में पराली  का इस्तेमाल हो जाता था। ले.किन अब पक्के मकान  बनने के कारण इनका प्रयोग नहीं होता।         पहले हर घर में जानवर होते थे। पराली  से  उनके चारे की जरूरत पूरी हो जाती थी लेकिन अब किसान घरेलू  जानवर नहीं पाल  रहे।
      हमे पराली  के दूसरे इस्तेमाल सोचने होंगे जैसे "रॉटावेयर मशीन" के द्वारा पराली  के छोटे टुकड़े करके उसे मिटटी में मिलाने पर जमीन बहुत उपजाऊ हो जाएगी और खाद खरीदने के लिए पैसे भी नहीं लगेंगे । इस मशीन की कीमत 5०   हजार है। ये  सरकार  किसानो को सस्ते रूप में उपलब्ध कराये । इसकी उपयोगिता लोगो को बताने की पहल करनी चाहिए जैसे किसान और मशीने किराये पर लेकर खेती में मदद ले रहे है ऐसे ही इसे किराये पर लिया जा सकता है।
         पराली  के द्वारा कागज  ,कार्डबोर्ड  जैसे व्यवसायों के बारे में लोगो को जागरूक करना चाहिए। जब तक किसानो को पराली  के उपयोग पता नहीं चलेंगे वे अपने खेत नयी फसल उगाने  के लिए इसी तरह जलाते  रहेंगे  और वायु प्रदूषण का कारण बनेगे।
     बहुत सारे  दिनों की विद्यालयों की छुट्टियाँ  करवाएंगे। अनेक लोगो को बीमार करवा कर मौत के मुँह में धकेलने का कारण बनेगे।  हमारी सजगता ही आने वाले भयावह संकट से उबार सकेगी वरना इंसानी जीवन मौत के मुँह में जाने के लिए विवश हो जायेगा। 

#romharshak description of kamakhya temple

                कामाख्या मंदिर का रोमहर्षक वर्णन 

 असम  का कामाख्या मंदिर प्रसिद्व  स्थान है। इस प्रदेश में मंदिर देखने के लिए पूरे  भारत से लोग आते है। इसमें सुबह से लोगो का आवागमन शुरू हो जाता है।  मुझे लोगो से पता चला आप सुबह 6  बजे चले जायेंगे तो आपको जल्दी देवी दर्शन  हो जायेंगे इसलिए हम सुबह जल्दी  तैयार होकर  साढ़े  छह बजे तक मंदिर पहुँच गए  लेकिन इस समय तक लोगो की बहुत लम्बी पंक्ति लग चुकी थी वह पंक्ति घूम -घूम कर चल रही थी। इतनी लम्बी पंक्ति देखकर हमारी हिम्मत जबाब दे गई। हमने सोचा इतनी लम्बी पंक्ति में लगकर  सात आठ घंटे लग जायेंगे। इससे तो विशेष दर्शन करने में भलाई है।
          हम विशेष दर्शन की पंक्ति में लग गए। बहुत देर तक हमारी पंक्ति आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रही थी। तब आगे जाकर मालूम करने पर पता चला  दफ्तर खुलने का समय साढ़े सात बजे है।  हमें जल्दी लाइन में खड़े होने का फायदा नहीं हुआ। यहाँ भी हमें एक घंटे टिकट खिड़की पर खड़ा होना  पड़ा। मेने अपने साथी को लाइन में लगाया।
      मेने   पूरे  मंदिर में घूमकर दर्शन करना शुरू कर दिया। क्योंकि बर्षो से मेरी कामाख्या मंदिर देखने की इच्छा थी वह अब जाकर पूरी हो रही थी। इसे ढंग से देखने का लालच में छोड़ नहीं सकती थी।  यहाँ की वास्तुकला बिलकुल अलग तरह की थी। इस समय सफाई हो  रही थी। मुझे अधिकतर स्थानों पर सफाई की व्यवस्था उचित लगी। लेकिन कुछ लोग कह रहे थे। पहले यहाँ इतनी सफाई नहीं थी। तिलचट्टे जगह -जगह दिखाई देते थे।
      यहां के तालाब में नहाते हुए लोग दिखाई दिए। लेकिन तालाब मुझे साफ नहीं लगा। उसमे हरियाली (काई ) दिखाई दे रही थी। कुछ आगे बढ़ने पर सीढ़िया  बनी हुई थी। जिनपर चढ़ने के बाद भव्य मंदिर के दर्शन होते है.मंदिर की बाहरी  दीवारों पर अनेक मुर्तिया बनी  हुई है। उन्हें निहारना मुझे बहुत अच्छा लगा।
          साढ़े  सात बजे हमारा टिकट लेने का नम्बर आया।यहाँ की टिकट 500  रूपये की थी। एक इंसान के लिए इतने रूपये इससे पहले कभी अदा  नहीं किये थे दो जनो के लिए हमने एक हजार  चुकाए।  उसके बाद हमें एक हाल में बिठा दिया गया जहा से हमें अगली जगह आधे घंटे बाद जाने के लिए कहा गया। उसके बाद तीसरे हाल में जाने दिया गया। उसमे लगभग आधा घंटा और लग गया। फिर हमें लाइन में लगकर आगे चलने के लिए कहा  गया। हमारी लाइन आधे घंटे तक घूमती हुए आगे बडी ।
             इस लाइन में खड़े हुए हमने जानवरो की बली  के बाद कटे हुए सिर  आते देखे। उनके आते समय एक दम  शोर मच जाता था। जानवरो के सर दूसरे दरवाजे से आते थे। उस दरवाजे को सिर्फ बलि के समय ही खोला जा रहा था। उसके बाद एकदम बंद कर दिया जाता था।
        हमने मंदिर में घूमते हुए कई सिंदूर लगे हुए बकरे और कबूतर देखे थे। मुझे लगता है कबूतर पूजा करके वही छोड़ दिए जाते थे। क्योंकि वहां जितने कबूतर थे उन सबपर सिंदूर लगा हुआ था। हम शाकाहारी लोगो ने इससे पहले कभी कटे हुए सिर नहीं देखे थे इसलिए उन्हें देखकर सिहरन हो रही थी।
       मेने इससे पहले किसी मंदिर के पुजारी को लाल कपड़ो में नहीं देखा था। यहाँ अधिकतर पुजारियों  ने सुर्ख लाल रंग के कपड़े पहने हुए थे पहले बहुत अजीब लगा था। बाद में मेने एक पुजारी को पीले कुर्ते में देखा लेकिन उसके कुर्ते पर लाल धब्बे लगे हुए थे। बाद में समझ आया ये धब्बे खून के है। उस पुजारी को देखकर मुझे झुरझुरी आने लगी इतने खून से भरे धब्बे वाले कुर्ते पहन कर ये आराम से कैसे घूम रहा है। बाकि पुजारियों के सुर्ख लाल कपड़ो का होना क्यों जरूरी है इसका कारण अब समझ में आया।
         इसके बाद हमे गर्भ गृह में जाने का मौका मिला।  बाकी  सभी जगहों पर भरपूर प्रकाश था लेकिन यहाँ पर केवल दो बड़े दीपक जल रहे थे। उसके धूमिल प्रकाश में कुछ भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था। पंडित जी हमें सही तरह से निर्देश दे रहे थे लेकिन हमें वहां कुछ समझ नहीं आ रहा था। यहाँ कमल  के  फूल चढ़ाओ ,व्हने वाले जल का आचमन करो। वही दूसरी तरफ कुछ और था ,उस पंडित जी ने भी हमें समझाने  की कोशिश की लेकिन हमें वहां केवल फूलो के ढेर दिखाई दिए उसके आलावा कुछ समझ नहीं आ रहा था। हमें वहां तसल्ली से रुकने का मौका मिला। लेकिन समझ नहीं आ रहा था। हम यहां देखने क्या आये है। कमसकम इतना प्रकाश करते जिससे आसपास की चीजे समझने का मौका मिलता।
        हमने दर्शन करने के बाद बाहर निकलते समय कुछ और लोगो को उस दरवाजे से अंदर आते देखा पता चला वह vvip दरवाजा है। वे लोग केवल कुछ मिनट में गर्भ गुफा तक पहुंच सकते है। हमने वहां मिल्ट्री वालो की अलग लाइन देखी। इस तरह यहाँ पर चार तरीके  से दर्शन होते देखे।
        मै  हाथ में प्रसाद की थैली ले जा रही थी। उसमे मेवे थे। एक बंदर ने मेरी थैली झपट ली। में उसे देखती रह गई। जो थोड़ा सा प्रसाद बचा  था उसी का भोग लगा दिया। वैसे प्रसाद हम अपनी संतुष्टि के लिए खरीदते है। वरना प्रसाद चढ़ाने की हमें कही जगह नहीं दिखाई दी।
        कुछ समय बाद मुझे वहां से जाने का दुबारा मौका मिला तो मुझे देखकर हैरानी हुई बंदर ने किशमिश सारी  छोड़ कर केवल दूसरे मेवे खाये है। मुझे उस बंदर पर बहुत गुस्सा आया उसने बादाम ,काजू और नारियल खाकर सारी किशमिश बर्बाद कर दी थी। अगर खा लेता तो संतुष्टि होती।
       हमें मांस  का प्रसाद  बंटता कही दिखाई नहीं दिया। बलि किसी अन्य जगह पर दी जाती है। यहां पर केवल सिर लेकर पूजा की जाती है।
       प्रसाद के अगरवत्ती और  दिए जलाने के अलग स्थान बनाये गए है। श्रद्धा भाव से लोग वहां अगरवत्ती और दिए जला रहे थे।
        कामाख्या मंदिर 51  शक्तिपीठो में से एक है। यहाँ शिव की पत्नी सती  की योनि गिरी थी। जून मास में अम्बुवाची पर्व मनाया जाता है। उस समय सती  को रजस्वला मान कर मंदिर के पट  बंद कर दिए जाते है। इस पर्व में शामिल होने के लिए दूर -दूर से लोग आते है।
       मंदिर से कुछ दूर   ब्रह्मपुत्र नदी के अंदर उमानंदा मंदिर है। जिसके बारे में कहा जाता है जब शिवजी के कंधे से विष्णुजी के द्वारा सारे  अंग काट दिए जाने पर भारहीन  होने पर शिवजी का क्रोध खत्म हुआ। तब उन्होंने उमानंदा  स्थान पर तपस्या करनी शुरू कर दी। इसी स्थान पर कामदेव ने उनकी तपस्या भंग  करने की कोशिश की। यहां पर शिवजी ने कामदेव को भस्म कर दिया। क्रोध शांत होने पर  दुबारा  से यही पर उन्हें  जीवन दान दिया था।
       मुझे शिवजी और सती  की कहानी और यहाँ होने के कारण मुझे लग रहा था जैसे मै  पौराणिक काल में पहुंच गई हूँ। मै  स्वयं को वहां पाकर रोमांच से भर उठी हूँ। इस तरह का एहसास इससे पहले मुझे कभी नहीं हुआ था। 

#RAVAN KE GUN

                                  रावण के गुण 

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        कल रावण का दहन हुआ। मुझे रावण में कुछ अच्छाइया दिखाई देती है लेकिन रावण राम से हार गए थे इसलिए उन्हें बुरा इंसान मान लिया गया। आज के इंसान को यदि रावण के समान गुण मिल जाये तब उसका व्यवहार भी बदल जायेगा। आप मेरे विचारो से सहमति जाहिर नहीं कर पाएंगे लेकिन जो विश्लेषण करने जा रही हूँ उसपर विचार अवश्य करे।
       किवदंती है बचपन में रावण बहुत सूंदर होने के कारण ,उन्हें दशानन कहकर पुकारा जाता था। उनके दस सिर कभी नहीं थे। बल्कि उनकी सूंदरता  के कारण उन्हें यह उपनाम मिला।
      रावण को शास्त्र और शस्त्र का अद्भुत ज्ञान हासिल था। अपने समय में रावण लंका के आलावा पूरे भारत मे भ्रमण करते थे। उनके साम्राज्य का विस्तार भी भारत में फैला हुआ था। दक्षिण भारत में विशेष रूप से उनका वर्चस्व था इसलिए वे हवन आदि क्रियाओ का विरोध करते थे। क्योंकि उनकी रक्ष संस्कृति इसके विपरीत थी। 
      राम आर्य संस्कृति को मानने वाले थे। जबकि रावण रक्ष संस्कृति के उपासक थे। हर इंसान अपने धर्म को दूसरे धर्म से ऊँचा समझता है जिसके कारण अपने धर्म के उत्थान के भरसक प्रयत्न करता है।  दूसरे धर्म को खत्म करने में सारी ताकत झोंक देता है। वैसे ही रावण ने किया। रक्ष संस्कृति में खुलापन था। जबकि आर्य संस्कृति इस खुलेपन को बर्दाश्त नहीं कर पाती  थी।
        सुपनखा अर्थात स्वर्णनखा ने राम और लक्षमण के सामने अपनी पसंद जाहिर की जबकि आर्य संस्कृति में विवाह दूसरे निर्धारित करते थे।उन्होंने उसकी इच्छा का उपहास ही नहीं उड़ाया बल्कि उन्होंने सूपनखा को बदसूरत ही बना दिया। ये कहाँ का इंसाफ है।
      सुपर्णखा के अपमान का बदला लेने के लिए रावण ने सीता का हरण किया था। किसी की बहन को बदसूरत बना देने पर साधारण इंसान भी अपना आपा खो बैठेगा जबकि रावण लंका का ताकतवर  राजा था। उसके गुस्से के बारे में किसी ने  नहीं सोचा। 
       रावण की पत्नी मंदोदरी पांच कन्याओं (सीता ,द्रोपदी, अहिल्या ,अनुसुइया और मंदोदरी ) में गिनी जाती है।यानि उस समय की सर्वश्रेष्ठ औरत  थी.सर्वश्रेठ  औरते सर्वश्रेष्ठ लोगो को ही मिलती है।   मंदोदरी अप्रतिम सौंदर्य की स्वामिनी थी। वह जोधपुर की कन्या थी।
          भारत में केवल दो स्थान है जहाँ रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। उसमे एक उत्तर प्रदेश का विशरख यहां रावण के पिता विश्रवा  ऋषि रहते थे  और दूसरा जोधपुर क्योकि रावण को  यहाँ दामाद माना जाता है।
          रावण लंका में जब भी सीता से मिलने जाता था तब उसके साथ मंदोदरी होती थी। यदि उसके मन में कलुष होता तब क्या वह मंदोदरी को अपने साथ लेकर जाता।  सीता का हरण केवल सूपनखा के अपमान का बदला लेने के लिए किया गया था।
      उस समय    रावण के सामान विद्वान कोई   नहीं था। तभी तो राम ने लक्ष्मण से उसके अंतिम क्षणों  में ज्ञान प्राप्त करने के लिए कहा। दुश्मन के पास कोई चीज होती है तभी उसके सामने झुका जाता है।  वरना दुश्मनी जिससे की जाती है उससे जीभरकर पहले नफरत की जाती है। जिससे नफरत करेंगे उससे ज्ञान प्राप्त करने के बारे में कौन सोचता है।
          रावण के सामान उस समय कोई बाहुबली नहीं था। उसे कोई हराने की सामर्थ्य नहीं रखता था। ऐसे में घमंड आना बड़ी बात नहीं है।
       रावण विभीषण की विश्वासघात के कारण मारा गया था। यदि ऐसा नहीं होता रावण को हराना असम्भव था। कहा जाता है रावण की मौत के बाद विभीषण को लंका का राजा बना दिया गया और मंदोदरी की शादी भी उससे कर दी गयी।
        आपको आर्य संस्कृति को  मानने के  कारण ये उचित लगता है। मुझे नहीं लगता।  जहाँ लक्ष्मण ने कभी सीता को पैरों  से ऊपर नहीं देखा वही विभीषण ने अपनी भाभी से शादी की।
        एक बार आप अवश्य विचार कीजिये रावण एक साधारण मनुष्य था। जिसके पिता ऋषि का जीवन जीते थे। उन्हें पैतृक रूप से वह केवल ज्ञान दे पाए वाकी  सब कुछ उन्होंने अपने पुरूषार्थ  से हासिल किया। उन्हें सुंदरता भगवद्कृपा से मिली बाकि गुण उन्होंने अपनी कर्मठता से हासिल किये।
        शिव को अपनी उपासना से प्रसन्न करके उनसे सोने की लंका प्राप्त की। जबकि हम तो किसी से एक तौला सोना भी प्राप्त नहीं कर पाते। 
        अभी हमने देवी को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखे। जिंदगी भर पूजा आराधना की लेकिन भगवान ने आज तक दर्शन नहीं दिए। हमसे रावण उत्तम है तभी तो उन्हें इच्छित फल मिले। 

#GANDHI IN TODAY"S CONTEXT

                                    आज के सन्दर्भ में गाँधी 

  

  आज महात्मा गाँधी जी की 150  वी  जयंती मनाई जा रही है।  लोग बहुत उत्साह से इसे त्यौहार की तरह  मना रहे है। मै  गाँधी जी को महात्मा के रूप में न मान कर एक साधारण इंसान मानती हू। जिसने हालात  को बदलने का प्रण  ले लिया। उसके कारण उन्हें कितनी भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा लेकिन वे अडिग रहे।  वे  मिलने वाली यातनाओ से घबराये नहीं।अपने निर्णय पर अडिग रहे।
          उनके जीवन में जेल और घर के माहौल में कोई अंतर नहीं था। वे  जेल में रहते हुए इस तरह अपने रोजमर्रा के कामो में इस तरह लगे रहते थे जैसे घर में रहते  काम कर रहे हो. ब्रिटिश अधिकारियो को उनके इस व्यवहार से हैरानी होती थी। गाँधी जी ने आम जनता के अंदर से भी जेल का डर  निकाल  दिया था। उनके द्वारा ही सबसे पहले जेल भरो आंदोलन की शुरुरात हुए थी। आदमी और औरत जेल जाने पर गौरान्वित महसूस करने लगे थे।
       १८५७ की आजादी  की आग लोगो के अंदर धीरे -धीरे दम तोड़ने लगी थी। भारतीय जनता के अंदर ब्रिटिश साम्राज्य का  सामना    करने की भावना खत्म हो गई थी। गाँधी जी ने उस भावना को फिर से जागृत किया। उन्होंने अकेले बढ़ने के आलावा ,सभी के अंदर स्वाभिमान से जीने की इच्छा पैदा की।  ये भावना बहुत बड़ी थी। मानो   मरते हुए इंसान को जीवित कर दिया हो।
           आज के समय में गाँधी जी के बारे में बहुत  लोग अपशब्द बोलते है। हम आजादी  के बाद पैदा होने वाली पीढ़ी है। हम उस हालात  से वाकिफ नहीं है। लेकिन बुद्धिजीवी लोग उनके सहयोग को नकार नहीं सकते।        गाँधी जी को समाज और देश में जो कमी दिखाई देती थी उसे अकेले निबटने की अपेक्षा जनांदोलन का रूप दे देते थे।
        भारतीय सफाई के लिए विशेष वर्ग तक  सीमित  थे । उनको अपने बराबर अधिकार भी देने के लिए तैयार नहीं थे ।  उनका महत्व भी नहीं समझता थे । लोग गंदगी में बैठना मंजूर करते थे लेकिन अपने हाथ से सफाई करना मंजूर नहीं था। उनकी इस आदत के कारण विदेशो में भारतीयों को गंदे लोग कहा जाता था।
      गांधीजी को ये बात खटकी। उन्होंने हर काम खुद करना शुरू किया जैसे बर्तन साफ करना, झाड़ू लगाना और पखाना साफ करना जिसे करने  की शक्ति आम लोगो में नहीं होती थी। सफाई खुद करके  लोगो को सफाई करने के लिए प्रेरित किया। साफ -स्वच्छ जगह पर रहने को उन्होंने जन -आंदोलन का रूप दे दिया।
        उनकी इस आदत को लोग 120  बर्षो में भूलने लगे थे। उसी भावना को मोदी जी ने फिर से जनांदोलन में बदल दिया। जन आंदोलन से समाज को बदलना आसान होता है। एक अकेला इंसान या सरकार  हालत को बदलने में असमर्थ होटी  है।
      मैने बहुत सालो से  सफाई कर्मियों की आवश्यकता केवल कागजो में देखी  थी प्रत्यक्ष में उनकी पगार का लाभ उठाते हुए, उच्च अधिकारियो को देखा था। जो सफाई कर्मी कार्यरत थे उन्हें भी कोई अधिकारी साफ -सफाई के लिए टोकता नहीं था। जिसके कारण 50  कमरों की सफाई करने के लिए एक कर्मी होता था। सभी को पता होता है  एक कर्मी इतनी सफाई नहीं कर सकता इसलिए सरकारी कार्यालयों में  गंदगी का अम्बार लगा होता था। अब उन्ही स्थानों पर सात कर्मी दोनों समय सफाई करते दिखाई देते है। उनके निरिक्षण के लिए समय -समय पर लोग आते रहते है।
       पहले हम यदि सफाई कर्मियों को काम के लिए कहते थे तब उनके पास ढेर सारे बहाने होते थे लेकिन अब सब अपनी जिम्मेदारी समझ कर काम करने लगे है।
        मैंने वह समय भी देखा है जब पुरे विद्यालय में एक कर्मी होता था। जो विद्यालय के समय में अधिक आमदनी के लिए आस पास के घरो में काम करने चला  जाता था। क्योंकि उसे बहुत कम वेतन दिया जाता था जिसमें  घर का गुजारा चलाना  कठिन होता था।
     मैंने वह वक्त  देखा है जब दो हजार बच्चो के विद्यालय में एक शौचालय होता था। उसे भी सफाई कर्मी सही तरीके  से साफ नहीं करता था। अधिकतर शौचालय जाम रहते थे। जिसके कारण लड़किया शौचालय में जाने से बचती थी।
           मैंने एक सफाई कर्मी ऐसा भी देखा जिसने उस इकलौते शौचालय में अपना ताला  लगा दिया था। जिसके कारण दो हजार लड़कियों को समस्या का सामना करना पड़ता था। जब उससे पूछा। उसने कहा "-इसमें मेरा सामान रखा है।इसे मैं  नहीं खोलूंगी। "उसके इस जबाब से हतप्रभ रह गई  इसके कारण लड़किया जहाँ जगह मिलती थी वही अपना काम करती थी। जिसके कारण वह सफाई कर्मी कहती थी "-इनको अक्ल नहीं है।गंद मचाती फिरती है।
      मै   मोदी जी के शौचालय अभियान और सफाई  अभियान के कारण आभारी हूँ।क्योकि गंदे शौचालय में जाने की हिम्मत नहीं होती थी। हम जैसे पढ़े -लिखे लोग खुले में जा नहीं सकते थे। हाथ में पैसे होते हुए भी बेबस थे।
     गांधीजी ने कोढ़ियो की सेवा करके लोगो के अंदर उपेक्षित और बीमार लोगो के प्रति हमदर्दी की भावना जगाई। आज भी बीमारों को उचित देखभाल और इलाज की जरूरत है। उसके लिए हमारी सरकार  ने आयुष्मान योजना और मौहल्ला क्लिनिक की शुरुरात की।
        भारत की जनसंख्या बढनेका कारण मृत्यु दर का अधिक होना है। यदि उचित समय में इलाज मिलेगा तो लोग एक या दो बच्चो से ज्यादा पैदा नहीं करेंगे। पढ़े -लिखे और अमीर  घरो में आपको एक या दो बच्चे ही मिलेंगे क्योकि उन्हें सही समय पर इलाज मिल जाता है। अभी भी भारत में गरीब राज्यों में जनसंख्या बहुत है जबकि अमीर  राज्यों में जनसंख्या का बढ़ना रुक गया है।
        अधिकतर लोग कहते है। गाँधी जी ने अछूतो को गले लगाया जो गलत था। लेकिन जब मनु ने जाति  नियमो की रचना की थी  वह  कर्म के आधार पर  निर्धारित होती थी लेकिन कालांतर में उच्च वर्ग के लोगो ने कर्म की जगह  जन्म के आधार पर  जाति निर्धारित कर दी।क्योकि उच्च वर्ग के लोग अपने बच्चो को छोटे काम करते देख नहीं सकते थे।
        निचले तबके के लोगो से सारे अधिकार छीन लिए गए। उन्हें इतना अधिक प्रताड़ित किया गया कि उन्होंने धर्म ही बदलने में भलाई समझी।क्योकि अन्य धर्मो में उन्हें समान समझा जाता था  और अनेक लाभ दिए जा रहे थे।  भारत में रहने वाले ईसाई  या मुस्लमान अधिकतर दलित वर्ग के लोग  थे।
       उच्च जाति का इंसान आसानी से धर्म नहीं बदलता। भारतीय अपनी कटटरता के कारण हिन्दू समाज को छोटा करते चले जा रहे थे जबकि ईसाई और मुसलमान बढ़ते जा रहे थे।
         सबसे पुराने धर्मो में हिन्दू धर्म की गणना की जाती है। यहाँ तक   कहा  जाता है -हिन्दू धर्म के अवशेष मालद्वीप, इंडोनेशिया , बर्मा ,मध्य एशिया ,अफगानिस्तान और अमरीका तक  मिल रहे है। तो एक भी हिन्दू राष्ट्र क्यों नहीं रहा।
      एक समय ऐसा आ गया था जब लोग खुद को हिन्दू नहीं कह रहे थे। भारतीय नेता खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने में शान समझ रहे थे। तब दूसरे देशो के लोगो से हिन्दू धर्म की छवि धूमिल होती जा रही थी। जब पहली बार मोदी जी ने विदेश में जाकर खुद को हिन्दू कहा. तब विदेशियों ने हैरानी से पूछा "-अन्य कोई नेता खुद को हिन्दू कहने की जगह धर्मनिरपेक्ष कहते है। आप ऐसा क्यों नहीं कहते। "
     जब हम अपने धर्म का सम्मान नहीं करेंगे तब दूसरा हमारे धर्म का सम्मान कैसे करेगा।
      आज के संदर्भ में भी गाँधी की उतनी ही जरूरत है जितनी अब से डेढ़ सौ साल पहले थी। हम गाँधी को वापिस बुला नहीं सकते लेकिन उनके पदचिन्हो पर चलने में कोई बुराई नहीं है।

              

#visit brahmputre river

                 ब्रह्मपुत्र नदी की सैर 



  मणिपुर से जब मै गोहाटी पहुंची तो सब कुछ बदला हुआ था। वहाँ  एयरपोर्ट से पलटन बाजार बहुत दूर था। एयरपोर्ट के आस -पास के इलाके में बहुत हरियाली थी। वहां से लगभग एक घंटे बाद असम सरकार की बस में बैठ कर पलटन बाजार पहुंचे इस बस का किराया केवल नब्बे रूपये था दूरी के हिसाब से वाजिब था। वरना  हमे कई गुना ज्यादा पैसे देने पड़ते। हमें सरकार का प्रबंध बहुत अच्छा लगा।
       आबादी में पहुंचते ही हरियाली गायब हो गई। हर तरफ जाम  दिखाई देने लगा।यहाँ पहुंचने के बाद असमी  चेहरे पहचानने मुश्किल लगने लगे। यहाँ की भीड़ में रंग का गोरापन भी गायब हो गया। हम केवल भाषा से असमी  लोगो को पहचानने  में सक्षम हो पा रहे थे।यहाँ की आबादी में सभी तरह के लोग दिखाई दे रहे थे। जबकि मणिपुर में गैर मणिपुरी बहुत ही कम दिखाई देते है। 
         मुझे ब्रह्मपुत्र नदी देखने का बहुत मन था। मैने कभी इस नदी को नहीं देखा था। जब मुझे पता चला ये नदी हमारे बाई तरफ बह  रही है। तब मै  रोमांचित हो उठी। सड़क के साथ -साथ इस नदी के बृहद आकार की  मैंने कल्पना नहीं की थी।  इस नदी और सड़क के बीच  में रेलिंग लगाई गई थी। उसके किनारे पर घूमने और खेलने के लिए पार्क बने हुए थे। नदी के किनारे पर बैठने की अच्छी व्यवस्था थी। उसके साथ ही खाने -पीने की अनेक जगह बनी हुई थी। अपनी हैसियत के मुताबिक आप जिंदगी के मजे ले सकते थे। कई जगह नदी के दर्शन करने की मुफ्त व्यवस्था थी तो कई जगह नदी के  दर्शन करने के लिए पैसे भी देने पड़ते थे।
        ये नदी बहुत बड़ी है। इस नदी को पार करने के लिए फेरी चलती है जिसके लिए कम से कम किराया पांच रूपये है। जो मुझे ज्यादा प्रतीत नहीं हुआ। हमारा होटल भी नदी के किनारे था। जहाँ से मुझे इस नदी को देखना बहुत अच्छा लग रहा था।
     फेरी की सवारी मैने  बहुत बार की हुई है। इसका मुझे चाव नहीं था। मेने इससे पहले कभी क्रूज की सवारी नहीं की थी। मैने  अपना शौक पूरा करने का इरादा बनाया। क्रूज में एक घंटे के सफर की कीमत साढ़े  तीन सौ रुपए थी। आप अंदाजा लगा सकते है कहाँ पांच रूपये और कहाँ साढ़े  तीन सौ रूपये।  लेकिन शौक के सामने कंजूसी ने दम  तोड़ दिया।
          शाम के समय अस्त होते हुए सूर्य के  समय को हमने चुना। क्रूज के अंदर कुर्सी और मेज बिछी हुई थी हमने अपनी सहूलियत के हिसाब से छोटी मेज चुनी क्योंकि हम केवल दो जने थे। वहां पर परिवार के हिसाब से बड़ी टेबल भी थी। उसमे आप छोटी और बड़ी दोनों तरह की पार्टी कर सकते थे। वहां पूरा रेस्टोरेंट और बार खुला हुआ था। लेकिन उसमे बैठ  कर खाने -पीने  के हिसाब से बिल ज्यादा रखा हुआ था। उसके बिल देखकर मैने खाने -पीने का इरादा स्थगित कर दिया।
        वैसे हमने क्रूज में चढ़ने से पहले वहां के स्ट्रीट फ़ूड खा रखे थे। क्योकि हमें पांच बजे का समय बताया  गया था। हमने सोचा पांच बजे क्रूज चला जायगा। इसलिए हम साढ़े  चार बजे ही पहुंच गए.लेकिन टिकट देने वाले ने बताया क्रूज साढ़े  पांच बजे चलेगा।  अब हमें लगभग एक घंटा बिताना था इसलिए हम जैसे चटोरो के लिए स्ट्रीट फ़ूड से अच्छा समय पास करने का तरीका और क्या हो सकता था।  हमारे लिए वहां की भेलपुरी, समोसे और गोलगप्पो  का जायका लेना भी बहुत जरूरी था। उनके मसाले हमारे स्वाद से अलग थे।  इनके मजे लेते हुए कब हमारा पेट भर गया पता ही नहीं चला।
            उत्तर -पूरब में अँधेरा जल्दी हो जाता था।ढलते हुए सूर्य को नदी पर देखना मुझे रोमांचित कर रहा था समझ नहीं आ रहा था बाहर का नजारा देखू  या अंदर का।  हमारे क्रूज में बैठते ही डीजे और गायन के कार्यक्रम शुरू हो गए। बाहर बहुत बड़ी  और फैली हुई नदी, अंदर धीमी रौशनी में बजता हुआ गाने -बजाने और नाचने का माहौल खुशनुमा अहसास दिला रहा था।  बहुत सारे  दम्पति ऐसे माहौल में उत्साहित होकर नाचने लगे। बच्चे तो शुरू से आखिर तक नाचते ही रहे।  बच्चो को देखकर लग रहा था यदि मै  भी इनकी तरह नाच सकती तो कभी मुझे मोटापे की चिंता नहीं होती
         इन सब को देखते हुए कब अँधेरा उतर  आया कब मैने चांदनी रात का मजा लेना शुरू कर दिया पता ही नहीं चला चांदनी रात में आसमान का प्रतिबिम्ब पानी पर उत्तर आया था आस -पास की रौशनी, लग रहा था धरती पर नहीं बल्कि मै  आकाश में भृमण  कर रही हू। इस रहस्य्मयी दुनिया में कितना समय बीत गया पता ही नहीं चला। मै  हर पल को सहेजने में लगी रही। पता नहीं इस अद्भुत स्वर्ग में दुबारा आने का मौका कब मिलेगा। 
           मणिपुर में पिछले कई साल में कई बदलाव दिखाई दे रहे है!पहले मुझे इंफाल के एयरपोर्ट, विधानसभा, मुख्यमंत्री निवास तक की सड़कें टूटी दिखाई दी थी !मुझे देखकर हैरानी हो रही थी है लोग इन मुख्य सडको की देखभाल नहीं कर पा रहे है तो छोटी सडको का कितना बुरा हाल होगा! इस बार आने पर मुझे इन सड़कों की अच्छी हालत मिली है!लेकिन छोटी सड़कें अभी भी बदहाल है!           यहां की नालिया खुली हुई है! सीवर प्रणाली सही नहीं है! लेकिन नालियों को साफ करने की जिम्मेदारी बुलडोजर करता है !मैने पहली बार छोटी गलियों में नालियो की सफाई बुलडोजर से होती देखी!साथ ही यदि किसी घर का सामान उनकी चारदीवारी से बाहर दिखाई दे रहा है तो उसे भी बुलडोजर तोड़ने में गुरेज नहीं कर रहा था!       हमारे घर के सामने एक मकान बन रहा था !बुलडोजर के आने से पहले वहां लाउडस्पीकर से घोषणा करवाई गई ! मुझे भाषा तो समझ नहीं आ रही थी लेकिन उसके एकदम बाद चहल - पहल होती दिखाई दी! सबने अपने घर का सामान उठाना शुरू कर दिया! यहां तक निर्माणाधीन घर का भी सारा सामान अंदर रख लिया गया!      आरम्भ में मुझे बहुत हैरानी हो रही थी! कि लोगो ने घर के गेट भी बहुत सारी सड़क छोड़ कर अंदर बनाए थे! सड़कों पर सीढ़ियां या स्लोप नहीं थे!कई घरों के अंदर दस गाडियां खड़ी करने की भी जगह थी!           इनके घरों में तुलसी के विरवे बीच चोक में बनाए गए थे जिनके चारो तरफ घूम कर पूजा की जा सकती है ! इन घरों में अलग से एक मंदिर की स्थापना की जाती है!इसके लिए एक कमरे के बराबर स्थान रखा जाता है! उसके पीछे परिक्रमा करने की जगह भी छोड़ी जाती है !        इन घरों में छोटे तालाब बनाए जाते है! जिसमें मछलियां और बतख पाली जाती है! इन्होंने तालाब बनाकर बारिश के पानी का सही उपयोग किया है! लेकिन सरकार कि तरफ से पानी सही रूप में नहीं दिया जाता इस कारण पानी के लिए हर हफ्ते टैंकर मंगवाया जाता है! पानी की बहुतायत होने पर भी सप्लाई का तरीका   सही नहीं है!बारिश बहुत होती है! आपको अनेक स्थानों पर पानी के तालाब मिल जाएंगे !लेकिन पीने और दैनिक जरूरतों के लिए पानी खरीदना पड़ता है!जो बहुत साफ नहीं होता !     यहां की छते ढलावदार टीन की बनाई जाती है !यदि इनके पानी को इकट्ठा कर लिया जाए तो इनके सालभर की जरूरत पूरी हो जाए!इन्हें पानी के संरक्षण का तरीका( waterharwesting) पता नहीं है !          यहां की हरियाली मन को मोह लेती है हर घर में सौ- डेढ़ सौ गज में हरियाली लगाई जाती है! हरियाली से हमारी आंखे तृप्त हो जाती है!         यहां अनेक पिकनिक की जगह है!शिलायपोंग,अंद्रो जैसी हरी भरी जगहों के बीच में झील से मजा दुगुना हो जाता है!बच्चो के लिए अनेक झूले  आदि भी बनाए गए है!     यहां की गाड़ियों के लिए प्रदूषण के नियंत्रण के लिए कोई कार्यवाही नहीं होती इसलिए गाड़ियों में से काला धुआं निकलता हुआ दिखाई देता है! इंफाल जैसी जगह पर प्रदूषण पता चलता है!       मेरे लिए यहां रोज ही बारिश हो रही है लेकिन यहां के लोग कह रहे है पहाड़ों पर बारिश नहीं है इसलिए खाने का सामान महंगा हो जाएगा! इम्फाल नहीं का पानी भी तली को छू रहा है!समझ नहीं आ रहा यहां की बारिश का पानी कहां जाता है!         हल्की सर्दी के बीच मणिपुर का मौसम बहुत सुहावना होता है ! धूप जब निकलती है तब उसकी तपिश असहनीय होती है!यहां के लोग अधिकतर छतरी लेकर चलते है !वह धूप और बरसात दोनों में जरूरी है!अभी भी बाहर बारिश हो रही है! https://madhupathak.blogspot.com/2019/09/waterharwesting.html

           मणिपुर में पिछले कई साल में कई बदलाव दिखाई दे रहे है!पहले मुझे इंफाल के एयरपोर्ट, विधानसभा, मुख्यमंत्री निवास तक की सड़कें टूटी दिखाई दी थी !मुझे देखकर हैरानी हो रही थी है लोग इन मुख्य सडको की देखभाल नहीं कर पा रहे है तो छोटी सडको का कितना बुरा हाल होगा! इस बार आने पर मुझे इन सड़कों की अच्छी हालत मिली है!लेकिन छोटी सड़कें अभी भी बदहाल है!           यहां की नालिया खुली हुई है! सीवर प्रणाली सही नहीं है! लेकिन नालियों को साफ करने की जिम्मेदारी बुलडोजर करता है !मैने पहली बार छोटी गलियों में नालियो की सफाई बुलडोजर से होती देखी!साथ ही यदि किसी घर का सामान उनकी चारदीवारी से बाहर दिखाई दे रहा है तो उसे भी बुलडोजर तोड़ने में गुरेज नहीं कर रहा था!       हमारे घर के सामने एक मकान बन रहा था !बुलडोजर के आने से पहले वहां लाउडस्पीकर से घोषणा करवाई गई ! मुझे भाषा तो समझ नहीं आ रही थी लेकिन उसके एकदम बाद चहल - पहल होती दिखाई दी! सबने अपने घर का सामान उठाना शुरू कर दिया! यहां तक निर्माणाधीन घर का भी सारा सामान अंदर रख लिया गया!      आरम्भ में मुझे बहुत हैरानी हो रही थी! कि लोगो ने घर के गेट भी बहुत सारी सड़क छोड़ कर अंदर बनाए थे! सड़कों पर सीढ़ियां या स्लोप नहीं थे!कई घरों के अंदर दस गाडियां खड़ी करने की भी जगह थी!           इनके घरों में तुलसी के विरवे बीच चोक में बनाए गए थे जिनके चारो तरफ घूम कर पूजा की जा सकती है ! इन घरों में अलग से एक मंदिर की स्थापना की जाती है!इसके लिए एक कमरे के बराबर स्थान रखा जाता है! उसके पीछे परिक्रमा करने की जगह भी छोड़ी जाती है !        इन घरों में छोटे तालाब बनाए जाते है! जिसमें मछलियां और बतख पाली जाती है! इन्होंने तालाब बनाकर बारिश के पानी का सही उपयोग किया है! लेकिन सरकार कि तरफ से पानी सही रूप में नहीं दिया जाता इस कारण पानी के लिए हर हफ्ते टैंकर मंगवाया जाता है! पानी की बहुतायत होने पर भी सप्लाई का तरीका   सही नहीं है!बारिश बहुत होती है! आपको अनेक स्थानों पर पानी के तालाब मिल जाएंगे !लेकिन पीने और दैनिक जरूरतों के लिए पानी खरीदना पड़ता है!जो बहुत साफ नहीं होता !     यहां की छते ढलावदार टीन की बनाई जाती है !यदि इनके पानी को इकट्ठा कर लिया जाए तो इनके सालभर की जरूरत पूरी हो जाए!इन्हें पानी के संरक्षण का तरीका( waterharwesting) पता नहीं है !          यहां की हरियाली मन को मोह लेती है हर घर में सौ- डेढ़ सौ गज में हरियाली लगाई जाती है! हरियाली से हमारी आंखे तृप्त हो जाती है!         यहां अनेक पिकनिक की जगह है!शिलायपोंग,अंद्रो जैसी हरी भरी जगहों के बीच में झील से मजा दुगुना हो जाता है!बच्चो के लिए अनेक झूले  आदि भी बनाए गए है!     यहां की गाड़ियों के लिए प्रदूषण के नियंत्रण के लिए कोई कार्यवाही नहीं होती इसलिए गाड़ियों में से काला धुआं निकलता हुआ दिखाई देता है! इंफाल जैसी जगह पर प्रदूषण पता चलता है!       मेरे लिए यहां रोज ही बारिश हो रही है लेकिन यहां के लोग कह रहे है पहाड़ों पर बारिश नहीं है इसलिए खाने का सामान महंगा हो जाएगा! इम्फाल नहीं का पानी भी तली को छू रहा है!समझ नहीं आ रहा यहां की बारिश का पानी कहां जाता है!         हल्की सर्दी के बीच मणिपुर का मौसम बहुत सुहावना होता है ! धूप जब निकलती है तब उसकी तपिश असहनीय होती है!यहां के लोग अधिकतर छतरी लेकर चलते है !वह धूप और बरसात दोनों में जरूरी है!अभी भी बाहर बारिश हो रही है!

आज का मनीपुर

मणिपुर और दिल्ली में अंतर

              दिल्ली के लोगों के लिए मणिपुर बिल्कुल अलग है। यहां के लोगों के अंदर बहुत प्यार और सम्मान की भावना पाई जाती है। ये लोग अन्य भारतीयों से जुड़ने का तहेदिल से प्रयास करते है। उनके मन की भावनाएं हमें सोचने पर मजबूर करती है ये लोग सच में ऐसा महसूस करते है या दिखावा कर रहे है! हम दिल्ली में रह कर दूसरों पर भरोसा करना भूल चुके है!दिल्ली के लोगों में हर इंसान से विश्वास उठ चुका है! हम सच्ची भावनाओं के प्रति भी आशंकित रहते है! हम जिन्दगी में इतना धोखा खा चुके होते है कि हर एक को शक की निगाहों से देखते रहते है!
       हमारे मेजबान का घर इतना बड़ा था कि उसमें आराम से दस गाड़ी खड़ी हो जाए! उनके घर की चारदीवारी इतनी छोटी थी कि कोई भी चोर अंदर प्रवेश कर सकता था!खिड़कियों पर सीखचे नहीं थे! कोई भी खुली खिड़की से आसानी से घुस सकता था! यहां के लोग बहुत सारा सोना पहन कर घूमते है! यहां तक कि छोटे बच्चे भी कन्हैया की तरह जेवर पहनते है! इन्हें देखकर समझ नहीं आता डर दिल्ली में अधिक है या मणिपुर में? दिल्ली के घरों की जगह के बराबर इनके घरों में तालाब भी बना हुआ है!जिसमें ये पानी के जीव पालते हैं! इनके घरों में लगभग डेढ़ सौ गज के बराबर जगह में हरियाली भी होती है जिसमें अनेक तरह के पेड़ लगे होते हैं!
           यहां बहुत बारिश होती है! जितनी बारिश होते मैने यहां देखी है! वह मुझे बहुत ज्यादा लगी! लेकिन यहां के लोगों के हिसाब से बहुत कम है! इसके कारण फसल नहीं बोई जा सकती! भारत के हर हिस्से में बारिश की अति परेशानी का कारण बन रही है वहीं यहां कमी परेशानी पैदा कर रही है!यहां की आबादी केवल ४० हजार है! सड़कें ख़ाली- खाली दिखाई देती है!
        इंफाल से बाहर निकलते ही हरे भरे इलाके दूर तक फैले नजर आते है!इस समय धान की बुआई का समय है लोगो को घुटनों तक पानी में खड़े होकर काम करते देखना मन को सुकून देता है! सारे खेत लगभग बराबर लंबाई और चौड़ाई में दिखाई देते है! यहां पहाड़ों पर जूम खेती होते हुए भी दिखाई देती है!
        इन्हीं रास्तों से होते हुए हम यहां के झरने साढू - चीरू देखने गए! जहां हमारा वाहन रुका उस जगह से हमें काफी ऊंचाई तक चढ़ना पड़ा! इस चड़ाई पर हमारा दम फुलने लगा  !हमें बीच में रुक कर सांस लेनी पड़ी! जबकि बहुत सारे बच्चो के समूह मस्ती करते हुए जा रहे थे उन्हें देख कर रशक हो रहा था!काश हम भी इनकी तरह जवान होते! ऊपर पहुंचने पर में विभोर हो उठी!
        झरने में बहुत अधिक पानी था! बहुत दूर खड़े होने पर भी पानी की बोछारे हमें भिगो रही थी! झरने से बहुत दूर एक पुल बना हुआ था!हम उस पर खड़े होकर आनंद लेने के बारे में सोच रहे थे! वहां बैठने की जगह भीगी हुई थी इसलिए खड़े होकर ही मजा ले रहे थे! लेकिन बोच्छारो से भीग रहे थे  बोछारो के कारण अच्छी तरह कपड़े भीग गए तब हमने भी पूरी तरह पानी के मजे लेने के बारे में सोचा!हम भी पानी में उतर कर भीगने लगे !अब हमने अच्छी तरह पानी का लुत्फ उठाया!
।      झरने की धार के नीचे बच्चे  खड़े होकर मजे से नहा रहे थे! लेकिन पानी की धार इतनी मोटी थी !मानो कोई मोटे लट्ठ से मार रहा हो जो ठीक धार के नीचे लुत्फ उठा रहे थे उनका शरीर बिल्कुल लाल था!उनकी हिम्मत को सराहने का मन कर रहा था!उनका जोश और दीवानगी देखने लायक थी
    इंफाल में बहुत जल्दी रात हो जाती है! हमारे साथी ने चलने पर जोर देना शुरू किया!तब हमारा बिल्कुल उठने का मन नहीं कर रहा था !पानी में अठखेलियां करते हुए हम कब अपनी उम्र भूल गए पता ही नहीं चला अब हमें भीगने के कारण ठंड भी लगने लगी थी!झरने के आस पास सरकार की तरफ  से खास इंतजाम नहीं थे रास्ता भी सही बना हुआ नहीं था!अंधेरा होने पर ऐसे रास्तों पर चलना मुश्किल था इसलिए हम बेमन से वापस चलने लगे! इन रास्तों पर उतरना चड़ने से भी मुश्किल लग रहा था!भीगे हुए लोगों के उतरने के कारण सीढ़ियां गीली हो गई थी! में कई जगह गिरते - गिरते बची!
        नीचे बहुत सारी दुकानें खुली हुई थी! वहां लोग अपनी पसंद की चीजे खा रहे थे!हमें समझ नहीं आ रहा था कि हमारे लायक कोई सामान है या नहीं क्योंकि हम शाकाहारी होने के कारण कई बार सोचते थे ! वहां के लोगों के हिसाब से उन्हें समझ नहीं आता था शाकाहारी लोग जिंदा केसे रहते है ! वे मछली को शाकाहारी मानते थे! मछली पकी हुई के अलावा वे मछली सूखा कर उसका चुरा बना कर किसी भी खाने में मिला देते थे! वहां के बाजार मे जिंदा।  , मरी हुई  सुखी हर तरह की मछली मिलती थी! इसलिए हम घर से बना कर खाना ले जाते थे!
      वापस घर आते हुए रात हो गई! लेकिन यहां का सफर हमारे ख्यालों में हमेशा जीवित     रहेगा!

#manipur ka dil loktak jhil

                 मणिपुर का दिल लोकटक झील 


     मणिपुर की प्रसिद्ध झील का नाम" लोकटक"  है।  यह झील बहुत बड़ी है। इसमें पानी  बहुत साफ है। आस -पास हरियाली फैली हुई है। इसमें मुझे हवाई -जहाज से देखते समय बहुत बड़े गोले दिखाई दिए जिसे देख कर समझ नहीं आ रहा था।ये  क्या है और क्यों है। प्लेन  से इस झील को देखकर इसका पानी महत्व नहीं रखता था बल्कि इसके गोले सोचने पर मजबूर कर रहे थे। मेरा पूरा ध्यान इसकी खोज करने में लगा रहा।  वह झील देखते -देखते मेरी नजरो से ओझल हो गई।
         घर आकर भी उसका अनोखापन मुझे सोचने पर मजबूर कर रहा। था।  एक दिन मे मुझे  लोकटक देखने का मौका मिला। हमारे घर से इसकी दुरी लगभग 3 घंटे में पूरी हुई। हमारे चालक ने हमे ठीक झील के पास पंहुचा दिया। ये झील बहुत बड़ी जगह में फैली हुई है. इसके चारो तरफ घूमने के लिए गलियारा बना हुआ है। गलियारे के दोनों तरफ रेस्टोरेंट बने हुए है। इसमें बैठकर आप चारो तरफ का नजारा देखते हुए अलौकिक आनंद महसूस कर सकते है। इसके चारो और अनेक प्रजाति के प्राणी पाए जाते है। ऐसे समय में मेने एक बहुत छोटी चिड़िया देखी  जो मेरे केवल एक अंगुली के बराबर थी जिसे देखकर कुदरत की  रचना पर हैरानी हो रही  थी। कही चौदह फिट चौड़े पक्षी तो कही एक ऊँगली के बराबर  पक्षी।
          यहाँ आकर हमने नाव की सैर करने का भी लुत्फ़ उठाया जैसे जमीन पर  सड़क बनी होती है वैसे ही यहाँ पर दोनों तरफ बांस गाड़ कर पानी में रास्ता बनाया हुआ था। हमरी नाव उसी रस्ते पर घूम कर लौट आयी। उस में अनेक विविधता लिए जीव -जंतु थे।
       .यहां की भाषा में": लोक" का मतलब "नदी या झरना" होता है  .  "टक "का अर्थ" अंत  "यह झील साफ पानी की बहुत बड़ी झील है। इसमें पानी और बिजली दोनों की जरूरत पूरी होती है। इसमें बहुत बड़े द्वीप है। इसमें साधारण द्वीपों के  अलावा तैरने वाले द्वीप भी है जो अन्य स्थानों पर नहीं मिलेंगे।  यह लगभग 35  किलोमीटर लम्बी और 13 किलोमीटर चौड़ी झील है ,
      इसके गोल घेर विशेष रूप से बनाये गए है। इन घेरो के बीच में मछली पाली जाती है।  मुझे इन घेरो को देखने में बहुत मजा आ रहा था। ये घेरे जो प्लेन से बहुत छोटे लग रहे थे। ये पास से देखने में बहुत विशाल थे। में सही तरीके से   पूरा घेरा नहीं देख सकी लेकिन इनकी विशालता से अभिभूत हो गई। ये एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान है. .
          इस झील के आस-पास संघई नमक हिरण का एकमात्र घर है। संघाई लुप्तप्राय जाति का हिरण है। इसके नाम पर कई सारे स्थानों के नाम रखे गए है। पहले मुझे संघाई का मतलब चीन से सम्बन्धित लगा था। इसलिए अधिक ध्यान नहीं दिया। लेकिन यहाँ आकर इसका महत्व समझ में आया।
      मणिपुर एक पानी से भरपूर नगरी है। यहाँ जितना पानी देखने को मिला उतना पानी किसी अन्य स्थान पर नहीं मिलेगा। हर तरफ साफ पानी की भरमार है।  

#confident woman

                        आत्मविश्वासी औरत  

 आज  भी  नारी को जीवन में अनेक समस्याओं का सामना करता पड़ता  है। यदि  उसने बेटियों को जन्म दिया है तो वह पूरी जिंदगी सम्मान  पाने के  लिए तरसती   रहती है। उसकी काबिलियत मायने नहीं रखती। उसको खुद मजबूत बनना पड़ता है। तभी वह खुद को और अपनी बेटियों को समाज में सम्मान दिलवा सकती है।  ऐसे ही मेरे जीवन में रमा का  पदार्पण हुआ।
     वह सांबले रंग की प्यारी सी  औरत थी। उसके शब्दों में मिठास थी। जब चलती थी तो उसकी चाल  देखकर लगता था मानो नई  नवेली दुल्हन अभी डोली से उतरी   है। उसे देखकर बिलकुल नहीं लगता था उसकी उम्र पचास के आस -पास है।
      उसकी तीन बेटियां थी वे तीनो उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही थी। रमा एम  ऐ  बी.एड  होकर सरकारी विद्यालय में ऊँची नौकरी कर रही थी। सभी उसकी नम्रता के कायल थे। वह कभी ऊँची आवाज में  बोलती या किसी से लड़ती दिखाई नहीं दी। इस उम्र की औरतो की इतनी विनम्रता मुझे हैरानी में डाल  देती थी।
          वह हमेशा अपनी बेटियों को साक्षात्कार कराने  या किसी और काम से अकेले ही दिल्ली से बाहर ले जाती थी। अब से बीस साल पहले मैने   ऐसी सक्षम औरते नहीं देखी  थी।
    एक दिन उनसे मैने  पूछा -तुम ऐसा कैसे कर लेती हो तुम्हे डर  नहीं लगता। .
     उसने कहा -मुझे भी सामान्य औरतो के सामान पहले डर लगता था। जब मेरी नै शादी हुई थी। एक दिन मेने पति से नौकरी  के  सिलसिले में अपने साथ चलने के लिए कहा।
      उनके पास समय नहीं था। उन्होंने टाल  दिया।
मै  काम में लग गई। इस बारे में सोचना बंद कर दिया काम में लगे हुए मेने चलते -चलते अपने पति को उनकी बहन से बात करते सुना ।
      वह बहन से कह रहे थे -तेरी भाभी गांव  से आयी है। उसे शहर में घूमते हुए  डर लगता है। तुम उसके साथ चली जाना।
      ये बात मेरे मन को चुभ गई। गांव की होने का मतलब डरपोक होने से नहीं है। मेने धीरे -धीरे अपने को शहर के हिसाब से ढालना शुरू कर दिया। शुरू में डर  लगता था। बाद में आदत पड़  गई। 
     हम दोनों नौकरी   मै होने के कारण प्रत्येक जगह साथ नहीं जा  सकते थे  . समय की कमी ने भी मुझे विश्वासी बना दिया। हमारे घर तीन में  लड़कियां थी। उन्हें डरपोक या दब्बू  बनाकर जीवन भर रोने  की जगह खुद को विश्वासी बनाकर उनमे आत्मविश्वास जगाया जा सकता है।
     उन्हें देखकर लगता है डर  के आगे जीत  है। मेने बहुत सारी  .ऐसी औरतो को देखा है जो जिंदगी भर सभी को कोसते हुए अपनी और अपने आस -पास के लोगो की जिंदगी बर्बाद करती रहती है। लेकिन वह मेरे और मेरे जैसी औरतो के लिए प्रेरणा  स्रोत बनी.
      

#DOPAHAR KI DAVAT

                     दोपहर की दावत 


गर्मियों में दोपहर की दावत का अनुभव लोगो के लिए कैसा  होता है। इस विषय पर आज में अपने अनुभव आपसे साझा करना चाहती हूँ।  जिससे आप  भी  आने वाले समय में  सतर्क  हो जाये।
     इतनी गर्मी में दावत देने के नाम पर मुझे घबराहट हो रही थी। लेकिन हालत कुछ ऐसे बने कि मुझे हामी भरनी पड़ी। मेहमानो के बारे में समझ  नहीं आ रहा था कि इतनी गर्मी  को  हमारे आराम -पसंद मेहमान किस तरह सहन  करेंगे। उनके लिए गर्मियों के कारण होने वाली परेशानिया उनके मिजाज को किस तरह दुरुस्त रख  पाएंगी।
       उनकी शिकायते सुनकर मेरा क्या हाल  होगा। क्योंकि सबसे पहले रिश्तेदारों ने पूछना शुरू किया तुम्हारे घर में एक से अधिक AC  है या नहीं। जब उन्हें पता चला अधिक है. तब उन्होंने राहत की साँस ली। जब उनके आने का समय हुआ. तब मे सुबह से काम में लग गई ताकि उन्हें किसी तरह की शिकायत का मौका न मिले। लेकिन कोशिश करने के बाबजूद कमियाँ  रह ही जाती है।
      गर्मियों में खाने से ज्यादा सबके लिए पीने के साधन मुहैया कराना जरूरी था। फ्रिज को सामान से भर दिया। फिर भी बर्फ और पानी की जरूरतों के सामने मानो फ्रिज ने दम तोड़ दिया ।
        खाना अधिक संख्या में बनवाकर रखने की समस्या सामने आ गई। सर्दियों में खाना खराब नहीं होता लेकिन गर्मियों में  इतने खाने को कहाँ  रखा जाये  फ्रिज तो पीने के सामान से भर गया था ।फ्रिज से बाहर अधिकतर रखा खाना ख़राब हो गया। 
      जब मुख्य दावत दोपहर की रखी गई तब जितने मेहमानो को बुलाया गया उससे लगभग आधे  आये। उसके कई कारण लोगो ने गिनवा दिए। सबसे पहले उन्हें दोपहर की दावत याद नहीं रही । उन्होंने शाम के हिसाब से तैयार होकर चलना शुरू किया  तब पता चला दावत तो दोपहर को ही खत्म हो गई। उनकी सारी  तेयारिया रखी रह गई।
      कुछ लोगो ने नौकरी से छुट्टी न मिलने का कारण बताया। नौकरी करने वाले लगभग सभी मेहमान नहीं आये। केवल स्वव्यवसायी ही उपस्थित हुए।
    कुछ लोगो के हिसाब से जब ले जाने वाले ही घर में नहीं थे तब वे कैसे आते। औरतो को इतनी दूर अकेले जाने की आदत नहीं थी। उन्हें रास्ते पता नहीं थे इसलिए घरेलू औरते नहीं आ सकी.
      कुछ के हिसाब से वे दिल्ली से बाहर गए थे। उन्हें छुट्टियों में ही बच्चो के साथ जाने का मौका मिलता है। उन्होंने पहले से ही आरक्षण करवा रखा था। इसलिए अनुपस्थित रहे।
      मेरे अनुभव ने जो सबक सिखाया उसके अनुसार आप भी इन बातो को समझ कर ऐसी गलती मत करना। क्योंकि इससे आपको तन. मन और धन तीनो की क्षति उठानी पड़ेगी। आपकी शारीरिक मेहनत के रूप मे तन थकेगा ,लोगो के न आने के कारण धन की हानि होगी। लोगो के न आने का कारण सोच कर मन परेशान हो जायेगा। कई तरह के विचार मन को आंदोलित करते रहेंगे हमसे कब और कहाँ भूल हो गई लोगो ने किस बात को मन से लगा लिया जो नहीं आये। या हमारे बुलाने के तरीके ने उन्हें दुःख पहुंचाया।  मन  इस दुःख से कई दिन बाद बाहर आएगा। 
      मुझे किसी ने पहले ही आगाह किया था दोपहर की दावत में आजकल कम लोग आते है। सब तरक्की पसंद हो गए है लोग एक दावत के पीछे अपनी नौकरी को दाव पर लगाना पसंद नहीं करेंगे लेकिन मुझे लगा मेने जितने लोगो का हिसाब लगाया है। उससे 50 प्लेट कम का आदेश दिया है। लेकिन तब हैरानी हुई जब आधे लोग भी नहीं आये. लोग .सोचने लगे है। एक दावत के लिए एक दिन की छुट्टी क्यों ली जाये। खाने से अच्छा एक दिन की कमाई है।   आप भी समय और खाने की बर्बादी से बचने के लिए इससे सबक लीजिये।
     

#bhartiy nari or janvar

                 भारतीय औरत और जानवर 

  जिंदगी में सभी को मनचाहा नहीं मिलता। कुछ लोग सारी  जिंदगी ईश्वर से प्रार्थना  करते है लेकिन जिसके लिए प्रार्थना करते है वह देने के साथ ,अपनी मर्जी से    उसकी अपेक्षा कुछ और दे देते है जिसकी उन्हें बिलकुल जरूरत नहीं होती है।
          मेरे पड़ोस में राधा नाम की औरत के साथ ऐसा कुछ  हुआ कि  मुझे  समझ नहीं आया वह इतनी गुस्सैल क्यों हो गई। राधा की शादी को दस साल हो गए। उसकी कोई संतान नहीं हुई। इसके कारण वह मन से बहुत दुखी रहती थी। जमाने वाले उसे    उल्टा -सीधा सुनाने से बाज  नहीं आते थे।
      इससे परेशान होकर वह भगवान की शरण में जा पहुंची।  उसकी प्रार्थना रंग लाई। उसके यहाँ एक बच्ची ने जन्म लिया उसकी  मन मांगी मुराद  पूरी हो गई। उसके घर में खुशिया आ गई। उसने बच्ची की परवरिश में दिन -रात लगा दिए। इसी बीच  उसने एक गाय खरीद ली। ताकि घर में गाय का शुद्ध दूध मिल जाये।
     उसके घर में कुछ साल बाद दूसरी बेटी ने जन्म लिया। इस तरह उसके घर में लगातार चार बेटिया  आ गई। उसने भगवान  से केवल एक बेटी मांगी थी। इतनी बेटियाँ नहीं। मुझे लगता है उसने भगवान  से तपस्या करते वक्त कई  बेटियों की प्रार्थना कर ली होगी जैसे द्रोपदी ने भगवान से वर मांगते हुए पति, पति ,पति ,पति ,पति पांच बार मांग लिए थे इसलिए दूसरे जन्म में उसे पांच पांडवो की पत्नी बनना पड़ा।
          भारत में लड़कियों की इतनी जरूरत नहीं समझी जाती बल्कि किसी घर में एक लड़की पैदा हो जाये वही काफी समझ ली जाती है। दो बेटियों की माँ को कोई मुबारक बाद भी नहीं देता बल्कि उसे कई सारी बंदिशों का सामना करना पड़ता है। ऐसी औरत से धीरे -धीरे   सारे अधिकार भी छीन लिए जाते है। अब उसे पुत्र की कामना होने लगी थी लेकिन ये कामना कभी पूरी नहीं हो सकी.
         उसे अब भी बहुत सारे लांछनो का सामना करना पड़ता था। भारतीय ओरत यदि पुत्रो को जन्म देती है तो समाज में उसे बहुत सम्मान मिल जाता है। बाद का वक्त किसी ने नहीं देखा कि बड़े होकर वे बेटे कैसे बनते है  लेकिन पुत्रवती औरत के बीस  साल आराम से कट जाते है ।
     गायो में यदि गाय मादा को जन्म देती है। तो उस गाय की कदर बड़ जाती है। लेकिन राधा की गाय हमेशा ;नर को जन्म देती थी। जबकि गाय में शिशु नर का कोई महत्व नहीं होता है।क्योंकि उससे दूध की प्राप्ति नहीं होती और वंश नहीं बढ़ता।
      नर के पैदा होने के कुछ साल बाद उस नर की पूजा करके उसे छोड़ दिया जाता था। मेने एक -एक करके उसके घर कई सारे नरो को पैदा होते ओर उन्हें छोड़ते देखा। मुझे जिंदगी के इस करिश्मे पर हमेशा हंसी आयी। भगवान् ने ऐसा चमत्कार उसके जीवन में क्यों किया।
      जब वह औरत मेरे संपर्क में आयी तो वह बहुत चिड़चिड़ी और गुस्सैल हो चुकी थी। उससे बात करने से भी लोग डरते थे। उसके जीवन की विडंबना देखकर में भगवन की मर्जी समझने में स्वयं को असमर्थ समझती हूँ। लोग कहते है -भगवान जो करते है  भला करते है। उसके चिड़चिड़ेपन का कारण भगवान् की भलाई समझने का मन नहीं करता। 

3banaras se lukhnau ka safar

                 बनारस से लखनऊ तक का सफर 


 बनारस से लखनऊ जाते समय हमें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। हमने बनारस का एक रेलवे स्टेशन सोचा था। हमारे चालक ने कहा यहाँ चार रेलवे स्टेशन है। आपकी गाड़ी कहाँ से जाएगी इसका पता सही ढंग से मालूम करो वरना आपको परेशानी उठानी पड़ेगी। अब हम भी सोच में डूब गए। क्योंकि हमारी ट्रेन सुबह पांच बजे की थी। इतनी सुबह घर से निकल  कर सही गंतव्य तक पहुंचना बहुत बड़ा काम होता है। इसलिए हमने कई लोगो से इससे सम्बन्धित जानकारी हासिल की। अंतत सुनिश्चित हो गया। वास्तव में हमारा स्टेशन मुख्य बनारस का है।
        सुबह चार बजे हमने ऑटो वाले को आने के लिए कह दिया। वह सही समय पर पहुंच गया। खाली  सड़के रात  के अँधेरे में अजीब लग रही थी। हमने बनारस की खासियत देखी वहां गंदगी नहीं    दिखाई दे  रही थी। सुबह से शाम ,अब तो रात के समय भी देखना नसीब हो गया था। भारत जैसे देश में ऐसा अचम्भा हमें देखने के बारे में  सोचा नहीं था।
          हमारी ट्रेन सही समय पर आ गयी। सही समय पर चल भी पड़ी। लेकिन चलने के थोड़ी देर बाद रुक गयी। फिर उसने चलने का नाम नहीं लिया। हमारी  आधी रात को उठने के कारण अधूरी नींद भी इस बीच  में पूरी हो गयी। समझ नहीं आ रहा था जो सफर ग्यारह बजे पूरा हो जाना चाहिए था। हम  ग्यारह बजे तक बनारस में ही थे । .
      काफी समय बाद ट्रेन चली। हम शाम के चार बजे लखनऊ  पहुंचे। हमारा आज का पूरा दिन  ट्रेन में बीतने के कारण  बहुत बुरा लग रहा था क्योंकि हमने अगले दिन तीन बजे की फ्लाइट  पकड़नी थी। इसलिए जिस रिक्शे से होटल पहुंचे उसी रिक्शे वाले से लखनऊ की कुछ बेहतरीन चीजे दिखाने के बारे में बात कर ली, वह भी राजी हो गया। हमारी होटल की बुकिंग पहले से थी। इसलिए कुछ ही देर में हम होटल में सामान रखकर   निकल लिए। मुझे लखनऊ देखने की बहुत इच्छा थी। इसलिए में एक भी पल बेकार नहीं जाने देना चाहती थी। उसे मुँह मांगे दाम  दे दिए। क्योंकि किसी से भाव -ताव करने में समय बेकार जाता।
         वह हमें सबसे पहले चिकन के काम के कपड़े दिखाने  ले गया। वहां काम तो बहुत अच्छा लगा लेकिन हमें पैसे ज्यादा लगे। इसलिए वहां से एक कुरता ख़रीदा। अलग -अलग दुकानों पर पैसे कम होते चले गए। आखरी दुकान पर एक चौथाई दाम पर खरीद हुई। इस कारण हमने काफी सामान खरीद लिया।
       हमने अँधेरा होने तक खरीदारी की। उसके बाद उसने हमें लखनऊ की विधानसभा दिखाई। उसकी भव्यता मन को मोह रही थी।
      तत्पश्चात आगे बढ़ने पर हमें उसी रस्ते पर बहुत बड़ी मस्जिद दिखाई दी। विधानसभा के इतने करीब मस्जिद की मेने कल्पना नहीं की थी। ये सफर बहुत छोटा था लगभग दो सड़को  के बराबर। अनजान होने के कारण हमें रिक्शे वाले का सहारा लेना पड़ा था वरना इतनी दूरी पैदल तय की जा सकती थी।
         लखनऊ में हर स्थान पर मुस्लिम लोग दिखाई देते है। कोई इलाका ऐसा नहीं दिखा जहाँ केवल एक समुदाय के लोग हो। यहाँ बहुत भीड़ -भाड़ थी। अन्य  शहरो के समान गंदगी भी दिखाई दे रही थी.
       हर शहर के समान यहाँ हमें धोखा -धड़ी का सामना भी करना पड़ा। अनजान समझ कर हमसे अनेक स्थानों पर दुगने या डेढ़ गुना पैसा वसूला गया। जिसका पता चलने पर बहुत दुःख हुआ.
       यहाँ बड़ा और छोटा इमामबाड़ा बहुत प्रसिद्ध है। उसकी वास्तुकला देखने लायक है। इसकी भूल भुलैया में हम सच में खो गए। अब तक जितनी भी भूल -भुलैया देखी थी। उसके हिसाब से इसमें हमें लग रहा था हम निकल जायेंगे। यह हमें बहुत छोटी सी लग रही थी। लेकिन जब हम इसमें  खो गए तब घबराहट होने लगी। हमें अपने जैसे और बहुत सारे लोग दिखाई दिए  .जिन्हे देखकर हिम्मत आ गयी। इस  भूल -भुलैया की गलिया इतनी पतली थी   इनमें एक समय में एक इंसान ही चल सकता था। दो इकट्ठे नहीं चल सकते थे। एक के साथ एक इंसान जुड़ते जा रहे थे। लेकिन किसी को रास्ता नहीं मिल रहा था। अंत में हमें गाइड के साथ एक परिवार मिल गया जिसके कारण हमें अपनी मंजिल मिली और हम बाहर निकल सके तब हमने राहत की साँस ली ।
      मेने इससे पहले मुहरर्म से सम्बन्धित सामान कही अन्य जगह नहीं देखे थे। लेकिन बड़े और छोटे इमामबाड़े में ताजिये के विविध रूप देखे। . जब हम भूल भुलैया में खो गए थे। तब हमें कई जगह से ताजिये दिखाई दे रहे थे। नीचे चलते हुए लोग भी दिखाई दे रहे थे। लेकिन रास्ता नहीं मिल रहा था। हर बार उम्मीद जगती थी रास्ता मिल गया लेकिन बाद में निराशा हाथ लगती थी।
         इस इमामबाड़े में बाबड़ी बहुत बड़ी बनी हुई है। जिसके सामने दिल्ली की अग्रसेन की बाबड़ी कुछ मायने नहीं रखती। बाहर निकलने पर हमे ईरिक्शा मिला जिसने हमे चार पांच जगहों के नाम गिनवाए। हमें वहां के बारे में बताने के लिए भी राजी हो गया। हमें यह बहुत सस्ते का सौदा  लगा। हमें उसने अपने रिक्शे में बिठा  कर चीजे दिखानी शुरू की अंत में पता चला वह सब चीजे बहुत पास थी। जिन तक पैदल चल कर पहुँचा जा सकता था।समय की कमी के कारण हमें इन सबसे समझौता करना पड़ा। लखनऊ में ज्यादा घूमने लायक जगह नहीं है। जिन्हे घूमने का शौक  है उनके लिए यह शहर बहुत अच्छा है।


#sarnath ka bhavy rup


              सारनाथ का भव्य   रूप    





  बनारस से सारनाथ जाने के लिए काशी विश्वनाथ मंदिर के पास से सवारी मिल जाती है। उससे आराम से हम सारनाथ पहुँच गए।वहाँ  पर गौतम बुध की अस्सी फिट ऊँची मूर्ति लगी हुई है।  उसके पास लोगो की भीड़ लगी हुई थी इससे पहले मैने इतनी ऊँची प्रतिमा नहीं देखी  थी उसकी ऊंचाई से मन अभिभूत हो गया। इस प्रतिमा के चारो तरफ लोग फोटो खिचवाने में लगे हुए थे। इस प्रतिमा के सामने हम  बोने लग रहे थे।
     उस तक पहुँचने का मार्ग बहुत सूंदर बना हुआ है  . दोनों तरफ हरियाली फैली हुई है। बीच में तालाब में अनेक तरह के फूल खिले हुए है। उसमे मेरा मन रम गया। उसके पास ही बोध धर्म के मानने  वालो का मठ बना हुआ था। वहां सबका प्रवेश निषेध था।
        बाहर  निकल कर जब हम चलने लगे   तब हमने पानी का एटीएम देखा। जो इससे पहले नहीं देखा था। यानी पैसे देकर आप अपनी इच्छानुसार पानी की बोतल भर सकते है। हर दुकान के बाहर कूड़ेदान रखा हुआ था ताकि कूड़ेदान में ही कूड़ा डाले उसके बाहर  नहीं। ये व्यवस्था मुझे बहुत अच्छी लगी।इसके कारण  हर  तरफ सफाई थी। गंदगी का नामोनिशान नहीं था। इतनी अधिक सफाई हम अपने छोटे से घर में रख पाते  है पूरे इलाके में ऐसी व्यवस्था कर पाना मुझे असम्भव लगता था।
       इसके बाद हमें संग्रहालय जाने के बारे में ज्ञात हुआ। मुझे लगा यहाँ पर गौतम बुद्ध  से सम्बंधित वस्तुएँ दिखाई देंगी। लेकिन सोच के अचम्भा हो रहा था ढाई हजार साल पुरानी चीजे कैसे संभाली जा सकती है। लेकिन वहां पहुंचकर उस समय को लगभग संरक्षित कर दिया गया था। वहां पर उस ज़माने में बैठने की व्यवस्था थी। उसका स्तूप हमे बुद्ध के समय का अनुमान लगाने के लिए मजबूर कर रहा था। मानो गौतम बुद्ध के शिष्य किस तरह प्रवचन सुन रहे थे। ये जगह बहुत बड़ी थी। ये सब मुझे ढाई हजार साल पहले पंहुचा रहे थे।
        सारनाथ में अनेक मंदिर बने हुए है। उनमे से एक जैनियों  का मंदिर भी है दूसरा मंदिर जापानियों का कहलाता  है। वह भी अद्वितीय है। 

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...