सारनाथ का भव्य रूप
बनारस से सारनाथ जाने के लिए काशी विश्वनाथ मंदिर के पास से सवारी मिल जाती है। उससे आराम से हम सारनाथ पहुँच गए।वहाँ पर गौतम बुध की अस्सी फिट ऊँची मूर्ति लगी हुई है। उसके पास लोगो की भीड़ लगी हुई थी इससे पहले मैने इतनी ऊँची प्रतिमा नहीं देखी थी उसकी ऊंचाई से मन अभिभूत हो गया। इस प्रतिमा के चारो तरफ लोग फोटो खिचवाने में लगे हुए थे। इस प्रतिमा के सामने हम बोने लग रहे थे।
उस तक पहुँचने का मार्ग बहुत सूंदर बना हुआ है . दोनों तरफ हरियाली फैली हुई है। बीच में तालाब में अनेक तरह के फूल खिले हुए है। उसमे मेरा मन रम गया। उसके पास ही बोध धर्म के मानने वालो का मठ बना हुआ था। वहां सबका प्रवेश निषेध था।
बाहर निकल कर जब हम चलने लगे तब हमने पानी का एटीएम देखा। जो इससे पहले नहीं देखा था। यानी पैसे देकर आप अपनी इच्छानुसार पानी की बोतल भर सकते है। हर दुकान के बाहर कूड़ेदान रखा हुआ था ताकि कूड़ेदान में ही कूड़ा डाले उसके बाहर नहीं। ये व्यवस्था मुझे बहुत अच्छी लगी।इसके कारण हर तरफ सफाई थी। गंदगी का नामोनिशान नहीं था। इतनी अधिक सफाई हम अपने छोटे से घर में रख पाते है पूरे इलाके में ऐसी व्यवस्था कर पाना मुझे असम्भव लगता था।
इसके बाद हमें संग्रहालय जाने के बारे में ज्ञात हुआ। मुझे लगा यहाँ पर गौतम बुद्ध से सम्बंधित वस्तुएँ दिखाई देंगी। लेकिन सोच के अचम्भा हो रहा था ढाई हजार साल पुरानी चीजे कैसे संभाली जा सकती है। लेकिन वहां पहुंचकर उस समय को लगभग संरक्षित कर दिया गया था। वहां पर उस ज़माने में बैठने की व्यवस्था थी। उसका स्तूप हमे बुद्ध के समय का अनुमान लगाने के लिए मजबूर कर रहा था। मानो गौतम बुद्ध के शिष्य किस तरह प्रवचन सुन रहे थे। ये जगह बहुत बड़ी थी। ये सब मुझे ढाई हजार साल पहले पंहुचा रहे थे।
सारनाथ में अनेक मंदिर बने हुए है। उनमे से एक जैनियों का मंदिर भी है दूसरा मंदिर जापानियों का कहलाता है। वह भी अद्वितीय है।
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