3banaras se lukhnau ka safar

                 बनारस से लखनऊ तक का सफर 


 बनारस से लखनऊ जाते समय हमें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। हमने बनारस का एक रेलवे स्टेशन सोचा था। हमारे चालक ने कहा यहाँ चार रेलवे स्टेशन है। आपकी गाड़ी कहाँ से जाएगी इसका पता सही ढंग से मालूम करो वरना आपको परेशानी उठानी पड़ेगी। अब हम भी सोच में डूब गए। क्योंकि हमारी ट्रेन सुबह पांच बजे की थी। इतनी सुबह घर से निकल  कर सही गंतव्य तक पहुंचना बहुत बड़ा काम होता है। इसलिए हमने कई लोगो से इससे सम्बन्धित जानकारी हासिल की। अंतत सुनिश्चित हो गया। वास्तव में हमारा स्टेशन मुख्य बनारस का है।
        सुबह चार बजे हमने ऑटो वाले को आने के लिए कह दिया। वह सही समय पर पहुंच गया। खाली  सड़के रात  के अँधेरे में अजीब लग रही थी। हमने बनारस की खासियत देखी वहां गंदगी नहीं    दिखाई दे  रही थी। सुबह से शाम ,अब तो रात के समय भी देखना नसीब हो गया था। भारत जैसे देश में ऐसा अचम्भा हमें देखने के बारे में  सोचा नहीं था।
          हमारी ट्रेन सही समय पर आ गयी। सही समय पर चल भी पड़ी। लेकिन चलने के थोड़ी देर बाद रुक गयी। फिर उसने चलने का नाम नहीं लिया। हमारी  आधी रात को उठने के कारण अधूरी नींद भी इस बीच  में पूरी हो गयी। समझ नहीं आ रहा था जो सफर ग्यारह बजे पूरा हो जाना चाहिए था। हम  ग्यारह बजे तक बनारस में ही थे । .
      काफी समय बाद ट्रेन चली। हम शाम के चार बजे लखनऊ  पहुंचे। हमारा आज का पूरा दिन  ट्रेन में बीतने के कारण  बहुत बुरा लग रहा था क्योंकि हमने अगले दिन तीन बजे की फ्लाइट  पकड़नी थी। इसलिए जिस रिक्शे से होटल पहुंचे उसी रिक्शे वाले से लखनऊ की कुछ बेहतरीन चीजे दिखाने के बारे में बात कर ली, वह भी राजी हो गया। हमारी होटल की बुकिंग पहले से थी। इसलिए कुछ ही देर में हम होटल में सामान रखकर   निकल लिए। मुझे लखनऊ देखने की बहुत इच्छा थी। इसलिए में एक भी पल बेकार नहीं जाने देना चाहती थी। उसे मुँह मांगे दाम  दे दिए। क्योंकि किसी से भाव -ताव करने में समय बेकार जाता।
         वह हमें सबसे पहले चिकन के काम के कपड़े दिखाने  ले गया। वहां काम तो बहुत अच्छा लगा लेकिन हमें पैसे ज्यादा लगे। इसलिए वहां से एक कुरता ख़रीदा। अलग -अलग दुकानों पर पैसे कम होते चले गए। आखरी दुकान पर एक चौथाई दाम पर खरीद हुई। इस कारण हमने काफी सामान खरीद लिया।
       हमने अँधेरा होने तक खरीदारी की। उसके बाद उसने हमें लखनऊ की विधानसभा दिखाई। उसकी भव्यता मन को मोह रही थी।
      तत्पश्चात आगे बढ़ने पर हमें उसी रस्ते पर बहुत बड़ी मस्जिद दिखाई दी। विधानसभा के इतने करीब मस्जिद की मेने कल्पना नहीं की थी। ये सफर बहुत छोटा था लगभग दो सड़को  के बराबर। अनजान होने के कारण हमें रिक्शे वाले का सहारा लेना पड़ा था वरना इतनी दूरी पैदल तय की जा सकती थी।
         लखनऊ में हर स्थान पर मुस्लिम लोग दिखाई देते है। कोई इलाका ऐसा नहीं दिखा जहाँ केवल एक समुदाय के लोग हो। यहाँ बहुत भीड़ -भाड़ थी। अन्य  शहरो के समान गंदगी भी दिखाई दे रही थी.
       हर शहर के समान यहाँ हमें धोखा -धड़ी का सामना भी करना पड़ा। अनजान समझ कर हमसे अनेक स्थानों पर दुगने या डेढ़ गुना पैसा वसूला गया। जिसका पता चलने पर बहुत दुःख हुआ.
       यहाँ बड़ा और छोटा इमामबाड़ा बहुत प्रसिद्ध है। उसकी वास्तुकला देखने लायक है। इसकी भूल भुलैया में हम सच में खो गए। अब तक जितनी भी भूल -भुलैया देखी थी। उसके हिसाब से इसमें हमें लग रहा था हम निकल जायेंगे। यह हमें बहुत छोटी सी लग रही थी। लेकिन जब हम इसमें  खो गए तब घबराहट होने लगी। हमें अपने जैसे और बहुत सारे लोग दिखाई दिए  .जिन्हे देखकर हिम्मत आ गयी। इस  भूल -भुलैया की गलिया इतनी पतली थी   इनमें एक समय में एक इंसान ही चल सकता था। दो इकट्ठे नहीं चल सकते थे। एक के साथ एक इंसान जुड़ते जा रहे थे। लेकिन किसी को रास्ता नहीं मिल रहा था। अंत में हमें गाइड के साथ एक परिवार मिल गया जिसके कारण हमें अपनी मंजिल मिली और हम बाहर निकल सके तब हमने राहत की साँस ली ।
      मेने इससे पहले मुहरर्म से सम्बन्धित सामान कही अन्य जगह नहीं देखे थे। लेकिन बड़े और छोटे इमामबाड़े में ताजिये के विविध रूप देखे। . जब हम भूल भुलैया में खो गए थे। तब हमें कई जगह से ताजिये दिखाई दे रहे थे। नीचे चलते हुए लोग भी दिखाई दे रहे थे। लेकिन रास्ता नहीं मिल रहा था। हर बार उम्मीद जगती थी रास्ता मिल गया लेकिन बाद में निराशा हाथ लगती थी।
         इस इमामबाड़े में बाबड़ी बहुत बड़ी बनी हुई है। जिसके सामने दिल्ली की अग्रसेन की बाबड़ी कुछ मायने नहीं रखती। बाहर निकलने पर हमे ईरिक्शा मिला जिसने हमे चार पांच जगहों के नाम गिनवाए। हमें वहां के बारे में बताने के लिए भी राजी हो गया। हमें यह बहुत सस्ते का सौदा  लगा। हमें उसने अपने रिक्शे में बिठा  कर चीजे दिखानी शुरू की अंत में पता चला वह सब चीजे बहुत पास थी। जिन तक पैदल चल कर पहुँचा जा सकता था।समय की कमी के कारण हमें इन सबसे समझौता करना पड़ा। लखनऊ में ज्यादा घूमने लायक जगह नहीं है। जिन्हे घूमने का शौक  है उनके लिए यह शहर बहुत अच्छा है।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

  शादी के समय दोनों अलग  माहौल  से आए होते हैं, जिसके कारण दोनों अपने साथी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरा उसके जैसा व...