#polluted delhi

             दिल्ली का प्रदूषित वातावरण 

         मणिपुर 
       दिल्ली का राष्ट्रपति भवन
दिल्ली का वातावरण असहनीय हो गया है। ऐसे माहौल में बच्चो और बुजुर्गो के लिए जीना बहुत मुश्किल हो गया है। हर तरफ स्मोग दिखाई दे रहा है। स्मोग का मतलब कोहरा और धुंआ जब मिल जाता है। सूरज भी ऐसे में चंदा जैसा दिखता  है। समझ नहीं आता हम दिन में सूरज देख रहे है या चन्द्रमा। सूरज का तेज मद्धम  हो जाता है।  मानो  बादल  छाये हो। हलकी ठण्ड भी महसूस होती है।
         जिसने साफ आकाश नहीं देखा उसके लिए आकाश  का रंग स्लेटी ही होता है। मेरा जन्म दिल्ली में हुआ था इसलिए मेने कभी स्वच्छ आसमानी आकाश नहीं देखा था। इसलिए हमे स्लेटी आकाश देखने की  आदत पड  गयी थी। पर्वतीय प्रदेशो में भी बिलकुल स्वच्छ आकाश कभी -कभार दिखाई देता है। जहां सैलानियों के कदम कम पड़े है वही आपको प्रदुषण रहित आकाश दिखाई देगा।
       मेने जिंदगी में प्रथम बार स्वच्छ आकाश मणिपुर में देखा। उसे देखकर मेरा उसपर से निगाह हटाने का मन नहीं कर रहा था। इतने सुन्दर आकाश को निहारते मेरा मन नहीं भर रहा था। दिन में आसमानी आकाश और रात के समय तारो भरा आकाश। दिल्ली में रहते हुए  हम धूल रहित हरीभरी   धरती और नीले आकाश को बिलकुल भूल चुके है।
        दिल्ली में रहते हुए धूल भरे वातावरण की आदत पड  चुकी है। जब में मणिपुर में थी तब जिस घर में रहती थी उस घर में रोज  पोछा लगाने और धूल झाड़ने  की जरूरत भी नहीं पड़ती थी। जब कई दिन बाद  पोछा लगाओ तब एक पोछे में पूरा घर साफ हो जाता था और पोछा भी गन्दा नहीं होता था।
     वहां  नीचे खड़ी  हुई गाड़ियां मेने कभी साफ होते नहीं देखी।  उनकी सफाई की कभी जरूरत नहीं पड़ती थी। हमेशा वे साफ -सुथरी रहती थी।       
       दिल्ली में रहते हुए सोने -चांदी  के जेवर मेने कभी इतने साफ नहीं देखे जितने मणिपुर में दिखाई दिए। लोगो के गले में पड़े हुए सोने के जेवर इतने अच्छे लगते थे मानो  अभी दुकान से लाकर  पहने है।  यहाँ तक छोटे बच्चो को भी वहां कन्हैया जैसे कानो , हाथ -पेरो और गले में जेवर पहनाये जाते है। मेने तीन महीने के बच्चे को  कानो और हाथ -पेरो में जेवर पहने देखे। चांदी  के जेवर देखकर मेरा मन भी ललचा गया। मेने सोचा बड़े साफ -सफाई के द्वारा जेवर चमका लेते होंगे लेकिन बच्चे इतना ध्यान नहीं रख सकते इसका मतलब यहाँ की चांदी बिना मिलावट की बहुत अच्छी है।
          उन्हें देखकर  मेने भी चांदी के गहने खरीद लिए। जब तक वहां रही चांदी  के गहने  पहन कर अपना शौक पूरा किया और  खुश होती रही  क्योंकि जेवर चमक रहे थे । जैसे ही दिल्ली आयी दस दिन में उन गहनों  की चमक खत्म हो गई। और मुझे तब समझ आया ये दिल्ली के वातावरण का असर है दिल्ली के सुनारो का दोष नहीं है।
       मैने लगभग 35  साल बाद चांदी  के गहने  पहनने का शौक पूरा किया था। जो दिल्ली में आते ही खत्म  हो गया।  चांदी की पायल भी बरसो से नहीं पहनी क्योंकि उसको पहनने के बाद पैर काले  हो जाते थे। पायल के साथ पेरो को और ज्यादा रगड़ कर साफ करना पड़ता था।
     अब से चालीस साल पहले दिल्ली की जनसंख्या 62  लाख थी। अब दिल्ली की जनसंख्या एक करोड़ साठ  लाख हो चुकी है। लगभग तीन  गुना बढ़ने का असर हर चीज पर पड  रहा है।
      हम पहले कही से भी  पानी पी  लेते थे। लेकिन अब नल का पानी भी साफ करके पीना पड़ता है। हर इंसान घर से पानी लेकर चलता है या पैकेटबंद पानी प्रयोग करता  है। पानी का व्यापार  शुरू हो गया है।
        कीटनाशकों और रासायनिक  खादों का  अधिक प्रयोग होने लगा है जिनके कारण अनेक बीमारिया  होने लगी है। अमीर  लोग खेती की जमीन  खरीद कर जैविक खाद और पारम्परिक तरीके  से  अपने खाने की चीजे पैदा करवा रहे है। पारम्परिक तरीके  से उगे खाद्य -पदार्थ का बड़ा बाजार तैयार हो गया है। इन्हे "ऑर्गेनिक  खाद्य" कहा जाता है। सम्पन्न लोग फिर से आर्गनिक खाद्यानो को महत्त्व देने लगे है इसलिए ऑर्गेनिक खाद्यान्न बड़ी दुकानों में मिलने लगे है।  ये बाजार में मिलने वाले सामानो  से ज्यादा महंगे होते है।
         आने वाले समय में वायु प्रदुषण के कारण लोग ऑक्सीजन के सिलेंडर भी घर से लेकर चलेंगे। ऐसे समय की कल्पना बहुत भयावह लग रही है। अभी केवल मास्क की जरूरत पड  रही है। जब सिलेंडर की जरूरत पड़ेगी उससे पहले हमें चेत जाना चाहिए। यदि हम सजग नहीं हुए तब हमें जीने के लिए शहर बदलने पड़ेगे। ये सब हमारी मूल आवश्यकताये   है।
         हवा के बिना कुछ पल भी बिताना मुश्किल है। ऐसी हवा में साँस लेने से हमारा जीवन और शहरो के लोगो से कमसकम 6 साल कम हो रहा है।
       हमें पराली  की समस्या से निबटने की कोशिश करनी चाहिए। पहले ज़माने में मजदूर फसल की कटाई  करते समय नीचे  तक की कटाई कर देते थे। लेकिन मजदूरी बचाने  के लिए मशीनों से कटाई  करवाई जाती है। मशीने ऊपरी सतह से खाद्यन्न काट कर खेतो में ही साफ करके रखने लायक बना देती है  जिसके कारण जल्दी और सस्ता काम हो जाता है।
        उसके बाद बची हुई पराली  का इस्तेमाल नहीं हो पाता। क्योकि पहले ज़माने में कच्ची झोपड़ियों में छते   बनाने में पराली  का इस्तेमाल हो जाता था। ले.किन अब पक्के मकान  बनने के कारण इनका प्रयोग नहीं होता।         पहले हर घर में जानवर होते थे। पराली  से  उनके चारे की जरूरत पूरी हो जाती थी लेकिन अब किसान घरेलू  जानवर नहीं पाल  रहे।
      हमे पराली  के दूसरे इस्तेमाल सोचने होंगे जैसे "रॉटावेयर मशीन" के द्वारा पराली  के छोटे टुकड़े करके उसे मिटटी में मिलाने पर जमीन बहुत उपजाऊ हो जाएगी और खाद खरीदने के लिए पैसे भी नहीं लगेंगे । इस मशीन की कीमत 5०   हजार है। ये  सरकार  किसानो को सस्ते रूप में उपलब्ध कराये । इसकी उपयोगिता लोगो को बताने की पहल करनी चाहिए जैसे किसान और मशीने किराये पर लेकर खेती में मदद ले रहे है ऐसे ही इसे किराये पर लिया जा सकता है।
         पराली  के द्वारा कागज  ,कार्डबोर्ड  जैसे व्यवसायों के बारे में लोगो को जागरूक करना चाहिए। जब तक किसानो को पराली  के उपयोग पता नहीं चलेंगे वे अपने खेत नयी फसल उगाने  के लिए इसी तरह जलाते  रहेंगे  और वायु प्रदूषण का कारण बनेगे।
     बहुत सारे  दिनों की विद्यालयों की छुट्टियाँ  करवाएंगे। अनेक लोगो को बीमार करवा कर मौत के मुँह में धकेलने का कारण बनेगे।  हमारी सजगता ही आने वाले भयावह संकट से उबार सकेगी वरना इंसानी जीवन मौत के मुँह में जाने के लिए विवश हो जायेगा। 

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