#DOPAHAR KI DAVAT

                     दोपहर की दावत 


गर्मियों में दोपहर की दावत का अनुभव लोगो के लिए कैसा  होता है। इस विषय पर आज में अपने अनुभव आपसे साझा करना चाहती हूँ।  जिससे आप  भी  आने वाले समय में  सतर्क  हो जाये।
     इतनी गर्मी में दावत देने के नाम पर मुझे घबराहट हो रही थी। लेकिन हालत कुछ ऐसे बने कि मुझे हामी भरनी पड़ी। मेहमानो के बारे में समझ  नहीं आ रहा था कि इतनी गर्मी  को  हमारे आराम -पसंद मेहमान किस तरह सहन  करेंगे। उनके लिए गर्मियों के कारण होने वाली परेशानिया उनके मिजाज को किस तरह दुरुस्त रख  पाएंगी।
       उनकी शिकायते सुनकर मेरा क्या हाल  होगा। क्योंकि सबसे पहले रिश्तेदारों ने पूछना शुरू किया तुम्हारे घर में एक से अधिक AC  है या नहीं। जब उन्हें पता चला अधिक है. तब उन्होंने राहत की साँस ली। जब उनके आने का समय हुआ. तब मे सुबह से काम में लग गई ताकि उन्हें किसी तरह की शिकायत का मौका न मिले। लेकिन कोशिश करने के बाबजूद कमियाँ  रह ही जाती है।
      गर्मियों में खाने से ज्यादा सबके लिए पीने के साधन मुहैया कराना जरूरी था। फ्रिज को सामान से भर दिया। फिर भी बर्फ और पानी की जरूरतों के सामने मानो फ्रिज ने दम तोड़ दिया ।
        खाना अधिक संख्या में बनवाकर रखने की समस्या सामने आ गई। सर्दियों में खाना खराब नहीं होता लेकिन गर्मियों में  इतने खाने को कहाँ  रखा जाये  फ्रिज तो पीने के सामान से भर गया था ।फ्रिज से बाहर अधिकतर रखा खाना ख़राब हो गया। 
      जब मुख्य दावत दोपहर की रखी गई तब जितने मेहमानो को बुलाया गया उससे लगभग आधे  आये। उसके कई कारण लोगो ने गिनवा दिए। सबसे पहले उन्हें दोपहर की दावत याद नहीं रही । उन्होंने शाम के हिसाब से तैयार होकर चलना शुरू किया  तब पता चला दावत तो दोपहर को ही खत्म हो गई। उनकी सारी  तेयारिया रखी रह गई।
      कुछ लोगो ने नौकरी से छुट्टी न मिलने का कारण बताया। नौकरी करने वाले लगभग सभी मेहमान नहीं आये। केवल स्वव्यवसायी ही उपस्थित हुए।
    कुछ लोगो के हिसाब से जब ले जाने वाले ही घर में नहीं थे तब वे कैसे आते। औरतो को इतनी दूर अकेले जाने की आदत नहीं थी। उन्हें रास्ते पता नहीं थे इसलिए घरेलू औरते नहीं आ सकी.
      कुछ के हिसाब से वे दिल्ली से बाहर गए थे। उन्हें छुट्टियों में ही बच्चो के साथ जाने का मौका मिलता है। उन्होंने पहले से ही आरक्षण करवा रखा था। इसलिए अनुपस्थित रहे।
      मेरे अनुभव ने जो सबक सिखाया उसके अनुसार आप भी इन बातो को समझ कर ऐसी गलती मत करना। क्योंकि इससे आपको तन. मन और धन तीनो की क्षति उठानी पड़ेगी। आपकी शारीरिक मेहनत के रूप मे तन थकेगा ,लोगो के न आने के कारण धन की हानि होगी। लोगो के न आने का कारण सोच कर मन परेशान हो जायेगा। कई तरह के विचार मन को आंदोलित करते रहेंगे हमसे कब और कहाँ भूल हो गई लोगो ने किस बात को मन से लगा लिया जो नहीं आये। या हमारे बुलाने के तरीके ने उन्हें दुःख पहुंचाया।  मन  इस दुःख से कई दिन बाद बाहर आएगा। 
      मुझे किसी ने पहले ही आगाह किया था दोपहर की दावत में आजकल कम लोग आते है। सब तरक्की पसंद हो गए है लोग एक दावत के पीछे अपनी नौकरी को दाव पर लगाना पसंद नहीं करेंगे लेकिन मुझे लगा मेने जितने लोगो का हिसाब लगाया है। उससे 50 प्लेट कम का आदेश दिया है। लेकिन तब हैरानी हुई जब आधे लोग भी नहीं आये. लोग .सोचने लगे है। एक दावत के लिए एक दिन की छुट्टी क्यों ली जाये। खाने से अच्छा एक दिन की कमाई है।   आप भी समय और खाने की बर्बादी से बचने के लिए इससे सबक लीजिये।
     

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