#GANDHI IN TODAY"S CONTEXT

                                    आज के सन्दर्भ में गाँधी 

  

  आज महात्मा गाँधी जी की 150  वी  जयंती मनाई जा रही है।  लोग बहुत उत्साह से इसे त्यौहार की तरह  मना रहे है। मै  गाँधी जी को महात्मा के रूप में न मान कर एक साधारण इंसान मानती हू। जिसने हालात  को बदलने का प्रण  ले लिया। उसके कारण उन्हें कितनी भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा लेकिन वे अडिग रहे।  वे  मिलने वाली यातनाओ से घबराये नहीं।अपने निर्णय पर अडिग रहे।
          उनके जीवन में जेल और घर के माहौल में कोई अंतर नहीं था। वे  जेल में रहते हुए इस तरह अपने रोजमर्रा के कामो में इस तरह लगे रहते थे जैसे घर में रहते  काम कर रहे हो. ब्रिटिश अधिकारियो को उनके इस व्यवहार से हैरानी होती थी। गाँधी जी ने आम जनता के अंदर से भी जेल का डर  निकाल  दिया था। उनके द्वारा ही सबसे पहले जेल भरो आंदोलन की शुरुरात हुए थी। आदमी और औरत जेल जाने पर गौरान्वित महसूस करने लगे थे।
       १८५७ की आजादी  की आग लोगो के अंदर धीरे -धीरे दम तोड़ने लगी थी। भारतीय जनता के अंदर ब्रिटिश साम्राज्य का  सामना    करने की भावना खत्म हो गई थी। गाँधी जी ने उस भावना को फिर से जागृत किया। उन्होंने अकेले बढ़ने के आलावा ,सभी के अंदर स्वाभिमान से जीने की इच्छा पैदा की।  ये भावना बहुत बड़ी थी। मानो   मरते हुए इंसान को जीवित कर दिया हो।
           आज के समय में गाँधी जी के बारे में बहुत  लोग अपशब्द बोलते है। हम आजादी  के बाद पैदा होने वाली पीढ़ी है। हम उस हालात  से वाकिफ नहीं है। लेकिन बुद्धिजीवी लोग उनके सहयोग को नकार नहीं सकते।        गाँधी जी को समाज और देश में जो कमी दिखाई देती थी उसे अकेले निबटने की अपेक्षा जनांदोलन का रूप दे देते थे।
        भारतीय सफाई के लिए विशेष वर्ग तक  सीमित  थे । उनको अपने बराबर अधिकार भी देने के लिए तैयार नहीं थे ।  उनका महत्व भी नहीं समझता थे । लोग गंदगी में बैठना मंजूर करते थे लेकिन अपने हाथ से सफाई करना मंजूर नहीं था। उनकी इस आदत के कारण विदेशो में भारतीयों को गंदे लोग कहा जाता था।
      गांधीजी को ये बात खटकी। उन्होंने हर काम खुद करना शुरू किया जैसे बर्तन साफ करना, झाड़ू लगाना और पखाना साफ करना जिसे करने  की शक्ति आम लोगो में नहीं होती थी। सफाई खुद करके  लोगो को सफाई करने के लिए प्रेरित किया। साफ -स्वच्छ जगह पर रहने को उन्होंने जन -आंदोलन का रूप दे दिया।
        उनकी इस आदत को लोग 120  बर्षो में भूलने लगे थे। उसी भावना को मोदी जी ने फिर से जनांदोलन में बदल दिया। जन आंदोलन से समाज को बदलना आसान होता है। एक अकेला इंसान या सरकार  हालत को बदलने में असमर्थ होटी  है।
      मैने बहुत सालो से  सफाई कर्मियों की आवश्यकता केवल कागजो में देखी  थी प्रत्यक्ष में उनकी पगार का लाभ उठाते हुए, उच्च अधिकारियो को देखा था। जो सफाई कर्मी कार्यरत थे उन्हें भी कोई अधिकारी साफ -सफाई के लिए टोकता नहीं था। जिसके कारण 50  कमरों की सफाई करने के लिए एक कर्मी होता था। सभी को पता होता है  एक कर्मी इतनी सफाई नहीं कर सकता इसलिए सरकारी कार्यालयों में  गंदगी का अम्बार लगा होता था। अब उन्ही स्थानों पर सात कर्मी दोनों समय सफाई करते दिखाई देते है। उनके निरिक्षण के लिए समय -समय पर लोग आते रहते है।
       पहले हम यदि सफाई कर्मियों को काम के लिए कहते थे तब उनके पास ढेर सारे बहाने होते थे लेकिन अब सब अपनी जिम्मेदारी समझ कर काम करने लगे है।
        मैंने वह समय भी देखा है जब पुरे विद्यालय में एक कर्मी होता था। जो विद्यालय के समय में अधिक आमदनी के लिए आस पास के घरो में काम करने चला  जाता था। क्योंकि उसे बहुत कम वेतन दिया जाता था जिसमें  घर का गुजारा चलाना  कठिन होता था।
     मैंने वह वक्त  देखा है जब दो हजार बच्चो के विद्यालय में एक शौचालय होता था। उसे भी सफाई कर्मी सही तरीके  से साफ नहीं करता था। अधिकतर शौचालय जाम रहते थे। जिसके कारण लड़किया शौचालय में जाने से बचती थी।
           मैंने एक सफाई कर्मी ऐसा भी देखा जिसने उस इकलौते शौचालय में अपना ताला  लगा दिया था। जिसके कारण दो हजार लड़कियों को समस्या का सामना करना पड़ता था। जब उससे पूछा। उसने कहा "-इसमें मेरा सामान रखा है।इसे मैं  नहीं खोलूंगी। "उसके इस जबाब से हतप्रभ रह गई  इसके कारण लड़किया जहाँ जगह मिलती थी वही अपना काम करती थी। जिसके कारण वह सफाई कर्मी कहती थी "-इनको अक्ल नहीं है।गंद मचाती फिरती है।
      मै   मोदी जी के शौचालय अभियान और सफाई  अभियान के कारण आभारी हूँ।क्योकि गंदे शौचालय में जाने की हिम्मत नहीं होती थी। हम जैसे पढ़े -लिखे लोग खुले में जा नहीं सकते थे। हाथ में पैसे होते हुए भी बेबस थे।
     गांधीजी ने कोढ़ियो की सेवा करके लोगो के अंदर उपेक्षित और बीमार लोगो के प्रति हमदर्दी की भावना जगाई। आज भी बीमारों को उचित देखभाल और इलाज की जरूरत है। उसके लिए हमारी सरकार  ने आयुष्मान योजना और मौहल्ला क्लिनिक की शुरुरात की।
        भारत की जनसंख्या बढनेका कारण मृत्यु दर का अधिक होना है। यदि उचित समय में इलाज मिलेगा तो लोग एक या दो बच्चो से ज्यादा पैदा नहीं करेंगे। पढ़े -लिखे और अमीर  घरो में आपको एक या दो बच्चे ही मिलेंगे क्योकि उन्हें सही समय पर इलाज मिल जाता है। अभी भी भारत में गरीब राज्यों में जनसंख्या बहुत है जबकि अमीर  राज्यों में जनसंख्या का बढ़ना रुक गया है।
        अधिकतर लोग कहते है। गाँधी जी ने अछूतो को गले लगाया जो गलत था। लेकिन जब मनु ने जाति  नियमो की रचना की थी  वह  कर्म के आधार पर  निर्धारित होती थी लेकिन कालांतर में उच्च वर्ग के लोगो ने कर्म की जगह  जन्म के आधार पर  जाति निर्धारित कर दी।क्योकि उच्च वर्ग के लोग अपने बच्चो को छोटे काम करते देख नहीं सकते थे।
        निचले तबके के लोगो से सारे अधिकार छीन लिए गए। उन्हें इतना अधिक प्रताड़ित किया गया कि उन्होंने धर्म ही बदलने में भलाई समझी।क्योकि अन्य धर्मो में उन्हें समान समझा जाता था  और अनेक लाभ दिए जा रहे थे।  भारत में रहने वाले ईसाई  या मुस्लमान अधिकतर दलित वर्ग के लोग  थे।
       उच्च जाति का इंसान आसानी से धर्म नहीं बदलता। भारतीय अपनी कटटरता के कारण हिन्दू समाज को छोटा करते चले जा रहे थे जबकि ईसाई और मुसलमान बढ़ते जा रहे थे।
         सबसे पुराने धर्मो में हिन्दू धर्म की गणना की जाती है। यहाँ तक   कहा  जाता है -हिन्दू धर्म के अवशेष मालद्वीप, इंडोनेशिया , बर्मा ,मध्य एशिया ,अफगानिस्तान और अमरीका तक  मिल रहे है। तो एक भी हिन्दू राष्ट्र क्यों नहीं रहा।
      एक समय ऐसा आ गया था जब लोग खुद को हिन्दू नहीं कह रहे थे। भारतीय नेता खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने में शान समझ रहे थे। तब दूसरे देशो के लोगो से हिन्दू धर्म की छवि धूमिल होती जा रही थी। जब पहली बार मोदी जी ने विदेश में जाकर खुद को हिन्दू कहा. तब विदेशियों ने हैरानी से पूछा "-अन्य कोई नेता खुद को हिन्दू कहने की जगह धर्मनिरपेक्ष कहते है। आप ऐसा क्यों नहीं कहते। "
     जब हम अपने धर्म का सम्मान नहीं करेंगे तब दूसरा हमारे धर्म का सम्मान कैसे करेगा।
      आज के संदर्भ में भी गाँधी की उतनी ही जरूरत है जितनी अब से डेढ़ सौ साल पहले थी। हम गाँधी को वापिस बुला नहीं सकते लेकिन उनके पदचिन्हो पर चलने में कोई बुराई नहीं है।

              

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