#romharshak description of kamakhya temple

                कामाख्या मंदिर का रोमहर्षक वर्णन 

 असम  का कामाख्या मंदिर प्रसिद्व  स्थान है। इस प्रदेश में मंदिर देखने के लिए पूरे  भारत से लोग आते है। इसमें सुबह से लोगो का आवागमन शुरू हो जाता है।  मुझे लोगो से पता चला आप सुबह 6  बजे चले जायेंगे तो आपको जल्दी देवी दर्शन  हो जायेंगे इसलिए हम सुबह जल्दी  तैयार होकर  साढ़े  छह बजे तक मंदिर पहुँच गए  लेकिन इस समय तक लोगो की बहुत लम्बी पंक्ति लग चुकी थी वह पंक्ति घूम -घूम कर चल रही थी। इतनी लम्बी पंक्ति देखकर हमारी हिम्मत जबाब दे गई। हमने सोचा इतनी लम्बी पंक्ति में लगकर  सात आठ घंटे लग जायेंगे। इससे तो विशेष दर्शन करने में भलाई है।
          हम विशेष दर्शन की पंक्ति में लग गए। बहुत देर तक हमारी पंक्ति आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रही थी। तब आगे जाकर मालूम करने पर पता चला  दफ्तर खुलने का समय साढ़े सात बजे है।  हमें जल्दी लाइन में खड़े होने का फायदा नहीं हुआ। यहाँ भी हमें एक घंटे टिकट खिड़की पर खड़ा होना  पड़ा। मेने अपने साथी को लाइन में लगाया।
      मेने   पूरे  मंदिर में घूमकर दर्शन करना शुरू कर दिया। क्योंकि बर्षो से मेरी कामाख्या मंदिर देखने की इच्छा थी वह अब जाकर पूरी हो रही थी। इसे ढंग से देखने का लालच में छोड़ नहीं सकती थी।  यहाँ की वास्तुकला बिलकुल अलग तरह की थी। इस समय सफाई हो  रही थी। मुझे अधिकतर स्थानों पर सफाई की व्यवस्था उचित लगी। लेकिन कुछ लोग कह रहे थे। पहले यहाँ इतनी सफाई नहीं थी। तिलचट्टे जगह -जगह दिखाई देते थे।
      यहां के तालाब में नहाते हुए लोग दिखाई दिए। लेकिन तालाब मुझे साफ नहीं लगा। उसमे हरियाली (काई ) दिखाई दे रही थी। कुछ आगे बढ़ने पर सीढ़िया  बनी हुई थी। जिनपर चढ़ने के बाद भव्य मंदिर के दर्शन होते है.मंदिर की बाहरी  दीवारों पर अनेक मुर्तिया बनी  हुई है। उन्हें निहारना मुझे बहुत अच्छा लगा।
          साढ़े  सात बजे हमारा टिकट लेने का नम्बर आया।यहाँ की टिकट 500  रूपये की थी। एक इंसान के लिए इतने रूपये इससे पहले कभी अदा  नहीं किये थे दो जनो के लिए हमने एक हजार  चुकाए।  उसके बाद हमें एक हाल में बिठा दिया गया जहा से हमें अगली जगह आधे घंटे बाद जाने के लिए कहा गया। उसके बाद तीसरे हाल में जाने दिया गया। उसमे लगभग आधा घंटा और लग गया। फिर हमें लाइन में लगकर आगे चलने के लिए कहा  गया। हमारी लाइन आधे घंटे तक घूमती हुए आगे बडी ।
             इस लाइन में खड़े हुए हमने जानवरो की बली  के बाद कटे हुए सिर  आते देखे। उनके आते समय एक दम  शोर मच जाता था। जानवरो के सर दूसरे दरवाजे से आते थे। उस दरवाजे को सिर्फ बलि के समय ही खोला जा रहा था। उसके बाद एकदम बंद कर दिया जाता था।
        हमने मंदिर में घूमते हुए कई सिंदूर लगे हुए बकरे और कबूतर देखे थे। मुझे लगता है कबूतर पूजा करके वही छोड़ दिए जाते थे। क्योंकि वहां जितने कबूतर थे उन सबपर सिंदूर लगा हुआ था। हम शाकाहारी लोगो ने इससे पहले कभी कटे हुए सिर नहीं देखे थे इसलिए उन्हें देखकर सिहरन हो रही थी।
       मेने इससे पहले किसी मंदिर के पुजारी को लाल कपड़ो में नहीं देखा था। यहाँ अधिकतर पुजारियों  ने सुर्ख लाल रंग के कपड़े पहने हुए थे पहले बहुत अजीब लगा था। बाद में मेने एक पुजारी को पीले कुर्ते में देखा लेकिन उसके कुर्ते पर लाल धब्बे लगे हुए थे। बाद में समझ आया ये धब्बे खून के है। उस पुजारी को देखकर मुझे झुरझुरी आने लगी इतने खून से भरे धब्बे वाले कुर्ते पहन कर ये आराम से कैसे घूम रहा है। बाकि पुजारियों के सुर्ख लाल कपड़ो का होना क्यों जरूरी है इसका कारण अब समझ में आया।
         इसके बाद हमे गर्भ गृह में जाने का मौका मिला।  बाकी  सभी जगहों पर भरपूर प्रकाश था लेकिन यहाँ पर केवल दो बड़े दीपक जल रहे थे। उसके धूमिल प्रकाश में कुछ भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था। पंडित जी हमें सही तरह से निर्देश दे रहे थे लेकिन हमें वहां कुछ समझ नहीं आ रहा था। यहाँ कमल  के  फूल चढ़ाओ ,व्हने वाले जल का आचमन करो। वही दूसरी तरफ कुछ और था ,उस पंडित जी ने भी हमें समझाने  की कोशिश की लेकिन हमें वहां केवल फूलो के ढेर दिखाई दिए उसके आलावा कुछ समझ नहीं आ रहा था। हमें वहां तसल्ली से रुकने का मौका मिला। लेकिन समझ नहीं आ रहा था। हम यहां देखने क्या आये है। कमसकम इतना प्रकाश करते जिससे आसपास की चीजे समझने का मौका मिलता।
        हमने दर्शन करने के बाद बाहर निकलते समय कुछ और लोगो को उस दरवाजे से अंदर आते देखा पता चला वह vvip दरवाजा है। वे लोग केवल कुछ मिनट में गर्भ गुफा तक पहुंच सकते है। हमने वहां मिल्ट्री वालो की अलग लाइन देखी। इस तरह यहाँ पर चार तरीके  से दर्शन होते देखे।
        मै  हाथ में प्रसाद की थैली ले जा रही थी। उसमे मेवे थे। एक बंदर ने मेरी थैली झपट ली। में उसे देखती रह गई। जो थोड़ा सा प्रसाद बचा  था उसी का भोग लगा दिया। वैसे प्रसाद हम अपनी संतुष्टि के लिए खरीदते है। वरना प्रसाद चढ़ाने की हमें कही जगह नहीं दिखाई दी।
        कुछ समय बाद मुझे वहां से जाने का दुबारा मौका मिला तो मुझे देखकर हैरानी हुई बंदर ने किशमिश सारी  छोड़ कर केवल दूसरे मेवे खाये है। मुझे उस बंदर पर बहुत गुस्सा आया उसने बादाम ,काजू और नारियल खाकर सारी किशमिश बर्बाद कर दी थी। अगर खा लेता तो संतुष्टि होती।
       हमें मांस  का प्रसाद  बंटता कही दिखाई नहीं दिया। बलि किसी अन्य जगह पर दी जाती है। यहां पर केवल सिर लेकर पूजा की जाती है।
       प्रसाद के अगरवत्ती और  दिए जलाने के अलग स्थान बनाये गए है। श्रद्धा भाव से लोग वहां अगरवत्ती और दिए जला रहे थे।
        कामाख्या मंदिर 51  शक्तिपीठो में से एक है। यहाँ शिव की पत्नी सती  की योनि गिरी थी। जून मास में अम्बुवाची पर्व मनाया जाता है। उस समय सती  को रजस्वला मान कर मंदिर के पट  बंद कर दिए जाते है। इस पर्व में शामिल होने के लिए दूर -दूर से लोग आते है।
       मंदिर से कुछ दूर   ब्रह्मपुत्र नदी के अंदर उमानंदा मंदिर है। जिसके बारे में कहा जाता है जब शिवजी के कंधे से विष्णुजी के द्वारा सारे  अंग काट दिए जाने पर भारहीन  होने पर शिवजी का क्रोध खत्म हुआ। तब उन्होंने उमानंदा  स्थान पर तपस्या करनी शुरू कर दी। इसी स्थान पर कामदेव ने उनकी तपस्या भंग  करने की कोशिश की। यहां पर शिवजी ने कामदेव को भस्म कर दिया। क्रोध शांत होने पर  दुबारा  से यही पर उन्हें  जीवन दान दिया था।
       मुझे शिवजी और सती  की कहानी और यहाँ होने के कारण मुझे लग रहा था जैसे मै  पौराणिक काल में पहुंच गई हूँ। मै  स्वयं को वहां पाकर रोमांच से भर उठी हूँ। इस तरह का एहसास इससे पहले मुझे कभी नहीं हुआ था। 

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