#taras

    सुकन्या को अलीगढ छोड़कर वेद दिल्ली आ  गया। दिल्ली में बुआजी किराये के छोटे से  मकान में  रहती थी। वहाँ  जगह की कमी थी पर उनके दिल बड़े थे उन्होंने तहेदिल से वेद का स्वागत किया। उसे घर में अपने पन  का अहसास हुआ। अब वेद को दिल्ली में रोजगार की तलाश थी। उसने इधर -उधर जहाँ  भी नौकरी की उम्मीद होती। वह वहाँ  जाकर अपनी किस्मत आजमाते। लेकिन उन्हें लगता उनकी किस्मत कही जाकर सो गयी है। हर जगह से नाउम्मीदी की खबरे आ  रही थी।
     एक महीने तक वेद लगातार नौकरी की उम्मीद में जाते रहे। अंतत उनकी कोशिश रंग लायी। उन्हें एक कारखाने  में नौकरी मिल गयी। नौकरी बहुत अच्छी तो नही थी लेकिन गुजारा  चल सकता था। वे यहाँ भी दिनरात एक करके काम कर रहे थे। उनकी कड़ी मेहनत देखकर सभी खुश थे।
        जब उन्हें पहले महीने की तनख्वाह मिली उसमे से उन्होंने बहुत कम  खर्च किये बाकी  सारे रूपये अलीगढ़ अपने पिताजी के पास भिजवा दिए। उन्हें लग रहा था उनकी बेटी और पत्नी जब उनके पिताजी के साथ रह रही है। तो दोनों की जिम्मेदारी सिर्फ उनकी है।  उनके पिताजी उसकी बेटी और पत्नी को अपने घर में रख रहे है  यही बहुत बड़ी बात है। वे सुबह से रात  तक काम करते। जो घर से खाना ले जाते वही  खाते  । भूख कितनी भी ज्यादा लगती थी बे कुछ भी बाहर का नही खाते  कही घर के लिए पैसे कम न पड  जाये। शाम को थकन और भूख से उतरा चेहरा देखकर  उनकी बुआजी को बहुत तरस  आता।
       बुआजी कई बार उससे कहती- कुछ अपने ऊपर  भी खर्च कर लिया कर।
     वेद हमेशा अपनी मज़बूरी की दुहाई देकर रह जाता। उसका दर्द उनकी बुआजी को समझ में आ  जाता। बुआ उनके लिए माँ के सामान थी। उनका दिल उसकी बेबसी पर तड़प कर रह जाता। वह उनके लिए ज्यादा कुछ भी नही कर सकती थी।
         बुआजी की पांच बेटियाँ  और दो बेटे थे। उनके पति की आमदनी भी ज्यादा नही थी सातो बच्चे बड़े थे। उनकी पांच बेटियाँ  शादी लायक थी। वे उनकी शादी के कारण ज्यादा पैसे बचाने  की फ़िराक में रहती थी। किसी तरह उनकी बेटियो की शादी अच्छे घर में हो जाये।आजादी के बाद का समय था। उस ज़माने में लड़कियों से कमाने के बारे में कोई सोचता भी नही था। इसलिए उन्हें अपनी जमापूंजी में से लड़कियों की शादी का खर्चा  वहन करना था।  पैसे के हिसाब से सभी का हाथ तंग था। उनके दिल में एक दूसरे के लिए बहुत प्यार था। इसी कारण सब परस्पर सम्ब्द्ध  थे।
    अलीगढ़ में सुकन्या को हर समय ताने  सुनाये जाते -तेरा निठल्ला पति तुम दोनों को हमारे उपर छोड़ कर चला गया है। हमसे अपना खर्चा  तो उठता नही उस पर तुम दोनों के लिए पैसे कहाँ  से लाये।
     ये सुनकर सुकन्या आंसू  पीकर रह जाती उसके पास पति के पास तक खबर पहुँचाने  का कोई साधन नही था। वह चिठ्ठी भी नही लिख सकती थी। क्योंकि उसको पढ़ाया ही नही गया  था। उस ज़माने में लड़कियों को पढ़ाने  का रिवाज ही नही था। वह घर से बाहर निकल कर किसी से चिट्टी भी नही लिखवा सकती थी। उस के दुःख के बारे में कोई उसका साथी नही था। वह अपनी नन्ही सी सुमन के सामने अपना दुखड़ा सुना कर अपने दिल की भड़ास निकाल कर रह जाती थी। वह नासमझ कुछ समझ नही पाती  थी। ये बात सुकन्या को भी पता था। लेकिन जब दुःख बहुत बड  जाता है  तो किसी ना किसी के सामने निकाल कर मन को तसल्ली मिल जाती है। ऐसी ही हालत सुकन्या की थी। उसे पता था सुमन उसके दुःख को कम  नही कर सकती। पर उसको किसी और का सहारा नही था। उसे नासमझ सुमन ही अपनी लगती। जिसके सामने वह अपना दुःख उड़ेल सकती थी। 

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