वेद अस्पताल से घर वापस आये। अभी उनकी तबियत सही नही थी। उनके सारे मददगार उन्हें छोड़कर जा चुके थे। सभी के मन में उनके मरने का विश्वास था । उन्हें उम्मीद थी कि अस्पताल से कोई जीवित नही आता। जो जैसे पैसा खीच सकता था उसने सारा रुपया वहाँ से ले लिया। उनको वेद के परिवार पर कोई दया नही आई। वेद उन सब के धोखे से टूट गए। कुछ लोग दुनियाँ में सिर्फ धोखा खाने के लिए आते है। वेद भी उनमे से एक थे। वेद शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों से टूट गए थे। अब उन्हें पैसे के बारे में सोचना था। उनकी सारी जमापूंजी खत्म हो चुकी थी। वे घर कैसे चलाये इस बारे में नए सिरे से सोचना पड़ रहा था।
वेद को सही खुराक तो क्या नसीब होती अब खाने के लाले पड़ गए थे। एक दिन वेद ने सुकन्या से कहा -मुझे तुम मेरे लेनदारो के पास ले चलो। ऐसे तो पैसे देने कोई घर नही आयेगा मुझे देखकर वो मेरा पैसा वापिस करने के बारे में सोचेंगे।वे कुछ पैसा लौटा देंगे जिससे घर चलाने में तुम्हे सहूलियत हो जाएगी। बच्चो की तरफ देखकर बहुत दुःख होता है।
सुकन्या उनकी तबियत के बारे में सोच कर बोली -इतनी ख़राब हालत में तुम इतना सफर कैसे कर सकोगे। अभी तक तुम्हारे लिए घर में चलना भी बहुत मुश्किल हो रहा है।
वेद बोला -घर चलाने के लिए पैसे की जरूरत है। तुमने अभी तक दुनियाँ का सामना नही किया है। बच्चे बहुत छोटे है। मेरे आलावा कौन तुम्हारी मदद के लिए आएगा। मुझे कोई दूर तक दिखाई नही दे रहा है
उनका सुझाव सुकन्या को ठीक लगा। उन्होंने गाड़ी मंगवाई एक तरफ सुकन्या ने सहारा दिया दूसरी तरफ से सुमन ने सहारा दिया। उन दोनों की मदद से वेद लेनदारों के पास गया। वहाँ जाकर उन्हें सबकी बेईमानी के बारे में पता चला। अधिकतर जगह से सभी पैसा उनके नाम से दूसरे लोग ले जा चुके थे। सुकन्या और सुमन का बाहरी दुनिया का अनुभव नया था। दुनियाँ की चालबाजी देखकर वे हैरान हो गयी। थोड़ा पैसा वेद को देखकर लेनदारों ने चूका दिया पर वह ज्यादा दिन तक चलने वाला नही था।
घर वापस आकर सभी सोच में डूब गए अब क्या किया जाये जिससे घर खर्च निकल सके। सुकन्या और वेद दोनों बुरी तरह टूट चुके थे। उनके अंदर जीने की इच्छा ही नही बची थी।
ऐसे में सुमन ने अपने माँ और पिता को सुझाव दिया- हमारे पास अभी भी मशीने है। कुछ कच्चा सामान बचा है। हम ज्यादा मजदूरो को नही रखेंगे बल्कि दो मजदूरो के साथ मिलकर काम करेंगे। अभी के लिए ये कच्चा मॉल पूरा करके देखते है। तब तक आपकी तबियत ठीक हो जाएगी। आप मुझे एकबार कारखाना चलाने की इजाजत दे दीजिये शायद हमारी हालत सुधर जाये। हाथ पे हाथ रख कर बैठने से तो काम करना ज्यादा अच्छा रहेगा।
वेद कर्मठ इंसान थे। उन्होंने कभी नही सोचा था। उन्हें अपनी बेटी की मदद लेनी पड़ेगी। उनकी मजबूरी ने उन्हें सुमन को कारखाना चलाने की आज्ञा देनी पड़ी। अभी वेद काम करने की हालत में नही थे।
वेद को सही खुराक तो क्या नसीब होती अब खाने के लाले पड़ गए थे। एक दिन वेद ने सुकन्या से कहा -मुझे तुम मेरे लेनदारो के पास ले चलो। ऐसे तो पैसे देने कोई घर नही आयेगा मुझे देखकर वो मेरा पैसा वापिस करने के बारे में सोचेंगे।वे कुछ पैसा लौटा देंगे जिससे घर चलाने में तुम्हे सहूलियत हो जाएगी। बच्चो की तरफ देखकर बहुत दुःख होता है।
सुकन्या उनकी तबियत के बारे में सोच कर बोली -इतनी ख़राब हालत में तुम इतना सफर कैसे कर सकोगे। अभी तक तुम्हारे लिए घर में चलना भी बहुत मुश्किल हो रहा है।
वेद बोला -घर चलाने के लिए पैसे की जरूरत है। तुमने अभी तक दुनियाँ का सामना नही किया है। बच्चे बहुत छोटे है। मेरे आलावा कौन तुम्हारी मदद के लिए आएगा। मुझे कोई दूर तक दिखाई नही दे रहा है
उनका सुझाव सुकन्या को ठीक लगा। उन्होंने गाड़ी मंगवाई एक तरफ सुकन्या ने सहारा दिया दूसरी तरफ से सुमन ने सहारा दिया। उन दोनों की मदद से वेद लेनदारों के पास गया। वहाँ जाकर उन्हें सबकी बेईमानी के बारे में पता चला। अधिकतर जगह से सभी पैसा उनके नाम से दूसरे लोग ले जा चुके थे। सुकन्या और सुमन का बाहरी दुनिया का अनुभव नया था। दुनियाँ की चालबाजी देखकर वे हैरान हो गयी। थोड़ा पैसा वेद को देखकर लेनदारों ने चूका दिया पर वह ज्यादा दिन तक चलने वाला नही था।
घर वापस आकर सभी सोच में डूब गए अब क्या किया जाये जिससे घर खर्च निकल सके। सुकन्या और वेद दोनों बुरी तरह टूट चुके थे। उनके अंदर जीने की इच्छा ही नही बची थी।
ऐसे में सुमन ने अपने माँ और पिता को सुझाव दिया- हमारे पास अभी भी मशीने है। कुछ कच्चा सामान बचा है। हम ज्यादा मजदूरो को नही रखेंगे बल्कि दो मजदूरो के साथ मिलकर काम करेंगे। अभी के लिए ये कच्चा मॉल पूरा करके देखते है। तब तक आपकी तबियत ठीक हो जाएगी। आप मुझे एकबार कारखाना चलाने की इजाजत दे दीजिये शायद हमारी हालत सुधर जाये। हाथ पे हाथ रख कर बैठने से तो काम करना ज्यादा अच्छा रहेगा।
वेद कर्मठ इंसान थे। उन्होंने कभी नही सोचा था। उन्हें अपनी बेटी की मदद लेनी पड़ेगी। उनकी मजबूरी ने उन्हें सुमन को कारखाना चलाने की आज्ञा देनी पड़ी। अभी वेद काम करने की हालत में नही थे।
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