वेद और सुकन्या पर बेटे का जोड़ा बनाने का दबाब पड़ रहा था।
सब आकर कहते - एक बेटे से क्या होता है। इसका जोड़ा होना चाहिए।
इन बातो का असर उनपर पड़ा। उन्होंने एक और बार बच्चे के बारे में सोचा। इस बार उनके घर बेटे ने जन्म लिया। उसका भविष्य पंडितो ने बहुत अच्छा बताया साथ ही उसे अभिभावकों के लिए भारी बताया। लेकिन बेटे को पा कर वे निहाल हो गए थे। उनका व्यवसाय इतना अच्छा चल रहा था उन्हें लगा ही नही बेटा उनका किसी रूप में भारी हो सकता है.
शिखर के होते ही व्यापार में घाटा होना शुरू हो गया। दिनों दिन हालत बिगड़ने लगी। अब वेद मेहनत के साथ भाग्य को भी मानने लगे। वे दिनरात मेहनत करते लेकिन हालत सुधरने का नाम ही नही ले रही थी।
अब वेद के पेट में असहनीय दर्द रहने लगा था। ये दर्द उनकी बर्दास्त के बाहर था। वे अपने उपर नियंत्रण नही रख पाते थे। इस बीच उनका भाई उनके काम में गिरावट देखकर उन्हें छोड़कर कही और काम करने लगा।
उनके पास सहायक के रूप में उनका कोई हमदर्द नही रहा था। ऐसे में जब वेद की हालत बहुत ख़राब हो जाती तब सुमन ही उनके इलाज के लिए डॉकटर के पास जाती। सुकन्या अनपढ़ और घरेलू औरत थी वह पति के बिना अकेली कभी घर से बाहर नही निकली थी उसके अंदर आत्मविश्वास की कमी थी इसलिए जब कभी वेद की हालत रात के समय खराव हो जाती तब भी सुमन उनके इलाज के लिए डॉ के पास जाने से गुरेज नही करती थी। उनकी बेटी सुमन अब 16 साल की हो रही थी। वह अद्वितीय सुंदर थी। हालत ने उसे नाजुक और कमजोर समझने का मौका ही नही दिया। वह दिनरात वेद के स्वास्थ्य के लिए पार्थना करती रहती।
एक तरफ वेद की माली हालत खराव होती जा रही थी। दूसरी और उनका स्वास्थ्य उनका साथ नही दे रहा था। वे अपनी तरफ से काम को सँभालने की पूरी कोशिश कर रहे थे। पर कुछ भी ठीक नही हो पा रहा था। दिनों दिन वेद की हालत बिगड़ती जा रही थी। उनको देखकर सभी डरे हुए थे। उन्हें देखकर डॉ ने ऑपरेशन के लिए कहा। उस समय लोग ऑपरेशन से बहुत डरते थे। सभी के मन में डर था कि ऑपरेशन कराने वाले जिन्दा नही बचते।
वेद के सामने उसके निरीह बच्चे उसे ऑपरेशन करवाने से रोक रहे थे। वेद का सबसे छोटा बेटा सिर्फ चार साल का था। कोई बच्चा समझदार नही था।
वेद हमेशा सोचते - मुझे कुछ हो गया तो मेरे परिवार को कौन देखेगा।
वे अपने दर्द को बर्दास्त करने की कोशिश करते रहते। अब दर्द बहुत जल्द होने लगा था। वेद के बर्दास्त के बाहर हो गया था। अब सबने वेद का ऑपरेशन करवाने के लिए डॉ से बात की सबको उनके ऑपरेशन की खबर भिजवा दी गयी।
वेद को हॉस्पिटल में भर्ती करवा दिया गया। उनके पिताजी आ गए थे। सुकन्या और सुमन वेद की देखभाल में लगी रहती थी। इस समय उनका कोई मददगार नही था। एक दिन अस्पताल से जब सुकन्या घर आई तो उसने मुंशीराम को अलमारी को खोल कर खड़े देखा।
उसने मुंशीराम से पूछा -आप यहाँ क्या कर रहे है. आपको कुछ चाहिए तो मुझे बता दीजिये में आपको दे देती हूँ।
मुंशीराम ने कहा -में अलीगढ़ के मकान के कागज ढूंढ रहा हूँ।
सुकन्या बोली -आप इनके आने पर इनसे ले लेना। ऐसे आपको परेशानी होगी। वे आपको आकर दे देंगे।
मुंशीराम बोले -अस्पताल में जाकर कोई वापस आता है जो वेद वापस आएगा। इसलिए में मकान के कागज अलीगढ़ ले जाऊंगा।
सुकन्या मुंशीराम के शब्द सुनकर सन्न रह गयी। एक पिता अपने बेटे के लिए ऐसे शब्द बोल सकता है। उसने मुंशीराम से कुछ नही कहा.लेकिन शर्म लिहाज में मुंशीराम ने अलमारी बंद करके चाबी सुकन्या को दे दी। उस समय बहु ससुर का सामना नही किया करती थी।
वेद अलीगढ़ नियमित रूप से पैसे भेजा करते थे। जिस महीने वेद अलीगढ़ पैसे नही भेज [पाते थे। मुंशीराम कोई काम नही करते थे। इसलिए उनके लिए घर चलाना बहुत मुश्किल था वे सिर्फ वर्तमान जरुरतो के बारे में सोचते थे उनके लिए भविष्य कोई मायने नही रखता था अलीगढ़ के घर चलाने की जिम्मेदारी भी वेद की थी। पैसे की कमी होने पर मुंशीराम मकान को गिरवी रख देते थे।
वेद हमेशा सोचते इनके पास एक छत तो रहनी चाहिए। इसलिए वेद पैसे का जुगाड़ करके उनका मकान छुड़वा के उनके मकान की रजिस्ट्री उन्हें वापस दे आते थे। ऐसा कई बार हुआ। तो परेशान होकर वेद ने रजिस्ट्री छुड़वाने के वाद पिताजी को नही दी और उसे दिल्ली ले आये थे। मुंशीराम को बेटे की तबियत की चिंता नही थी बल्कि सिर्फ मकान के बारे में सोच रहे थे.
सब आकर कहते - एक बेटे से क्या होता है। इसका जोड़ा होना चाहिए।
इन बातो का असर उनपर पड़ा। उन्होंने एक और बार बच्चे के बारे में सोचा। इस बार उनके घर बेटे ने जन्म लिया। उसका भविष्य पंडितो ने बहुत अच्छा बताया साथ ही उसे अभिभावकों के लिए भारी बताया। लेकिन बेटे को पा कर वे निहाल हो गए थे। उनका व्यवसाय इतना अच्छा चल रहा था उन्हें लगा ही नही बेटा उनका किसी रूप में भारी हो सकता है.
शिखर के होते ही व्यापार में घाटा होना शुरू हो गया। दिनों दिन हालत बिगड़ने लगी। अब वेद मेहनत के साथ भाग्य को भी मानने लगे। वे दिनरात मेहनत करते लेकिन हालत सुधरने का नाम ही नही ले रही थी।
अब वेद के पेट में असहनीय दर्द रहने लगा था। ये दर्द उनकी बर्दास्त के बाहर था। वे अपने उपर नियंत्रण नही रख पाते थे। इस बीच उनका भाई उनके काम में गिरावट देखकर उन्हें छोड़कर कही और काम करने लगा।
उनके पास सहायक के रूप में उनका कोई हमदर्द नही रहा था। ऐसे में जब वेद की हालत बहुत ख़राब हो जाती तब सुमन ही उनके इलाज के लिए डॉकटर के पास जाती। सुकन्या अनपढ़ और घरेलू औरत थी वह पति के बिना अकेली कभी घर से बाहर नही निकली थी उसके अंदर आत्मविश्वास की कमी थी इसलिए जब कभी वेद की हालत रात के समय खराव हो जाती तब भी सुमन उनके इलाज के लिए डॉ के पास जाने से गुरेज नही करती थी। उनकी बेटी सुमन अब 16 साल की हो रही थी। वह अद्वितीय सुंदर थी। हालत ने उसे नाजुक और कमजोर समझने का मौका ही नही दिया। वह दिनरात वेद के स्वास्थ्य के लिए पार्थना करती रहती।
एक तरफ वेद की माली हालत खराव होती जा रही थी। दूसरी और उनका स्वास्थ्य उनका साथ नही दे रहा था। वे अपनी तरफ से काम को सँभालने की पूरी कोशिश कर रहे थे। पर कुछ भी ठीक नही हो पा रहा था। दिनों दिन वेद की हालत बिगड़ती जा रही थी। उनको देखकर सभी डरे हुए थे। उन्हें देखकर डॉ ने ऑपरेशन के लिए कहा। उस समय लोग ऑपरेशन से बहुत डरते थे। सभी के मन में डर था कि ऑपरेशन कराने वाले जिन्दा नही बचते।
वेद के सामने उसके निरीह बच्चे उसे ऑपरेशन करवाने से रोक रहे थे। वेद का सबसे छोटा बेटा सिर्फ चार साल का था। कोई बच्चा समझदार नही था।
वेद हमेशा सोचते - मुझे कुछ हो गया तो मेरे परिवार को कौन देखेगा।
वे अपने दर्द को बर्दास्त करने की कोशिश करते रहते। अब दर्द बहुत जल्द होने लगा था। वेद के बर्दास्त के बाहर हो गया था। अब सबने वेद का ऑपरेशन करवाने के लिए डॉ से बात की सबको उनके ऑपरेशन की खबर भिजवा दी गयी।
वेद को हॉस्पिटल में भर्ती करवा दिया गया। उनके पिताजी आ गए थे। सुकन्या और सुमन वेद की देखभाल में लगी रहती थी। इस समय उनका कोई मददगार नही था। एक दिन अस्पताल से जब सुकन्या घर आई तो उसने मुंशीराम को अलमारी को खोल कर खड़े देखा।
उसने मुंशीराम से पूछा -आप यहाँ क्या कर रहे है. आपको कुछ चाहिए तो मुझे बता दीजिये में आपको दे देती हूँ।
मुंशीराम ने कहा -में अलीगढ़ के मकान के कागज ढूंढ रहा हूँ।
सुकन्या बोली -आप इनके आने पर इनसे ले लेना। ऐसे आपको परेशानी होगी। वे आपको आकर दे देंगे।
मुंशीराम बोले -अस्पताल में जाकर कोई वापस आता है जो वेद वापस आएगा। इसलिए में मकान के कागज अलीगढ़ ले जाऊंगा।
सुकन्या मुंशीराम के शब्द सुनकर सन्न रह गयी। एक पिता अपने बेटे के लिए ऐसे शब्द बोल सकता है। उसने मुंशीराम से कुछ नही कहा.लेकिन शर्म लिहाज में मुंशीराम ने अलमारी बंद करके चाबी सुकन्या को दे दी। उस समय बहु ससुर का सामना नही किया करती थी।
वेद अलीगढ़ नियमित रूप से पैसे भेजा करते थे। जिस महीने वेद अलीगढ़ पैसे नही भेज [पाते थे। मुंशीराम कोई काम नही करते थे। इसलिए उनके लिए घर चलाना बहुत मुश्किल था वे सिर्फ वर्तमान जरुरतो के बारे में सोचते थे उनके लिए भविष्य कोई मायने नही रखता था अलीगढ़ के घर चलाने की जिम्मेदारी भी वेद की थी। पैसे की कमी होने पर मुंशीराम मकान को गिरवी रख देते थे।
वेद हमेशा सोचते इनके पास एक छत तो रहनी चाहिए। इसलिए वेद पैसे का जुगाड़ करके उनका मकान छुड़वा के उनके मकान की रजिस्ट्री उन्हें वापस दे आते थे। ऐसा कई बार हुआ। तो परेशान होकर वेद ने रजिस्ट्री छुड़वाने के वाद पिताजी को नही दी और उसे दिल्ली ले आये थे। मुंशीराम को बेटे की तबियत की चिंता नही थी बल्कि सिर्फ मकान के बारे में सोच रहे थे.
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